
21. Jesus, the Resurrection, and the Life
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21. यीशु पुनरुथान और जीवन
यूहन्ना के सुसमाचार के अध्याय दस का अंत यीशु के यरूशलेम से 3,500 फीट नीचे के तेज ढाल पर पैदल उतर समुद्र तल से 825 फीट नीचे यर्दन घाटी में एक ऐसे क्षेत्र में हुआ जो मृत सागर के उत्तर में स्थित था। वह यहूदी धार्मिक अधिकारियों के साथ अपने टकराव के बाद वहाँ गया था जब उन्होंने इसलिए उसका पथराव करने की कोशिश की क्योंकि उसने खुद को "अच्छा चरवाहा" कहा था और यह कथन कहा था, "मैं और पिता एक हैं” (यहुन्ना 10:30)। यीशु उनकी पकड़ से बच निकला और नीचे उस स्थान पर उतर आया जहाँ यहुन्ना बप्तिस्मा देने वाला यर्दन नदी में बपतिस्मा दे रहा था। वहाँ वे लोग थे जो उसका वचन प्राप्त करने के लिए खुले थे, और बहुत से लोग उसके पास आए (यहुन्ना 10:42)। यही वह जगह थी जहाँ यीशु को अपने दोस्त लाज़र के बारे में खबर मिली थी।
1मरियम और उसकी बहन मार्था के गाँव बैतनिय्याह का लाजर नाम एक मनुष्य बीमार था। 2यह वही मरियम थी जिसने प्रभु पर इत्र डालकर उसके पाँवों को अपने बालों से पोंछा था, इसी का भाई लाजर बीमार था। 3सो उसकी बहनों ने उसे कहला भेजा, “हे प्रभु, देख, जिससे तू प्रीति रखता है, वह बीमार है।” 4यह सुनकर यीशु ने कहा, “यह बीमारी मृत्यु की नहीं, परन्तु परमेश्वर की महिमा के लिये है, कि उसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र की महिमा हो।” 5और यीशु मार्था और उस की बहन और लाजर से प्रेम रखता था। 6सो जब उसने सुना, कि वह बीमार है, तो जिस स्थान पर वह था, वहाँ दो दिन और ठहर गया। 7फिर इस के बाद उसने चेलों से कहा, “आओ, हम फिर यहूदिया को चलें।” 8चेलों ने उससे कहा, “हे रब्बी, अभी तो यहूदी तुझे पत्थरवाह करना चाहते थे, और क्या तू फिर भी वहीं जाता है?” 9यीशु ने उत्तर दिया, “क्या दिन के बारह घंटे नहीं होते? यदि कोई दिन को चले, तो ठोकर नहीं खाता है, क्योंकि इस जगत का उजाला देखता है। 10परन्तु यदि कोई रात को चले, तो ठोकर खाता है, क्योंकि उसमें प्रकाश नहीं।” 11उसने ये बातें कहीं, और इस के बाद उनसे कहने लगा, “हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूँ।” (यहुन्ना 11:1-10)
जब यीशु को यह खबर मिली, तो वह अपने मित्रों के घर के करीब नहीं था। यरूशलेम से डेढ़ मील दूर मरियम, मार्था और लाजर के घर तक पहुँचने के लिए, बैतनिय्याह में अपने मित्रों तक पहुँचने के लिए अठारह मील की चढ़ाई तय करने में एक दिन की यात्रा लगती। हम इस कहानी में कई चीजें सीख सकते हैं, न केवल यीशु के बारे में बल्कि मृत्यु नामक शत्रु से सामना होने पर उसके प्रतिउत्तर के तरीके के बारे में भी।
यह एक सुंदर विचार है कि गाँव को मरियम और मार्था के गाँव के रूप में जाना जाता है (पद 1)। क्या यह एक सुंदर बात नहीं होगी कि परमेश्वर के लिए आपकी भक्ति इतनी प्रसिद्ध हो कि इससे आपके नगर या शहर में आपके नाम के प्रसिद्ध होने का कारण बने? जिस सुसमाचार का अध्यन हम कर रहे हैं, उसका लेखक यहुन्ना मानता था कि उसके पाठकों ने मरियम के बारे में अन्य सुसमाचार लेखकों के द्वारा सुना था (पद 2)। वह हमें अगले अध्याय तक मरियम के महंगी इत्र से मसीह के अभिषेक का परिचय नहीं देता। बहनों ने यीशु को यह सन्देश भेजा, "जिससे तू प्रीति रखता है, वह बीमार है", अर्थात लाजर। हमें याद रखना होगा कि यीशु को तीनों के साथ समय बिताने में आनंद मिलता था और वे करीबी मित्र बन गए थे।
उन्होंने उसे आने के लिए नहीं कहा, क्योंकि उन्हें पता था कि यह उस पर बड़ा दबाव डाल देगा। बहनों को पता था कि धार्मिक अधिकारी मसीह के पीछे पड़े थे और उसे मारना चाहते थे। यरूशलेम के निकट कहीं भी आना मुसीबत को न्योता देना हो सकता था, लेकिन वे उसे परिस्थिति के बारे में बताने से अनभिज्ञ नहीं रख सकते थे। वह उनकी एकमात्र आशा था। शायद, उनके मन में यह विचार था कि यीशु ने सूबेदार के सेवक को दूर से ही चंगा किया था (मत्ती 8: 5-13), और शायद, वह लाजर के लिए भी कुछ ऐसा ही करेगा।
जब प्रभु ने यह समाचार सुना, तो उसने उत्तर दिया कि यह मृत्यु में समाप्त नहीं होगा और इसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र की महिमा की जाएगी। मुझे यकीन है कि दूत उन शब्दों को मार्था और मरियम के पास वापस लेकर गया होगा। समस्या यह थी कि, मसीह के यह कहने से पहले ही लाजर मर चुका था। आइए इसके बारे में सोचें। यीशु जहाँ था वहाँ तक चलकर पहुँचने के लिए दूत को एक दिन लगा। यीशु ने वहाँ जाने से पहले दो दिन (पद 6) इंतजार किया, और निश्चित रूप से, जब वह चला, तो कम से कम एक दिन यरूशलेम तक पहुँचने में लगा। जब वह वहाँ पहुँच गया, तो मार्था ने उसे बताया कि लाजर चार दिन से कब्र में दफन था (पद 17 और 39)।
प्रश्न 1) यीशु ने सूबेदार के सेवक की तरह ही दूर से ही चंगाई क्यों नहीं दी? दो दिनों की देर करने का उद्देश्य क्या था? क्या आपने कभी परमेश्वर के समय पर सवाल उठाया है?
यहूदी परंपरा यह मान्यता सिखाती थी कि एक मृत व्यक्ति का प्राण या आत्मा तीन दिनों तक शरीर के पास रहता है। जब चेहरे का रंग बदल जाए और सड़ने का संकेत स्पष्ट हो जाए, तो वह व्यक्ति के पुनर्वसन की कोई आशा नहीं होने के कारण उसे मृत मान लेते थे। तीन दिनों के बाद, प्राण के फिर से शरीर में प्रवेश करने को असंभव माना जाता था। जब तक दूत यीशु के पास आया, तब तक प्रभु जानता था कि पिता के हृदय में क्या था। हमारे लिए दर्ज यीशु द्वारा भाग लिए प्रत्येक अंतिम संस्कार का परिणाम मृत व्यक्ति के जी उठने में हुआ। नईन में विधवा का पुत्र था (लूका 7:11-17), लेकिन संदेह करने वाले कह सकते थे कि वह तो तभी मरा था। फिर, जयैर की बेटी थी, और वे कह सकते थे कि उसे अभी तक दफनाया नहीं गया था (मत्ती 9:18-26); लेकिन, यहाँ लाजर का जी उठाना हुआ, जहाँ सड़ना कुछ समय पहले शुरू हो गया था।
यदि प्रभु लाजर को जी उठाने के लिए तुरंत निकल जाता, तो लोग तर्क दे सकते थे कि पुनरुत्थान के बजाय यह एक चंगाई थी, और पिता हमें सिखाना चाहता था कि यीशु वास्तव में पुनरुत्थान और जीवन है (पद 25)। यहूदी लोगों का मानना था कि, शास्त्रों के अनुसार, मृतकों का पुनरुत्थान होगा और मसीह के संकेतों में से एक यह होगा कि वह उस विशेष चमत्कार को करेगा। लाजर का पुनरुत्थान एक धन्य घटना होगा, लेकिन इससे भी अधिक, यह उनके लिए एक संकेत भी होगा कि यीशु ही वह मसीहा था और है जिसकी मृत्यु पर सामर्थ है, अर्थात भविष्यवाणी किया हुआ जन जो मरे हुओं को उठाएगा:
तेरे मरे हुए लोग जीवित होंगे, मुर्दे उठ खड़े होंगे। हे मिट्टी में बसनेवालों, जागकर जयजयकार करो! क्योंकि तेरी ओस ज्योति से उत्पन्न होती है, और पृथ्वी मुर्दो को लौटा देगी। (यशायाह 26:19)
2और जो भूमि के नीचे सोए रहेंगे उनमें से बहुत से लोग जाग उठेंगे, कितने तो सदा के जीवन के लिये, और कितने अपनी नामधराई और सदा तक अत्यन्त घिनौने ठहरने के लिये। 3तब सिखानेवालों की चमक आकाशमण्डल की सी होगी, और जो बहुतों को धर्मी बनाते हैं, वे सर्वदा तारों की नाईं प्रकाशमान रहेंगे। (दानिय्येल 12:2-3)
यह तथ्य कि लाजर चार दिनों तक मरा रहा का अर्थ यह है कि उसके मृतकों में से उठाए जाने पर लोगों के मनों में संदेह के लिए कोई जगह नहीं रहेगी। यहाँ यहूदी लोगों के लिए इस बात के सबूत थे कि यीशु वास्तव में मसीहा था!
अब, इस संदेश के पहुँचने के समय के बाद, आइये हम वापस चेलों और यीशु के पास आएं। दो दिन इंतज़ार करने के बाद, जब यीशु ने शिष्यों से कहा कि अब यहूदिया वापस जाने का समय है, तो वे सभी जानते थे कि वह यरूशलेम के बारे में बात कर रहा था। यहूदिया पठार में जाने के लिए उन्हें बैतनिय्याह और यरूशलेम से जाना पड़ता। उन्होंने यह जानते हुए कि यह उन सभी के लिए खतरनाक होगा, तुरंत उसके निर्णय पर सवाल उठाना शुरू कर दिया।
यरूशलेम में यहूदी नेतृत्व ने पहले ही यीशु को मारने की कोशिश की थी। वे सभी यीशु के शिष्यों के रूप में चिह्नित किये हुए थे, धार्मिक यहूदी अभिजात वर्ग के विरुद्ध पाखंडी। उन्हें कोई कारण नहीं दिख रहा था कि उन्हें यरूशलेम वापस क्यों जाना चाहिए। जहाँ तक वे जानते थे, लाजर के साथ सब ठीक था। यीशु ने खुद कहा था कि लाजर की बीमारी मृत्यु में समाप्त नहीं होगी, इसलिए उन्होंने तब तक यह सोचा कि वह ठीक है जब तक प्रभु ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह मर चुका है (पद 14)। इसलिए, जब यीशु ने दूत से कहा कि यह मृत्यु में समाप्त नहीं होगा, तो आपको क्या लगता है कि यीशु ने गलत कहा? बिलकुल नही! उसने कहा था कि यह मृत्यु की नहीं, यहाँ जोर मृत्यु की नहीं पर है। उसने उन्हें आश्वस्त किया कि जब तक वे ज्योति में चलते रहेंगे तो सब ठीक रहेगा। समय घंटों में गिना जाता था; दिन और रात दोनों बारह घंटे के थे। वह समय आएगा जब उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने से लेकर उसके पुनरुत्थान तक अन्धकार शासन करेगा। प्रभु जानता था कि उसका समय आ रहा था, लेकिन तब तक, क्योंकि वह ज्योति में चलाता हुआ अपने पिता के कार्य को करता रहेगा, उसके पास डरने के लिए कुछ भी नहीं था ।
11उसने ये बातें कहीं, और इसके बाद उनसे कहने लगा, “हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूँ।” 12तब चेलों ने उससे कहा, “हे प्रभु, यदि वह सो गया है, तो बच जाएगा।” 13यीशु ने तो उसकी मृत्यु के विषय में कहा था: परन्तु वे समझे कि उसने नींद से सो जाने के विषय में कहा। 14तब यीशु ने उनसे साफ कह दिया, “ लाजर मर गया है। 15और मैं तुम्हारे कारण आनन्दित हूँ कि मैं वहाँ न था जिस से तुम विश्वास करो, परन्तु अब आओ, हम उसके पास चलें।” 16तब थोमा ने जो दिदुमुस कहलाता है, अपने साथ के चेलों से कहा, “आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें।” 17सो यीशु को आकर यह मालूम हुआ कि उसे कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं। 18बैतनिरयाह यरूशलेम के समीप कोई दो मील की दूरी पर था। 19और बहुत से यहूदी मार्था और मरियम के पास उनके भाई के विषय में शान्ति देने के लिये आए थे। 20सो मार्था यीशु के आने का समाचार सुनकर उससे भेंट करने को गई, परन्तु मरियम घर में बैठी रही। 21मार्था ने यीशु से कहा, “हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता। 22और अब भी मैं जानती हूँ, कि जो कुछ तू परमेश्वर से मांगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।” 23यीशु ने उससे कहा, “तेरा भाई जी उठेगा।” 24मार्था ने उससे कहा, “मैं जानती हूँ, कि अन्तिम दिन में पुनरूत्थान के समय वह जी उठेगा।” 25यीशु ने उससे कहा, “पुनरूत्थान और जीवन मैं ही हूँ, जा कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा। 26और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा, क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?” 27उसने उससे कहा, हाँ हे प्रभु, मैं विश्वास कर चुकी हूँ, कि परमेश्वर का पुत्र मसीह जो जगत में आनेवाला था, वह तू ही है।” (यहुन्ना 11:11-27)
प्रश्न 2) यीशु ने विश्वासी की मृत्यु का वर्णन करने के लिए सो गया शब्द का उपयोग किया। क्या हम में से वह जो विश्वास करने वाले हैं, बेहोश रहेंगे और जब तक मसीह नहीं आएगा तब तक सोए रहेंगे? जब हम मर जाते हैं तो हमारे साथ क्या होता है?
परमेश्वर ने एक विश्वासी की मृत्यु को “नींद” के रूप में वर्णित किया। यह शारीर से मनुष्य के प्राण और आत्मा का अलग होना है। शरीर कब्र में सोया है, लेकिन आत्मा, हमारा अदृश्य भाग जो असली “हम” है, वह प्रभु के साथ होने के लिए जाता है। पहले शहीद, स्तिफनुस ने, जब यहूदी उसे उसके विश्वास के लिए पत्थर मार रहे थे, प्रभु को परमेश्वर पिता के दाहिने हाथ पर खड़े हुए देखा (प्रेरितों 7:56), और फिर पवित्रशास्त्र कहता है कि वह परमेश्वर में सो गया था (प्रेरितों 7:60)। उसका शरीर पत्थरों के ढेर में था, परन्तु प्रभु यीशु पिता के दाहिने हाथ पर अपने सामान्य बैठने के स्थान से खड़ा था ताकि वह स्वयं स्तिफनुस का आत्मा स्वीकर कर सके। जब यीशु ने जयैर की बेटी को मरे हुओं में से उठाया, तो पवित्रशास्त्र कहता है कि उसके प्राण लौट आए (लूका 8:55)। अगर उसके प्राण लौट आए, तो वह कहाँ गई थी? वह पिता के साथ थी, भले ही उसका शरीर भौतिक राज्य में यीशु के सामने था। थिस्सलुनिका और कुरिन्थ में कलीसिया को लिखते हुए, प्रेरित पौलुस ने लिखा:
वह हमारे लिये इस कारण मरा, कि हम चाहे जागते हों, चाहे सोते हों; सब मिलकर उसी के साथ जीएं। (1 थिस्सलुनीकियों 5:10) इसलिये हम ढाढ़स बान्धे रहते हैं, और देह से अलग होकर प्रभु के साथ रहना और भी उत्तम समझते हैं। (2 कुरिन्थियों 5:8)
जब एक विश्वासी का शरीर मर (सो) जाता है, तब भी हम बिलकुल ज़िंदा और मसीह के साथ होंगे। पौलुस ने इस विचार के बारे में और जगह लिखा:
22पर यदि शरीर में जीवित रहना ही मेरे काम के लिये लाभदायक है तो मैं नहीं जानता, कि किसको चुनूँ। 23क्योंकि मैं दोनों के बीच अधर में लटका हूँ; जी तो चाहता है कि कूच करके मसीह के पास जा रहूँ, क्योंकि यह बहुत ही अच्छा है। 24परन्तु शरीर में रहना तुम्हारे कारण और भी आवश्यक है। (1 फिलिपियों 22-24)
पौलुस ने लिखा कि वह जाकर मसीह के साथ रहने की चाह रखता था। अगर वह मानता होता कि वह बेहोश होगा, तो यह "बहुत ही अच्छा” नहीं होता। नहीं, पौलुस का मानना था कि जिस क्षण वह मरेगा, वह मसीह के साथ होगा। जब हम, पौलुस की तरह, विश्वास करते हैं कि मृत्यु वाकई बहुत बेहतर है, तो मसीह में विश्वास का यह दृष्टिकोण हमें कुछ भी सामना करने के लिए तैयार करेगा।
थोमा को अक्सर संदेह करने वाला कहा जाता है, लेकिन जब हम पढ़ते हैं कि यीशु ने चेलों से कहा कि वे यरूशलेम और यहूदिया जा रहे थे, तो थोमा सामान बाँध जाने के लिए तैयार था; "तब थोमा ने जो दिदुमुस कहलाता है, अपने साथ के चेलों से कहा, “आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें।” (यूहन्ना 11:16)। वह मसीह के साथ मरने की पूर्णत: उम्मीद कर रहा था। मृत्यु कई लोगों के लिए भय का बादशाह हो सकती है, लेकिन यीशु राजाओं का राजा है और हम में से उन के लिए जिन्होंने अपने जीवन उसे सौंप दिए हैं उसने मृत्यु और नरक को पराजित कर दिया है।
प्रश्न 3) लाजर के बारे में बताया जाने के बाद, यीशु ने बैतनिय्याह के लिए निकलने से पहले दो दिन इंतजार किया। एक ऐसा समय साझा करें जब आप परमेश्वर के समय से निराश हुए हैं। बाद में, क्या देरी के फल-स्वरूप कुछ अच्छा हुआ?
मुझे एक समय याद है, जब साढ़े तीन वर्षों तक मैंने अमेरिका के लिए अपना निवासी वीजा प्राप्त करने की कोशिश मैंने अमेरिकी आप्रवासन सेवा के साथ लड़ाई लड़ी। यह एक कठिन समय था क्योंकि इंतजार के पूरे समय में मैं कोई कमाई नहीं कर सका। हमें अपने प्रयोजन के लिए परमेश्वर पर भरोसा करना था। यह प्रतीक्षा की अवधि बहुत झुंझलाहट भरी थी। यदि हमारे मित्र और परमेश्वर का अनुग्रह नहीं होता, तो मुझे नहीं पता कि हम उस समय से होकर कैसे गुज़र पाते। पीछे मुड़कर देखने में, इस तनावपूर्ण अनुभव में प्रभु के कई बार हमारे लिए वित्तीय सहायता करने वाले लोगों को भेजने के द्वारा मैं अपने विश्वास में मजबूत हुआ। परमेश्वर का समय हमारे समय से अलग है; हम अपनी प्रार्थना के सभी उत्तर तत्काल पसंद करते हैं! यीशु तुरंत अपने मित्र के घर नहीं गया। हम यह इसलिए जानते हैं क्योंकि यह बताता है कि तीव्र चढ़ाई के बाद, यीशु बैतनिय्याह के गाँव के पास पहुँचा (पद 17, 20)। मार्था को बताया गया था कि यीशु आ रहा है, यह नहीं कि वह वहाँ था (पद 20)।
अब, हम मार्था को उससे मिलने के लिए तेज़ी से बाहर की ओर जाते देखते हैं, जबकि मरियम ठहर गई थी। वह किस स्थान पर पहुँचा? यह संभव है कि वह गाँव के बाहर पहुँचा था जहाँ कब्रिस्तान स्थित थे। मार्था उस स्थान पर आई जहाँ वह इंतजार कर रहा था। यहिरो के मार्ग के तेज घुमाव चढ़ने के बाद यीशु और चेले थक गए होंगे। जब मार्था ने सुना कि प्रभु आ रहा था, तो यह सहज था। वह जो भी कर रही थी, उसे छोड़ मरियम के बिना उससे मिलने निकल पड़ी, लेकिन जब तक मरियम भी वहाँ नहीं आ जाती तब तक प्रभु लाजर को नहीं जिलाता। वह चाहता था कि जब वह कब्र से निकले तो दोनों बहनें अपने भाई से मिलें।
मार्था, मरियम और लाजर यरूशलेम में अच्छी तरह से जाने जाते थे, क्योंकि शास्त्र हमें बताते हैं कि जब उन्होंने सुना कि लाजर की मृत्यु हो गई है, कई यहूदी बहनों को सांत्वना देने आए थे (पद 19)। यहुन्ना हमें नहीं बताता कि मरियम क्यों रुक गई थी। हम जानते हैं कि मार्था हमेशा अपने मेहमानों की देखभाल करती, एक आदर्श मेज़बान थी। शायद, उसने मरियम के प्रभु के चरणों में प्रतीक्षा और मसीह के शब्दों को सुनकर उनसे सबक सीखा था। अब, उसने मसीह को पहले और अपने मेहमानों के प्रति जिम्मेदारियों को दूसरे स्थान पर रखने का दृढ़ संकल्प किया था। हमें इस आश्चर्यजनक प्रश्न के साथ छोड़ दिया जाता है कि मरियम घर पर क्यों रुक गई थी।
जब मार्था मसीह के पास आई, तो वह केवल "अगर" से भरी थी। "यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता।” (पद 21)। हम अक्सर अपने जीवन में हमारी अपनी पसंद से या दुर्भाग्य से होने वाली बातों पर पछतावा कर सकते हैं। जीवन "केवल अगर" और "मगर" से भरा है। जीवन प्रश्नों से भरा है। लेकिन, यदि हम अपने जीवन में "केवल अगर" पर केंद्रित रहते हैं, तो हम अधिक महत्वपूर्ण सवाल खो सकते हैं, जो है "अब क्या?" इस तरह की परिस्थितियों में परमेश्वर से हमारा प्रश्न, "परमेश्वर, अब क्या? अगला कदम क्या है?” होना चाहिए।
कोई समस्या या परिस्थिति इतनी बड़ी या जटिल नहीं है कि उसका समाधान न हो, खासकर जब हम प्रभु को अपनी सामर्थ के साथ समीकरण में प्रवेश करने को आमंत्रित करते हैं। यहाँ, मार्था ने अपना खेद व्यक्त किया। लेकिन, वह यह भी जानती थी कि परमेश्वर के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है, क्योंकि उसने आगे कहा, "अब भी मैं जानती हूँ, कि जो कुछ तू परमेश्वर से मांगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।” (पद 22)।
जब हम उसके और उसकी बहन के बारे में पढ़ते हैं तो हम अक्सर मार्था का कठोरता से न्याय करते हैं, लेकिन यीशु ने कोमलता के साथ उसके दुःख को देखा और उसका दर्द महसूस किया। जैसा कि हम इस खंड में सीखते हैं, उसने काफी कुछ सही समझा! उसने आशा रखने का साहस रखा और अपने इस विश्वास की घोषणा की कि वह मसीह है, परमेश्वर का पुत्र, जो संसार में आया है! हम यीशु को अपनी परिस्थिति में पहचान सकते हैं, लेकिन क्या हम उम्मीद के साथ उसके पास आए हैं? मार्था का विश्वास उस स्थान तक पहुँचाया गया था जहाँ वह कह सकती थी, "मैं जानती हूँ, कि जो कुछ तू परमेश्वर से मांगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।” (पद 22)। लेकिन, वह उससे मांगती नहीं! हम में से कई ऐसे स्थान पर आ गए हैं जहाँ हमारे पास मज़बूत विश्वास है, लेकिन हम उसे चमत्कारी रूप से कार्य करने के लिए नहीं मांगते। यह उस व्यक्ति की कहानी की तरह है जिसका पुत्र दुष्ट-आत्मा से ग्रसित था:
21उसने उसके पिता से पूछा, “इस की यह दशा कब से है?” उसने कहा, “बचपन से।” 22“उसने इसे नाश करने के लिये कभी आग और कभी पानी में गिराया; परन्तु यदि तू कुछ कर सके, तो हम पर तरस खाकर हमारा उपकार कर।” 23यीशु ने उससे कहा; “‘यदि तू कर सकता है’; विश्वास करनेवाले के लिये सब कुछ हो सकता है।” 24बालक के पिता ने तुरन्त गिड़गिड़ाकर कहा; “हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ, मेरे अविश्वास का उपाय कर।” (मरकुस 9:21-24)
इस व्यक्ति की, मार्था के समान, अपने अविश्वास के साथ लड़ाई थी। उनका मानना था कि यीशु उसके बेटे को चंगा कर मुक्त सकता है, लेकिन हम में से कईयों की तरह, मार्था सहित, हमारा विश्वास हमारे सामने उस परिस्थिति पर केंद्रित है जो इतनी कठिन और असंभव प्रतीत होती है। हमें अपने अविश्वास से जूझने में परमेश्वर से मदद चाहिए! महान मैं हूँ जो मैं हूँ (निर्गमन 3:14) मार्था के सम्मुख उसके विश्वास की अभिव्यक्ति की तलाश में है। उसने उसके साथ साझा किया कि वह कौन है - “पुनरूत्थान और जीवन मैं ही हूँ, जा कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा। और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा, क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?” (पद 25-26)। यह मसीह का पाँचवाँ मैं हूँ कथन है। ऐसा लगता है जैसे प्रभु मार्था से कह रहा है, "तुम्हें केवल मेरे वह होने की आवश्यकता है जो मैं हूँ”। अक्सर, हम प्रभु को अपने शिष्यों के विश्वास को चुनौती देते देखते हैं, और यही वह मरियम के साथ और शायद, हम में से प्रत्येक के साथ कर रहा है, अर्थात अपनी परिस्थिति में उसे करने के लिए अपनी आँखें उठाकर प्रभु के हमारे विश्वास के उत्तर के रूप में कुछ करने की आशा रखना। याकूब ने कहा, तुम्हें इसलिए नहीं मिलता क्योंकि तुम मांगते नहीं" (याकूब 4:2)। मार्था का सामना करने वाली परिस्थिति में, वही वह व्यक्ति है जिसके पास उसमें जीवन और पुनरुत्थान की सामर्थ है, क्योंकि वह जीवन और पुनरुत्थान है। प्रभु "केवल अगर" के प्रश्नों से हमारा ध्यान हटाना चाहता है, और इसके बजाय, कि हम उससे पूछें, "अब क्या? अब आप क्या करना चाहते हैं, प्रभु?"
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