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2. The Parable of the Ten Virgins

2. दस कुंवारियों का दृष्टान्त

शुरुआती प्रश्न: क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपने अपने आप को गलती से अपनी कार, घर, आदि में बंद कर लिया हो? यदि नहीं, तो क्या आप किसी ऐसे समय के बारे में सोच सकते हैं जब आपको यह महसूस हुआ हो कि आपको दरकिनार कर दिया गया हो? संक्षेप में अपने अनुभव को साझा करें।

 

यीशु के पास कहानियों या दृष्टान्तों को बताने का एक ऐसा तरीका था जो लोगों के हृदयों को मोहित कर लेता और लोगों को उनके अस्तित्व की गहराईयों में हिलाकर रख देता, खासकर तब, जब वह कहानी को पलट सुनने वालों पर लागू कर देता था। उसने शमौन जो फरीसी था, उसके साथ ऐसा तब किया जब शमौन ने व्यभिचार में पड़ी स्त्री को अपने पैरों पर रोने और उन आँसुओं को बालों से पोंछने की अनुमति देने पर यीशु की आलोचना की थी (लूका 7: 41-43) मसीह के दृष्टान्त उनके सुनने वालों के हृदयों को प्रकट करते थे। ओहदे या लिंग के बावजूद, उसके शब्द उन तक पहुँचते थे, यहाँ तक ​​कि आत्म-धर्मी और वह लोग भी जो यह समझते थे कि वो धार्मिकता की राह पर ठीक चल रहे हैं। यीशु अपने शब्दों के साथ एक तस्वीर रच देता जो सुनने वालों को एक निष्कर्ष निकालने पर विवश कर देती, और फिर उनपर यह प्रकट होता कि वे स्वयं उस कहानी का एक हिस्सा हैं! यह लोगों को स्वयं को एक नई रोशनी में देखने पर मजबूर करता।

 

पुराने नियम के भविष्यवक्ता ने इसी तरह से बात की थी। प्रभु किसी बात को समझाने के लिए सुनने वालों को एक कहानी या सादृश्य बताते जो उन्हें एक राय बनाने के लिए उत्तेजित करतीं। उदाहरण के लिए, भविष्यवक्ता नातान ने राजा दाऊद को उस छोटी सी भेड़ की कहानी सुनाकर जिसे उसके उस स्वामी से चुरा लिया गया था जो उससे अत्यंत प्रेम करता, सुनाने के द्वारा किया था (2 शमूएल 12: 1-10) इस कहानी ने दाऊद को अपने जीवन को परमेश्वर के दृष्टिकोण से देखने पर विवश किया। परमेश्वर ने योना के साथ उस रेंड़ के पेड़ की कहानी के द्वारा भी ऐसा ही किया। परमेश्वर ने योना को दिखाया कि उस भविष्यवक्ता को उन लोगों की चिंता के बजाए जिन्हें परमेश्वर चेतावनी का सन्देश देना चाहता था, कहीं अधिक चिंता उस रेंड़ के पेड़ से थी (योना 4: 5-11) असल में योना इसलिए नाराज़ हो गया था क्योंकि परमेश्वर ने करुणा दिखाने का चुनाव किया!

 

मुझे यकीन है कि हम सभी सोचते हैं कि अगर परमेश्वर ने किसी पर करुणा दिखाने का चुनाव किया तो हम कभी भी नाराज़ नहीं होंगे। लेकिन एक क्षण ठहर जाइए। क्या आपने कभी किसी के लिए यह चाहा है वह देख पाए कि उसे “अपनी करनी का फल मिले?” देखिये, जब परमेश्वर हमारे हृदयों के गुप्त स्थानों में ज्योति बिखेरता है, तो हम अक्सर जो प्रकाशित होता है उससे आश्चर्यचकित रह जाते हैं। वह ऐसा हमारे लिए अपनी महान करुणा के कारण करता है। हम जिस कहानी पर विचार करने जा रहे हैं, उससे वह हम में से हर एक से बात करना चाहता है कि हम इस बारे में सोचें कि हम इस कहानी में कौन सा पात्र हैं। यह दृष्टान्त दूल्हे के आगमन और अनंत काल के आरम्भ पर सभी विश्वासियों की निरंतर तैयारी पर केंद्रित है।

 

 

1तब स्वर्ग का राज्य उन दस कुंवारियों के समान होगा जो अपनी मशालें लेकर दूल्हे से भेंट करने को निकलीं। 2उन में पाँच मूर्ख और पाँच समझदार थीं। 3मूर्खों ने अपनी मशालें तो लीं, परन्तु अपने साथ तेल नहीं लिया। 4परन्तु समझदारों ने अपनी मशालों के साथ अपनी कुप्पियों में तेल भी भर लिया। 5जब दूल्हे के आने में देर हुई, तो वे सब ऊंघने लगीं, और सो गईं। 6आधी रात को धूम मची, ‘कि देखो, दूल्हा रहा है, उस से भेंट करने के लिए चलो।7तब वे सब कुंवारियाँ उठकर अपनी अपनी मशालें ठीक करने लगीं। 8और मूर्खों ने समझदारों से कहा, ‘अपने तेल में से कुछ हमें भी दो, क्योंकि हमारी मशालें बुझी जाती हैं।9परन्तु समझदारों ने उत्तर दिया किकदाचित यह हमारे और तुम्हारे लिये पूरा हो; भला तो यह है, कि तुम बेचनेवालों के पास जाकर अपने लिये मोल ले लो।10जब वे मोल लेने को जा रही थीं, तो दूल्हा पहुँचा, और जो तैयार थीं, वे उसके साथ ब्याह के घर में चलीं गईं और द्वार बन्द किया गया। 11इसके बाद वे दूसरी कुंवारियाँ भी आकर कहने लगीं, ‘हे स्वामी, हे स्वामी, हमारे लिये द्वार खोल दे।12उसने उत्तर दिया, ‘कि मैं तुम से सच कहता हूँ, मैं तुम्हें नहीं जानता।13इसलिये जागते रहो, क्योंकि तुम उस दिन को जानते हो, उस घड़ी को।(मत्ती 25:1-13)

 

मध्य पूर्वी क्षेत्र के विवाह (पद 1)

 

सबसे पहले, हमें इस दृष्टान्त के संदर्भ को देखने की आवश्यकता है। यीशु अपने शिष्यों से अपनी वापसी और उस समय के विषय में विस्तार से बात कर रहा था जब वह अपने राज्य को स्थापित करेगा और उसकी दुल्हन से उसका विवाह होगा (मत्ती 24) असल में, जब मत्ती ने इस सुसमाचार को लिखा था तो उसमें कोई अध्याय विभाजन नहीं था, इसलिए हमें इस दृष्टान्त को पिछले अध्याय से जुड़ा हुआ देखना चाहिए। यह उसके दूसरे आगमन पर हृदय की तैयारी और हृदय की प्रतिक्रिया के विषय पर और आगे बढ़ता है। याद रखें, कि पिछले दृष्टान्त में, यीशु ने उस व्यक्ति का उल्लेख किया था जो विवाह समारोह में विवाह के वस्त्र के बिना था। तो हम इन कहानियों को एक समान विचारधारा में बताया हुआ पाते हैं।

 

उन दिनों की विवाह प्रथाएं आज की हमारी पश्चिमी संस्कृति से जिसके हम आदि हैं बहुत अलग थीं। यह मध्य पूर्व क्षेत्र में एक सामान्य विवाह उत्सव है। आमतौर पर, दूल्हा अपने करीबी मित्रों के साथ, दुल्हन के घर जाता जहाँ सब उत्सव होते। इसके बाद नए घर की ओर एक जुलूस जाता, जहाँ जोड़ा राजा और रानी की तरह होते और एक सप्ताह के लिए उत्सव मनाया जाता (उत्पत्ति 29:27) दुल्हन की करीबी सहेलियाँ दस कुंवारियाँ होतीं, जिनका कार्य मार्ग को प्रकाशित करना और दूल्हे और उसके करीबी दोस्तों का दुल्हन के घर में स्वागत करना था। वे उसके बाद दूल्हे के विवाह और उत्सव में प्रवेश करतीं। जब वह दूल्हे के मित्रों को यह पुकारते सुनतीं, कि देखो, दूल्हा रहा है, उस से भेंट करने के लिए चलो!” तब उन सहेलियों को पता चल जाता कि अब जाकर मार्ग को प्रकाशित करना है।

 

यहाँ पाठक इस धारणा के साथ चलता है कि दूल्हा और दुल्हन एक ही शहर से नहीं हैं, और इसलिए, दूल्हे के आने का समय अनिश्चित है। समय जो भी होता, सहेलियों को तैयार रहना आवश्यक था। दृष्टान्त में दुल्हन का कोई उल्लेख नहीं किया गया है; हमें इस दृष्टान्त को ज़रूरत से ज्यादा समझने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इजराइल और आज के समय में कलीसिया के लोगों को कुछ बुद्धिमान और कुछ मूर्ख कुंवारियों के रूप में वर्णित किया गया है जो दूल्हे की प्रतीक्षा कर रही हैं, जो प्रभु यीशु की तस्वीर है। यही इस खंड का केंद्र है।

 

विवाह के स्थल का मार्ग दिखाने में मदद करने के लिए, सहेलियों (कुंवारियों) को इस पुकार को सुनते ही कि दूल्हा निकट है अपनी मशाल/ लालटेन को तुरन्त ठीक करना होता। मशाल/ लालटेन को ठीक करने का अर्थ उसकी बाती के जले हुए भाग को काट देना था ताकि वह फिर से समान रूप से जले। फिर, वे मशाल/ लालटेन के अंदर से और बाती खींच लेतीं जिसके कारण प्रकाश और ज़्यादा उजागर हो जाता। बेशक, इसका मतलब था कि वह लाई हुईं कुप्पियों में से उसमें और तेल डाल लें (पद 4) तब वह दूल्हे और उसके मित्रों का स्वागत करतीं और उनके साथ विवाह में चलीं जातीं। अल्फ्रेड एडर्सहैम हमें इसकी एक तस्वीर बना पाने में मदद करते हैं:

 

"‘लालटेन’, – न कि 'मशालें', जो दस कुंवारियों के पास थीं, उच्चतम निर्माण के थे .... उनमें बाती या तेल के लिए गोल पात्र था। यह गहरी तश्तरी के एक खोखले प्याले में रखा होता था, जिसे नुकीले छोर पर एक लम्बी लकड़ी के खम्भे पर लगा दिया जाता था। यहूदी अधिकारियों के अनुसार, पूरब में दुल्हन के जुलूस को ले जाने के लिए इस तरह की दस लालटेन होने की एक प्रथा थी, दस किसी भी कार्यालय या समारोह में उपस्थित होने के लिए आवश्यक संख्या थी, जैसे कि विवाह समारोह के साथ आने वाली मंगलकामनाएं।1

 

यह उन कुंवारियों की अपनी लालटेन होती थी। दृष्टान्त का जोर इस बात पर है कि उनमें से प्रत्येक को दूल्हे के आगमन पर तैयार रहने के लिए विशेष ध्यान और तैयारी करने की आवश्यकता थी। उन्हें दूल्हे के आगमन से पहले उस अंधेरी रात में ज्योति होने के लिए तैयार होना था। दुर्भाग्य से, उनमें से पाँच दूल्हे के रात को देर से आने की उम्मीद नहीं कर रहीं थीं, और उन्होंने देर रात तक अंधेरे का सामना करने के लिए तैयारी नहीं की। जिस तरह से यीशु ने दृष्टान्त के बारे में बताया, वह संकेत दे रहा था कि वह भविष्यवाणी कर रहा था कि उसके आने का इंतजार लंबे समय तक का होगा। 5जब दूल्हे के आने में देर हुई, तो वे सब ऊंघने लगीं, और सो गई। (मत्ती 25:5)

 

कुछ लोग कहते हैं कि कलीसिया को रात के लिए तैयारी करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि प्रभु अंधकार होने से पहले उनके लिए आएंगे। क्या आप कहेंगे कि दुनिया भर में कलीसिया रात्रि के अंधकार के लिए तैयार है? आज के विश्वासियों को अंधकार की शुरुआत के लिए कैसे तैयारी करना चाहिए?

 

सभी दस कुंवारियाँ उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करतीं हैं जो विश्वासी होने का दावा करते हैं, लेकिन केवल कुछ ही लोगों के पास जीवन की ज्योति है जबकि अन्य के पास नहीं। कुछ लोग खाली लालटेन के समान हैं जो मसीह के जीवन की ज्योति को वहन नहीं करते। किसी भी कलीसिया में, कुछ अच्छे अभिनेता और ढोंगी होते हैं। शिष्यों के झुण्ड में, यहूदा ने एक शिष्य होने का नाटक किया, लेकिन उसने वास्तव में कभी पश्चाताप नहीं किया - वह एक पाखंडी था, जीवन के मंच पर एक अभिनेता (यूहन्ना 12:4-6, यहुन्ना 6:70-71)। केवल उन्ही लोगों ने जिन्होंने वास्तव में पश्चाताप किया हैं (पाप से मुँह मोड़ लिया है) और मसीह को और उसके आत्मा के प्रावधान को प्राप्त किया है वास्तव में संसार में ज्योति हैं (मत्ती 5:14)। हम शरीर, प्राण और आत्मा से बने त्रिपक्षीय प्राणी हैं (1 थिस्सलुनीकियों 5:23), लेकिन जब तक हम प्रभु के जीवन और ज्योति की भेंट प्राप्त नहीं करते हमारी आत्मा मृत है (इफिसियों 2:1 और 5)मनुष्य की आत्मा यहोवा का मशाल/ लालटेन है; वह मन की सब बातों की खोज करता है। (नीतिवचन 20:27) यीशु ने कहा, जगत की ज्योति मैं हूँ; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।” (यहुन्ना 8:12) पाँच बुद्धिमान कुंवारियाँ वास्तविक विश्वासियों का प्रतीक हैं। उनके दीपकों में तेल उन में वास करने वाले पवित्र आत्मा का प्रतीक है, असल में तो, पवित्र आत्मा के बिना तो कोई भी विश्वासी हो ही नहीं सकता:

 

और उसी में तुम पर भी जब तुम ने सत्य का वचन सुना, जो तुम्हारे उद्धार का सुसमाचार है, और जिस पर तुम ने विश्वास किया, प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप लगी। (इफिसियों 1:13)

 

अंधेरे में प्रतीक्षा करते समय सभी दस कुंवारियाँ सो गईं। जबकि हमारा शत्रु मनुष्य के प्राणों पर अन्धकार के साए को बढ़ाता है