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7. The Millennium

7. सहस्त्राब्दी

अनन्तकाल हमारी आत्मा के (डी.एन.) पर लिखा गया है-

 

हम अब अनन्तकाल में अंतदृष्टि के पाँचवे अध्ययन पर पहुँच गए हैं, और मैं आशा करता हूँ कि अब तक आप अनन्तकाल के बारे में काफ़ी समझ चुके होंगे और प्रभु यीशु के क्रूस के द्वारा खरीदी हुई नियति को पूर्णतः समझ चुके होंगे। कुछ हद तक हम में से बहुत अपने अंत: मन में यह नहीं समझ पाते की केवल यही एक छोटे समय का जीवन है जो हम इस पृथ्वी पर जी हैं। जीवन की चुनौतियों को देखते हुए जब हम बारीकी से चीजों को परखते हैं और उनके प्रमाण देखते हैं हम पाते हैं कि जो सिद्धांथ सृष्टिकर्ता को नकारते हैं वह मानना तर्कविरूद्व है। ऐसे कई सवाल हैं जिनका उत्तर विज्ञान नहीं दे सकता। हमारा हद्वय हमें यह बताता है कि जीवन में ऐसा बहुत कुछ है जिसका अनुभव हमने अभी तक यहाँ नही किया है। राजा सुलेमान जिन्हें सबसे चतुर माना जाता था कहते हैं :-

 

उसने सब कुछ ऐसा बनाया कि अपने अपने समय पर वे सुन्दर होते हैं; फिर उसने मनुष्यों के मन में अनादि-अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है, तौभी काल का ज्ञान उत्पन्न किया है, वह आदि से अन्त तक मनुष्य बूझ नहीं सकता। (सभोपदेशक :११)

 

पवित्र आत्मा से प्रेरित होकर सुलेमान ने परमेश्वर की रचनात्मकता पर बोला कि उस ने मनुष्यों के मन में अनादि-अनन्तकाल का ज्ञान उत्पन्न किया है।फ्रैन्च बाईबिलमें कहा गया है कि ईश्वर ने अनन्तकाल के विचार हमारे हद्वय में स्थापित किए हैप्रिन्स चाल्र्स ने एक बार मनुष्य की आत्मा के अंदरूनी खालीपन के बारे में कहा था, “चाहे विज्ञान की कितनी भी उपलबधियाँ क्यों हो, फिर भी कहीं कहीं आत्मा की गहराई में लगातार एक चिन्ता रहती है, कि कुछ छूट गया है, या कुछ कमी है राजकुमारी डायना एक सभा में बोली थी, “आज के जीवन में लोगों के लिए आधुनिक चाल चलन में अस्तित्व बनाने उसमें जीने का फल है एक भारी सूनापन अकेलेपन को बुलावा देना।उन्होने कहा, “वह जानते हैं कि कुछ कमी है।हमारे हद्वय में जब तक कि हम प्रभु यीशु के पास नही आते हैं, तब तक हमें उस खालीपन का एहसास होता है और हम उसे ड्रग्स (नशे), शराब, सैक्स शान्ति, रूपये पैसे और झूठे दिखावे से संतुष्ट करते हैं परन्तु हमें संतुष्टि नही मिलती है, क्योंकि हम उस खाली स्थान के साथ ही रचे गए है। जैसे कि ब्लेज पास्कलजो एक फ्रैन्च दार्शनिक गणितिज्ञ थे, ने लिखा है, “हर एक व्यक्ति के अन्दर ईश्वर ने परमेश्वर के आकार का एक खाली स्थान छोड़ा है।सी.एस.लूईस ने अपनी पुस्तक मीयर क्रिस्चैनिटीमें लिखा है-जीव जन्तु तभी लालसाओं के साथ जन्म लेते हैं जब उन लालसाओं को संतुष्ट किया जा सकता है। एक छोटा बच्चा भूखा होता है, तो उसके लिए भोजन उपलब्ध है। एक बत्तख का बच्चा तैरना चाहता है, तो उसके लिए पानी उपलब्ध है। व्यक्ति के जीवन में यदि शारिरिक इच्छा को पूर्ण करने की इच्छा होती है, तो उसके लिए यौन संबन्ध उपलब्ध है। यदि मुझे एक ऐसी इच्छा हो जो इस पृथ्वी पर पूरी सकूँ तो मैं यह समझूंगा कि शायद मैं किसी दूसरी दुनिया के लिए बना हूँ। यदि हम उन इच्छाओं को किसी भी संसारिक सुख से पूरा कर सकें तो इसका मतलब यह नही की संसार एक छलावा है। शायद वह इच्छा सांसारिक सुखों से पूरी नहीं हो सकती है, बल्कि उसको इसलिए जगाया जाता है कि वह सही चीज़ की और इशारा कर सके। पाँचवी शताब्दी के दार्शनिक अगस्टीन ने लिखा है, हमारा हृदय तब तक शान्त नही होता, जब तक हमें तुझ में विश्राम नही मिलता। यह खोया हुआ टुकड़ापरमेश्वर ही है। वह जीवित जल है और जीवन की रोटी है। वही है जो हमें पूरी तरह से संतुष्ट कर सकता है। हाग्गै भविश्यद्वक्ता ने लिखा है, और मैं सारी जातियों को कम्पकपाँऊगा, और सारी जातियों की मनभावनी वस्तुएं आंएगी; और मैं इस भवन को अपनी महिमा के तेज से भर दूंगा, सेनाओं के यहोवा का यही वचन है। (हाग्गै :) वह जिसे सारे राष्ट्र चाहते हैं, इसराइल का पवित्र परमेश्वर यीशु मसीह जब आकर पृथ्वी पर खड़ा होगा तो हम अपने पुनजीर्वित शरीर में उसे देखेंगें। अययूब ने कहा- 25 मुझे तो निश्चय है, कि मेरा छुडाने वाला जीवित है, और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा। 26 और अपनी खाल के इस प्रकार नाश हो जाने के बाद भी, मैं शरीर में हो कर ईश्वर का दर्शन पाऊंगा। 27 उसका दर्शन मैं आप अपनी आंखों से अपने लिये करूंगा। और कोई दूसरा। यद्यपि मेरा हृदय अन्दर ही अन्दर चूर चूर भी हो जाए, तौभी मुझ में तो धर्म का मूल पाया जाता है। (अययूब १९:२४-२७) उसका पृथ्वी पर दूसरी बार आना, शान्ति का समय लेकर आयेगा।

 

इस पठन में हम देखेंगे कि बाईबिल उन हज़ार सालों के लिए जो न्याय संगत, आनन्द से परिपूर्ण और शान्ति से भरे राजाओं के राजा यीशु के राज्य में होंगे क्या कहती है।

 

प्रश्न ) आज के समाज में कितनी आत्मिक भूख है, इसके लिए आपके पास क्या प्रमाण है? हमारे समाज में इस आत्मिक भूख को किस प्रकार व्यक्त किया जाता है?

 

शान्ति के हजार वर्ष-

 

तीसरी कड़ी में हमने शरीर के पुनरूत्थान के विषय में पढ़ा था, जिसमें हमने जाना था कि जब प्रभु यीशु का पुनरूत्थान होगा सन्तों का पुनरूत्थान होगा। वह लोग जो पुनरजीवित होगें उनको सामर्थी अविनाशी शरीर तथा अनन्त जीवन प्रदान होगा।

 

यह शरीर प्रभु यीशु के जीवित शरीर की तरह होगा। एक ऐसा शरीर जो पहले नकारा गया किन्तु फिर स्तुति में उठाया गया हो ( कुरिन्थियों १४:४३) हमें बताया गया है कि संतो को यह अधिकार मिला है कि वह प्रभु यीशु के साथ मिलकर एक हजार वर्ष तक राज्य करेंगे (प्रकाशितवाक्य २०:, कुरिन्थियों :) और शैतान को बाँधकर नरक में फेंक दिया जाएगा। (प्रकाशित वाक्य २०:-)

 

1 फिर मैं ने एक स्वर्गदूत को स्वर्ग से उतरते देखा; जिस के हाथ में अथाह कुंड की कुंजी, और एक बड़ी जंजीर थी। 2 और उस ने उस अजगर, अर्थात पुराने साँप को, जो इब्लीस और शैतान है; पकड़ के हजार वर्ष के लिये बान्ध दिया। 3 और उसे अथाह कुंड में डाल कर बन्द कर दिया और उस पर मुहर कर दी, कि वह हजार वर्ष के पूरे होने तक जाति जाति के लोगों को फिर भरमाए; इस के बाद अवश्य है, कि थोड़ी देर के लिये फिर खोला जाए।। 4 फिर मैने सिहांसन देखे, और उन पर लोग बैठ गए, और उन को न्याय करने का अधिकार दिया गया; और उनकी आत्माओं को भी देखा, जिन के सिर यीशु की गवाही देने और परमेश्वर के वचन के कारण काटे गए थे; और जिन्हो ने उस पशु की, और उस की मूरत की पूजा की थी, और उस की छाप अपने माथे और हाथों पर ली थी; वे जीवित हो कर मसीह के साथ हजार वर्ष तक राज्य करते रहे। 5 और जब तक ये हजार वर्ष पूरे हुए तब तक शेष मरे हुए जी उठे; यह तो पहिला मृत्कोत्थान हैं। 6 धन्य और पवित्र वह है, जो इस पहिले पुनरूत्थान का भागी है, ऐसों पर दूसरी मुत्यु का कुछ भी अधिकार नहीं, पर वे परमेश्वर और मसीह के याजक होंगे, और उसके साथ हजार वर्ष तक राज्य करेंगे।। (प्रकाशित वाक्य २०:-)

 

धर्म शास्त्री और विद्वान इस हज़ार साल के प्रभु यीशु के राज्य को सहस्त्राब्दि कहते है। सहस्त्राब्दि का अर्थ है एक हज़ार। इस पर तीन तरह की बातें मानी जाती है। पहला अमिलेनिएस्म कहलाता है। यह वह व्यक्ति है जो यह मानता है कि एक हजार वर्ष, जो लगभग पाँच ऊपर दिए गए पदों में लिखा गया है, वास्तविक रूप में प्रतीकात्मक अंक नहीं है, परन्तु यह एक ऐसे समय को दर्शाता है जो आज का समय है, एक कलीसिया का युग।

 

दूसरा, सहस्त्राब्दि के बाद का समय। इस विश्वास को  मानने वाले जन भी यह समझते है कि यह समय जिसे एक हज़ार वर्ष का समय माना जाता है जैसे कि ऊपर बताया गया है, वास्तव में एक हज़ार वर्ष नही हैं। उनके विचार से कलीसिया अपने अनुयाइयों के लिए सुनहरा युग लाएगी और फिर उसके बाद प्रभु यीशु का पुनः आगमन होगा। तीसरा, सहस्त्राब्दि से पहले का समय जिसमें मैं स्वंय विश्वास करता हूँ। इस पर विश्वास करने वाले विश्वास करते है कि प्रभु यीशु का पुनः आगमन सताव के बाद होगा और परमेश्वर उन संतों को पुर्नजिवित कर देगा, जो आत्मा के द्वारा पुर्नजीवित होगे, और यह संत परमेश्वर के साथ पृथ्वी पर एक हज़ार वर्ष तक राज्य करेंगें। वह दैत्य, जिसे हम सर्प के नाम से जानते हैं। जो, अदन के बाग में आया था तथा जिसको शैतान का नाम दिया जाता है, उसे बाँध दिया जायेगा पद के अनुसार अथाह कुंडमें (अबुओस-यह एक यूनानी शब्द है जिसका अर्थ है एक ऐसी गहराई जिसका कोई अन्त हो, जो कभी सोचा जा सके और ही माँपा जा सके) इन एक हज़ार सालों में कोई भी युद्व नही होगा, और फिर कुछ समय के लिए शैतान को मुक्त कर दिया जाएगा।

 

प्रश्न ) कल्पना कीजिए कि तब हमारी दुनिया कैसी होगी, जब शैतान को बाँध दिया जाएगा। आप क्या सोचते है, कि उन लोगों के जीवन में क्या अन्तर आयेगा जो तब इस पृथ्वी पर होगें और शैतान के चंगुल से कुछ समय के लिए मुक्त हो जायेंगे?

 

संतों के लिए, जो परमेश्वर की देह है, वह अपने पुर्नजीवित देह में किसी भी प्रकार के पाप और बुराई के लालच से मुक्त होंगे। वचन हमें बताता है,कि जब शैतान को अथाह कुंडमें डाल दिया जाएगा, तो पृथ्वी में किसी भी प्रकार का धोखा नहीं होगा (पद ) हमारा पुर्नजीवित शरीर हममें किसी भी प्रकार की हानि के भय को निकाल देगा। हमारी पाप की प्रकृति हमसे ले ली जाएगी और हमारी पाप करने की इच्छा समाप्त हो जाएगी। मृत्यु का भय समाप्त हो जाएगा क्योंकि हम बंधन मुक्त होकर काम करेंगें और हमारी रचनात्मक अपनी चर्म सीमा पर होगी। हम अपने शरीर, आत्मा और मस्तिष्क से कुछ इस प्रकार कार्य करेंगे जैसे हमने पहले कभी नही किया होगा, हम अपने शरीर,आत्मा और मस्तिष्क से कुछ इस प्रकार कार्य करेंगे जैसे परमेश्वर चाहता है। उसी क्षण से, जब प्रभु यीशु का पुर्नागमन होगा सभी संत अमर हो जायेंगें। हमें यह बताया गया है कि सारी सृष्टि उस समय की प्रतीक्षा कर रही है। जब हम सब, जो प्रभु में है, अपना अविनाशी शरीर, जो कभी भ्रष्ट नही होगा पहन लेंगे। ( कुरिन्थियों १४:४८) उस समय प्राणी-जगत में कुछ अलग ही बदलाव आंऐगे।

 

19 क्योंकि सृष्टि बड़ी आशाभरी दृष्टि से परमेश्वर के पुत्रों के प्रगट होने की बाट जोह रही है।20 क्योंकि सृष्टि अपनी इच्छा से नहीं पर आधीन करने वाले की ओर से व्यर्थता के आधीन इस आशा से की गई। 21 कि सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छूटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतन्त्रता प्राप्त करेगी। 22 क्योंकि हम जानते है, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है। (रोमियों :११-२२)

 

जब पौलूम ने रोम की कलीसिया को सृष्टि के बारे में पत्र लिखा, तब मैं सोचता हूँ कि आखिर उसके मन में क्या था। शायद वो उस प्राणी-जगत के बारे में कह रहा था जो मनुष्य से डरते है। नैतिक पतन से अब तक मनुष्य और जानवरों के बीच का संबध खराब हो चुका है। आज हम देखते है कि किस प्रकार कृषि तथा जानवरों को पालने की