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9. Jesus Heals a Royal Officials Son

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9. यीशु ने राजकर्मचारी के पुत्र को चंगा किया

शुरुआती प्रश्न: एक ऐसे समय के बारे में बाँटें जब आपको किसी से सहायता प्राप्त हुई थी। उन्होंने आपकी सहायता कैसे की थी और उसके बाद उनके लिए आपकी क्या भावनाएं थीं?

 

1इन बातों के पीछे यहूदियों का एक पर्व हुआ और यीशु यरूशलेम को गया। 2यरूशलेम में भेड़ फाटक के पास एक कुण्ड है जो इब्रानी भाषा में बेतहसदा कहलाता है, और उसके पाँच ओसारे हैं। 3इनमें बहुत से बीमार, अन्धे, लंगड़े और सूखे अंगवाले (पानी के हिलने की आशा में) पड़े रहते थे। 4(क्योंकि नियुक्ति समय पर परमेश्वर के स्वर्गदूत कुण्ड में उतरकर पानी को हिलाया करते थे: पानी हिलते ही जो कोई पहिले उतरता वह चंगा हो जाता था चाहे उसकी कोई बीमारी क्यों न हो।) 5वहाँ एक मनुष्य था, जो अड़तीस वर्ष से बीमारी में पड़ा था। 6यीशु ने उसे पड़ा हुआ देखकर और जानकर कि वह बहुत दिनों से इस दशा में पड़ा है, उस से पूछा, क्या तू चंगा होना चाहता है? 7उस बीमार ने उसको उत्तर दिया, कि हे प्रभु, मेरे पास कोई मनुष्य नहीं, कि जब पानी हिलाया जाए, तो मुझे कुण्ड में उतारे; परन्तु मेरे पहुँचते पहुँचते दूसरा मुझ से पहिले उतर पड़ता है। 8यीशु ने उस से कहा, उठ, अपनी खाट उठाकर चल फिर। 9वह मनुष्य तुरन्त चंगा हो गया, और अपनी खाट उठाकर चलने फिरने लगा। 10वह सब्त का दिन था। इसलिये यहूदी उससे, जो चंगा हुआ था, कहने लगे, कि आज तो सब्त का दिन है, तुझे खाट उठानी उचित नहीं। 11उस ने उन्हें उत्तर दिया, कि जिस ने मुझे चंगा किया, उसी ने मुझ से कहा, अपनी खाट उठाकर चल फिर। 12उन्होंने उस से पूछा वह कौन मनुष्य है जिस ने तुझ से कहा, खाट उठाकर चल फिर? 13परन्तु जो चंगा हो गया था, वह नहीं जानता था वह कौन है; क्योंकि उस जगह में भीड़ होने के कारण यीशु वहाँ से हट गया था। 14इन बातों के बाद वह यीशु को मन्दिर में मिला, तब उसने उस से कहा, देख, तू तो चंगा हो गया है; फिर से पाप मत करना, ऐसा न हो कि इस से कोई भारी विपत्ति तुझ पर आ पड़े। 15उस मनुष्य ने जाकर यहूदियों से कह दिया, कि जिस ने मुझे चंगा किया, वह यीशु है। (यहुन्ना 5:1-16)

 

बेहतसदा अस्पताल

 

इस अध्याय का दृश्य भेड़ फाटक के निकट पानी के एक कुण्ड पर घटता है, आम तौर पर यह माना जाता है कि यह फाटक शहरपनाह के बाहर, यरूशलेम शहर की उत्तरी दिशा में है। यीशु यहूदियों के एक पर्व के लिए यरूशलेम में है। (पद 1) हमें बताया गया है कि इस कुण्ड को बेतहसदा कहा जाता है, जिसका अर्थ करुणा का घर है। बेतहसदा के कुण्ड को खोज कर, उसकी खुदाई के पश्चात् उस कुण्ड को वास्तविक स्थान मान लिया गया है। यह एक पहाड़ के कटान से, बरसात के पानी से भरा 55 फीट लम्बा और 12 फीट चौड़ा जलाशय है जिसे ऊँची और घुमावदार सीढ़ियों के द्वारा पहुँचा जा सकता है। इतने वर्षों बाद भी यहुन्ना द्वारा वर्णित ओसेरों के प्रमाण अब भी हैं। मैं निश्चित हूँ कि यीशु के समय में तो यह काफी अलग दिखता होगा।

यहुन्ना यहाँ बड़ी संख्या में पड़े लोगों के दुखद: नज़ारे का विवरण देता है। कितने लोग बहुत से की संख्या बनाएंगे? शायद आप सोचेंगे, सौ? अगर इस दृश्य की कल्पना करी जाए, तो मैं तो उन सब को पानी के जितना निकट संभव हो, तंगी के साथ झुण्ड बनाए बैठे, पानी के हिलने का बेकरारी से इंतज़ार करने के दृश्य को देखता हूँ। अंग्रेजी बाइबिल का एक अनुवाद NIV पद 4 को जिसमें उनके वहाँ जमा होने का कारण है, इसलिए नहीं लिखता क्योंकि पूर्व की हस्तलिपियों में यह नहीं था। एक दूसरे अनुवाद KJV में लिखा है, क्योंकि नियुक्ति समय पर परमेश्वर के स्वर्गदूत कुण्ड में उतरकर पानी को हिलाया करते थे: पानी हिलते ही जो कोई पहिले उतरता वह चंगा हो जाता था चाहे उसकी कोई बीमारी क्यों न हो।” (यहुन्ना 5:4)

 

विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि स्तह पर लहरें उठने के बाद यह इसपर निर्भर था कि कोई व्यक्ति कितनी जल्दी पानी में जा सकता है क्या स्वर्गदूत असल में दिखाई देता था? इस बात को लेकर हमारे पास काफी प्रश्न हैं.... क्या यह यहाँ पड़ी मानवता के लिए परमेश्वर की करुणा है? शायद इसीलिए इसे बेतहसदा, करुणा का घर कहा जाता था। शायद, अपनी निराशा में उनका इस बात में विश्वास कि परमेश्वर इस रीती से चंगा करेगा उनकी चंगाई का कारण था। परमेश्वर निराश और विश्वास से भरी प्रार्थना का उत्तर देता है। लेकिन, अगर ऐसा था कि अगर पानी के हिलाए जाने के बाद पानी में पहुँचा केवल पहला व्यक्ति ही चंगाई पाएगा, तो प्रतीत होता है कि कुछ लोगों के लिए तो यह भारी नुक्सान था। अगर सबकुछ एक व्यक्ति के जल्दी से जल्दी पानी में उतरने के उपर निर्भर करता है, तो लहरें उठने के समय पानी की निकटता के अनुसार, उनकी चंगाई पाने की सम्भावना बढ़ जाती। हमें नहीं पता कि यह पानी का हिलाया जाना कितना अक्सर होता था लेकिन उनका ध्यान पानी को देखने और उसके हिलाए जाने या उसमें लहर उठने पर उसमें कूदने पर था।

 

वहाँ तीन श्रेणीयाँ के लोगों का वर्णन है: अन्धे, लंगड़े और सूखे अंगवाले। (पद 3) अंधे पानी को हिलते नहीं देख सकते थे। क्योंकि वह केवल लहर उठने का इंतज़ार कर रहे थे, तो यह जानने के लिए कि कब कूदना है, उनके लिए नुक्सानदायक बात थी। और लोग उनसे पहले कूद जाते। लंगड़े और सूखे अंगवाले (अपाहिज) यह देख तो पाते थे कि क्या चल रहा है, लेकिन उन्हें कुण्ड में जाने के लिए मदद चाहिए थी। इनके लिए लोगों को अपने उपर से कूदकर चंगाई के पानी तक जाते देखना कितना निराशा भरा होता होगा! जब एक व्यक्ति लम्बे समय से वहाँ होता तो स्वाभाविक है कि वह पानी के और अपनी चंगाई के उतना ही निकट होता जाता। हम सोच सकते हैं कि कुछ लोग चंगाई पाने के अपने अवसर के लिए कितने लम्बे समय से वहाँ पड़े होंगे। वह भोजन या हलके होने जैसी अपनी शारीरिक ज़रूरतों को कैसे पूरा करते होंगे? यकीनन वह कुण्ड के किनारे अपने मनचाहे स्थान को नहीं खोना चाहते थे। शायद कुछ लोगों के मित्र और परिवार उनकी मदद करते हुए उनके लिए ज़रूरत का सामान लाते हों और भीड़ के जमावड़े के बाद सफाई करने में मदद करते हों। फिर भी, हम यह कल्पना भी कर सकते हैं कि यह जगह गंदी और बदबूदार थी। यह निश्चित ही बड़ी निराशा का स्थान होगा; जहाँ इतने लोगों को उनकी अत्यधिक आवश्यकताएं उन्हें उस स्थान पर लेकर आई होंगी। हम यह भी मान सकते हैं कि जब लोग कुण्ड पर इंतज़ार करते होंगे तो वहाँ कई मौतें होती होंगी, और साथ ही अगर किसी को उनके स्थान से धकेल दिया जाता या उनसे बलवान व्यक्तियों के द्वारा कुण्ड में पहले जाने से रोक दिया जाता तो इन कारणों से वहाँ कड़वाहट और लड़ाईयाँ भी होती होंगी

 

इस स्थान के पतन के मध्य में हम यीशु को मानवता के इस मायूस समूह के बीच आते देखते हैं। हमें 5वें पद में बताया गया है कि वह बीमार जिसने चंगाई पाई अड़तीस वर्षों से उस अवस्था में था! वह जितने भी वर्षों से वहाँ रहा हो, या पानी के जितना भी निकट वह पहुँच सकता हो, उसके पास औरों से पहले पानी में पहुँचने के लिए उसकी मदद करने वाला कोई नहीं था।

 

यह व्यक्ति लम्बे समय से वहाँ उस अवस्था में पड़ा था; वह वहाँ क्यों रहा? आप क्या सोचते हैं कि उसकी भावनात्मक दशा क्या होगी? जब आप भावनात्मक रूप से पीड़ा में होते हैं तो आप कहाँ जाते हैं?

 

मैं उसकी भावनात्मक दशा के बारे में अचरज करता हूँ। अड़तीस वर्ष लम्बा समय है। क्या वह वहाँ इतने सभी वर्षों से था? क्या वह वहाँ आया जाया करता था, अपने घर को और घर से निरंतर यात्राएं करता हुआ? यीशु के साथ अपनी संक्षिप्त वार्तालाप में वह बताता है कि उसके पास कुण्ड में जाने के लिए मदद करने वाला कोई नहीं था।

 

ऐसा लगता है कि उसे आशाहीन, निराश और असहाय महसूस हो रहा था। क्या आप कभी ऐसी परिस्थिति में रहे हैं जब आपको भी ऐसा ही महसूस हुआ हो? क्या आप बाँटना चाहेंगे कि क्या हुआ था?

 

जब वह यीशु से मिला तो उसके पास कितनी आशा बाकी थी? क्या उसने प्रार्थना की थी? क्या उसने अपनी पीड़ा के मध्य में परमेश्वर को रोते हुए पुकारा था? उसने अपना भरोसा किसपर रखा था? उसका केंद्र और आशा समय-समय पर स्वर्गदूत भेजने के द्वारा परमेश्वर की उस करुणा पर था, जिसमें वह यह आस लगाए था कि एक दिन चंगाई का अनुग्रह पाने वाला वह होगा। एक बात तो हम जानते हैं, कि पिता ने उस व्यक्ति को देख यीशु को उसकी मदद करने भेजा था। इस तरह से, वह आखिरकार परमेश्वर की चंगाई की करुणा को अनुभव करने वाला था। परमेश्वर उसकी परवाह करता है जिनके पास उनकी परवाह करने वाला कोई नहीं है। इस स्थिति में उसने अपने पुत्र, प्रभु यीशु मसीह को, उसकी देख-रेख करने के लिए भेजा। हमें यह नहीं बताया जाता कि उस दिन वहाँ कुण्ड पर प्रभु ने कुछ और लोगों को भी चंगा किया; यह बीमार व्यक्ति ही एकमात्र जन प्रतीत होता है। प्रेरित यहुन्ना हमें बताता है:

 

6यीशु ने उसे पड़ा हुआ देखकर और जानकर कि वह बहुत दिनों से इस दशा में पड़ा है, उस से पूछा, क्या तू चंगा होना चाहता है? (पद 6)

 

आपको परमेश्वर द्वारा जाना गया है

 

हमें और लोगों में से इस एक व्यक्ति पर अचानक यीशु का ध्यान केन्द्रित होने की तस्वीर मिलती है। मसीह ने जाना कि यह व्यक्ति वहाँ लम्बे समय से रहा है। हम नहीं जानते कि यह ज्ञान उसे वहाँ कुण्ड पर उपस्थित और लोगों से मिला, या फिर यह यीशु को पिता से प्राप्त एक आलौकिक प्रकाशन था जैसा कि अक्सर होता था। हो सकता है उसने उस व्यक्ति से पुछा हो कि वह वहाँ कितने वर्षों से है। हम केवल इतना जानते हैं कि पिता ने यीशु को इस व्यक्ति के विषय में ज्ञान दिया, और वह जानता था की अब इस व्यक्ति के चंगाई पाने का समय है। यीशु हमेशा जो वह पिता को करते “देखता” और पिता से आभास करता था वही करता था। यह एक ऐसा पल था जिसे हम आलौकिक नियोजन कहते हैं। लेकिन फिर भी यीशु बिना पहले उससे बात कर एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे बिना उसे चंगा नहीं करता। इन वचनों में, हम इस बात का अद्भुत उदहारण पाते हैं कि कैसे यीशु ने आत्मा में चल अपने पिता की इच्छा को जानते हुए उसे पूरा करने का कार्य किया।

 

क्या यह ज्ञान उसपर इसलिए प्रकट हुआ क्योंकि वह देह धारण किए परमेश्वर था या फिर इसलिए क्योंकि परमेश्वर का आत्मा उसकी अगवाई कर रहा था? क्या यीशु पृथ्वी पर अपने समय के दौरान सब बातें जानता था?

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सेवकाई में उसकी प्रेरणा

 

यीशु ने आश्चर्य-कर्म और चंगाईयाँ लोगों की पीड़ा कम करने और पिता के प्रति आज्ञाकारी और उसे महिमा देने के सिवाए किसी और कारण से नहीं किए। जो कुछ भी उसने किया वो पिता की आज्ञाकारिता में था। उसने अपनी ओर ध्यान नहीं खींचा; उसने केवल उस आदमी को उसकी पीड़ा से राहत देने के लिए चंगा कर दिया। प्रभु ने तो उसके परमेश्वर का पुत्र होने की सच्ची पहचान में विश्वास होने की माँग भी नहीं रखी, क्योंकि उसने उसे नहीं बताया कि वह कौन है। वह इसलिए आश्चर्य-कर्म करने और चंगाईयाँ देने में आनंदित होता है ताकि उसके पिता की महिमा हो उसने स्वार्थी कारणों से अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने की चाह नहीं रखी। यीशु की सेवकाई के विवरण को लिखते हुए, मत्ती ने यीशु के इसी स्वभाव पर गौर किया:

 

15यह जानकर यीशु वहाँ से चला गया; और बहुत लागे उसके पीछे हो लिये; और उसने सब को चंगा किया। 16और उन्हें चिताया, कि मुझे प्रगट करना 17कि जो वचन यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था, वह पूरा हो। 8 कि देखो, यह मेरा सेवक है, जिसे मैंने चुना है; मेरा प्रिय, जिस से मेरा मन प्रसन्न है: मैं अपना आत्मा उस पर डालूँगा; और वह अन्यजातियों को न्याय का समाचार देगा। 19वह झगड़ा करेगा, और धूम मचाएगा; और बाजारों में कोई उसका शब्द सुनेगा। 20वह कुचले हुए सरकण्डे को तोड़ेगा; और धूआँ देती हुई बत्ती को बुझाएगा....... (मत्ती 12:15-20 जोर मेरी ओर से जोड़ा गया है)

 

ध्यान दीजिये कि वो नहीं चाहता था कि लोग बताएं कि वो कौन है उसमें इसी बात का जज़्बा था कि बीमारों की चंगाई में उसके पिता की महिमा हो। मत्ती, भविष्यद्वक्ता यशायाह में से लिखते हुए, उसके स्वाभाव का ऐसे वर्णन देता है कि वह न झगड़ा करेगा, और न धूम मचाएगा। वह बहस करने वालों में नहीं था। उसने लोगों को अपने आप को सुनने के लिए विवश नहीं किया। उसने अपनी ओर ध्यान आकर्षित करते हुए गलियों में आवाजें और पुकार नहीं लगाई। यहाँ जिस विवरणात्मक शब्द का प्रयोग किया गया है वो एक आदमी के एक आँधी की वजह से टूटी और क्षतिग्रस्त ईख को झुक कर फिर से सीधा करना है। यहाँ एक ऐसी मोमबत्ती की तस्वीर भी है जो अब जल नहीं रही है, लेकिन बुझने के बाद उसकी बाती अभी भी लाल है और सुलग रही है। वो उसे बुझाएगा नहीं, लेकिन उसकी देखभाल कर उसे हवा दे फिर से लौ जलाने की कोशिश करेगा। यह उस एक के बारे में बात करता है जो उन लोगों को चंगा और उत्साहित करेगा जो अपनी आस खो चुके हैं, वह जिनके पास आशा नहीं है, वह जो टूटे हुए हैं। वह उनके साथ आएगा और उनके जीवन पर फूंक उन्हें कारण देगा और उन्हें फिर से एक नई आशा और भविष्य देगा। क्या इसे हमें भी जो कलीसिया में हैं, इसी तरह व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहन नहीं करना चाहिए? हमें यहुन्ना बप्तिस्मा देने वाले के उदहारण के पीछे चलते रास्ते से हट जो कुछ भी वह करता है उसके लिए परमेश्वर को महिमा देनी है। जब हम अपने ऊपर ध्यान नहीं खींचेंगे, लेकिन यीशु की तरह ही परमेश्वर की महिमा करने को खोजेंगे, तब हम और ज्यादा मसीह के जैसे बनेंगे।

 

यह व्यक्ति अड़तीस वर्षों से बीमार पड़ा हुआ था। उसे वह करने को कहा गया जो उसके लिए असंभव था: अपनी खाट उठाकर चल फिर।” (पद 11) एक बात तो निश्चित है; इस व्यक्ति को चंगाई उसके विश्वास और मसीह की समझ के आधार पर नहीं मिली। यह बीमार यह नहीं जानता था कि जो उससे बात कर रहा है वो कौन है, उसने तो बस आज्ञा मानी। जब उसने यीशु के कहे शब्दों पर कार्य किया, उसने समर्थ पाई, और उसके अंगों में चंगाई का संचार हुआ। अधिकतर समय, वचन हमें चंगाई के विषय में एक अलग ही कहानी दिखता है; फरियादी मसीह में विश्वास करता है, जिसके द्वारा चंगाई होती है। यह चंगाई कुछ अलग है। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि इस व्यक्ति के पास तो केवल बहुत कम मात्रा में कुछ आशा थी जिसका केंद्र चंगाई पाने के लिए कुण्ड के पानी में उतर पाना था। लेकिन, वह वहाँ इतने वर्षों से था, कि उसका विश्वास अब एक छोटी सी लौ के समान था जो बुझने के कगार पर था। यह तो आशा की एक धीमी फुसफुसाहट थी, क्योंकि वह उस कुण्ड के किनारे इतने लम्बे समय से था, कि यह तो अब उसके लिए जीवन जीने का तरीका बन गया था। प्रतीक्षा करना उसके जीवन का कार्य था। जब यीशु इस दृश्य में प्रवेश करता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह तो वाकई में इस आदमी की आशा की छोटी सी चिंगारी के उत्तर में मसीह का आलौकिक कार्य है।

 

वो इस आदमी को एक सरल निर्देश देता है; अपनी खाट उठा चलने की। हम नहीं जानते कि इस आदमी के दिमाग में क्या चल रहा था लेकिन वह आज्ञा मानने के लिए तैयार था, यहाँ तक की इस असंभव आदेश को भी जो यीशु ने उसे दिया। हम केवल अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जब यीशु ने उसे यह असंभव सा आदेश दिया तो इस व्यक्ति को उसके आलौकिक अधिकार का आभास हुआ होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु यीशु के शब्दों के अनुसार आज्ञा मानने के अलावा, इस व्यक्ति ने ज्यादा कुछ नहीं किया। यह उसके लिए एक बड़ा कदम था; क्योंकि वह तो अपनी चंगाई के लिए कुण्ड के आश्चर्य-कर्म पर आस लगाए बैठा था। अब, एक आदेश में यीशु उसका सम्पूर्ण दृष्टिकोण बदल देता है! यह हमें दिखता है कि परमेश्वर कैसे चंगाई देता है इस विषय में हम उसे सीमित नहीं कर सकते कि वह केवल इसी तरह से कार्य करेगा। वह हमें असीमित और चौंकाने वाले तरीकों से चंगा कर आश्चर्य में ड़ालेगा। उसकी करुणा और चंगाई पाने के लिए परमेश्वर हमसे उसके तरीकों को समझने की आवश्यकता नहीं रखता, लेकिन जब वह कुछ कहता है तो उसमें उसे हमारी आज्ञाकारिता की आवश्यकता है। उसने उस व्यक्ति को असंभव कार्य करने को कहा, उठकर चलने को! किसी दूसरे को वह कहता है, अपना हाथ बढ़ा” (मत्ती 12:12), और जब हाथ आगे बढ़ाया गया तो वह चंगा हो चुका था। एक अन्य समय उसने भूमि पर थूका और थूक से मिट्टी सानी, और वह मिट्टी अन्धे की आँखों पर लगाई और वह तुरंत चंगा हो गया। उसने एक अलग चंगाई के लिए एक व्यक्ति के कानों में अपनी उंगलियाँ भी डाली। (मरकुस 7:33) और एक अन्य समय उसने केवल कुछ शब्द बोले और एक व्यक्ति के पुत्र ने बीस मील दूर चंगाई पा ली। (यहुन्ना 4:50) यह बता कर कि हम इस कार्य को कैसे चाहते हैं, परमेश्वर को सीमित कर देते हैं; बजाय उसके लिए अपने हृदय और मन को खोल कहने के, “तेरी इच्छा, तेरा तरीका, प्रभु।” वो ऐसे व्यक्ति के साथ कार्य कर सकता है जो जब वह कुछ कहे, सरलता से उसकी आज्ञा मान लें! इस व्यक्ति ने अपने गुणों के कारण चंगाई नहीं पाई, लेकिन इसलिए क्योंकि उसने उसे दी गई सरल आज्ञा को माना।

 

हमें बताया गया है कि इस व्यक्ति ने तुरंत चंगाई पा ली। यहाँ कोई प्रमाण नहीं हैं कि उसपर हाथ रखे गए हों या फिर यह कि यीशु ने उठाने के लिए उस व्यक्ति की ओर हाथ भी बढ़ाया हो। कुछ नहीं! केवल शब्द बोले गए हैं! इस दृश्य की कल्पना करें। आज्ञा के कुछ शब्द और हो गया! वचन कहता है, वह मनुष्य तुरन्त चंगा हो गया, और अपनी खाट उठाकर चलने फिरने लगा।(पद 9)

 

आप क्या कल्पना करते हैं, कि कुण्ड के आस-पास और लोगों ने जब पानी से बाहर की इस ख़बर को सुना होगा तो उन्होंने इसे कैसे लिया होगा?

 

मैं सोचता हूँ कि इस चंगाई ने कुण्ड के आस-पास अफरा-तफरी मचा दी होगी। यहुन्ना इस दृश्य के विवरण की गहराई में नहीं जाता, लेकिन अगर आप चाहें तो मेरे साथ इसकी कल्पना करने की कोशिश करें। क्या आप नहीं सोचते कि जब वहाँ मौजूद और लोगों को पता चला होगा कि व्यक्ति वह तुरंत चंगा हो गया तो वह हैरान रह गए होंगे? जब उसने इस बात का एहसास किया होगा कि अब वह चल सकता है तो उसने काफी हल्ला मचाया होगा। मैं कल्पना करता हूँ कि जब उसने अड़तीस साल बाद खड़ा होकर अपनी खाट उठाई होगी तो वह उन्माद और उल्लास से भरा होगा! क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब भीड़ ने इस बात को जाना होगा कि इस व्यक्ति ने बिना कुण्ड में जाए ही चंगाई पा ली है तब उन्होंने क्या सोचा होगा? कोई आश्चर्य नहीं है कि यह “धार्मिक पुलिस” को मंच पर ले आई। वह तुरंत दो बातों पर केन्द्रित हुए: यह व्यक्ति सब्त के दिन अपनी खाट उठाए क्या कर रहा है? और जब उन्होंने इस व्यक्ति की गवाही सुनी, तब वह यह जानना चाहते थे कि वह कौन था जो सब्त के दिन चंगाई कर रहा है।

 

वचन का यह खंड हमें यह भी प्रकट करता है कि हमारे प्रभु के लिए उनके साथ सम्बन्ध रखना महत्वपूर्ण है जो उसके प्रेम के द्वारा छुए गए हैं। हमें बताया गया है कि यीशु उसे मंदिर में मिला। (पद 14) मिलने का अर्थ है कि यीशु ने उसे उसकी चंगाई के विषय में कुछ निर्देश देने के लिए उसकी खोज की होगी।

 

14इन बातों के बाद वह यीशु को मन्दिर में मिला, तब उसने उस से कहा, देख, तू तो चंगा हो गया है; फिर से पाप मत करना, ऐसा न हो कि इस से कोई भारी विपत्ति तुझ पर आ पड़े। (यहुन्ना 5:14)

 

यीशु उससे पाप के विषय में बात क्यों करता है? क्या आप सोचते हैं कि हर वाकये में बीमारी पाप का ही परिणाम होती है?

 

वचन से यह स्पष्ट है कि बीमारी हमेशा एक व्यक्ति के पाप का परिणाम नहीं होती। यहुन्ना की पुस्तक में आगे जाकर, चेलों का सामना एक ऐसे व्यक्ति से होता है जो जन्म से अंधा था, और उन्होंने यीशु से उसके अंधेपन का कारण पूछा, “....2हे रब्बी, किस ने पाप किया था कि यह अन्धा जन्मा, इस मनुष्य ने, या उसके माता पिता ने? 3यीशु ने उत्तर दिया, कि तो इस ने पाप किया था, इस के माता पिता ने; परन्तु यह इसलिये हुआ, कि परमेश्वर के काम उस में प्रगट हों।बीमारी हमेशा पाप का परिणाम नहीं होती। लेकिन यहाँ बीमार के साथ फिर मुलाकात से यह स्पष्ट है कि, इस मामले में, उसकी बीमारी पाप के कारण थी, और उसे फिर से उस पाप में वापस नहीं जाना चाहिए, ताकि उसके साथ इससे भी बुरा न हो। प्रभु इस बात की चिंता रखता है कि हम शत्रु के जालों से बचे रहे और कि हम पाप से मुक्त हों।

 

वो पिछली बार कब था जब आपको चोट पहुँची थी या आपके जीने की आग बुझ सी रही थी? क्या हुआ था? मसीह आपके संग कैसे खड़ा हुआ? या फिर आप अब भी चोट खाए हुए हैं? क्या आप मसीह की चंगाई तक पहुँचने के लिए तैयार हैं, तब भी जब इसका मतलब यह हो कि अब आपका जीवन बदल जाएगा?

 

जब लोगों को अपनी ज़रूरतों को बाँटने के लिए अवसर मिल जाए, तो सुझाव है कि उसके बाद प्रार्थना के समय के साथ अंत किया जाए:

 

प्रार्थना: धन्यवाद पिता, यीशु को हमारे अन्धकार और जीवन की पीड़ाओं में भेजने के लिए धन्यवाद। हम आज आपको एक नई ताज़गी से हमारे पास आकर हम में से उन लोगों को चंगाई देने के लिए आमंत्रित करते हैं जो चोट खाए हुए हैं और बुझती लौ की तरह छोड़ दिए गए हैं। हम में एक बार फिर से लौ जला और जीवन में नयापन दें। अमीन!

 

कीथ थॉमस

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-मेल: keiththomas7@gmail.com

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