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1. The Parable of the Wedding Feast

1. विवाह भोज का दृष्टान्त

शुरुआती प्रश्न: ने बटुए या पर्स से कुछ लेकर अपना परिचय दें जो आपके और आपके परिवार के बारे में कुछ का वर्णन करता है।

 

वैकल्पिक शुरुआती प्रश्न [ऐसे समूह के लिए जो एक दूसरे को जानते हों]: क्या आप कभी किसी शादी में गए हैं? इसके बारे में एक ऐसी स्मृति साझा करें जो मज़ेदार, अनोखी, रूमानी हो, या फिर कुछ ऐसी बात जिसने आपसे मसीह के विषय में बात की हो।

 

यीशु दृष्टांतों में क्यों बात किया करता था?

 

यह शब्द दृष्टान्त, यूनानी शब्द पैराबोले से आता है, जिसका अर्थ है "तुलना, चित्रण या सादृश्य”। सुनने वालों की कल्पना के लिए आध्यात्मिक सच्चाई को स्पष्ट करने के लिए रची यह एक सरल कहानी है। एक तस्वीर एक हजार शब्दों के बराबर होती है। जब यीशु से उसके शिष्यों ने पूछा कि वह दृष्टांतों में क्यों बात करता है, तो उसने जवाब दिया, तुम को स्वर्ग के राज्य के भेदों की समझ दी गई है, पर उनको नहीं। मैं उन से दृष्टान्तों में इसलिये बातें करता हूँ, कि वे देखते हुए नहीं देखते; और सुनते हुए नहीं सुनते; और नहीं समझते।” (मत्ती 13:11, 13) प्रभु लोगों को आत्मिक सत्य को समझने से रोकने की कोशिश नहीं कर रहा है, हमारे प्राणों का शत्रु ही वह है जो ऐसा करता है।

 

एक दृष्टान्त आत्मिक वास्तविकताओं को इस तरह से साझा करने का एक तरीका है, जिससे वह हमारे मनों में मौजूद उन छलनों (रुकावटों) से बच निकलती हैं जो हमें नए तरीकों से देखने से रोकते हैं। यीशु हमारे मनों को नज़रंदाज़ नहीं कर रहा, लेकिन वह हमें अपनी नज़रों से चीज़ों को देखना सिखा रहा है। यीशु परमेश्वर के राज्य की सच्चाई प्रकट कर रहा है, और निश्चित रूप से, एक और राज्य है जो इस सच्चाई का विरोध करता है। हमारे प्राण का दुश्मन सक्रीय रूप से हमारे मनों को सच्चाई के प्रति अंधा करने का प्रयास करता है, और यीशु इस बारे में जानता था। (2 कुरिन्थियों 4:4)

 

दृष्टान्तों में बात करने से यीशु ने जो हासिल किया वह था पूर्वनिश्चित विचारों को चुनौती देना और मुद्दे की जड़ तक पहुँच! इस मामले के सार को सही करने के लिए था! उनकी शिक्षा हर किसी व्यक्ति के लिए थी। यह एक ऐसी बात थी जो उसकी शिक्षा को उनके दिन के अन्य धार्मिक शिक्षकों से इतना अलग बनाती थी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने चतुर हैं, आपका सामाजिक स्तर, उम्र या लिंग क्या है, यीशु आपसे बात कर रहा है! यीशु हमेशा हृदय से प्रतिक्रिया की तलाश करता है। किसी व्यक्ति का दिल या आत्मा बहुत लंबे समय से कठोर, बिना हल चलाई भूमि की तरह है जिसे परमेश्वर के वचन के बीज बोए जाने से पहले तोड़ना आवश्यक है। (होशे 10:12) यह कहानियाँ मन को चुनौती देती हैं। यदि किसी व्यक्ति का हृदय प्राप्त करने के लिए खुला है, तो दिल और इच्छा को स्पर्श कर प्रेरित किया जाता है।

 

अक्सर दृष्टान्तों पर विचार और मनन करने की आवश्यकता होती है, और केवल तभी, जब किसी व्यक्ति का हृदय सुनने के लिए खुला होता है, वह उसे "समझ पाएगा"। ज्योति चमकती है, और एक व्यक्ति रोज़मर्रा की कहानी में छिपे हुए आत्मिक सत्य के बारे में जागरूक हो जाता है। लेकिन जब एक व्यक्ति इस आत्मिक समझ को हासिल कर लेता है तो उस व्यक्ति की एक ज़िम्मेदारी ठहर जाती है। अर्थात्, जब उस व्यक्ति को आत्मिक सत्य का अर्थ प्राप्त हो जाता है, तो वह उस सच्चाई को अपने जीवन में जीने के लिए जवाबदेह बन जाता है! परमेश्वर के वचन के बीज के सुने जाने से काफी समय पहले से ही प्रभु के द्वारा हृदय की भूमि को तैयार किया जाता है। यही कारण है कि प्रभु अक्सर हमें अपने जीवनों में कठिन परिस्थितियों या कठिन "मौसमों" से होकर जाने की अनुमति देता है-- यह घमंड और हमारे हृदय में पवित्र आत्मा के काम के प्रतिरोध की कठोर मिट्टी को तोड़ता है।

 

यीशु के दृष्टान्त भी हमारी आत्मिक परिस्थिति को प्रकट करते हैं। इसीलिए यीशु ने अपने समय के फरीसियों और धार्मिक अग्वों से बहुत अवांछित नकारात्मक ध्यान आकर्षित किया। यीशु एक कहानी बताता, और यह एक दर्पण में देखने की तरह होता। वह अपनी सच्ची अवस्था को नहीं देखना चाहते थे, और वह दीन होने का चुनाव करने की बजाय अपमानित महसूस करते। आप में से बहुत से लोग जो इन शब्दों को पढ़ रहे हैं, अपने जीवन की परिस्थितियों में पीछे मुड़ कर देख सकते होंगे कि जब आप कठिन परिश्रम या मुश्किल हालातों से गुज़रे होंगे, तब आपने अनन्त काल की बातों को खोजना शुरू किया होगा। क्योंकि वह जानता है कि हमें बिलकुल किस चीज़ की आवश्यकता है, प्रभु हमारे दिल को तैयार करने के लिए अपने पास उपलब्ध कई साधनों का प्रयोग करता है। मेरी आशा और प्रार्थना यह है कि, जब हम दृष्टान्तों के माध्यम से यीशु के इन शब्दों का अध्ययन करते हैं, तब हमारे हृदय की आंखें खोली जाएंगी और प्रभु अपने मार्गों को समझने के द्वारा आत्मिक उन्नति लाएगा। दृष्टान्त उसकी संतानों को “राज्य के मार्गों” के विषय में सिखाते हैं। जबकि हमें उसके भोज के लिए आमंत्रित किया गया है, आइये हम अपने हृदय खोलें और उससे माँगे कि वह हमारे लिए अपने मार्गों को उजागर करे।

 

विवाह और भोज का तैयार किये जाना (मत्ती 22:1-14)

 

1यीशु फिर उनसे दृष्टान्तों में कहने लगा। 2स्वर्ग का राज्य उस राजा के समान है, जिसने अपने पुत्र का विवाह किया। 3और उसने अपने दासों को भेजा, कि निमंत्रित लोगों को विवाह के भोज में बुलाएँ; परन्तु उन्होंने आना न चाहा। 4फिर उसने और दासों को यह कहकर भेजा, कि ‘निमंत्रित लोगों से कहो, देखो; मैं भोज तैयार कर चुका हूँ, और मेरे बैल और पले हुए पशु मारे गए हैं: और सब कुछ तैयार है; विवाह के भोज में आओ।’ 5परन्तु वे उपेक्षा करके चल दिए: कोई अपने खेत को, कोई अपने व्यापार को। 6औरों ने जो बच रहे थे उसके दासों को पकड़कर उनका अनादर किया और मार डाला। 7तब राजा को क्रोध आया, और उसने अपनी सेना भेजकर उन हत्यारों को नाश किया, और उनके नगर को फूँक दिया। 8तब उसने अपने दासों से कहा, ‘विवाह का भोज तो तैयार है, परन्तु निमंत्रित लोग योग्य नहीं ठहरे। 9इसलिये चौराहों पर जाओ, और जितने लोग तुम्हें मिलें, सब को विवाह के भोज में बुला लाओ।’ 10सो उन दासों ने सड़कों पर जाकर क्या बुरे, क्या भले, जितने मिले, सब को इकट्ठा किया; और विवाह का घर अतिथियों से भर गया। 11जब राजा अतिथियों को देखने भीतर आया; तो उस ने वहाँ एक मनुष्य को देखा, जो विवाह का वस्त्र नहीं पहिने था। 12उसने उससे पूछा, ‘हे मित्र; तू विवाह का वस्त्र पहिने बिना यहाँ क्यों आ गया?’ उसका मुँह बन्द हो गया। 13तब राजा ने सेवकों से कहा, ‘इस के हाथ-पाँव बान्धकर उसे बाहर अन्धियारे में डाल दो, वहाँ रोना, और दांत पीसना होगा।’ 14क्योंकि बुलाए हुए तो बहुत हैं परन्तु चुने हुए थोड़े हैं।” (मत्ती 22:1-14)

 

सबसे पहले, हम जानते हैं कि एक राजा है जो अपने बेटे और सभी आने वाले मेहमानों के लिए विवाह-उत्सव की तैयारी कर रहा है। यह दावत या भोज, उन लोगों के भविष्य का प्रतीक है, जो क्रूस पर मसीह के सम्पूर्ण कार्य को अपने पापों के क़र्ज़ के चुकाए जाने के लिए प्राप्त कर चुके हैं। प्रेरित यहुन्ना ने भी आने वाले उस समय के बारे में लिखा था जो सच्चे विश्वासियों के लिए आगे है:

 

8और उस को शुद्ध और चमकदार महीन मलमल पहिनने का अधिकार दिया गया, क्योंकि उस महीन मलमल का अर्थ पवित्र लोगों के धर्म के काम है। 9और उसने मुझसे कहा; “यह लिख, ‘कि धन्य वे हैं, जो मेम्ने के ब्याह के भोज में बुलाए गए हैं;’” फिर उसने मुझ से कहा, “ये वचन परमेश्वर के सत्य वचन हैं।(प्रकाशितवाक्य 19:8-9)

 

ऊपर के खंड में ध्यान दें कि जिन लोगों को आमंत्रित किया गया है, उन्हें पहिनने के लिए वस्त्र दिए गए हैं, वस्त्र जिन्हें धर्म के कार्य कहा गया है। हमें एक क्षण भी ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि हमें आमंत्रित किये जाने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए। नहीं, उस मेज़ पर हमारी जगह पूर्णत: सेंत-मेत में परमेश्वर द्वारा दिया एक उपहार है। लेकिन, एक बार जब हम परमेश्वर के अनुग्रह को स्वीकार कर उसके सुसमाचार पर विश्वास करते हैं, तब हमें हमारे भीतर वास करते आत्मा के कार्य के द्वारा यीशु की समानता में रूपांतरित किया जाता है। हम मसीह की सेवा करने और उसकी महिमा के लिए भले कार्य करने के लिए उसके साथ अपने प्रेम संबंध में सुरक्षित हैं। क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं; और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहिले से हमारे करने के लिये तैयार किया। (इफिसियों 2:10)

 

जब हम इस भोज की तैयारी में हो रहे कार्य के बारे में सोचते हैं, तो हम अक्सर उस मेज़ के बारे में सोचते हैं जो कि तैयार हो रहा है और जो भोजन उस पर है, लेकिन मुझे लगता है कि इसका मतलब इससे कहीं गहरा है। परमेश्वर की तैयारी का कार्य उन लोगों के जीवन में है, जिन्हें वहाँ आमंत्रित होने के लिए चुना गया है। यीशु ने कहा, "मेरे पीछे आओ, और मैं तुम्हें मनुष्यों का मछुआरों को बनाऊँगा" (मत्ती 4:19)। जब हम उसके पास आते हैं और उसके पीछे हो लेते हैं, तो वो हमें वह बना देगा जो होने और करने के लिए उसने हमें बुलाया है। उसके चेलों के सन्दर्भ में, यह उन्हें मनुष्यों का मछुआरा बनाना था।

 

यदि आप परमेश्वर के हैं तो वह आप में कार्य कर रहा है, आपको स्वयं की छवि में रूपांतरित करने का कार्य (गलातियों 4:19)। जबकि इस संसार के अंत में एक वास्तविक भोज होगा, इस भोज की तस्वीर घनिष्ठ संबंध की एक तस्वीर है। हमें संसार के अंत तक इंतजार करना की आवश्यकता नहीं। मेरा क्या मतलब है? अगर मैं आपको अपनी ज़िंदगी के सबसे अच्छे समयों में से एक का वर्णन करने के लिए कहूँ, तो आप में से बहुत से लोग परिवार के रूप में एक मेज़ के चारों ओर साथ भोजन खाने के किसी घनिष्ठ समय का विवरण देंगे। एक साथ भोज करना वचन में घनिष्ठता की एक तस्वीर है। यीशु ने एक स्थान पर कहा,

 

देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूंगा, और वह मेरे साथ।(प्रकाशितवाक्य 3:20)

 

यीशु यह कह रहा है, कि जो लोग पुकार को सुनते हैं और अपना हृदय खोलते हैं, वह आकर उनके साथ घनिष्ठ संबंध का आनंद उठाएगा, जिसे आम तौर पर मेज़ पर उसके साथ बैठ भोजन करने की तस्वीर के द्वारा दर्शाया गया है।

 

विवाह के लिए आमंत्रण (पद 3-4)

 

3और उसने अपने दासों को भेजा, कि निमंत्रित लोगों को विवाह के भोज में बुलाएं; परन्तु उन्होंने आना न चाहा। 4फिर उसने और दासों को यह कहकर भेजा, कि ‘निमंत्रित लोगों से कहो, देखो; मैं भोज तैयार कर चुका हूँ, और मेरे बैल और पले हुए पशु मारे गए हैं: और सब कुछ तैयार है; विवाह के भोज में आओ।’

 

मसीह के समय मध्य पूर्व में, धनी लोग अपने द्वारा तैयार किये जा रहे विवाह के भोज के लिए सभी लोगों को एक सामान्य निमंत्रण भेजते थे। दिन निर्धारित किया जाता था, लेकिन समय नहीं। ध्यान दें कि तीसरे पद में कहा गया है कि दासों को उन सभी लोगों को बुलाने भेजा गया था जिन्हें आमंत्रित किया गया था (यानी, भूतकाल में)

 

आप लोगों को भोज में आमंत्रित किये जाने के लिए भेजे गए शुरुआती दासों में किन्हें मानेंगे?

 

सभी आम लोग जल्दी आ गए; वह अपने बेटे के विवाह में राजा के आनंद की खुशी का हिस्सा होना चाहते थे। अधिक प्रतिष्ठित अतिथि राजा के दासों के आने के लिए इंतजार करेते कि वह आकर उन्हें बताएंगे कि अब सब कुछ तैयार है। राजा की इस सोच के कारण कुलीन अतिथियों का समय व्यर्थ नहीं होगा। वे तभी आएंगे जब समारोह शुरू हो रहा होगा। पहले से भेजे गए दास शायद यहुन्ना बपतिस्मा देने वाले की सेवकाई का प्रतीक है, और फिर प्रभु यीशु (यशायाह 42:1), स्वयं दूल्हा।

 

तीसरा पद हमें बताता है कि प्रतिउत्तर आने में असमर्थता होने का नहीं है, लेकिन आने के लिए इच्छुक नहीं होने का है। राजा के अनुग्रह पर ध्यान दें। जब शुरुआती दासों ने उन आमंत्रित अतिथियों से जो नहीं आएंगे, न आने का इनकार पा लिया, तो राजा ने अपने दासों को दूसरी बार भेजा, 4फिर उसने और दासों को यह कहकर भेजा, कि ‘निमंत्रित लोगों से कहो, देखो; मैं भोज तैयार कर चुका हूँ, और मेरे बैल और पले हुए पशु मारे गए हैं: और सब कुछ तैयार है; विवाह के भोज में आओ।’ (मत्ती 22:4)

 

आपने अपने जीवन में किन तरीकों से परमेश्वर के निमंत्रण को सुना है? क्या आप किसी विशेष उदाहरण या परिस्थिति के बारे में सोच सकते हैं जब आपको उनकी बुलाहट का एहसास हो रहा था? परमेश्वर ने आपके पास कितनी बार अपने दासों को भेजा है?

 

संसार के राजा द्वारा मनुष्यों के स्वयं से पुन: मेल हो जाने पर उसके द्वारा व्यय किये मूल्य के बारे में सोचिए-- लोगों के पापों का भुगतान करने के लिए क्रूस पर स्वयं अपने पुत्र की मृत्यु तक। क्या आपको नहीं लगता कि वह अपने दासों द्वारा दिए निमंत्रण की अस्वीकृति पर अपमानित महसूस करेगा?

 

 

राजा का अपमान या नीचा दिखाए जाना

 

दूसरी बार भेजे गए और दास किसका प्रतीक होंगे और इतिहास में इसकी क्या प्रतिक्रिया थी?

 

यह मेरा विश्वास है कि दूसरी बार भेजे गए और दास सुसमाचार को येरूशलेम और यहूदिया औए सामरिया के बाहरी क्षेत्र में सुसमाचार पहुँचाने वाले प्रेरितों और अन्य शिष्यों को दर्शाते हैं। परमेश्वर द्वारा प्रेम की पेशकश के जवाब में बुझे मन से दिए बहाने मिले:

 

5परन्तु वे उपेक्षा करके चल दिए: कोई अपने खेत को, कोई अपने व्यापार को। 6औरों ने जो बच रहे थे उसके दासों को पकड़कर उनका अनादर किया और मार डाला।

 

यीशु मंदिर के क्षेत्र में ही इस दृष्टान्त के शब्दों को बता रहा था। उनके चारों ओर वह धार्मिक अग्वे थे जो उनके अनुग्रहकारी शब्दों के प्रति प्रतिरोधी थे। वह विवाह के भोज के दृष्टान्त से पहले ही दो और दृष्टान्तों को बाँट चुका है (मत्ती 21: 23-46)। उनके बहानों को लेकर उसके शब्दों ने उनके हृदय को छेदा होगा क्योंकि उसके द्वारा कहे जाने वाले दृष्टान्त सच्चाई के बहुत करीब थे।

 

अक्सर आज के समय में, सुसमाचार के दावों और पुकार को कई अलग-अलग बहानों से नकार दिया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग हृदय के मुद्दों से पहले अपना व्यवसाय और जीवन के कार्यों को रखते हैं। वे कहते हैं "मैं बहुत व्यस्त हूँ," । वे कभी भी खेल-कूद, या सोशल मीडिया या फिल्मों आदि के लिए बहुत व्यस्त नहीं लगते। आज कई लोग तकनीक से जुड़े रहने के जुनून से ग्रस्त हैं। उन्हें हर समय "जुड़ा हुआ" होना चाहिए। मैं उन्हें "स्क्रीनऐजर्स" कहता हूँ। यह प्रवृत्ति सभी उम्र के लोगों में होती है, लेकिन युवा संस्कृति में यह बेहद प्रचलित है। यह उन लोगों को संदर्भित करता है, जो आत्मिक मुद्दों सहित किसी और बात से मतलब रखने के लिए अपने मोबाइल फोन या लैपटॉप से थोड़े लंबे समय तक भी दूर नहीं रह सकते। हम अपने समय की बातों में इतना खोए हो सकते हैं, कि हम अनंतकाल की बातों को भूल जाते हैं।

 

यह एक सत्य है, कि यदि आप व्यायाम नहीं करते हैं, तो आपकी मांसपेशियाँ कमज़ोर हो जाएँगी। हमारे आत्मिक जीवन के साथ भी ऐसा ही है। हमें आत्मिक प्राणी बनाया गया है, परमेश्वर के प्रति जीवित होने के लिए। अगर हम उसके वचन को सुनने के द्वारा अपना ध्यान आत्मिक मुद्दों पर न लगा परमेश्वर के प्रति जीवित नहीं हैं, तो परमेश्वर के पवित्र आत्मा के प्रति हमारी संवेदनशीलता कम होते हुए नष्ट हो जाएगी। आपके प्राण का शत्रु चाहता है कि आप अपनी आत्मिक ज़रूरत के विषय में निष्क्रिय हो सोते रहें।

सौभाग्य से हमारी आत्मा के लिए, हमें मसीह की आवश्यकता के लिए जागरूक करने के लिए परमेश्वर परीक्षाओं, कठिनाइयों और कष्टों का उपयोग करता है और हमें उस स्थान तक लाता है जहाँ हम मसीह को देखना शुरू करेंगे। दुनिया भर में इस जागृति के लिए क्या करना होगा? यह बहुत संभव है कि जो बातें लोगों को उनकी ज़रूरत के प्रति जागृत करेंगी, वह वो बातें हैं जो समय के अंत में होने वाली हैं और जिनके विषय में भविष्यवाणी की गई है:

 

 

10जाति पर जाति और राज्य पर राज्य चढ़ाई करेगा। 11और बड़ें-बड़ें भूकंप होंगे, और जगह जगह अकाल और महामरियाँ पड़ेंगी, और आकाश से भयंकर बातें और बड़े-बड़े चिन्ह प्रगट होंगे। 12परन्तु इन सब बातों से पहले वे मेरे नाम के कारण तुम्हें पकडेंगे, और सताएंगे, और पंचायतों में सौपेंगे, और बन्दीगृह मे डलवाएंगे, और राजाओं और हाकिमों के सामने ले जाएंगे। 13पर यह तुम्हारे लिये गवाही देने का अवसर हो जाएगा। 26 भय के कारण और संसार पर आनेवाली घटनाओं की बाँट देखते देखते लोगों के जी में जी रहेगा क्योंकि आकाश की शक्तियाँ हिलाई जाएँगी। (लूका 21:10-13,26)

 

जबकि उसके दासों की हत्या हो रही है, परमेश्वर निष्क्रिय नहीं रहेगा। इस दृष्टान्त में राजा ने अपने दासों की हत्या पर प्रतिक्रिया हत्यारों को नष्ट कर उनके शहर को जलाने के द्वारा दी। (मत्ती 22:7) कलीसिया के शुरुआती वर्षों में सताए और मार दिए गए सभी लोगों के आंकड़े हम नहीं जानते। हमें केवल स्तिफुनुस और याकूब के विषय में बताया गया है जो शहीद हुए थे और फिर उसके बाद सताव आया था (प्रेरितों 8:1-3)। इतिहास हमारे लिए मसीह के क्रूस पर चढ़ाये जाने के सैंतीस वर्ष बाद रोमियों द्वारा यरूशलेम के विनाश को दर्ज करता है। परमेश्वर के दासों और उनके परिवारों पर आया सताव इज़रायल में राजनीतिक और धार्मिक वर्गों पर न्याय लेकर आया। आज भी, दुनिया भर में, मसीह के सुसमाचार का प्रचार करने वालों को सताया जा रहा है और उनकी हत्या की जा रही है।

 

8तब उसने अपने दासों से कहा, ‘विवाह का भोज तो तैयार है, परन्तु निमंत्रित लोग योग्य न ठहरे। 9इसलिये चौराहों में जाओ, और जितने लोग तुम्हें मिलें, सब को विवाह के भोज में बुला लाओ।’ 10सो उन दासों ने सड़कों पर जाकर क्या बुरे, क्या भले, जितने मिले, सब को इकट्ठा किया; और विवाह का घर अतिथियों से भर गया।

 

जब राष्ट्र के अग्वों ने दोनों निमंत्रणों को अस्वीकार कर दिया, तब परमेश्वर अन्यजातियों को राज्य में लेकर आया, वह जिन्हें बाहरी लोग समझा जाता था। समय की शुरूआत से ही परमेश्वर की यही योजना थी कि यहूदी लोग परमेश्वर के वचन की सुरक्षा के लिए सावधानीपूर्वक ध्यान देंगे और सभी लोगों के लिए परमेश्वर के प्रेम का संदेश सामने लाएंगे, कि केवल एक ही राष्ट्र के लिए। अन्यजातियों के साथ परमेश्वर के सुसमाचार का बाँटा जाना मसीह के संदेश का विरोध करने वालों को हजम नहीं हुआ। जब शाऊल जो प्रेरित पौलुस बन गया था, मंदिर के बाहर यहूदी लोगों को उपदेश दे रहा था, तो वह परमेश्वर के स्वयं उसपर प्रकट होने के द्वारा उसके रूपांतरण के अनुभव को सुनने में ठीक थे, लेकिन जब पौलुस ने उन्हें बताया कि प्रभु ने उसे अन्यजातियों में जा उन्हें भोज के लिए के बुलाने के निर्देश दिया था, यह बात उनके लिए अस्वीकार्य थी। यही वह समय था जब उन्होंने ऐसी बात कहने के लिए उसे मारने की कोशिश की:

 

20और जब तेरे गवाह स्तिफनुस का लहू बहाया जा रहा था तब मैं भी वहाँ खड़ा था, और इस बात में सहमत था, और उसके घातकों के कपड़ों की रखवाली करता था। 21और उसने मुझ से कहा, चला जा: क्योंकि मैं तुझे अन्यजातियों के पास दूर-दूर भेजूँगा।’” 22 वे इस बात तक उसकी सुनते रहे; तब ऊँचे शब्द से चिल्लाए, “ऐसे मनुष्य का अन्त करो; उसका जीवित रहता उचित नहीं।(प्रेरितों 22:20-22)

 

पौलुस को एक मुश्किल कार्य के लिए बुलाया गया था। यह उनके समय के लोगों के बीच एक लोकप्रिय संदेश नहीं था। उसे अन्यजातियों के बीच सुसमाचार के शुभ सन्देश का प्रचार करने के लिए भेजा गया था। उस समय, कलीसिया में इस बात को लेकर बहुत विवाद था कि यह निमंत्रण किसके लिए था! प्रेरित यह पा रहे थे कि परमेश्वर का इरादा सभी लोगों को आमंत्रित करना था, न कि केवल उन लोगों को जिन्हें वे परमेश्वर के राज्य के लिए उपयुक्त मानते थे। एक बार फिर, उनका संसार को देखने का दृष्टिकोण को पलटा जा रहा था। हम में से उनको जो गैर-यहूदी मसीही हैं, आभारी होना चाहिए, जैसे पौलुस ने कहा:

 

हे भाइयों, कहीं ऐसा हो, कि तुम अपने आप को बुद्धिमान समझ लो; इसलिये मैं नहीं चाहता कि तुम इस भेद से अनजान रहो, कि जब तक अन्यजातियाँ पूरी रीति से प्रवेश कर लें, तब तक इस्त्राएल का एक भाग ऐसा ही कठोर रहेगा। और इस रीति से सारा इस्त्राएल उद्धार पाएगा(रोमियों 11:25-26)

 

पौलुस यह कह रहा है कि इस्राएल एक समय के लिए सच्चाई के प्रति कठोर है, लेकिन यह भलाई उत्पन्न करेगा क्योंकि तभी राज्य का संदेश सभी के लिए दिया गया। पौलुस को उस समय का भी इंतजार है जब इसराइल पुन: स्थापित किया जाएगा और परमेश्वर की नई वाचा को स्वीकार करेगा (यिर्मयाह 31:31)। हमें अवश्य मसीह के लिए इतना जीवित और एक दूसरे के प्रति प्रेम से ऐसा भरा होना चाहिए कि हम दूसरों में ईर्ष्या भड़काएं, यहूदियों और अन्यजातियों में समान रूप से, कि उनका भी उसी प्रकार का जीवन हो। हमें कभी भी यह सोचने की गलती नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर ने यहूदी लोगों को छोड़ दिया है। नहीं, पौलुस हमें बताता है कि एक समय आएगा जब वे परमेश्वर के अनुग्रह के विषय में सुन कर अपना प्रतिउत्तर देंगे। पौलुस लिखता है कि जब वह समय आएगा, तब यहूदी और अन्यजाति लोग एक साथ कलीसिया में महान आत्मिक समृद्धि का एक समय लाएंगे:

 

सो मैं कहता हूँ: क्या उन्होंने इसलिये ठोकर खाई, कि गिर पड़ें? कदापि नहीं! परन्तु उनके गिरने के कारण अन्यजानियों को उद्धार मिला, कि उन्हें जलन हो। सो यदि उनका गिरना जगत के लिये धन और उनकी घटी अन्यजातियों के लिये सम्पत्ति का कारण हुआ, तो उनकी भरपूरी से क्या कुछ होगा।(रोमियों 11:11-12)

 

पौलुस एक बार फिर से यहूदियों के बीच जागृति के समय की प्रतीक्षा कर रहा है, जो इज़रायल के पुन: स्थापित होने पर सभी को आशीषित करेगा। यह अंतर इतना नाटकीय होगा कि इसे केवल जीवन और मृत्यु के बीच के अंतर के रूप में वर्णित किया जा सकता है:

 

क्योंकि जबकि उनका त्याग दिया जाना जगत के मिलाप का कारण हुआ, तो क्या उनका ग्रहण किया जाना मरे हुओं में से जी उठने के बराबर न होगा? (रोमियों 11:15)

 

क्या होगा वह दिन! यह परमेश्वर की दया का उंडेला जाना होगा जो कलीसिया के लिए मरे हुओं में से जीवित होने की तरह प्रतीत होगा। परमेश्वर के राज्य में घमंड या उत्कृष्टता के लिए कोई जगह नहीं है। हमें उसके महान प्रेम और दया के कारण ही विवाह भोज के लिए बुलाया जाता है, न कि ऐसे कुछ के लिए जो हम मेज पर लेकर आते हैं। उसकी महान योजना में, उसने सभी को आमंत्रित किया है।

 

क्या आप वचन में ऐसे उदाहरणों के बारे में सोच सकते हैं जब यीशु उन लोगों तक पहुँचा जिन्हें दूसरों द्वारा तुच्छ जाना जाता था? क्या आपको लगता है कि आज भी हमारी अपनी मान्यताओं के कारण कुछ लोगों को छोड़ देना संभव है? चर्चा करें।

 

बिना विवाह के वस्त्र वाला मनुष्य

 

11जब राजा अतिथियों के देखने को भीतर आया; तो उस ने वहाँ एक मनुष्य को देखा, जो विवाह का वस्त्र नहीं पहिने था। 12उसने उससे पूछा, ‘हे मित्र; तू विवाह का वस्त्र पहिने बिना यहाँ क्यों आ गया?’ उसका मुँह बन्द हो गया। 13तब राजा ने सेवकों से कहा, ‘इस के हाथ-पाँव बान्धकर उसे बाहर अन्धियारे में डाल दो, वहाँ रोना, और दांत पीसना होगा।’ 14क्योंकि बुलाए हुए तो बहुत हैं परन्तु चुने हुए थोड़े हैं।” (मत्ती 22:11-14)

 

पद 11-12 में, आपको क्या लगता है कि विवाह के वस्त्र किस बात/ चीज़ का प्रतीक हैं?

 

अब हमें राजा के विवाह के उत्सव में आने के बारे में बताया गया है कि वो वहाँ एक ऐसे मनुष्य को देखता है जिसने विवाह के वस्त्र नहीं पहने हैं। पलिश्ती देश में शिमशोन की शादी की कहानी में हमें विवाह में आमंत्रित अतिथियों को मलमल के वस्त्र देने की प्रथा के बारे में बताया गया है (न्यायियों 14:10-13)। शिमशोन की घटना में उसने एक पहेली प्रस्तुत करते हुए प्रथा से बाहर निकलने की कोशिश की।

 

हमारे दृष्टान्त में, इस प्रथा को संदर्भित किया गया है। दृष्टान्त में राजा परमेश्वर का प्रतीक है जो विवाह के अतिथियों को धार्मिकता का वस्त्र उपलब्ध कराता है। विवाह के भोज में कोई भी ऐसा नहीं होगा जो अन्य लोगों की तुलना में बेहतर वस्त्र पहने हो -- हम सब परमेश्वर की धार्मिकता पहने मसीह यीशु में एक होंगे:

 

मैं यहोवा के कारण अति आनन्दित होऊंगा; मेरा प्राण परमेश्वर के कारण मगन रहेगा; क्योंकि उसने मुझे उद्धार के वस्त्र पहिनाए, और धर्म की चद्दर ऐसे ओढ़ा दी है जैसे दूल्हा फूलों की माला से अपने आपको सजाता और दुल्हिन अपने गहनों से अपना सिंगार करती है। (यशायाह 61:10)

 

इस मनुष्य के उचित वस्त्र होना इस बात को दर्शाता है कि उसने जानबूझकर उसके लिए राजा के प्रावधान को अस्वीकार कर दिया है। यह उन लोगों की तुलना से अधिक अपमान है जो शादी में आने से इनकार कर देते हैं। इस व्यक्ति ने राजा के सभी मेहमानों की उपस्थिति में उसका अपमान करने का चुनाव किया है। वह उन लोगों का प्रतीक है, जो परमेश्वर द्वारा दिए धार्मिकता के वस्त्रों के प्रावधान को पहनने से इनकार करते हैं (यशायाह 61:10) दृष्टान्त के का यह भाग उन यहूदियों के विषय में बात करता है जो उसके बोलने के समय मसीह के चारों ओर खड़े रहते थे, विश्वासी होने का ढोंग करते हुए, लेकिन उसके ही शब्दों में उसे फंसाने की कोशिश में लगे हुए (मत्ती 2:15) यह उन लोगों की भी तस्वीर है जो सोचते हैं कि वह विश्वासी हैं; लेकिन, उन्होंने वास्तव में सच्चाई से कभी भी आत्मा द्वारा नए सिरे से जन्म लेते हुए (यहुन्ना 3:3) पुत्र