10. The Parable of the Persistent Widow

10. आग्रही विधवा का दृष्टान्त

शुरुआती प्रश्न: एक ऐसा समय साझा करें जब आपने जिस बात के लिए प्रार्थना की थी उसे प्राप्त किया।

 

वैकल्पिक प्रश्न: क्या आपके ऐसे माता-पिता या दादा-दादी में से ऐसे कोई थे जो जब आप उनसे कोई माँग करते वह आपके लिए उसे पूरा कर देते थे? क्या आपको याद है कि आप उनसे "हाँ" कहलवाने के लिए क्या करते थे?

 

जब आप एक कठिन परिस्थिति में होते हैं, और आपको मदद की आवश्यकता होती है, तो क्या आप प्रार्थना करते हैं? कभी-कभी प्रार्थना हमारे लिए आखिरी उपाय होती है, लेकिन अक्सर मैंने इसे अपनी एकमात्र उम्मीद पाया है! एक व्यावसायिक मछुआरे के रूप में अपने पिता के साथ काम करने की एक बहुत ही आकर्षक नौकरी छोड़ने के बाद, मुझे एक चुनौती का सामना करना पड़ा। परमेश्वर ने मुझसे अपने जाल छोड़ने और मसीह के पीछे चलने के विषय में बात की थी और कि वो मुझे मनुष्यों का एक मछुवारा बना देगा (मत्ती 4:19)। अब मैं क्या करूँगा? मैं अपने परिवार के लिए पूर्ति कैसे करूंगा? मुझे तो केवल समुद्र और मछली पकड़ने के विषय में पता था । मैं शारीरिक रूप से चुस्त था और सीढ़ी पर चढ़ सकता था, इसलिए मैंने आजीविका के लिए खिड़कियाँ साफ़ करने का काम शुरू कर दिया और शाम के समय कलीसिया स्थापित करने के साथ-साथ मैं धीरे-धीरे चित्रकला और और सजावट की ओर झुकाव रखने लगा। खिडकियों की सफाई और चित्रकला ने मुझे वचन को पढ़ने और अपने छोटे टेप रिकॉर्डर पर मसीही शिक्षण के टेप सुनने के लिए कई घंटे अकेले में दिए। अब आप समझ गए होंगे कि यह कितनी पुरानी बात होगी! आप में से कुछ "टेप रिकॉर्डर" शब्दों के मायने जानने के लिए इंटरनेट खोज रहे होंगे। कुछ वर्ष कलीसिया के लिए काम करने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मुझे ऑफिस वाकई में एक ऑफिस के परिवेश में काम करना सीखना होगा, जो मेरे लिए बहुत ही डरावना प्रस्ताव था क्योंकि मुझे कंप्यूटर के विषय में कतई जानकारी नहीं थी। उस समय मेरे सभी उपदेश हाथ से लिखे होते थे। मेरी पत्नी, सैंडी, यूरोस्टार नामक एक कंपनी में काम कर रही थीं, जो कि लंदन से पेरिस (फ्रांस) और ब्रुसेल्स (बेल्जियम) तक की यात्रा तेज़ गति की रेलगाड़ियों में कराते थे। सैंडी ने सोचा कि सुसमाचार प्रचार के लिए मेरे हृदय के कारण, मुझे विक्रय आसान काम लगेगा। उसने सोचा कि मैं फोन पर रेल टिकट बेचने का एक अच्छा विक्रेता बनूँगा। मैं उस नौकरी को हासिल करने में कैसे कामयाब रहा, मुझे नहीं पता।

 

जब विक्रेता बनने के लिए दो सप्ताह का प्रशिक्षण शुरू हुआ, तो अपने आसपास उन्नत कंप्यूटर कौशल वाले युवाओं को देख मेरा दिल वाकई बैठ गया - मैं इतना भयभीत हो गया था कि मैं सोचने लगा था कि मैं तो यहाँ नहीं टिकूंगा। वे सभी इतने तेज थे और जल्दी से समझ गए कि फ़ोन पर कैसे टिकट बेचना है और किस प्रकार टिकट आरक्षित करने के लिए कंप्यूटर पर जटिल बुकिंग सॉफ्टवेयर का उपयोग करना है। जब प्रशिक्षण खत्म हो गया, तो मुझे वाकई समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मैं कर क्या रहा था! हताश, मैं अपनी मदद - प्रभु की ओर मुड़ा। प्रतिदिन काम शुरू करने से पहले मैं प्रार्थना करता कि परमेश्वर मुझे इसे करने में मदद करे। अक्सर विक्रय की वार्तालाप के दौरान मैं पिता से अपनी मदद करने के लिए कहता। उस कंपनी के साथ होने के अपने तीसरे महीने में, दो सौ अन्य विक्रय करने वाले लोगों के बीच, मैंने बिक्री के शीर्ष रिकॉर्ड को एक तिहाई ज्यादा बिक्री कर तोड़ दिया, जिससे मुझे वेतन की तुलना में बोनस में अधिक पैसा मिला। जब दिवार पर दूसरों के लिए उदाहरण के रूप में मेरी तस्वीर टांगी गई तो मुझसे ज्यादा आश्चर्यचकित कोई भी नहीं था! मेरे साथ में काम करने वाले युवक ने पूछा कि मैंने यह कैसे किया। वह जानता था कि मैं एक मसीही था। मैंने उसे सच बताया, कि मैं एक प्रार्थना करने वाला व्यक्ति था और मैं परमेश्वर से बिक्री करने के लिए सही व्यक्ति से बात करने में मेरी मदद करने के लिए कहता था। उसने एक गहरी साँस लेते हुए जवाब दिया, "बस, मुझे एक मसीही बनना होगा!"

 

हम वास्तव में प्रार्थना की शक्ति को कमतर समझते हैं, और अपने कौशल, बुद्धि और ऊर्जा पर भरोसा करते हैं। हम ऐसी संस्कृति में जीते हैं जो आत्मनिर्भरता की प्रशंसा करती है। हम अपनी संस्कृति द्वारा चीजों की तुरंत अपेक्षा करने के लिए प्रशिक्षित किए गए हैं, लेकिन परमेश्वर की चीजें हमारे फास्ट फूड के समान फटाफट नहीं दी जाती हैं। परमेश्वर हमें अपने अनन्त सिद्धांतों में प्रशिक्षण दे रहा है जो केवल उन लोगों तक पहुँचते हैं जो परमेश्वर के सम्मुख इंतजार करने और इस दुनिया की बातों को अभिभूत कर उसकी सहायता के इच्छुक हैं। जो भी काम आप कर रहे हैं उसमें परमेश्वर की मदद के लिए प्रार्थना करना शुरू करने के लिए मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ। कुछ भी बहुत छोटा या महत्वहीन नहीं है। यीशु ने हमारे सामने आने वाली प्रत्येक कठिनाई को दूर करने के लिए और वर्णन करने कि किस प्रकार से प्रार्थना करनी है एक दृष्टांत बताया:

 

1फिर उसने इसके विषय में कि नित्य प्रार्थना करना और हियाव छोड़ना चाहिए उनसे यह दृष्टान्त कहा। 2किकिसी नगर में एक न्यायी रहता था; जो परमेश्वर से डरता था और किसी मनुष्य की परवाह करता था। 3और उसी नगर में एक विधवा भी रहती थी: जो उसके पास आकर कहा करती थी, ‘मेरा न्याय चुकाकर मुझे मुद्दई से बचा।4कुछ समय तक तो वह माना परन्तु अन्त में मन में विचार कर कहा, ‘यद्यपि मैं परमेश्वर से डरता, और मनुष्यों की कुछ परवाह करता हूँ। 5तौभी यह विधवा मुझे सताती रहती है, इसलिये मैं उसका न्याय चुकाऊंगा, कहीं ऐसा हो कि घड़ी घड़ी आकर अन्त को मेरा नाक में दम करे।6प्रभु ने कहा, ‘सुनो, कि यह अधर्मी न्यायी क्या कहता है? 7सो क्या परमेश्वर अपने चुने हुओं का न्याय चुकाएगा, जो रात- दिन उस की दुहाई देते रहते हैं? और क्या वह उन के विषय में देर करेगा? 8मैं तुम से कहता हूँ; वह तुरन्त उन का न्याय चुकाएगा; तौभी मनुष्य का पुत्र जब आएगा, तो क्या वह पृथ्वी पर विश्वास पाएगा? (लूका 18:1-8)

 

हम नहीं जानते कि यह दृष्टांत एक ऐसी वास्तविक घटना का था जिसे लोगों ने सुना था या फिर यीशु ने सुनने वालों को प्रार्थना के विषय में सिखाने के लिए सत्य को स्पष्ट करने के लिए यह कहानी बनाई थी। दृष्टांत का उद्देश्य शुरुआती वचन से बहुत स्पष्ट है – कि हमें निरंतर प्रार्थना करनी चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि यह न्यायाधीश स्वर्ग में हमारे पिता का एक प्रतीक है। नहीं, यह आदमी पिता के बहुत विपरीत है। बल्कि, यह तो विरोधाभास का एक अध्ययन है।

 

यह कहानी हमें विधवा के चरित्र के बारे में क्या बताती है? यह हमें न्यायाधीश के चरित्र के बारे में क्या बताती है?

 

आइए पहले न्यायाधीश के विषय में देखें।

 

अन्यायपूर्ण न्यायाधीश

 

न्यायाधीशों को निष्पक्ष होना चाहिए, और काफी संभव है कि इस आदमी ने ईमानदारी से न्याय करने के लिए परमेश्वर के सामने शपथ ली होगी, लेकिन उसे परमेश्वर के सामने किसी भी शपथ से कोई लेना देना नहीं था क्योंकि उसे परमेश्वर का डर नहीं था। उसने सोचा कि उसे जो पसंद है वो कह और कर सकता है और कोई भी उससे सवाल नहीं कर सकेगा। वह सोचता था कि वह तो न्याय से ऊपर है। उच्च पदों पर सभी पुरुषों और महिलाओं को इस विचार पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि एक दिन हम सभी धर्मी न्यायाधीश के सम्मुख खड़े होंगे, और हमने जो कुछ कहा और किया है उसके लिए हमें लेखा-जोखा देना होगा (रोमियों 14:12, मत्ती 12: 36)। उपर से, हमें बताया गया है वह अपने साथी मनुष्य की भी परवाह नहीं करता था। उसके न्यायिक निर्णय आम आदमी के विरोध के शोर-शराबे से प्रभावित नहीं होते थे। इस आदमी ने अपनी विवेक को इतना खेदित कर दिया था वह स्वयं यह कहते हुए अपने विरुद्ध गवाही देता था, यद्यपि मैं न परमेश्वर से डरता, और न मनुष्यों की कुछ परवाह करता हूँ... (लूका 18: 4)। बहुत से लोग अपने दिन के काम के अंत में अपने उस दिन के कार्य के बारे में सोचेंगे और उनका विवेक उन्हें बताएगा कि उन्होंने क्या सही किया और क्या गलत किया, लेकिन इस न्यायाधीश ने अपने हृदय को इतना कठोर कर दिया था उसने स्वयं यह स्वीकार किया कि उसे न तो परमेश्वर की और न ही मनुष्य की परवाह थी। उसमें कोई आत्म-छल नहीं था। वो स्वतंत्र रूप से कबूल करता था कि वह कैसा है और इसके बारे में शर्मिंदा नहीं था। विधवा मानव रूप में एक दानव के सामने खड़ी था जो केवल अपने आराम की चिंता करता था। वो एकमात्र चीज जो उसे सही कार्य करने के लिए प्रेरित करती है वो यह थी कि विधवा उसे परेशान करते हुए उसे अपने आराम के स्थान पर परेशान कर रही थी। वह सिर्फ शांति और चुप्पी चाहता था!

 

दृढ़ विधवा

 

यीशु के समय में महिलाओं का पुरुषों के समान सामाजिक दर्जा नहीं था और इसलिए उन्हें दूसरे श्रेणी के नागरिक माना जाता था, और एक अन्यायपूर्ण न्यायाधीश के सामने उसका मामला बिगाड़ने के लिए, वह एक विधवा थी जिसे समाज ने अधिकार हीन कर दिया था क्योंकि उसके साथ खड़े होने के लिए कोई पुरुष नहीं था। पवित्रशास्त्र में, विधवा एक ऐसे व्यक्ति का प्रतीक है जिसके पास भरोसा करने के लिए परमेश्वर के अलावा और कोई भी नहीं है। हमें यह नहीं बताया गया है कि उसकी परिस्थिति क्या थी, सिर्फ इतना कि यह इतनी अविलम्ब थी कि वो शहर के उस एकमात्र व्यक्ति के पास आने के लिए पर्याप्त थी जो उसके पक्ष में न्याय कर सकता था - अन्यायपूर्ण न्यायाधीश। मैंने गौर किया कि उसके मुकदमे में पैरवी करने के लिए कोई वकील नहीं था। न्याय दिलाने के लिए कोई वकील नहीं था। विपरीत इसके हममें से प्रत्येक जो मसीही हैं, हमारे पास स्वर्ग के सिंहासन के सम्मुख एक वकील है, यीशु मसीह एकमात्र धर्मी जन (1 यहुन्ना 2:1), और इस समय में भी उसकी सेवकाई हमारे लिए परमेश्वर से मध्यस्थता (बीच-बचाव या हस्तक्षेप) करना है (इब्रानियों 7:25)। वह अपने मुकदमे को कैसे आगे बढ़ा रही थी? हमें बताया गया है कि वह उसके पास आती रही। यहाँ उस सबक का केंद्र है जो यीशु हमें सिखाना चाहता है, प्रार्थना में बने रहने का। कुछ लोग कहेंगे कि हमें एक बार प्रार्थना करनी चाहिए और इसे परमेश्वर के हाथों में छोड़ देना चाहिए - यह दृष्टांत ये संदेश नहीं सिखा रहा है। हमें अपने प्राण पर हावी बातों को परमेश्वर के सम्मुख प्रार्थना में दृढ़ता और निरन्तरता से लाना है

 

हमें एक क्षण के लिए भी यह नहीं सोचना चाहिए कि उसने एक समय नियुक्ति किया या वह अदालत में तब आई थी जबकि अन्य मुकदमे चल रहे थे। नहीं, यह महिला दिन के हर समय उसका सामना करती थी। शायद वह उसके घर भी पहुँच जाया करती थी। शायद वह बाजार में उसका पीछा करती। चलिए इसे आज के शब्दों में कहें; वह अपना ई-मेल खोलता और वहाँ उसका एक संदेश होता। वह फेसबुक पर जाता और वहाँ एक और संदेश होता। वह अपने फोन को अपने कान पर लगाता और उसमें उससे एक संदेश पाता। वह अदालत में दरबानों से बच निकल आती और हर बार एक ही बात कहती, मेरा न्याय चुकाकर मुझे मुद्दई से बचा।’ मैंने इस बात पर गौर किया है कि उसने अपने विधवा होने के आधार पर या फिर उसके बच्चे न होने के कारण न्याय की मांग नहीं की। उसने अपने मुद्दे में जीतने के लिए अपने विरोधियों के वर्णन मैं कुछ नहीं कहा था। उसने दुष्ट न्यायियों पर परमेश्वर के न्याय के बारे में भी उससे बात नहीं की थी, जो हमें यह दिखाता है कि हमें अपने भारी-भरकम शब्दों या अपने वाक्यों के निर्माण पर भरोसा नहीं करना चाहिए। नहीं, केवल दो शब्द उस चीज का वर्णन करते हैं जिस पर उसने भरोसा किया – उसका आग्रह। यह अन्यायपूर्ण न्यायाधीश के लिए शर्मिंदगी भरा हो गया था, क्योंकि जब वह अपने मित्रों के साथ शांत समय चाहता था तो गरीब विधवा चाय की दुकान में दिखाई देती और उसके मित्रों के सामने अपने मुकदमे को निपटाने की मांग करती। आखिरकार उसने उसे इसलिए न्याय दिया क्योंकि वह उसकी नाक में दम कर रही थी। आर.केंट ह्यूजेस ने अपनी समीक्षा में उल्लेख किया है कि न्यायाधीश को जो महसूस हो रहा था उसका वर्णन करने के लिए उस ने विधवा के लिए “नाक में दम” (लूका 18:5) वाक्यांश का उपयोग किया। ह्यूजेस लिखते हैं,

 

““नाक में दमका शाब्दिक अनुवाद (मेरी नाक फोड़ देना) भी उसकी झुंझलाहट को बेहतर प्रकट करता है। यह मुक्केबाजी की अभिव्यक्ति थी (देखें 1 कुरिन्थियों 9:27) उसका आग्रह शायद उसकी नाक से खून निकाल रहा थी, शायद सार्वजनिक शर्मिंदगी के एक भाव में, जिसके द्वारा वो उसकी प्रतिष्ठा या प्रमुखता को लहुलुहान कर रही थी।

 

इस तरह की दृढ़ता इच्छा दर्शाती है। उसकी जरूरत उसके सामने आला दर्जे की थी। प्रार्थना किसी के सुनहरे शब्दों के कारण नहीं सुनी जाती है। एक व्यक्ति की प्रार्थना में व्यक्त इच्छा, आवश्यकता और दृढ़ता ही वो बात है जिसे परमेश्वर सुनता है। जब कोई व्यक्ति परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ और परमेश्वर के चरित्र को जानता है, तो वह प्रार्थना में दृढ़ रह सकता है क्योंकि उसका विश्वास एक ऐसे परमेश्वर में रहता है जो दृष्टांत में न्यायाधीश के विपरीत है। न्यायाधीश ही एकमात्र जरिया था जिसके द्वारा विधवा स्वयं को अपनी परिस्थिति से उबरते देख सकती थी, और क्योंकि उसने उसे अपनी एकमात्र आशा के रूप में देखा, उसने विनती करना जारी रखी और हार नहीं मानी। अक्सर कलीसिया दरवाजे पर दस्तक देकर उत्तर आने से पहले ही भाग जाने का बच्चों का खेल खेलती है!

.एम बाउंड्स, एक व्यक्ति जिन्होंने प्रार्थना के विषय पर बहुत कुछ लिखा है, इस खंड के विषय में यह टिप्पणियाँ करते हैं:

 

"जब उसके चुने हुए जन दिन-रात उसकी ओर देख रोते हैं तब परमेश्वर धैर्यपूर्वक इंतजार करता है। वह इस अन्यायपूर्ण न्यायाधीश की तुलना में उनके अनुरोधों से दस लाख गुना अधिक विचलित होता है। उसके लोगों की निरंतर दृढ़ता से प्रार्थना करते हुए उनकी प्रतीक्षा करने की एक सीमा निर्धारित की गई है, और फिर गहराई से उत्तर दिए जाते हैं। परमेश्वर अपने प्रार्थना करने वाले संतान में ऐसा विश्वास पाता है जो बना रहता है और रोता है, और वह इसके और अभ्यास किए जाने की अनुमति देकर इसे सम्मानित करता है ताकि यह और मजबूत और समृद्ध हो सके। फिर वह बहुतायत और निर्णायक रूप से उनका अनुरोध पूरा कर इसे पुरस्कृत करता है।"

 

आपके और मेरे जीवन में कुछ परिस्थितियाँ ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया गया है और उन्हें टाला नहीं जा सकता। हम पवित्र आत्मा के जय होने के प्रशिक्षण के विद्यालय में हैं। हमें जय पाने के लिए बुलाया गया है। क्योंकि हमारे विश्वास के लिए पहाड़ों के चारों ओर से होकर जाने का कोई रास्ता नहीं है, इसलिए हमें उसमें से होकर रास्ता खोजना होगा। यह हमें अपनी बुद्धि, क्षमताओं और प्रतिभाओं के बजाय परमेश्वर पर निर्भर होना सिखाता है। मेरी अपने एक विक्रय कार्यालय में काम करने की शुरुआत की कहानी को पहले साझा करने में सीख यही थी। परमेश्वर चाहता है कि हम जिस भी परिस्थिति में हों, उसमें उसे पुकारने में तत्पर रहें। हम बच्चों के रूप में सीखते हैं कि कैसे अपने माता-पिता के साथ आपने मन की कर सकें, कितना अधिक रोएं, कैसे बिलखें और फायदा उठाएं, हम जो चाहते हैं उसे प्राप्त करने के लिए सत्य को कैसे मरोड़ें। लेकिन हमारे बचपन का जिद्दी-पन हमें मसीह की क्रूस पर छोड़ देना चाहिए। हम अपने स्वर्गीय पिता का फायदा नहीं उठा सकते; वह अपना फायदा इसलिए नहीं उठाने देगा, क्योंकि वह सब जानता है। हेनरी वार्ड बीचर ने कहा, "दृढ़ता और जिद्दी-पन के बीच का अंतर यह है कि एक अक्सर एक मजबूत इच्छा से आता है और दूसरा एक मजबूत अन-इच्छा से होता है।" मसीही परिपक्वता की आवश्यकता है कि हम परमेश्वर से प्रार्थना में दृढ़ रहें।

 

जब राजा दाऊद का पुत्र, सुलैमान, इजराइल के सिंहासन पर आया, तो परमेश्वर ने उसके निकट आकर कहा, "जो कुछ तू चाहे कि मैं तुझे दूँ, वह माँग" (1 राजा 3:5)। अगर परमेश्वर ने आपके साथ ऐसा किया, तो आप उससे क्या माँगेंगे?

 

कुछ मामलों में, हम खुद को ऐसी परिस्थितियों का सामना करते पाते हैं जिनमें सोने से पहले छोटी प्रार्थना से कहीं अधिक की आवश्यकता होती है। हम जो परमेश्वर से माँग रहे हैं उसे कितना चाहते हैं? हन्ना, एक महिला जो बाँझ थी, हमें याद दिलाती है कि उसकी इच्छा प्रार्थना में परमेश्वर को कैसे व्यक्त की गई थी। जब उसने शिलाह में मंदिर में प्रार्थना करना शुरू किया, तो वह प्रार्थना में इतनी उत्साहित और हृदय में इतनी भरी हुई थी कि महायाजक एली ने उसपर नशे में होने का आरोप लगाया था। उसने यह कहकर उसे जवाब दिया, "मैं तो दु:खिया हूँ; मैंने तो दाखमधु पिया है और मदिरा, मैंने अपने मन की बात खोलकर यहोवा से कही है (1 शमूएल 1:15) एली ने ऐसा क्या देखा जिससे उसे संदेह हुआ कि हन्ना नशे में थी? उसने परमेश्वर के सम्मुख स्वयं को व्यक्त करने में खुद को रोका नहीं। जब आवश्यकता के पीछे मजबूत इच्छा होती है, तो परमेश्वर में विश्वास प्रार्थना के माध्यम से व्यक्त किया जाता है जो उसके हृदय को छूता है। क्या विधवा की तरह ही आपकी आवश्यकता ने आपके हृदय को छुआ है? अगर हमारी आवश्यकता ने हमारे ही हृदय को नहीं छुआ है तो हम अपनी आवश्यकता से परमेश्वर के हृदय को छूने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? .डब्लू. टोज़र ने एक बार कहा था, जब हम प्रार्थना करने में बहुत प्रभावशील हो जाते हैं तो हम लगभग निश्चित रूप से खुद से ही बात कर रहे हैं। हन्ना के मामले में यह एक पुत्र के लिए उसका जुनून और इच्छा ही थी जिसका उत्तर दिया गया।

 

मसीही लोगों की बड़ी गलतियों में से एक अक्सर यह होती है कि हम विशिष्ट चीज़ों के लिए परमेश्वर से नहीं मांगते। परमेश्वर हमें अपनी शक्ति और हमारा महान पूर्तिकर्ता, यहोवा यीरे होने की उनकी क्षमता दिखाने के लिए विशेष रूप से वह देने में प्रसन्न होता है जिसे हमने माँगा है। एक स्थान पर, यीशु ने कहा:

 

अब तक तुम ने मेरे नाम से कुछ नहीं माँगा; माँगो तो पाओगे ताकि तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए। (यहुन्ना 16:24)

 

इज़राइल में रहने वाली मेरी एक मित्र, क्रिस्टीन ने मुझे उस समय के बारे में बताया जब उसे अपने दो बच्चों के लिए बंक बेड चाहिए था। वह दुकान में गई और कीमत पता की। तब वह प्रार्थना में पिता के पास गई और उससे इज़राइली शेकेल में विशिष्ट राशि माँगी। उसकी प्रार्थना के कुछ ही समय बाद, डाक में बिलकुल सटीक शेकेल का एक चेक आया। मुझे राशि याद नहीं है लेकिन यह निकटतम दस अंकों तक बिना बिंदु लगाए संख्या थी, यह उसकी आवश्यकता की बिलकुल सटीक राशि थी, उसके द्वारा शेकेल में पलंगों के लिए बताई एकदम सटीक राशि। जब उसने बाद में धन्यवाद देने के लिए उस व्यक्ति से बात की जिसने उसे यह उपहार दिया था, तो देने वाले ने जवाब दिया कि पवित्र आत्मा ने उन्हें यही सटीक राशि देने के लिए कहा था, न एक शेकेल अधिक न एक शेकेल कम। जब परमेश्वर विशिष्ट प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं तो हमारा विश्वास मज़बूत होता है।

 

जब परमेश्वर किसी व्यक्ति की महान विश्वास में अगवाई करना चाहता है, तो वह कभी-कभी मौन होने के द्वारा व्यक्ति के विश्वास की परीक्षा लेता है। उसके उत्तर में विलम्ब हमारे अत्यंत भले के लिए और धैर्य और दृढ़ता में हमारे प्रशिक्षण के लिए तैयार किया जाता है, जो आखिरकार अधिक विश्वास उत्पन्न करेगा। ऐसी घटनाओं में, उसका जवाब उसके समय में हमारे पास आता है; एक ऐसा तरीका जो ऐसे गुणों को रचता है जो कि हम जिस चीज को माँग रहे हैं उससे अधिक अनमोल और स्थाई हैं।

 

मध्यरात्रि में मित्र का दृष्टांत

 

माँगी गई चीज़ों के लिए जुनून और इच्छा, और दृढ़ता प्रार्थना में परिणाम लेकर आते हैं। इस विश्वासयोग्य दृढ़ता का यह विचार प्रभु के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि उसने हमें इस उम्मीद में एक और दृष्टांत दिया है कि यह हमें कोई भी बाधाओं के मध्य में प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित करे। आइए मध्यरात्रि में मित्र के दृष्टांत को पढ़ें:

 

5और उसने उनसे कहा, “तुम में से कौन है कि उसका एक मित्र हो, और वह आधी रात को उसके पास आकर उससे कहे, ‘हे मित्र; मुझे तीन रोटियाँ दे। 6क्योंकि एक यात्री मित्र मेरे पास आया है, और उसके आगे रखने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है।7और वह भीतर से उत्तर दे, ‘मुझे दुख दे; अब तो द्वार बन्द है, और मेरे बालक मेरे पास बिछौने पर हैं, इसलिये मैं उठकर तुझे दे नहीं सकता?’ 8मैं तुम से कहता हूँ, यदि उसका मित्र होने पर भी उसे उठकर दे, तौभी उसके लज्जा छोड़कर मांगने के कारण उसे जितनी आवश्यकता हो उतनी उठकर देगा।(लूका 11:5-8 बल मेरी ओर से जोड़ा गया है)

 

जब कोई उत्तर आता प्रतीत नहीं होता तब क्या होता है? तब ऐसा लगता है जैसे आपके विश्वास की प्रार्थनाओं को अनदेखा किया जा रहा है? यीशु हमें प्रोत्साहित करने के लिए उपर्युक्त दृष्टांत इसलिए सिखाता है ताकि हम यह सीख लें कि इस प्रकार की परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिए ।

 

उपरोक्त वचनों के खंड में, हमारे पास एक ऐसे यात्री की कहानी है जो रात के मध्य में अपने मित्र के घर पहुँचता है। मध्य पूर्व में गर्मियों के महीनों के दौरान यात्री दिन की गर्मी से बचने के लिए अक्सर देर से यात्रा पर निकलते थे। यह यात्री एक यात्रा पर था और जब वह एक शहर से गुज़र रहा था तो उसने बाकी रात अपने एक मित्र के साथ बिताने का निर्णय लिया। उन दिनों में कोई ई-मेल या फोन नहीं होने के कारण, उसके मित्र को उसके आने की उम्मीद नहीं थी और उसके पास उसे खिलाने के लिए कोई रोटी नहीं थी। अतिथि-सत्कार करना और यात्री को भोजन कराने के साथ-साथ उसे सोने के लिए जगह देना वहाँ का एक पवित्र दायित्व था। घर के स्वामी को क्या करना चाहिए? मित्र के सामने परोसने के लिए रोटी न होना उसके लिए बड़ी शर्मिंदगी की बात थी। उसका एक मित्र था जिसके बारे में उसने सोचे कि वह उठकर उसे कुछ रोटी दे सकता है तो वह अपने मित्र को उठाकर कुछ रोटी लाने के लिए चला गया। उस समय मध्य पूर्व में परिवार के एक ही कमरे में एक साथ सोना आम बात थी। आज भी, एशिया के कुछ देशों में, यह असामान्य नहीं है।

 

1976 में मैंने एक मित्र के साथ सड़क मार्ग से यूरोप भर में और मध्य पूर्व से होते हुए एशिया में यात्रा की थी। एक शहर में हमें कोई होटल नहीं मिला, और पूछताछ करने पर हमें ऐसी जगह रहने के लिए आमंत्रित किया गया जहाँ कई अन्य एशियाई लोग रह रहे थे। पहले से ही समय लगभग रात के 10 बजे का था, और हम पर्वत श्रृंखलाओं पर एक खच्चर बस में अपनी यात्रा से थक कर चूर हो गए थे। जब तक वह कमरा हमें दिखाया नहीं गया था जिसमें हम रहना था, तब तक यह बहुत सस्ता लग रहा था। यह एक बड़ा कमरा था जिसमें लगभग बीस अन्य लोग बहुत मोटी तह की हुई दरी पर चटाई बिछा कर फर्श पर सो रहे थे। स्वाभाविक रूप से, हम यह जानकर चौंक गए कि हम उसी कमरे में सो रहे थे जहाँ कई अन्य लोग पहले से ही फर्श पर सो रहे थे। यह एक सामुदायिक सोने का कमरा था। कमरे में कोई फर्नीचर नहीं था, बस लोगों को गर्म रखने के लिए बीच में एक लकड़ी से चलने वाली भट्टी थी। एक ही कमरे में लगभग बीस अन्य लोगों के साथ सोने का अनुभव काफी रुचिकर था!

 

पश्चिमी लोगों के लिए, यह अजीब लगता होगा कि बहुत से लोग एक ही कमरे में सोएंगे, लेकिन मध्य पूर्व और एशिया के लोगों के लिए यह असामान्य नहीं था। यीशु ने मध्यरात्रि के बाद जगाए गए इस व्यक्ति का वर्णन किया, जिसकी स्थिति भी इसी समान थी जहाँ उसका परिवार एक साथ सो रहा था। इसका अर्थ होगा उठकर अंधेरे में अपने बच्चों पर पैर न रखने की सावधानी बरतते हुए दीपक ढूंढना और उसे जलाने की कोशिश करना, और फिर जाकर रोटी ढूँढना जिससे शायद पूरा घर जाग जाए। हम कल्पना कर सकते हैं कि वह अपने मित्र से शांत स्वर में बात कर रहा है, शायद एक खिड़की से, यह उम्मीद करते हुए कि उसका मित्र समझेगा कि वह उठकर उसे उसकी आवश्यकता की रोटी क्यों नहीं दे सकता। अपने मित्र के लिए उसकी यह प्रतिक्रिया थी... मुझे दुख न दे; अब तो द्वार बन्द है, और मेरे बालक मेरे पास बिछौने पर हैं, इसलिये मैं उठकर तुझे कुछ दे नहीं सकता?’ (लूका 11:7)। यह एक अंतिम जवाब देने की तरह लगता है। हालांकि, यह कहानी का अंत नहीं था।

 

विलियम बार्कले ने अपनी समीक्षा में कहा है:

 

"पूरब में कोई भी बंद दरवाजे पर तब तक दस्तक नहीं देगा जब तक आवश्यकता जरूरी नहीं होगी। सुबह को दरवाजा खोला जाता और वह पूरे दिन खुला रहता, क्योंकि वहाँ बहुत कम एकांत की ज़रूरत थी; लेकिन अगर दरवाजा बंद कर दिया गया हो, तो यह एक निश्चित संकेत था कि मित्र को परेशान नहीं किया जा सकता था। लेकिन इस खोज कर रहे स्वामी ने इसे रूकावट नहीं बनने दिया। उसने दस्तक दी और देता चला गया।"

 

 

इस दृष्टांत को कहने में, आपको क्या लगता है कि यीशु ने इस कहानी में उस मित्र को शामिल करने का चुनाव क्यों किया जो उठकर अपने मित्र की सहायता करने के लिए इच्छुक नहीं था? आपको क्या लगता है कि यीशु इस चरित्र के कार्यों और जिस तरह से उसने अपने मित्र को प्रतिक्रिया दी उसके द्वारा क्या दर्शाने की कोशिश कर रहा था?

 

एंड्रयू मरे, पुस्तक क्राइस्ट इन स्कूल ऑफ प्रेयर के लेखक, इस खंड के बारे में एक बहुत अच्छा अवलोकन करते हैं:

 

"दृढ़ता से प्रार्थना क्या ही गहरा स्वर्गीय रहस्य है! वह परमेश्वर जिसने प्रतिज्ञा की है और जो आशीष देने की लालसे रखता है, वही उसे रोकता है। यह उसके लिए इतना गहरा महत्व रखता है कि पृथ्वी पर उसके मित्र स्वर्ग में अपने समृद्ध मित्र को जानें और उस पर पूरी तरह से भरोसा करें! इसी वजह से, वो यह पता लगाने के लिए कि उनकी दृढ़ता वास्तव में कैसे प्रबल होती है उन्हें देरी से उत्तर के विद्यालय में प्रशिक्षित करता है। अगर वह स्वयं को इसपर स्थापित करते हैं तो वे स्वर्ग में शक्तिशाली शक्ति का संचालन कर सकते हैं!" 

 

लूका 11:8 में बाइबल के न्यू इंटरनेशनल वर्जन (एनआईवी) में बल लज्जा छोड़कर शब्द पर है और किंग जेम्स संस्करण (केजेवी) में यह दृढ़ता पर दिया गया है। यूनानी शब्द अनाईडिया का अनुवाद हमारी हिंदी में शब्द "लज्जा छोड़कर" किया गया है। इस यूनानी शब्द का शाब्दिक अर्थ है बिना शर्म के होना। की वर्ड स्टडी बाइबिल का कहना है कि इसका मतलब है: "बेशर्मी, बेधड़कपन, साहस। यह शब्द किसी चीज़ की खोज में दिखाए गई बहादुर दृढ़ता का वर्णन करता है, अशिष्टता और खेद के आभाव की विशेषता रखने वाला एक आग्रह।"

 

किंग जेम्स संस्करण अनाईडिया का अनुवाद हिंदी के शब्द “दृढ़ता” से करता है। वेबस्टर के न्यू वर्ल्ड डिक्शनरी का कहना है कि इस शब्द दृढ़ता का अर्थ है: "पूछने या मांगने में निरंतर लगे रहना; ना स्वीकार करने से इनकार कर देना; निरंतरता से सताते हुए, परेशान करते हुए। "

 

यीशु इस शब्द का प्रयोग क्यों करेगा? वह हमें प्रार्थना में परमेश्वर के सम्मुख बेशर्मी और साहस के साथ आने के बारे में क्या समझाना चाहता है?

 

एक ऐसा विश्वास और दृढ़ता होती है जो जब तक एक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता प्राप्त न हो जाए तब तक परमेश्वर को नहीं जाने देगी। यह एक ऐसा विश्वास है जो परमेश्वर को प्रसन्न करता है। निश्चित रूप से दृष्टांत का मुद्दा यह है कि वह व्यक्ति दरवाजे पर दस्तक देता रहेगा और जब तक उसे आवश्यक रोटी नहीं दे दी जाती तब तक वह अपने मित्र को वापस सोने नहीं देगा। यीशु इस खंड में यह कह रहा है कि यदि एक चिड़चिडे मित्र को थोड़ी बेशर्म, अड़ियल दृढ़ता के द्वारा उठकर अपने मित्र को कुछ रोटी देने के लिए मजबूर किया जा सकता है, तो परमेश्वर कितना ज्यादा करेगा, वह जो उनके मांगने पर अपने लोगों को भोजन देता और ढांपने की लालसा रखता है? निश्चित रूप से यह कहानी हमें प्रार्थना में निरंतर लगे रहने और हार न मानने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए दी गई है। यदि दृढ़ता होने पर और बेशर्मी के साहस का उपयोग अपनी आवश्यकता को एक ऐसे व्यक्ति के सामने लाने के लिए किया जा सकता है जो असुविधा दिए जाने से नाराज़ है, तो परमेश्वर हमारे लिए कितना अधिक करेगा? परमेश्वर असीम दयालु, इच्छुक और हमारा भला करने के लिए तैयार है। हमारा पिता हमारी बेधड़क दृढ़ता पर नाराज नहीं होता लेकिन यह लालसा रखता है कि हम लंबे समय तक प्रार्थना में बने रहें।

 

जब उसे अपने भाई एसाव की नफरत के संबंध में हल की आवश्यकता थी, तब याकूब ने इस तरह के विश्वास को प्रदर्शित किया था। बीस साल से ज्यादा पहले याकूब इसहाक की आशीष और पहलौठे होने के हक को एसाव से छीनने में सफल रहा था। आशीष और जन्म का हक़ पहलौठे को जाना चाहिए था, जो एसाव था, लेकिन याकूब ने छल के द्वारा एसाव से यह हक और आशीष छीन ली थी। अब जब याकूब कनान में वापस घर लौट रहा था तब एसाव बदला लेने की तलाश में था। एसाव 400 लोगों के साथ याकूब को नुकसान पहुँचाने के लिए रास्ते में आ रहा था, तो याकूब ने खुद को परमेश्वर के हाथों में सौंप दिया और एक आदमी के रूप में स्वर्गदूत प्रकट हुआ जिसने रात भर उसके साथ मल्लयुद्ध किया:

 

24और याकूब आप अकेला रह गया; तब कोई पुरूष आकर पौ फटने तक उससे मल्लयुद्ध करता रहा। 25जब उसने देखा, कि मैं याकूब पर प्रबल नहीं होता, तब उसकी जांघ की नस को छूआ; सो याकूब की जांघ की नस उससे मल्लयुद्ध करते ही करते चढ़ गई। 26तब उसने कहा, “मुझे जाने दे, क्योंकि भोर होने वाला है; याकूब ने कहा, “जब तक तू मुझे आशीर्वाद दे, तब तक मैं तुझे जाने दूँगा।27और उसने याकूब से पूछा, “तेरा नाम क्या है?” उसने कहा, “याकूब 28 उसने कहा, “तेरा नाम अब याकूब नहीं, परन्तु इजराइल होगा, क्योंकि तू परमेश्वर से और मनुष्यों से भी युद्ध कर के प्रबल हुआ है (उत्पत्ति 32:24-28)

 

मैं यह नहीं मानता कि यहाँ हमें यह बताया जा रहा है कि अपनी ज़रूरत को पूरा करने के लिए हमें परमेश्वर का हाथ मरोड़ने की ज़रूरत है। परमेश्वर वाकई में देने के लिए तैयार और इच्छुक है, लेकिन कुछ चीजें थोड़ी मेहनत, जुनून और दृढ़ता के बिना नहीं मिलतीं। याद रखें कि परमेश्वर को विश्वास का प्रदर्शित होना भाता है और निश्चित रूप से वह हमें अनंत काल के लिए विश्वास का प्रयोग? करने में प्रशिक्षण दे रहा है। आत्मिक क्षेत्र में परमेश्वर में विश्वास और भरोसा सामर्थ है। विश्वास पर विश्वास नहीं, जो हमें कुछ भी नहीं दे सकता। विश्वास सही स्रोत पर होना चाहिए - स्वयं परमेश्वर पर। संघर्ष अक्सर अनदेखी आत्मिक ताकतों के खिलाफ होता है जो हमारी समझ को रोकने की कोशिश करती हैं। पौलुस प्रेरित ने लिखा, "क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं। (इफिसियों 6:12 बल मेरी ओर से जोड़ा गया है)

 

याकूब के संघर्ष के विषय में इस खंड में, यह स्पष्ट है कि याकूब शैतान की ताकतों के साथ संघर्ष नहीं कर रहा था, लेकिन वह एक आत्मिक प्राणी के साथ संघर्ष कर रहा था, जो पवित्रशास्त्र कहता है कि यहोवा का स्वर्गदूत था - स्वयं यहोवा (उत्पत्ति 33:28,30)। इस बात पर ध्यान देना रोचक है कि परमेश्वर के स्वर्गदूत दूत ने कहा कि याकूब ने परमेश्वर के साथ और मनुष्यों के साथ युद्ध किया था (पद 28)। मैं इसका मतलब इस प्रकार निकलता हूँ कि याकूब का संघर्ष ईसाव के क्रोध और घृणा से उबरने का युद्ध था परमेश्वर के लिए एक आध्यात्मिक संघर्ष, अन्यथा स्वर्गदूत ऐसा क्यों कहता कि याकूब ने मनुष्यों के साथ संघर्ष किया था? परमेश्वर के साथ यह संघर्ष याकूब के लिए एक जीवन और मृत्यु की बात थी। वह जानता था कि एसाव उसे नष्ट करने का इरादा रखता था। भले ही परमेश्वर की इच्छा इन दोनों भाइयों का मेल-मिलाप कराने की थी, फिर भी एसाव के हृदय को बदलने की प्रक्रिया याकूब की प्रार्थना के साथ-साथ एसाव के दिल में चमत्कार करने के लिए परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर थी। परमेश्वर के स्वर्गदूत के साथ याकूब का संघर्ष शारीरिक था, लेकिन यह प्रार्थना में संघर्ष का प्रतीक भी था। कई ऐसी बातें हैं जिन से हम केवल और केवल प्रार्थना और प्रार्थना के द्वारा ही उबर सकते हैं? प्रार्थना में हम किस चीज़ के साथ मल्लयुद्ध करते व संघर्ष करते हैं?

 

हमें अपनी इच्छाओं से संघर्ष करना पड़ सकता है। क्या जो आप माँग रहे हैं वह पवित्रशास्त्र में बताई गई परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है? क्या आपकी इच्छा वचन के किसी भी सिद्धांत का विरोधाभास करती है? हमें ईमानदारी से अपने हृदय की जाँच करने की आवश्यकता है। क्या इसका अर्थ यह है कि सभी प्रार्थनाएं नि:स्वार्थ होनी चाहिए, या हम अपनी जरूरतों या इच्छाओं के लिए कुछ भी नहीं मांग सकते हैं? बिलकुल नहीं! हमारा स्वर्गीय पिता अपनी संतानों को भले उपहार देने के लिए उत्सुक है। हालाँकि, अपने ज्ञान में, वह हमारे मंशा के कारण या फिर इसलिए कि हम जो चीज मांगते हैं वह स्वयं के लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए हानिकारक साबित हो सकती है, वह प्रार्थना का उत्तर रोक सकता है। कुछ चीजें जो हम मांगते हैं नैतिक रूप से निष्पक्ष होती हैं, जिसका अर्थ है, वे ऐसी चीजें हैं जो स्वयं में हानिकारक नहीं हैं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को आर्थिक प्रयोजन की आवश्यकता हो सकती है और वह आर्थिक आशीष के लिए प्रार्थना कर सकता है। यदि उस व्यक्ति को एक बड़ी राशि दे दी जाए, तो वह इसे भले के लिए प्रयोग कर सकता है, या फिर यदि उसमें आर्थिक उपहार को संभालने के लिए आत्मिक परिपक्वता नहीं है तो वह गलत तरीके से इसका प्रयोग करने का चुनाव कर ठोकर खा सकता है। हमारे उद्देश्य और इच्छाएं हमारे अपने नियंत्रण में हैं और हम उनके लिए ज़िम्मेदार हैं।

 

हमें विरोधी ताकतों, जैसे दुष्ट आत्माओं के प्रभाव, के साथ भी संघर्ष करना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, जब हम अपने किसी प्रियजन या परिवार के सदस्य के लिए अपने प्रभु यीशु मसीह के उद्धार की सामर्थ के विश्वास और ज्ञान में आने के लिए प्रार्थना करते हैं, तो हम यह जानते हैं कि हम पिता की इच्छा के अनुसार कुछ मांग रहे हैं। लेकिन, यह हो सकता है कि वो व्यक्ति स्वेच्छा से अपने आप को पाप के लिए दे रहा हो जो उन्हें अवज्ञा के कारण शत्रु के बंधन में रख रहा है। इस प्रकार का गढ़ प्रार्थना में परमेश्वर के साथ संघर्ष और युद्ध करने की आवश्यकता का एक उदाहरण है। प्रार्थना के द्वारा, हम परमेश्वर की इच्छा को इस धरती पर उसी प्रकार लाने में सहभागी हो जाते हैं जैसी वो स्वर्ग में (पहले से ही) है।

 

हमें अपनी शारीरिक और भावनात्मक कमज़ोरियों के साथ संघर्ष करने की आवश्यकता भी हो सकती है। याकूब कितना थका हुआ होगा! निश्चित रूप से वह हार मानने की परीक्षा में होगा, लेकिन उसने दृढ़ता को चुना, और परमेश्वर ने इसे सम्मानित किया। कभी-कभी जब हम हार मान लेते हैं तो हम उत्तर के कितने करीब होते हैं? यह हम कभी नहीं जान पाएंगे। थकान या निराशा को अपने आप को भावनात्मक रूप से झकझोड़ने न दें कि आप प्रार्थना में जारी रखने के बजाए हथियार डाल दें। इस बात पर भरोसा करने का चुनाव करें कि परमेश्वर आपको उत्तर देना चाहता है, और याकूब की तरह जब तक आप उत्तर नहीं पा लेते तब तक बने रहें।

 

याकूब की तरह ही हमें भी प्रार्थना में दृढ़ता से बने रहने के लिए बुलाया गया है। याकूब की आवश्यकता हार मानने के लिए बहुत बड़ी थी। वह अपने भाई के साथ एक होने के संघर्ष को नहीं छोड़ सका। उसे एसाव के हृदय के लिए परमेश्वर के साथ संघर्ष करना जारी रखना पड़ा, और मुझे यकीन है कि उसके अपने हृदय के लिए भी, क्योंकि याकूब के लिए कनान या इज़राइल के वाचा के देश में परमेश्वर की उसके जीवन के लिए जो कुछ भी योजनाएं थीं, उनके पूरी होने के लिए उसके हृदय में परिवर्तन की आवश्यकता थी। याकूब की जांघ की नस को पीड़ा देना उसके स्वयं के साधनों के बजाय परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर होने का प्रतीक है। विजय की प्रार्थना और मध्यस्थता के द्वारा वो परमेश्वर में एक नए स्थान पर लाया गया। प्रार्थना उसका एकमात्र सहारा था। परमेश्वर को भाता है कि हम उस पर निर्भर रहें। हम अपने सब कुछ को कैसे परमेश्वर पर डाल कर अपनी सारी ज़रूरतों के लिए उसपर कैसे निर्भर हो सकते हैं, इसके लिए यह एक महान सबक है। पिता को हमारा उसमें दृढ़ विश्वास प्रदर्शित करना बहुत भाता है।

 

9और मैं तुम से कहता हूँ; कि माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढ़ों तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। 10क्योंकि जो कोई माँगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा। (लूका 11:9-10)

 

यीशु सबसे पहले हमें मांगने के लिए प्रेरित करता है, और फिर अपनी मांग पर ढूँढने और खटखटाने के द्वारा कार्य करने के लिए, जो हमारे ढूँढने और मांगने में दृढ़ता की बात करता है। हमारी हिंदी भाषा इस खंड में यूनानी शब्दों के समान अर्थ नहीं बताती है। यूनानी शब्द वास्तव में इस प्रकार से हैं, "लगातार मांगते रहो, और यह तुमको दिया जाएगा; लगातार ढूंढते रहो, और तुम पाओगे; लगातार खटखटाते रहो, और दरवाजा तुम्हारे लिए खोला जाएगा।" वह इस विश्वास और भरोसे के साथ प्रार्थना में बने रहने के इस विचार को आगे बढ़ा रहा है कि जो चीज़ आप माँग रहे हैं वो आपको मिल जाएगी। यह क्या बढ़िया प्रतिज्ञा है! हमें बलपूर्वक यह बताया जाता है कि अगर हम लगातार मांगते रहें, तो यह हमें दिया जाएगा। परमेश्वर अपने वचन पर खरा है, और उसके लिए झूठ बोलना असंभव है (इब्रानियों 6:18)। जब आप प्रार्थना करते हैं तो क्या आप सच में विश्वास करते हैं कि परमेश्वर पिता आपको जवाब देना चाहता है?

 

सी.एच. स्पर्जन ने एक बार कहा, "क्योंकि परमेश्वर जीवित परमेश्वर है, वह सुन सकता है; क्योंकि वह एक प्रेम करने वाला परमेश्वर है, वो सुनेगा; क्योंकि वह हमारा वाचा रखने वाला परमेश्वर है, उसने स्वयं को सुनने के लिए बाध्य किया है।"

 

प्रार्थना: पिता, कृपया हमें मदद करें कि हम हार न मानें लेकिन प्रार्थना में दृढ़ रहें ताकि हम आपके द्वारा उपहार प्राप्त कर सकें। हमें थकने की बजाय प्रार्थना करना सिखाएं। हमें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा सुदृढ़ करें। आमीन।

 

कीथ थॉमस

नि:शुल्क बाइबिल अध्यन के लिए वेबसाइट: www.groupbiblestudy.com

-मेल: keiththomas7@gmail.com

 क्राइस्ट इन स्कूल ऑफ प्रेयर, एंड्रयू मरे, व्हिटकर हाउस पब्लिशर्स, 1981, पृष्ठ 64

की वर्ड स्टडी बाइबिल, एएमजी प्रकाशक, चट्टानूगा, टीएन 37422. पृष्ठ 1585