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1. Who is Jesus?

1. यीशु कौन है?

मसीहत से संबंधित मेरी सबसे पुरानी यादों में था, लगभग 9 वर्ष की आयु में स्कूल जाना।  जैसे मैं सेलिब्रेशन आर्मी चर्च के पास से गुजरा, दीवार पर टंगे एक पोस्टर ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। उस पर लिखा था, "क्या तुम सचमुच जीवित हो?" मैंने सोचा, जो मैंने अब तक पढ़ा था उसमें से यह अब तक का सबसे बेतुका कथन था। मैं जीवित हूं तभी तो मैं उस बेवकूफी भरी बात को पढ़ पा रहा हूं। इसके लिए कोई व्यवस्था नहीं थी और मुझे ऐसा प्रतीत होता था कि मसीही लोग सबसे अधिक नसमझ लोग हो सकते हैं। निश्चित तौर पर, जब मैं स्वयं मसीही बना तो मैंने जाना कि जब कोई व्यक्ति मसीह के पास आता है तो वह एक अलग प्रकार के जीवन में प्रवेश करता है मसीह में एक नया जीवन, जहां एक व्यक्ति "सचमुच जीवित हो जाता है

 


मसीहत के विरुद्ध मेरा पश्चताप पूर्ण रवैया मुझे बहुत सारे नए युगकी सामग्री और दूसरे धर्मों की खोज में से लेकर गया। अंत में जिसने मुझे मसीहत की ओर देखने के लिए विवश किया वह हैल लिन्से नामक लेखक द्वारा लिखी गई पुस्तक थी, जिसका नाम था,  "The Late Great Planet Earth" (स्वर्गीय महान ग्रह पृथ्वी) उसने कई सारे प्रमाण दिए कि यीशु जीवित और अच्छा था और बहुत सारी बाइबल की भविष्यवाणियां जो उसके लौटने के विषय में लिखी गई हैं पूरी हुईं हैं और हो रहीं हैं। मुझे आपके बारे में नहीं पता लेकिन इससे पहले कि मैं अपना जीवन मसीह को देता, मुझे बहुत सारी जानकारी की आवश्यकता थी।

 मेरे जीवन का क्या अर्थ है, इस खोज की शुरुआत मै गंभीरता से करने लगा। मैं इस बात पर विश्वास नहीं करता कि आप गणितज्ञ या वैज्ञानिक प्रमाण से मसीहत को साबित कर सकते हैं लेकिन इस बात के भारी प्रमाण है कि यदि इसे न्यायालय में पेश किया जाए तो कोई भी तर्क समझने वाला व्यक्ति प्रमाणों को तोल कर यह निर्णय दे देगा कि मसीहत सच्ची है। इस अध्ययन में मैं आपके विचारण के लिए मसीह के व्यक्तित्व के बारे में कुछ ऐतिहासिक प्रमाणों को जांचना चाहूंगा और यह कि वह कौन था?

 सर्वप्रथम हम कैसे जानते हैं कि उसका अस्तित्व था?

 मुझे बताया गया कि सम्यवादी रूसी शब्दकोश में यीशु को एक काल्पनिक जन के रूप में दिखाया गया है जिसका कभी अस्तित्व नहीं था। कोई भी गंभीर इतिहासकार आज इस विचारधारा को नहीं रख सकता। यीशु के अस्तित्व के बारे में बहुत सारे प्रमाण हैं। नए नियम से प्रमाण, बल्कि गैर मसीही लेखी से भी। उदाहरण के लिए, दोनों रोमी इतिहासकारी टैसीट्स  (प्रत्यक्ष रूप से) और  सुईटोनिअस (अप्रत्यक्ष रूप से) ने उनके विषय में लिखा है।

 

फिर से ३७ ईसवी में जन्मे यहूदी इतिहासकार फ्लाविअस जोसेफ (स्पष्टता: एक गैर मसीही) यीशु और उसके चेलों का इस प्रकार से वर्णन करते हैं:

अब इस समय के लगभग एक बुद्धिमान मनुष्य था, यीशु यदि उसे मनुष्य कहना नियोजित हो क्योंकि वह भले कामों का करने वाला था, ऐसे लोगों का शिक्षक जो सच/सत्य को आनंद के साथ ग्रहण करते हैं। उसने अपनी ओर दोनों को खींच लिया- बहुत से यहूदी और बहुत से अन्य जातियाँ। वह मसीही था, और अब पिलातुस, ने हम में से मुख्य लोगों के सुझाव पर, उसे क्रूस पर दंडित किया, उसे जो उससे पहले प्रेम करते थे उन्होंने उसे छोड़ा नहीं, क्योंकि तीसरे दिन वह उन्हें फिर जीवित दिखाई दिया, जैसा की दिव्य भविष्यवक्ताओं ने यह सब और उससे संबंधित दस हजार और सुंदर बातें पहले ही बता दी थी, और मसीह जाति जो उसके नाम से बुलाई जाती है आज के समय में विलुप्त नहीं है।

1. हम कैसे जाने कि जो उन्होंने लिखा वह बदला नहीं गया? क्या नए नियम के लेख विश्वसनीय हैं?

शायद कुछ लोग कहेंगे कि नया नियम काफी समय पहले लिखा गया। हम कैसे जाने कि जो उन्होंने लिखा वह सालों में नहीं बदला? इसका उत्तर शाब्दिक आलोचना के विज्ञान में छिपा है। इसका अर्थ है कि जितनी लिखित सामग्री या मनुस्मृतियाँ हमारे पास हैं  और जितने समय के निकट यह लिखी गई, उनके मूल  होने में उतना ही कम संदेह रह जाता है।
आइए हम नए नियम की तुलना, हमें दिए गए अन्य प्राचीन लेखों से करें। स्वर्गीय प्रोफेसर एफ.एफ. ब्रूस (जो कि यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर, इंग्लैंड में वचन पर टिप्पणी के रायलंइज प्रोफेसर थे) इस बात की ओर संकेत करते हैं कि  सीजर्ज गैलिक वार के लिए हमारे पास नौ या दस प्रतियां हैं  और उनमें से सबसे पुरानी कैसर के समय में लगभग नौ साल बाद लिखी गई। लुवीज रोमी इतिहास के लिए हमारे पास बीस से अधिक प्रतियाँ नहीं है जिसमें से सबसे पुरानी लगभग सौ  ईसवी के आसपास आती है। जब हम नए नियम पर आते हैं तो हमारे पास बहुत सारी सामग्री है। नया नियम चालीस और सौ ईसवीं के बीच लिखा गया। हमारे पास संपूर्ण नए नियम के लिए सर्वोत्तम  मनुस्मृतियाँ हैं जो तीन सौ ईसवी के आस-पास से है (समय सीमा केवल तीन सौ साल) प्यरी पर लिखे  नए नियम के अधिकांश लेख तीसरी शती से और यहुन्ना के सुसमाचार का हिस्सा भी जो लगभग एक सौ तीस ईसवी में लिखा है।  गया लगभग पाँच हजार से अधिक यूनानी मनुस्मृतियाँ, दस हजार से ज्यादा  लैटिन मनुस्मृतियां, और नौ हजार तीन सौ  अन्य मनुस्मृतियाँ  साथ ही  छत्तीस हजार से अधिक हवाले प्राचीन कलीसिया के अगुवों के लेखों में।

 

कार्य   कब लिखी गई  प्राचीनतम प्रतियाँ   समय अवधी (वर्षो में) प्रतियों की संख्या

 

हैरोडोस 488-428. पू.  900 ईसवी1300 8

 

थ्यूसीडाईडस 0.460-400 o पूo900 ईसवी1300   8

 

टैसीट्स  100 ईo पूo   100 o पूo   100020

 

सीजर्स गैलिक  58-50 o पूo100 o पूo150 9.10

 

युद्ध

 

लिवि का रोमी इतिहास49 ईo पूo-17 ईसवी900ईसवी 900 20

 

नया नियम  40-100 ईसवी 130 ईसवी300 संपूर्ण मनुस्मृतियाँ  350ईसवी

 

5,000$यूनानी 10,000लातीन 9300अन्य

 

इस क्षेत्र में एक अग्रणी विद्वान सर फ्रेडरिक केनयम की बात को दोहराते हुए एफo एफo ब्रूस प्रमाण का सार देते हैं:

 

 मूल लेखो और प्राचीनतम परमाणु के अस्तित्व में होने की तिथियों के बीच की अवधि बहुत कम या न के बराबर हो जाती है, और किसी भी संदेह के लिए आखिरी आधार का वचन हमारे पास अधिकांश वैसे ही पहुंचा जैसे लिखा गया, अब हट गया है। अतः यह मान लिया जाए कि नए नियम की पुस्तकें सच्ची और खरी है’

 

तो हम प्राचीनतम मनुस्मृति से जानते हैं कि वह था, पर वह कौन है?

 

 मार्टिन सकोर्सिज, एक फिल्म निर्माता ने एक बार अपमानजनक फिल्म बनाई जिसका नाम था  English the Last Temptation of Christ” (मसीह की आखिरी परीक्षा)। जब उनसे फिल्म बनाने का कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वह यह दिखाना चाहते थे कि यीशु सचमुच में एक इंसान था। फिर भी ज्यादातर लोगों के मन मे यह संदेह नहीं है। आज कुछ  भी लोग संदेह करते हैं कि यीशु पुर्ण रूप से मानव था। उसके पास मानवीय शरीर था। कई बार मैं थका हुआ और भूखा होता था उसके पास माननीय भावनाएं थी। वह नाराज होता था, प्रेम करता था और वह शोकित भी होता था। उसके पास मानवीय अनुभव थे, उसकी परीक्षा ली गई, उसने सीखा, काम किया और उसने अपने माता- पिता की आज्ञा मानी। आज अधिकांश लोग यह कहते हैं कि यह यीशु केवल एक मनुष्य था- एक महान धर्मगुरु। बिलि कोनोली,  एक हास्य कलाकार ने बहुत बड़ी बात की जब उसने कहा "मैं मसीहत में विश्वास नहीं कर सकता परंतु मैं यह समझता हूं कि यीशु  एक बहुत अच्छा मनुष्य था।"

 
क्या प्रमाण है यह बताने के लिए कि यीशु एक बहुत अच्छा मनुष्य या एक धार्मिक गुरु से बढ़कर था? उत्तर यह है कि इस विचार से सहमत होने के लिए कि वह था और परमेश्वर का विशेष पुत्र है, त्रिएकता का दूसरा व्यक्ति, बहुत सारे प्रमाण हैं।

 उसने अपने विषय में क्या कहा?
कुछ लोग कहते हैं, "यीशु ने  कभी भी परमेश्वर होने का दावा नहीं किया"। वास्तव में यह सच है कि यीशु यह कहते  हुए  कि मैं परमेश्वर हूं यहां वहां नहीं फिरा। फिर भी यदि उस ओर देखा जाए जो सब उसने सिखाया और दावा किया तो संदेह नहीं है कि वह इस बात को जानता था कि  वह एक मनुष्य था जिसकी पहचान परमेश्वर था।

1. स्वंय पर केंद्रित शिक्षा
यीशु के बारे में एक  दिल लुभाने वाली बात यह है कि उसकी बहुत सारी शिक्षाएं स्वंय पर केंद्रित थी। वह अक्सर लोगों से कहता था, "यदि तुम परमेश्वर के साथ संबंध चाहते हो तो तुम मेरे पास आओ।" ( देखें यहुन्ना १४:६ पृष्ठ १६२१)  उसके साथ संबंध के द्वारा ही हम परमेश्वर से मिल पाते हैं। अपने जीवन के युवा सालों में मैं इस बात से जागृत था कि  कोई चीज की कमी  मेरे जीवन में है, यह इस प्रकार से था जैसे कि एक आंतरिक खालीपन था जो भरे जाने की चाह रखता था। शायद आप सुबह के आंतरिक खालीपन से परिचय होंगे जिसकी भरपाई आप वस्तुओं से करना चाहते हैं। बीसवीं शताब्दी के अग्रणी मनोवैज्ञानिकों द्वारा इस अंदरूनी खालीपन को स्वीकार किया गया है। उन सब से इस बात को पहचाना है कि हम सब ने सबके हृदय में एक गहरा खालीपन, एक खोया हुआ भाग, बहुत बड़ी भूख है।
फ्रेउड ने कहा, " लोग प्रेम के भूखे हैं।"
जंग ने कहा,  "लोग सुरक्षा के भूखे हैं।"
एडलर ने कहा, "लोग महत्वता के भूखे हैं।"
 
यीशु ने कहा, "मैं जीवन की रोटी हूँ।यदि तुम अपनी भूख की तृप्ति चाहते हो तो मेरे पास आओ। यदि अंधकार में चल रहे हो तो वह कहता है "मैं जगत की ज्योति हूं।"

 

एक किशोर के रूप मै मृत्यु से बहुत डरता था शायद उस जोखिम भरे काम के कारण जो मैं कर रहा था। मैं इंग्लैंड से पूर्वी तट पर एक व्यावसायिक मछुआरे की तरह काम कर रहा था। कई बार मैंने अपने जालों में विस्फोटक गोले पकड़े और मुझे उनका सामना करना पड़ा था और मैं उन्हें जहाज  के फ़र्श पर लुडकता हुआ पाता था। एक प्रश्न हमेशा मेरे सामने रहता था- यदि मैं मर गया तो किधर जाऊंगा? यदि तुम मृत्यु से भयभीत हो, यीशु कहता है, "पुनरुत्थान और जीवन में ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तो भी जीएगा। और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनंत काल तक न मरेगा, क्या तू इस बात पर विश्वास करती है? (यहुन्ना ११:२५-२६) यीशु की शिक्षा स्वयं पर केंद्रित होने से मेरा यही अभिप्राय है। जीवन में खाली हिस्से की ओर उसने अपने आपको उत्तर के रूप में दर्शाया है।

कुछ लोग विभिन्न चीजों की तल में होते हैं- नशा, शराब, शारीरिक संबंध। यीशु ने कहा "यदि पुत्र तुम्हें स्वतंत्र करें तो तुम सचमुच स्वतंत्र हो जाओगे"  (यहुन्ना ८:३६) बहुत से लोग चिंता, घबराहट, भय और दोष से दबे हुए हैं। "यीशु ने कहा, हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूंगा।" (मती ११:२८) उसने कहा, "मार्ग, सत्य और जीवन में ही हूं।"

उसने कहा कि उसे प्राप्त करना परमेश्वर को प्राप्त करना है (मत्ती १०-४०) उसका स्वागत करना परमेश्वर का स्वागत करना है। (मरकुस ९:३७) और उसको देख लेना परमेश्वर को देख लेना है। (यहुन्ना १४:९)

एक बार एक बालक ने एक चित्र बनाया और उसकी मां ने उससे पूछा कि वह क्या कर रहा है? बच्चे ने कहा,  "मैंने परमेश्वर की तस्वीर बना रहा हूं।"  मैंने कहा, "मूर्ख मत बनो। तुम परमेश्वर की तस्वीर नहीं बना सकते। कोई नहीं जानता कि ईश्वर कैसा दिखाई देता है। बच्चे ने उत्तर दिया, हां जब तक मैं समाप्त करूंगा, वे जान जाएंगे। वास्तव में यीशु ने कहा, "यदि तुम यह जानना चाहते हो कि परमेश्वर कैसा दिखाई देता है तो मेरी ओर देखो।"
 

2. अप्रत्यक्ष दावे
यीशु ने काफी सारी बातें कहीं, जो कि, यद्यपि प्रत्यक्ष  रूप से परमेश्वर होने का दावा नहीं करती लेकिन यह दिखाती है कि वह अपने आप को परमेश्वर के जैसे स्थान में सोचता था जैसे कि हम एक या दो उदाहरणों  में देखेंगे। अपनी बाइबल में निकालें (मरकुस २:३-१२)। पाप क्षमा करने का अधिकार

 

3.और लोग एक झोले के मारे हुए को चार मनुष्यों से उठवाकर उसके पास ले आए। 4.परंतु जब वे भीड़ के कारण उसके निकट न पहुंच सके, तो उन्होंने उस छत को जिसके नीचे वह था, खोल दिया और जब उसे उधेड़  चुके, तो उस खाट को जिस पर झोले का मारा हुआ पड़ा था, लटका दिया। 5.यीशु ने,  उसका विश्वास देखकर, उस झोले के मारे हुए से कहा है, हे पुत्र, तेरे पा क्षमा हुए। 6.तब कई एक शास्त्री जो वहां बैठे थे, अपने-अपने मन में विचार करने लगे। 7.कि यह मनुष्य क्यों ऐसा कहता है? यह तो परमेश्वर की निंदा करता है, परमेश्वर को छोड़ और कौन पाप क्षमा कर सकता है? 8.यीशु ने तुरन्त अपनी आत्मा में जान लिया, कि वे अपने-अपने मन में ऐसा विचार कर रहे हैं, और उसने कहा, तुम अपने-अपने मन में यह विचार क्यों कर रहे हो? 9.सहज क्या है? क्या झोले के मारे से यह कहना कि तेरे पाप क्षमा हुए, या यह कहना, कि उठ अपनी खाट उठा कर चल फिर? 10.परन्तु  जिससे तुम जान लो कि मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का भी अधिकार है (उसने उस झोले के मारे हुए से कहा)। 11.मैं तुझसे कहता हूं उठ अपनी खाट उठाकर अपने घर चला जा। 12.और वह उठा, और तुरंत खाट उठाकर  और सबके सामने से निकल कर चला गया, इस पर सब चकित हुए, और परमेश्वर की बड़ाई करके कहने लगे, कि हमने ऐसा कभी नहीं देखा।(मरकुस २:३-१२)

पाप क्षमा  करने का दावा सचमुच चौंकाने वाला दावा है।
अपनी पुस्तक  मेयर क्रिश्चियनिटीमें सीo एसo लुईस इसको अच्छे से समझाते हैं जब वह लिखते हैं,

"दावे का एक हिस्सा हम इसलिए  देख भी नहीं पाते हैं क्योंकि हमने उसे अक्सर सुना है, और हम उसके महत्व को समझ ही नहीं पाते। मेरा अर्थ है पाप क्षमा करने का दावा: हर  तरह के पाप। अब यदि बोलने वाला ईश्वर न हो तो यह बेहद मजाकिया होगा। हम सब समझ सकते हैं कि किसी प्रकार मनुष्य अपने प्रति की गई गलतियों को क्षमा करता है। तुम मेरे पैर पर  चढ़ो और मैं तुम्हें क्षमा कर दूँ, तुम मेरे पैसे चुराओ और मैं तुम्हें क्षमा कर दूँ। पर हम उस मनुष्य का क्या करें जो स्वंय लूटा गया और स्वंय कुचला गया न हो जिसने इस बात की घोषणा की कि उसने तुम्हें दूसरे मनुष्य के पैर पर चढ़ने के लिए और दूसरे मनुष्य के पैसे चुराने के लिए क्षमा किया है। उसके आचरण के उदार रूप में अर्थहीन  बेवकूफी बताया जा सकता है। फिर भी, यीशु ने ऐसा किया।  उसने लोगों को बताया कि उनके पाप क्षमा हुए और कभी भी उन लोगों से सलाह लेने के लिए नहीं ठहरा जिन्हें उनके पापों ने निसंदेह चोट पहुंचाइ थी। वह  बिना हिचकिचाहट ऐसा जताता था जैसे कि वही वह व्यक्ति है, जिसने मुख्यता हर गलियों में चोट खाई है। यह बात तभी मायने रखती है यदि वह सचमुच ईश्वर था जिसके नियम तोड़े गए थे, और जिसका प्रेम हर पाप में से घायल हुआ। किसी और बोलने वाले के मुंह से जो ईश्वर नहीं है। इन शब्दों से यह समझ आता है कि यह मूर्खता और घमंड है जिसकी प्रतिस्पर्धा किसी और पात्र से नहीं की जा सकती।
 संसार का न्याय होने का दवा

 

एक और असाधारण सा अप्रत्यक्ष दावा यह है कि एक दिन वह संसार का न्याय करेगा। (मती २५:३१-३२) उसने कहा वह लौटेगा और स्वर्गीय महिमा में अपने सिंहासन पर बैठेगा (पद ३१) सारी जातियां/राष्ट्र उसके सम्मुख होंगे। वह उसका न्याय करेगा। कुछ लोग अनंत जीवन और वह मीरास प्राप्त करेंगे जो सृष्टि की उत्पत्ति से उनके लिए तैयार की गई है लेकिन और लोग उससे अनंत काल के लिए अलग होने का दंड भोगेगें।

3. प्रत्यक्ष दावे
"मसीही"  होने का उसका प्रत्यक्ष दावा (यहुन्ना २०:२६-२९)
26.आठ दिन के बाद उसने चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उसके साथ था, और द्वार बंद थे, तब यीशु ने आकर और बीच में खड़ा होकर कहा, तुम्हें शांति मिले। 27.तब उसने थोमा से कहा, अपनी उंगली यहां लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लगाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वास ही नहीं परंतु विश्वासी हो। 28.यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, हे मेरे प्रभु हे मेरे परमेश्वर। 29.यीशु ने उस से कहा, तूने तो मुझे देखकर विश्वास किया है, धन्य वे हैं जिन्होंने ने बिना देखे विश्वास किया। (यहुन्ना २९:२६-२९)।
 यीशु ने यह नहीं कहा, अरे जरा ठहरो। तुम बहुत आगे निकल गए हो। उसने असल में यह कहा, तुम समझने में थोड़ा कम थे। उसने कहा शक करना छोड़ो और विश्वास करो। (पद २७)
 

 

इस क्षेत्र में एक अग्रणी विद्वान सर फ्रेडरिक केनयम की बात को दोहराते हुए एफo एफo ब्रूस प्रमाण का सार देते हैं:

 

 मूल लेखो और प्राचीनतम परमाणु के अस्तित्व में होने की तिथियों के बीच की अवधि बहुत कम या न के बराबर हो जाती है, और किसी भी संदेह के लिए आखिरी आधार का वचन हमारे पास अधिकांश वैसे ही पहुंचा जैसे लिखा गया, अब हट गया है। अतः यह मान लिया जाए कि नए नियम की पुस्तकें सच्ची और खरी है’

 

तो हम प्राचीनतम मनुस्मृति से जानते हैं कि वह था, पर वह कौन है?

 

 मार्टिन सकोर्सिज, एक फिल्म निर्माता ने एक बार अपमानजनक फिल्म बनाई जिसका नाम था  English the Last Temptation of Christ” (मसीह की आखिरी परीक्षा)। जब उनसे फिल्म बनाने का कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वह यह दिखाना चाहते थे कि यीशु सचमुच में एक इंसान था। फिर भी ज्यादातर लोगों के मन मे यह संदेह नहीं है। आज कुछ  भी लोग संदेह करते हैं कि यीशु पुर्ण रूप से मानव था। उसके पास मानवीय शरीर था। कई बार मैं थका हुआ और भूखा होता था उसके पास माननीय भावनाएं थी। वह नाराज होता था, प्रेम करता था और वह शोकित भी होता था। उसके पास मानवीय अनुभव थे, उसकी परीक्षा ली गई, उसने सीखा, काम किया और उसने अपने माता- पिता की आज्ञा मानी। आज अधिकांश लोग यह कहते हैं कि यह यीशु केवल एक मनुष्य था- एक महान धर्मगुरु। बिलि कोनोली,  एक हास्य कलाकार ने बहुत बड़ी बात की जब उसने कहा "मैं मसीहत में विश्वास नहीं कर सकता परंतु मैं यह समझता हूं कि यीशु  एक बहुत अच्छा मनुष्य था।"

 
क्या प्रमाण है यह बताने के लिए कि यीशु एक बहुत अच्छा मनुष्य या एक धार्मिक गुरु से बढ़कर था? उत्तर यह है कि इस विचार से सहमत होने के लिए कि वह था और परमेश्वर का विशेष पुत्र है, त्रिएकता का दूसरा व्यक्ति, बहुत सारे प्रमाण हैं।

 उसने अपने विषय में क्या कहा?
कुछ लोग कहते हैं, "यीशु ने  कभी भी परमेश्वर होने का दावा नहीं किया"। वास्तव में यह सच है कि यीशु यह कहते  हुए  कि मैं परमेश्वर हूं यहां वहां नहीं फिरा। फिर भी यदि उस ओर देखा जाए जो सब उसने सिखाया और दावा किया तो संदेह नहीं है कि वह इस बात को जानता था कि  वह एक मनुष्य था जिसकी पहचान परमेश्वर था।

1. स्वंय पर केंद्रित शिक्षा
यीशु के बारे में एक  दिल लुभाने वाली बात यह है कि उसकी बहुत सारी शिक्षाएं स्वंय पर केंद्रित थी। वह अक्सर लोगों से कहता था, "यदि तुम परमेश्वर के साथ संबंध चाहते हो तो तुम मेरे पास आओ।" ( देखें यहुन्ना १४:६ पृष्ठ १६२१)  उसके साथ संबंध के द्वारा ही हम परमेश्वर से मिल पाते हैं। अपने जीवन के युवा सालों में मैं इस बात से जागृत था कि  कोई चीज की कमी  मेरे जीवन में है, यह इस प्रकार से था जैसे कि एक आंतरिक खालीपन था जो भरे जाने की चाह रखता था। शायद आप सुबह के आंतरिक खालीपन से परिचय होंगे जिसकी भरपाई आप वस्तुओं से करना चाहते हैं। बीसवीं शताब्दी के अग्रणी मनोवैज्ञानिकों द्वारा इस अंदरूनी खालीपन को स्वीकार किया गया है। उन सब से इस बात को पहचाना है कि हम सब ने सबके हृदय में एक गहरा खालीपन, एक खोया हुआ भाग, बहुत बड़ी भूख है।
फ्रेउड ने कहा, " लोग प्रेम के भूखे हैं।"
जंग ने कहा,  "लोग सुरक्षा के भूखे हैं।"
एडलर ने कहा, "लोग महत्वता के भूखे हैं।"
 
यीशु ने कहा, "मैं जीवन की रोटी हूँ।यदि तुम अपनी भूख की तृप्ति चाहते हो तो मेरे पास आओ। यदि अंधकार में चल रहे हो तो वह कहता है "मैं जगत की ज्योति हूं।"

 

एक किशोर के रूप मै मृत्यु से बहुत डरता था शायद उस जोखिम भरे काम के कारण जो मैं कर रहा था। मैं इंग्लैंड से पूर्वी तट पर एक व्यावसायिक मछुआरे की तरह काम कर रहा था। कई बार मैंने अपने जालों में विस्फोटक गोले पकड़े और मुझे उनका सामना करना पड़ा था और मैं उन्हें जहाज  के फ़र्श पर लुडकता हुआ पाता था। एक प्रश्न हमेशा मेरे सामने रहता था- यदि मैं मर गया तो किधर जाऊंगा? यदि तुम मृत्यु से भयभीत हो, यीशु कहता है, "पुनरुत्थान और जीवन में ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तो भी जीएगा। और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनंत काल तक न मरेगा, क्या तू इस बात पर विश्वास करती है? (यहुन्ना ११:२५-२६) यीशु की शिक्षा स्वयं पर केंद्रित होने से मेरा यही अभिप्राय है। जीवन में खाली हिस्से की ओर उसने अपने आपको उत्तर के रूप में दर्शाया है।

कुछ लोग विभिन्न चीजों की तल में होते हैं- नशा, शराब, शारीरिक संबंध। यीशु ने कहा "यदि पुत्र तुम्हें स्वतंत्र करें तो तुम सचमुच स्वतंत्र हो जाओगे"  (यहुन्ना ८:३६) बहुत से लोग चिंता, घबराहट, भय और दोष से दबे हुए हैं। "यीशु ने कहा, हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूंगा।" (मती ११:२८) उसने कहा, "मार्ग, सत्य और जीवन में ही हूं।"

उसने कहा कि उसे प्राप्त करना परमेश्वर को प्राप्त करना है (मत्ती १०-४०) उसका स्वागत करना परमेश्वर का स्वागत करना है। (मरकुस ९:३७) और उसको देख लेना परमेश्वर को देख लेना है। (यहुन्ना १४:९)

एक बार एक बालक ने एक चित्र बनाया और उसकी मां ने उससे पूछा कि वह क्या कर रहा है? बच्चे ने कहा,  "मैंने परमेश्वर की तस्वीर बना रहा हूं।"  मैंने कहा, "मूर्ख मत बनो। तुम परमेश्वर की तस्वीर नहीं बना सकते। कोई नहीं जानता कि ईश्वर कैसा दिखाई देता है। बच्चे ने उत्तर दिया, हां जब तक मैं समाप्त करूंगा, वे जान जाएंगे। वास्तव में यीशु ने कहा, "यदि तुम यह जानना चाहते हो कि परमेश्वर कैसा दिखाई देता है तो मेरी ओर देखो।"
 

2. अप्रत्यक्ष दावे
यीशु ने काफी सारी बातें कहीं, जो कि, यद्यपि प्रत्यक्ष  रूप से परमेश्वर होने का दावा नहीं करती लेकिन यह दिखाती है कि वह अपने आप को परमेश्वर के जैसे स्थान में सोचता था जैसे कि हम एक या दो उदाहरणों  में देखेंगे। अपनी बाइबल में निकालें (मरकुस २:३-१२)। पाप क्षमा करने का अधिकार

 

3.और लोग एक झोले के मारे हुए को चार मनुष्यों से उठवाकर उसके पास ले आए। 4.परंतु जब वे भीड़ के कारण उसके निकट न पहुंच सके, तो उन्होंने उस छत को जिसके नीचे वह था, खोल दिया और जब उसे उधेड़  चुके, तो उस खाट को जिस पर झोले का मारा हुआ पड़ा था, लटका दिया। 5.यीशु ने,  उसका विश्वास देखकर, उस झोले के मारे हुए से कहा है, हे पुत्र, तेरे पा क्षमा हुए। 6.तब कई एक शास्त्री जो वहां बैठे थे, अपने-अपने मन में विचार करने लगे। 7.कि यह मनुष्य क्यों ऐसा कहता है? यह तो परमेश्वर की निंदा करता है, परमेश्वर को छोड़ और कौन पाप क्षमा कर सकता है? 8.यीशु ने तुरन्त अपनी आत्मा में जान लिया, कि वे अपने-अपने मन में ऐसा विचार कर रहे हैं, और उसने कहा, तुम अपने-अपने मन में यह विचार क्यों कर रहे हो? 9.सहज क्या है? क्या झोले के मारे से यह कहना कि तेरे पाप क्षमा हुए, या यह कहना, कि उठ अपनी खाट उठा कर चल फिर? 10.परन्तु  जिससे तुम जान लो कि मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का भी अधिकार है (उसने उस झोले के मारे हुए से कहा)। 11.मैं तुझसे कहता हूं उठ अपनी खाट उठाकर अपने घर चला जा। 12.और वह उठा, और तुरंत खाट उठाकर  और सबके सामने से निकल कर चला गया, इस पर सब चकित हुए, और परमेश्वर की बड़ाई करके कहने लगे, कि हमने ऐसा कभी नहीं देखा।(मरकुस २:३-१२)

पाप क्षमा  करने का दावा सचमुच चौंकाने वाला दावा है।
अपनी पुस्तक  मेयर क्रिश्चियनिटीमें सीo एसo लुईस इसको अच्छे से समझाते हैं जब वह लिखते हैं,

"दावे का एक हिस्सा हम इसलिए  देख भी नहीं पाते हैं क्योंकि हमने उसे अक्सर सुना है, और हम उसके महत्व को समझ ही नहीं पाते। मेरा अर्थ है पाप क्षमा करने का दावा: हर  तरह के पाप। अब यदि बोलने वाला ईश्वर न हो तो यह बेहद मजाकिया होगा। हम सब समझ सकते हैं कि किसी प्रकार मनुष्य अपने प्रति की गई गलतियों को क्षमा करता है। तुम मेरे पैर पर  चढ़ो और मैं तुम्हें क्षमा कर दूँ, तुम मेरे पैसे चुराओ और मैं तुम्हें क्षमा कर दूँ। पर हम उस मनुष्य का क्या करें जो स्वंय लूटा गया और स्वंय कुचला गया न हो जिसने इस बात की घोषणा की कि उसने तुम्हें दूसरे मनुष्य के पैर पर चढ़ने के लिए और दूसरे मनुष्य के पैसे चुराने के लिए क्षमा किया है। उसके आचरण के उदार रूप में अर्थहीन  बेवकूफी बताया जा सकता है। फिर भी, यीशु ने ऐसा किया।  उसने लोगों को बताया कि उनके पाप क्षमा हुए और कभी भी उन लोगों से सलाह लेने के लिए नहीं ठहरा जिन्हें उनके पापों ने निसंदेह चोट पहुंचाइ थी। वह  बिना हिचकिचाहट ऐसा जताता था जैसे कि वही वह व्यक्ति है, जिसने मुख्यता हर गलियों में चोट खाई है। यह बात तभी मायने रखती है यदि वह सचमुच ईश्वर था जिसके नियम तोड़े गए थे, और जिसका प्रेम हर पाप में से घायल हुआ। किसी और बोलने वाले के मुंह से जो ईश्वर नहीं है। इन शब्दों से यह समझ आता है कि यह मूर्खता और घमंड है जिसकी प्रतिस्पर्धा किसी और पात्र से नहीं की जा सकती।
 संसार का न्याय होने का दवा

 

एक और असाधारण सा अप्रत्यक्ष दावा यह है कि एक दिन वह संसार का न्याय करेगा। (मती २५:३१-३२) उसने कहा वह लौटेगा और स्वर्गीय महिमा में अपने सिंहासन पर बैठेगा (पद ३१) सारी जातियां/राष्ट्र उसके सम्मुख होंगे। वह उसका न्याय करेगा। कुछ लोग अनंत जीवन और वह मीरास प्राप्त करेंगे जो सृष्टि की उत्पत्ति से उनके लिए तैयार की गई है लेकिन और लोग उससे अनंत काल के लिए अलग होने का दंड भोगेगें।

3. प्रत्यक्ष दावे
"मसीही"  होने का उसका प्रत्यक्ष दावा (यहुन्ना २०:२६-२९)
26.आठ दिन के बाद उसने चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उसके साथ था, और द्वार बंद थे, तब यीशु ने आकर और बीच में खड़ा होकर कहा, तुम्हें शांति मिले। 27.तब उसने थोमा से कहा, अपनी उंगली यहां लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लगाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वास ही नहीं परंतु विश्वासी हो। 28.यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, हे मेरे प्रभु हे मेरे परमेश्वर। 29.यीशु ने उस से कहा, तूने तो मुझे देखकर विश्वास किया है, धन्य वे हैं जिन्होंने ने बिना देखे विश्वास किया। (यहुन्ना २९:२६-२९)।
 यीशु ने यह नहीं कहा, अरे जरा ठहरो। तुम बहुत आगे निकल गए हो। उसने असल में यह कहा, तुम समझने में थोड़ा कम थे। उसने कहा शक करना छोड़ो और विश्वास करो। (पद २७)
 

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