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7. The Parable of the Weeds
7. जंगली बीज का दृष्टान्त
24यीशु ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया: “स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के समान है जिसने अपने खेत में अच्छा बीज बोया। 25पर जब लोग सो रहे थे तो उसका बैरी आकर गेहूँ के बीच जंगली बीज बोकर चला गया। 26जब अंकुर निकले और बालें लगी, तो जंगली पौधे भी दिखाई दिए। 27इस पर गृहस्थ के दासों ने आकर उससे कहा, ‘हे स्वामी, क्या तूने अपने खेत में अच्छा बीज न बोया था? फिर जंगली दाने के पौधे उस में कहाँ से आए?’ 28उसने उनसे कहा, ‘यह किसी बैरी का काम है।’ दासों ने उससे कहा ‘क्या तेरी इच्छा है, कि हम जाकर उनको बटोर लें?’ 29उसने कहा, ‘नहीं, ऐसा न हो कि जंगली दाने के पौधे बटोरते हुए तुम उनके साथ गेहूं भी उखाड़ लो। 30कटनी तक दोनों को एक साथ बढ़ने दो, और कटनी के समय मैं काटनेवालों से कहूँगा; पहले जंगली दाने के पौधे बटोरकर जलाने के लिये उन के गट्ठे बान्ध लो, और गेंहूँ को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो।’” (मत्ती 13:24-30)
यहाँ हम एक ऐसी समस्या के बारे में पढ़ते हैं जिसका सामना ऐसे किसान करते थे जिन्हें अपने व्यावसायिक लेन-देन में अनुचित या रूखा जाना जाता था। कोई शत्रु उनके खेत में जंगली बीज बो जाता, जिसेसे छुटकारा पाने में, यदि यह संभव होता भी तो वर्षों लग जाते। जिस शब्द का अनुवाद जंगली बीज के रूप में किया गया है वो यूनानी शब्द ज़िनाज़िओन है। यह एक ऐसा पौधा है जो बढ़ने के समय दिखने में और हरे-पन में बिलकुल गेहूँ के समान होता है, लेकिन पूर्णत: बढ़ने और पकने के बाद, उसकी बालें ज्यादा लम्बी होती हैं और यह काला और विषैला दाना उत्पन्न करता है। अगर दाने को पूरी तरह पकने दिया जाता है, तो बीज मिट्टी में गिर कर अगले वर्ष फिर यही समस्या उत्पन्न करते हैं।
जब कटनी का समय नज़दीक ही था, तब खेत में काम कर रहे दास इस बात पर गौर करने लगे कि जैसे-जैसे पौधे अपनी विकास के अंतिम चरण में पहुँच रहे थे, कुछ पौधों की बालें गेहूँ से ज्यादा बड़ी हो रहीं थीं और अलग दिख रहीं थीं। उन्होंने खेत के गृहस्थ और स्वामी को यह बताने में तत्परता दिखाई कि उन्हें दाने के बनने से पहले ज़िनाज़िओन को बटोरने में जुट जाना चाहिए। लेकिन समस्या यह थी कि जंगली पौधे उसी भूमि में उगे थे जिसमें गेहूँ था, और जंगली पौधों को उखाड़ने से गेहूँ को भी नुकसान पहुँचता। इस समस्या का हल स्वामी के कटनी तक रुक कर उस समय गेहूँ और जंगली पौधों को अलग-अलग करने के निर्णय द्वारा हुआ।
जंगली बीज का दृष्टान्त बीज बोने वाले के दृष्टान्त के बिलकुल बाद दिया गया है (मत्ती 13:3-23)। यह दृष्टान्त एक व्यक्ति को परमेश्वर के राज्य में फल्वंत होने में परमेश्वर की सामर्थ को रोकने में शैतान के कार्य के विषय में था। जो बीज बोया गया था वो एक व्यक्ति के हृदय में परमेश्वर के वचन का प्रतीक था और उसी के विषय में उसका प्रतिउत्तर। चेले इस जंगली बीज के दृष्टान्त से कुछ उलझे हुए थे क्योंकि यह भी बीज बोने वाले के दृष्टान्त के समान प्रतीत हो रहा था। जब उन्होंने यीशु को भीड़ से कुछ अलग पाया, तब उन्होंने उसको (उसी उपदेश में दिए) राई के बीज के दृष्टान्त या खमीर के दृष्टान्त 31-35 पद को समझाने के लिए नहीं कहा, लेकिन जंगली बीज के दृष्टान्त के बारे में कुछ ऐसा था जिसने उन्हें विशेष रूप से आकर्षित किया। आइये उसकी व्याख्या को पढ़ें:
36तब वह भीड़ को छोड़कर घर में आया, और उसके चेलों ने उसके पास आकर कहा, “खेत के जंगली दाने का दृष्टान्त हमें समझा दे।” 37उसने उनको उत्तर दिया, “कि अच्छे बीज का बोनेवाला मनुष्य का पुत्र है। 38खेत संसार है, अच्छा बीज राज्य के सन्तान, और जंगली बीज दुष्ट के सन्तान हैं। 39जिस बैरी ने उनको बोया वह शैतान है; कटनी जगत का अन्त है: और काटनेवाले स्वर्गदूत हैं। 40सो जैसे जंगली दाने बटोरे जाते और जलाए जाते हैं वैसा ही जगत के अन्त में होगा। 41मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके राज्य में से सब ठोकर के कारणों को और कुकर्म करनेवालों को इकट्ठा करेंगे। 42और उन्हें आग के कुंड में डालेंगे, वहाँ रोना और दांत पीसना होगा। 43उस समय धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की नाई चमकेंगे; जिस के कान हों वह सुन ले।” (मत्ती 13:36-43)
यीशु क्या कहता है कि इस दृष्टान्त में अलग-अलग चीज़ें किसका प्रतीक हैं? यह इसी अध्याय के पहले भाग में दिए बीज बोने वाले के दृष्टान्त से भिन्न कैसे है?
बीज बोने वाले के दृष्टान्त में, बीज बोने वाला किसी भी ऐसे व्यक्ति का प्रतीक है जो मसीह के संपन्न कार्य के विषय में सुसमाचार (शुभ सन्देश) को बाँटता है। भूमि या मिट्टी परमेश्वर के वचन को सुनने वाले लोगों के हृदय का प्रतीक है, और बीज परमेश्वर का वचन है। जंगली बीज के दृष्टान्त में हम इतना ही फर्क देखते हैं कि बोने वाला स्वयं प्रभु यीशु मसीह है (मत्ती 13:37) और संसार भूमि है (पद 38)। अच्छा बीज उन सभी लोगों का प्रतीक है जिन्होंने मसीह पर विश्वास और भरोसा किया है, जबकि जंगली बीज दुष्ट की संतान हैं, और जो शत्रु उन्हें बोता है वो शैतान है (पद 39)। कटनी का समय आने वाले अंत के दिनों का प्रतीक है जहाँ कटनी करने वाले स्वर्गदूत हैं। यह दृष्टान्त दो विपरीत ताकतों के बीच के संघर्ष के बारे में है: परमेश्वर का राज्य और शैतान का राज्य।
1900 के शुरुआती वर्षों में, यू.एस.ए और यूरोप की कलीसियाओं में अग्वों के प्रचलित विचार यह थे कि कलीसिया समूचे संसार को “मसीही” बना देगा, क्योंकि पूरे संसार भर में मिशनरियों को भेजा जा रहा था। विचारधारा यह थी कि सभी को मसीह के निकट ला देने से कलीसिया संसार में से बुराई को ख़त्म कर देगी। जबकि यह घटनाक्रम में अद्भुत मोड़ होगा, यह सत्य नहीं है। जितना नज़दीक हम समय के अंत की ओर आ रहे हैं और शैतान के पौधों की सच्चाई सामने आ रही है, संसार उतना ज्यादा ही बुरा और भ्रष्ट होता चला जा रहा है। उन के फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे। (मत्ती 7:16)
जैसा कि हमने पहले कहा है, इस पृथ्वी ग्रह पर केवल दो ही राज्य हैं जो आपस में युद्ध में हैं। भले ही कई राष्ट्र और कई धर्म हों, लेकिन सभी भिन्न-भिन्न विचारधाराओं और धर्मों के पीछे, एक न दिखने वाला शत्रु है जो मसीह के कार्य को उलट-पलट कर देना चाहता है। यह हाथ में त्रिशूल लिए कोई छोटे कद का लाल आदमी नहीं है। वो शक्तिशाली, न दिखने वाला, रचा हुआ प्राणी है जिसके पास मानवता के इतिहास को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाली आत्मिक प्राणियों की सेना है।
क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं। (इफिसियों 6:12)
न दिखने वाले स्वर्गीय स्थानों से जो इस ग्रह को प्रभावित करते हैं, मनुष्य के मन पर नियंत्रण करने के लिए युद्ध लड़ा जा रहा है। हमारा शत्रु एक मनुष्य के समान सीमित जीवनकाल से बंधा नहीं है; वो अदन की वाटिका के समय से युद्ध कर रहा है। वो वहीं अदन की वाटिका में था कि परमेश्वर ने शैतान या सर्प पर न्याय की आज्ञा दी थी। परमेश्वर ने उससे कहा:
और मै तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा। (उत्पत्ति 3:15)
शैतान के पास हमेशा अपने लोग होते हैं जिन्हें वह परमेश्वर के राज्य के विरोध में प्रयोग करता है। फिरोन के इजराइल के नवजात शिशुओं को जन्म के समय मारने की कहानी है (निर्गमन 1:22)। फिर हेरोदेस ने यीशु को बचपन में ही मारने की आशा में बेतलेहेम में तीन वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों को मारने की कोशिश की (मत्ती 2:16)। हमान ने एस्तेर की पुस्तक में यहूदी कुल को नाश करने की कोशिश की (एस्तेर 3:5-6)। हम उन लोगों के बारे में बात कर सकते हैं जो यीशु की सेवकाई के विरोध में थे, वो उसे क्रूस पर चढाने के लिए दृढ़ और अडिग थे। उसने उन्हें एक समय पर कहा:
43“तुम मेरी बात क्यों नहीं समझते? इसलिये कि तुम मेरा वचन सुन नहीं सकते। 44तुम अपने पिता शैतान से हो, और अपने पिता की लालसाओं को पूरा करना चाहते हो। वह तो आरम्भ से हत्यारा है, और सत्य पर स्थिर न रहा, क्योंकि सत्य उसमें है ही नहीं: जब वह झूठ बोलता, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है; क्योंकि वह झूठा है, वरन झूठ का पिता है।” (यहुन्ना 8:43-44)
शत्रु द्वारा बोए बीज कौन हैं?
आप क्या सोचते हैं कि जंगली बीज के दृष्टान्त मैं शत्रु क्या हासिल करना चाह रहा था?
कोई शत्रु जंगली बीज बोकर एक अच्छे-भले खेत को क्यों उजाड़ना चाहेगा? संसार के शब्दों में, यहाँ निश्चित ही खेत के स्वामी के लिए नफरत का विचार है, उसकी कटनी को नुक्सान पहुँचाने का, या फिर खेत पर नियंत्रण की लालसा।
जैसे परमेश्वर के पास इस पृथ्वी पर वह हैं जिन्हें वो अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रयोग करता है, वैसे ही शैतान, हमारा शत्रु भी अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए लोगों की खोज में रहता है। शत्रु परमेश्वर के समान रचने में सक्षम नहीं; इसीलिए, वह तो केवल असली की ही नक़ल कर उसकी जाली प्रति ही बना सकता है। क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर के पास स्वर्गदूतों और प्रधान्ताओं का उच्चतम संगठित बीड़ा है, और साथ ही अपने उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए स्त्री और पुरुष, इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि शैतान भी इसी तरह के अधिकार संरचना की नक़ल करता है।
देख, यहोवा की दृष्टि सारी पृथ्वी पर इसलिये फिरती रहती है कि जिनका मन उसकी ओर निष्कपट रहता है, उनकी सहायता में वह अपना सामर्थ्य दिखाए। (2 इतिहास 16:9)
अगर प्रभु सजग और सक्रीय रूप से उन लोगों को खोज रहा है जिनके हृदय उसकी इच्छा करने के लिए उसकी ओर हैं, क्या आप सोचते हैं कि शत्रु भी ऐसा ही कर रहा होगा? परमेश्वर की योजनाओं को नष्ट करने का उसका सबसे प्रभावशाली तरीका घुसपैठ कर, धोखा देना, और अंतत: नाश करना ही है। वो अपना यह काम सबसे अच्छी रीती से तब कर सकता है जब इसे भाँपा न जा सके (जिसके बारे में मेरा विचार है कि इसे सोने के प्रतीक के साथ जोड़ा जा सकता है)। वो सबसे ज्यादा प्रभावी तब होता है जब वो ज्योति के दूत के रूप में प्रतीत होता है। वो कुछ ऐसा प्रस्तुत करता है जो सच्चा प्रतीत होता है, लेकिन है नहीं। लेकिन, एक बात है जो वह नहीं कर सकता। वो अच्छा फल नहीं उत्पन्न नहीं कर सकता। अंत में, जब फल की सच्चाई सामने आएगी तब उसका छल प्रकट हो जाएगा। उसके कार्य की एक उपज और परिणाम है, और यह बुरी फसल उत्पन्न करेगा।
विलियम बर्कले ने मत्ती की पुस्तक की समीक्षा में जंगली पौधों की उत्पत्ति के विषय में कुछ रोचक टिप्पणियाँ की हैं:
जंगली पौधे और गेंहूँ इतने एक समान थे कि यहूदी लोग जंगली पौधों को “जारज गेंहूँ” कहा करते थे। जंगली पौधों के लिए यहूदी शब्द ज़ूनिम है, जिससे यूनानी ज़ीज़ानिओन आता है; ज़ूनिम का नाता ज़ानाह शब्द से माना जाता है, जिसका अर्थ व्यभिचार करना है; और प्रसिद्ध कहानी यह है कि जंगली पौधों की उत्पत्ति जल-प्रलय से पहले फैली दुष्टता में हुई, क्योंकि उस समय सम्पूर्ण सृष्टि, पुरुष, स्त्री, जानवर और पौधे, सभी भटक गए और उन्होंने व्यभिचार किया और स्वाभाविक से विपरीत उत्पन्न किया। इनके शुरुआती चरणों में, बढ़ते हुए गेंहूँ और जंगली पौधे को सकुशल अलग नही किया जा सकता, लेकिन अंतत: इन्हें अलग करना ही होता था, क्योंकि इस दढ़ियल कण का दाना कुछ विषैला होता है। इससे चक्कर और बीमारी आती है और हर अपने असर में यह नशीले होते हैं, और इसकी बहुत कम मात्रा भी कड़वी और स्वाद में अप्रिय होती है।
यह हमेशा से शत्रु की रणनीति रही है, घुसकर, घुल-मिल के, घुसपैठ कर के न केवल संसार का नियंत्रण करना, लेकिन मनुष्य का भी नियंत्रण करना। यहाँ पर जंगली पौधों और गेंहूँ की जड़ की संरचना के परस्पर मिश्रण का विचार उत्पन्न होता है।
इस संसार में जंगली पौधों के कार्य की जाँच करने के लिए, और यह देखने के लिए कि कैसे शत्रु ने इतिहास में संसार को भ्रष्ट किया है, हमें वापस उत्पत्ति की पुस्तक में जाना होगा:
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