8. Jesus and the Samaritan Woman

8. यीशु और सामरी स्त्री

शुरुआती प्रश्न: एक ऐसे समय के बारे में बाँटें जब आप किसी अन्य संस्कृति या देश के व्यक्ति से मिले थे आपने क्या फ़र्क देखे?

 

1फिर जब प्रभु को मालूम हुआ, कि फरीसियों ने सुना है, कि यीशु यहुन्ना से अधिक चेले बनाता, और उन्हें बपतिस्मा देता है। 2(यद्यपि यीशु आप नहीं वरन उसके चेले बपतिस्मा देते थे) 3तब यहूदिया को छोड़कर फिर गलील को चला गया। 4और उस को सामरिया से होकर जाना अवश्य था। 5सो वह सूखार नाम सामरिया के एक नगर तक आया, जो उस भूमि के पास है, जिसे याकूब ने अपने पुत्र यूसुफ को दिया था। 6और याकूब का कुआँ भी वहीं था; सो यीशु मार्ग का थका हुआ उस कुँए पर योंही बैठ गया, और यह बात छठे घण्टे के लगभग हुई। 7इतने में एक सामरी स्त्री जल भरने को आई: यीशु ने उस से कहा, मुझे पानी पिला। 8क्योंकि उसके चेले तो नगर में भोजन मोल लेने को गए थे। 9उस सामरी स्त्री ने उस से कहा, तू यहूदी होकर मुझ सामरी स्त्री से पानी क्यों मांगता है? (क्योंकि यहूदी सामरियों के साथ किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखते)10यीशु ने उत्तर दिया, यदि तू परमेश्वर के वरदान (उपहार) को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से माँगती, और वह तुझे जीवन का जल देता। 11स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, तेरे पास जल भरने को तो कुछ है भी नहीं, और कुआँ गहिरा है: तो फिर वह जीवन का जल तेरे पास कहा से आया? 12क्या तू हमारे पिता याकूब से बड़ा है, जिस ने हमें यह कुआँ दिया; और आप ही अपनी सन्तान, और अपने पशुओं समेत उस में से पीया? 13यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि जो कोई यह जल पीएगा वह फिर प्यासा होगा। 14 परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूंगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा: वरन जो जल मैं उसे दूंगा, वह उस में एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा। 15 स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, वह जल मुझे दे ताकि मैं प्यासी न होऊं और न जल भरने को इतनी दूर आऊं। 16यीशु ने उस से कहा, जा, अपने पति को यहाँ बुला ला। 17स्त्री ने उत्तर दिया, कि मैं बिना पति की हूँ: यीशु ने उस से कहा, तू ठीक कहती है कि मैं बिना पति की हूँ। 18क्योंकि तू पाँच पति कर चुकी है, और जिस के पास तू अब है वह भी तेरा पति नहीं; यह तू ने सच कहा है। 19स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, मुझे ज्ञात होता है कि तू भविष्यद्वक्ता है। 20हमारे बाप-दादों ने उसी पहाड़ पर भजन किया: और तुम कहते हो कि वह जगह जहाँ भजन करना चाहिए यरूशलेम में है। 21यीशु ने उस से कहा, हे नारी, मेरी बात की प्रतीति कर कि वह समय आता है कि तुम न तो इस पहाड़ पर पिता का भजन करोगे न यरूशलेम में। 22तुम जिसे नहीं जानते, उसका भजन करते हो; और हम जिसे जानते हैं उसका भजन करते हैं; क्योंकि उद्धार यहूदियों में से है। 23परन्तु वह समय आता है, वरन अब भी है जिसमें सच्चे भक्त पिता का भजन आत्मा और सच्चाई से करेंगे, क्योंकि पिता अपने लिये ऐसे ही भजन करनेवालों को ढूंढ़ता है। 24परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसके भजन करनेवाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें। 25स्त्री ने उस से कहा, मैं जानती हूँ कि मसीह जो ख्रीस्त कहलाता है, आनेवाला है; जब वह आएगा, तो हमें सब बातें बता देगा। 26यीशु ने उस से कहा, मैं जो तुझ से बोल रहा हूँ, वही हूँ।

 

सामरियों और यहूदियों के बीच की दुश्मनी को समझना

 

एक यहूदी और सामरी स्त्री के बीच हुई इस बातचीत से लगभग सात सौ वर्ष पूर्व (723 ईसा पूर्व), उत्तरी इजराइल के 10 गोत्रों को अश्शूर को निर्वासित कर दिया गया था। उस समय से उस क्षेत्र को सामरिया कहा जाने लगा। अश्शूर के राजा ने उस भूमि में पाँच अलग-अलग देशों के लोगों को बसा दिया जो अलग-अलग झूठे देवताओं की आराधना करते थे(2 राजाओं 17:24) उनके झूठे देवताओं की आराधना के कारण, वचन हमें बताता है कि परमेश्वर ने उनके बीच शेरों को भेज उनमें से कुछ लोगों को मार दिया। (2 राजाओं 17:25) अश्शूर के राजा ने इजराइलियों की ओर से उनके पास एक याजक भेजा ताकि वह उन्हें यहोवा की आराधना करना सिखा सके, लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि वहाँ एक झूठा मिश्रित धर्म शुरू हो गया जिसमें वह यहोवा की आराधना तो करते थे, लेकिन अपने मूल स्थान के देवताओं का पूजन भी किया करते थे(2 राजाओं 17:33) उनकी झूठी आराधना गरीज्जीम पर्वत के इर्द-गिर्द केन्द्रित थी जहाँ सामरियों ने एक मंदिर बनाया था; याकूब के कुँए के काफी निकट, जहाँ अब यीशु बैठा विश्राम कर रहा था। 129 ईसा पूर्व में, यहूदी सेनाध्यक्ष, जॉन हिर्कैनस ने सामरिया पर चढ़ाई की अगवाई कर गरीज्जीम पर्वत पर स्थित सामरी मंदिर का विनाश कर दिया था। यहूदी लोग सामरियों को उनके सच्चे यहूदी धर्म के भ्रष्ट करने के कारण से उन्हें अन्य जातियों (ग़ैर-यहूदी) से भी बदत्तर मानते थे। अगर एक यहूदी व्यक्ति को येरुशालेम में किसी भोज में शामिल होने की यात्रा में उत्तरी इजराइल के गलील और नाज़रथ के क्षेत्र से जाना पड़ता था, तो आम तौर पर वह सामरिया और सामरियों से पूरी तरह बचते हुए, नीचे यर्दन घाटी से होते मृत सागर के उत्तर में यहिरो के समीप यरूशलेम पहुँचते। इसका अर्थ दो या तीन दिन की अतिरिक्त यात्रा था। अगर एक व्यक्ति बजाय घूमकर आने वाला रास्ता लिए सीधे यरूशलेम से नाज़रथ चले, तो यह लगभग पचहत्तर मील था, और वर्ष के समय के अनुसार यहाँ काफी ठण्ड भी हो सकती थी, सूखार इजराइल के पहाड़ी क्षेत्र में था नाज़रथ अगर आप उस इलाके का नक्षा देखना चाहते हैं तो नीचे क्लिक करें:

 

http://bibleatlas.org/full/road_to_jerusalem.htm

 

अगर एक यहूदी व्यक्ति उत्तरी दिशा से सामरिया से होता हुआ यरूशलेम यात्रा कर रहा होता, तो अक्सर उनके वहाँ रुकने के लिए स्वागत नहीं किया जाता था (लूका 9:53); सामरियों की यहूदियों के प्रति और यहूदियों की सामरियों के प्रति ऐसी नफरत थी जिस समय यीशु उस कुँए पर बैठा, यह शत्रुता चार सौ वर्ष से ज्यादा की थी

 

आप क्या सोचते हैं कि जब यहुन्ना यह लिखता है कि उस को सामरिया से होकर जाना अवश्य था तो उसका क्या मतलब था?

 

यीशु को घूमकर यर्दन घाटी के बजाए सामरिया से होकर जाना अवश्य था। कुछ लोग कहेंगे कि यीशु उस मार्ग से जाकर समय बचाना चाहता था, लेकिन इस बात से कि जब सामरी स्त्री गाँव में जाकर लोगों को बताती है, यीशु उनके साथ दो दिन और ठहरा, यह स्पष्ट है कि यीशु के दिमाग में पहले से और कोई और व्यस्तता नहीं थी(पद 40) उसके सामरिया से होकर जाने का कारण इस सामरी स्त्री की और उन सभी लोगों की जिन्हे वह उद्धारकर्ता के पास लेकर आई, ज़रूरतें पूरी करना था। भले ही उन्होंने क्या पाप किया हो, भले ही उनकी जीवनशैली कैसी ही हो, यीशु के पास लोगों के लिए हमेशा समय था, वह उन तक पहुँचता था।

 

यीशु प्रचारक

 

विद्वानों ने सूखार की पहचान इबाल पर्वत की दक्षिणी-पूर्वी ढाल पर शेचेम और अस्कर कहलाए जाने वाले छोटे गाँव के साथ की है। शेचेम का स्थान, अस्कर का गाँव, और यह कुआं जहाँ यीशु सामरी स्त्री तक पहुँचा एक त्रिकोण बनाते हैं जिसके हर बाजू लगभग आधा मील लम्बे है। हमें बताया गया है कि जब यीशु कुँए पर विश्राम कर रहा था तब चेले एकसाथ नगर में भोजन लेने गए थे। हमें अचरज होता है कि कुछ चेले यीशु के साथ क्यूँ नहीं रुके; निश्चित ही यह पतरस, याकूब या यहुन्ना, उसके प्रिय चेलों के साथ अकेले में कुछ बढ़िया समय बिताने का उच्चतम अवसर था? ऐसा लगता है कि यीशु को तो पता ही था कि सामरी स्त्री कुँए की ओर आने के लिए मार्ग में है, शायद जब वह चलकर नगर में आधा मील जा रहे होंगे, चेले और सामरी स्त्री एक दूसरे के पास से गुज़रे होंगे। क्या उसने सभी चेलों को नगर में इसलिए भेजा ताकि वह बिना ध्यान के भटके इस स्त्री से बात कर सके? यह कोई अचानक से पाया अवसर नहीं लगता, लेकिन ऐसा जो कि पहले से ही पिता द्वारा नियुक्त किया गया है कि यह स्त्री उसी समय आएगी जब यीशु कुँए के किनारे बैठेगा। हाँ, यह सम्भावना भी है कि बजाय इस घटना के उन दो दिनों के बाद उस स्त्री के द्वारा बताए जाने के, यहुन्ना भी एक दीवार पर बैठी शांत मक्खी की तरह वहाँ था और इस पूरी घटना का साक्षी बना हो।

 

उन दिनों में, आम तौर पर स्त्रियाँ या तो भोर को या सांझ को पानी भरने जाती थीं। यह ऐसा समय होता जब स्त्रियाँ एक साथ एकत्रित होकर गप-शप करते हुए सूचनाएं बाँटती और एक दूसरे के साथ कुछ समय बितातीं थीं। आप क्या सोचते हैं कि यह स्त्री छठे पहर, मध्य दोपहरी को, दिन के सबसे गर्म समय में जब अधिकतर लोग नींद ले रहे होंगे, पानी भरने क्यूँ आई होगी?

हमारे लिए यह समझना कि उन दिनों मध्य-पूर्व की संस्कृति में स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार होता था, मददगार रहेगा। विलियम बार्क्ले, यहुन्ना की पुस्तक पर अपने व्याख्यात्मक निबंध में हमें बताते हैं:

 

कड़क रब्बी किसी रब्बी को एक स्त्री का सार्वजानिक स्थान में अभिनन्दन करने के लिए वर्जित करते थे। एक रब्बी सार्वजानिक स्थान में शायद अपनी पत्नी या बेटी या बहन तक से बात नहीं करता था। यहाँ तक कि ऐसे फरीसी भी थे जिन्हे “चोट खाए और लहू बहाते फरीसी” कहा जाता था क्योंकि सड़क पर किसी स्त्री को देख वह आँखें बंद कर लेते और इसलिए दीवारों से टकरा या घरों में घुस जाते! किसी रब्बी के सार्वजानिक स्थान में एक स्त्री से बातें करते देखना उसकी साख का अंत था – लेकिन फिर भी यीशु ने इस स्त्री से बात की। न केवल वह एक स्त्री थी, बल्कि एक बदनाम चरित्र की स्त्री थी। रब्बी तो दूर, कोई भला आदमी भी इस स्त्री के साथ बात करता या देखा जाता नहीं होगा – लेकिन फिर भी यीशु ने उससे बात करी।”

 

ध्यान दें कि वह कैसे वार्तालाप की शुरुआत करता है, वह उससे कुछ मदद माँगता है। वह उससे पीने के लिए पानी माँगता है – उसके घड़े से। उस स्त्री के लिए यह बेहद अचंभित करने वाली बात थी। वह केवल उसके वस्त्रों, प्रार्थना के झालर, उसके प्रार्थना के वस्त्र का छोर और उसकी आगे की लटें व्यवस्था के अनुसार न कटी हुई देखते ही बता सकती थी कि वह एक यहूदी व्यक्ति है। (अपने सिर में घेरा रखकर मुंड़ाना, और अपने गाल के बालों को मुंड़ाना (लैव्यव्यस्था 19:27)) न केवल वह सामरी थी, बल्कि एक स्त्री भी, लेकिन फिर भी वह उसके घड़े से पीने को कह रहा था, एक बात जो आम तौर पर किसी यहूदी व्यक्ति के लिए घिनौनी होगी। लेकिन यह यीशु था, और सामान्य सांस्कृतिक रुकावटें उसे परेशान नहीं करती थीं। वह एक स्त्री थी जो ज़रूरत में थी और इसलिए वह उस तक पहुँचा।

 

जब सैंडी, मेरी पत्नी, और मैं जवान थे, हम अपनी कलीसिया में लोगों के ऐसे दलों के रूप में कार्य करते थे जो इंग्लैंड की सड़कों पर जाकर लोगों के साथ आत्मिक बातों के वार्तालाप में उन्हें संलग्न किया करते थे हम लोगों तक पहुँचने के लिए संवाद के अन्य माध्यम जैसे नाटक, तस्वीरों द्वारा प्रचार और कई सैंकड़ों तरीकों का प्रयोग करते थे। इंग्लैंड में ऐसा करना आसान है, क्यूंकि नगर के मध्य क्षेत्र पदयात्रियों के अनुसार रचे जाते हैं, जहाँ कारों को आने की अनुमति नहीं होती। लोग अक्सर नगर के मध्य क्षेत्र में अपना समय बिताते हैं। एक चीज़ जिसका प्रयोग हम करते थे वह था सर्वेक्षण। हम लोगों से पूछते थे कि क्या उनके पास कुछ प्रश्नों की सूची के उत्तर देने के लिए दो या तीन मिनट हैं? अधिकांश अंग्रेज़ लोग व्यावसायिक सर्वेक्षण में मदद करने के आदि होते हैं, तो हम सर्वेक्षण करते थे, जिसमें आत्मिक विषयों पर प्रश्न होते थे, या ऐसे प्रश्न जो मसीह और उसके दावों के विषय में वार्तालाप की ओर ले जा सकते हों। आम तौर पर जब लोगों से किसी विषय में मदद मांगी जाती है तो वह काफी खुले होते हैं। यीशु वार्तालाप का महारथी था और उसे बस पता था कि लोगों की आवश्यकता के स्थान तक कैसे पहुँचा जाए। यीशु ने मदद मांगने के साथ शुरुआत की। उसकी आवश्यकता व्यावहारिक थी; पानी पीने की। सूखार में याकूब का कुआँ सौ फीट से ज्यादा गहरा था और उसके पास न तो बाल्टी, रस्सी या मटका था। उसे उसके घड़े से पीने में ऐतराज़ नहीं था। उसकी इच्छा उसे जीवित जल देने की थी, जो इससे कई अधिक महत्वपूर्ण था। उसके साथ उसके वार्तालाप ने स्त्री की जिज्ञासा को छेड़ उसकी आत्मिक भूख जागृत कर दी।

 

सामरी स्त्री इस बात से पूरी तरह भौंचक्की रह गयी कि यह तीस वर्ष का जवान यहूदी आदमी, पानी मांगते हुए उसके साथ वार्तालाप कर रहा है वह पुरूषों द्वारा सार्वजानिक स्थान पर उससे बात किये जाने की आदि नहीं है, निश्चित ही किसे यहूदी आदमी से तो बिलकुल नहीं। वह तो उसके अपने वहाँ होने की स्वीकृति की अपेक्षा भी नहीं रख रही थी, लेकिन यीशु ने न केवल उससे पानी माँगा, लेकिन उसे जीवित जल देने की पेशकश भी की। वह एक ऐसा कथन कहता है जिससे वह उसको उकसा सके कि वह स्त्री उससे उस जीवन के जल की माँग कर सके। हम यीशु को इस स्त्री को उसका हृदय खोलने वाले वार्तालाप में अगवाई करते देखते हैं। जब आप इसके बारे में सोचेंगे तो यह बहुत असामान्य है। यीशु ने न केवल सांस्कृतिक सीमाएं लांघी, लेकिन उसने लोगों के लिए विवादास्पद मुद्दे उठा कर कदम बढ़ाये। अगर आपने कभी ऐसी कोशिश नहीं करी, तो जान लीजिए यह बहुत लाभप्रद अनुभव हो सकता है। अगर इसे सही मंशा से किया जाए, तो मसीह का प्रेम इसमें से चमकेगा। यीशु इस स्त्री की आँखें परमेश्वर के उपहार के प्रति खोलना चाहता था और उसे यह दिखाना चाहता था कि उसे क्षमा प्राप्त हो सकती है, और उसे अपने प्राण के लिए जीवित जल मिल सकता है। मुझे ऐसे समय याद हैं जब सैंडी और मैं लोगों को वार्तालाप में संलग्न करने की कोशिश कर उनसे यह प्रश्न पूछते थे कि क्या उन्हें कभी परमेश्वर के उपहार के बारे में बताया गया है। यह लोगों को मसीह के दावों के विषय में और चर्चा के लिए खोल देता। यहाँ कुछ प्रश्नों के उदहारण हैं जिन्हे हम अपनी बातचीत के नतीजे के रूप में उत्पन्न होने की आशा करते थे:

 

क्या आप आत्मिक बातों में रूचि रखते हैं?

आप आज मनुष्य की सबसे बड़ी ज़रूरत क्या समझते हैं?

क्या आपको कभी किसी ने परमेश्वर के उपहार के बारे में बताया है?

अगर कोई आपसे पूछे, “एक सच्चा मसीह क्या है?” तो आप क्या उत्तर देंगे?

क्या आपने कभी व्यक्तिगत रूप से यीशु मसीह को पाया है, या आप अभी उस प्रक्रिया में हैं?

क्या आप सोचते हैं कि मरने से पहले यह निश्चित रूप से जानना कि आप स्वर्ग जा रहे हैं, संभव है?

एक दिन जब आप परमेश्वर के सम्मुख खड़े होंगे, तो आप उसे अपने आप को उसके राकी में प्रवेश करने की अनुमति देने के लिए क्या कारण देंगे?

 

लोगों को इस प्रकार के वार्तालाप में संलग्न करने के पीछे आशा यह थी कि एक गहरे स्तर की बातचीत तक पहुँचा जा सके कभी-कभी ऐसा होता, और कभी नहीं भी। लेकिन लोग वहां से जाते वक्त जो कुछ भी सोचते हों, उन लोगों के कारण जो प्रतिक्रिया देते थे यह समय देने योग्य था। अक्सर हमारे पास लोगों के लिए उनकी आवश्यकता में प्रार्थना करने का अवसर मिलता। कुछ के लिए तो यह निश्चित ही एक अलौकिक नियुक्ति होती। आइये इस सामरी स्त्री के साथ यीशु के इस अलौकिक नियुक्ति को गहराई से देखें

 

यीशु ने उससे कहा:

 

यदि तू परमेश्वर के वरदान (उपहार) को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से माँगती, और वह तुझे जीवन का जल देता।(10 पद)

 

एक उपहार क्या है और आप क्या सोचते हैं, परमेश्वर के उपहार से यहाँ क्या अर्थ है? और एक व्यक्ति को इसे प्राप्त करने से पहले परमेश्वर के उपहार को क्यों माँगना है?

 

एक उपहार वो है जिसके दिए जाने के लिए कुछ भी कार्य न किया गया हो। उदहारण के लिए, क्रिसमस के समय एक परिवार की कल्पना करें, वर्ष का वह समय जहाँ पाश्चात्य संसार में आम तौर पर उपहार दिए जाते हैं। उपहार माता-पिता के अनुग्रह के आधार पर दिए जाते हैं न कि इस आधार पर कि बच्चों ने उन्हें हासिल करने के लिए कुछ किया है या नहीं। अगर क्रिसमस से पूर्व की संध्या में कोई बच्चा कितना ही शरारत भरा कार्य करता है, तो माता-पिता का क्रिसमस की सुबह उसे उपहार से वंचित रखना गैर मामूली ही होगा। वचन में परमेश्वर के वरदान (उपहार) के सन्दर्भ में दो बातों का उल्लेख है; अनंत जीवन का वरदान और पवित्र आत्मा का वरदान। फिर आत्मा के वरदान भी हैं, लेकिन वह वरदान (उपहार) है, जब आत्मा को एक व्यक्ति के जीवन में आमंत्रित किया जाता है – अनंत जीवन का वरदान (उपहार)। मूलतः दोनों एक ही हैं। एक के बिना आप दूसरा प्राप्त नहीं कर सकते। अनंत जीवन परमेश्वर के आत्मा द्वारा नए सिरे से जन्म लेने का फल है (यहुन्ना 3:3); यह एक करुणामय प्रेमी परमेश्वर का वरदान (उपहार) है। इस वरदान को अर्जित करने के लिए कुछ नहीं किया जा सकता। यह अर्जित करने के लिए एक व्यक्ति के अपने जीवन द्वारा किये किए किसी भी कार्य से मुक्त है। यह तब दिया जाता है जब कोई क्रूस पर मसीह के संपन्न कार्य पर विश्वास कर उसमें भरोसा रखता है।

 

8क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है9और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे। (इफिसियों 2:8:9)

 

अगर स्वर्ग में अपने भले कार्यों के द्वारा पहुँचा जा सकता तो क्या आप स्वर्ग में चल रही शेखी बघारने वाली बातों की कल्पना कर सकते हैं? अगर परमेश्वर को केवल हमारी अच्छाइयों और गुणों के आधार पर हमारा न्याय करना पड़ता तो हमें कितना भला होना पड़ता? इसके बारे में सोचिए! अगर परमेश्वर लोगों को केवल उनके भले कार्यों के अनुसार पुरस्कृत करता, तो आपको स्वर्ग हासिल कर दण्ड के बजाय अनंत जीवन हासिल करने के लिए कितने भले कार्य करने पड़ते? क्या भले कार्यों का कोई जादुई आंकड़ा है? क्या यह सब एक बराबर हैं? अगर एक व्यक्ति दूसरे से एक भला या दया का कार्य कम करता है, तो क्या ऐसा संभव है कि एक तो स्वर्ग चला जाए और दूसरा पिता द्वारा अनंतकाल के लिए तिरस्कृत कर दिया जाए? यह स्पष्ट है कि यह समझदारी वाली बात नहीं लेकिन, हम इस बात पर भरोसा रख सकते हैं कि पिता हर एक व्यक्ति का हृदय जानता है और उस व्यक्ति की मंशाओं के बारे में सब समझता है। वह सटीकता से जानता है कि इस जीवन में उन्हें क्या दिया गया है। यह तभी समझा जा सकता है जब परमेश्वर अपने सिद्ध पुत्र के द्वारा उपलब्ध अनंत जीवन के वरदान के प्रति प्रतिउत्तर के आधार पर लोगों का न्याय करे। हम कभी सिद्धता नहीं प्राप्त कर सकते, लेकिन यीशु सिद्ध है, और उसने हमारे स्थान पर अपना जीवन दिया है।

 

मैंने एक बार एक व्यक्ति से मसीही होने के विषय में बात की थी और उसने मुझे बताया था कि वह मृत्यु के बाद अपने स्वर्ग जाने के विषय में निश्चिंत है क्योंकि उसने क्षतिग्रस्त हवाई जहाज़ के मलबे से दो आदमियों को खींच के निकला था। परमेश्वर तो उसके अपने जीवन को जोखिम में डाल औरों को बचाने में उसकी बहादुरी के कारण निश्चित ही उसकी गैर-ईश्वरीय जीवनशैली को सही करार देगा। मैंने उसे यह समझाने की कोशिश करी कि उद्धार एक उपहार है जिसे एक व्यक्ति ग्रहण करता है न कि कोई कार्य जिसे एक व्यक्ति स्वर्ग में अनंत जीवन अर्जित करने के लिए करता है, लेकिन उसने इसे इस नज़रिए से नहीं देखा। उसे अपने बहादुरी के कार्यों पर काफी भरोसा था, कि वह उसके प्राण बचाने के लिए काफी होंगे। परमेश्वर का यह वरदान (उपहार); हमारे प्रभु यीशु मसीह द्वारा अनंत जीवन, तब दिया जाता है जब एक व्यक्ति एक पवित्र परमेश्वर के सम्मुख अपने आत्मिक कंगलेपन का सामना कर, फिर से सोच कर, मन फिराता है, या फिर मसीह की ओर फिर कर परमेश्वर को लुभाने वाला जीवन जीता है, न कि स्वयं को:

 

38मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का (वर)दान पाओगे(प्रेरितों 2:38)

 

परमेश्वर का वरदान (उपहार), पवित्र आत्मा, जब वह एक व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करता है, एक नएपन का जीवन लेकर आता हैजबतक हम इस “नए सिरे से जन्म लेने” (यहुन्ना 3:3) का अनुभव नहीं करते, हम आत्मिक रीती से मृत हैं (इफिसियों 2:1,5) और परमश्वर को आत्मिक रूप से जानने में अक्षम हैं। आपके भीतर वास करता परमेश्वर का आत्मा अनन्त जीवन के लिये उमड़ते सोते के रूप में देखा जाता है

 

एक बार फिर कुँए पर स्त्री के साथ यीशु के वार्तालाप को देखें, तो हम पाते हैं कि किस तरह यीशु ने उसके भीतर एक जिज्ञासा जागृत कर दी थी, और यीशु यह कहकर उसकी जिज्ञासा बढ़ा देता है:

 

13यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि जो कोई यह जल पीएगा वह फिर प्यासा होगा। 14 परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूंगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा: वरन जो जल मैं उसे दूंगा, वह उस में एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा। (यहुन्ना 4:13-14)

यीशु का यह कहने का क्या अर्थ था कि जो कोई व्यक्ति उस जल में से पीएगा जो वह उसे देगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा?

 

यीशु आत्मिक भाषा में आत्मा के विषय में बात कर रहा है, लेकिन स्त्री अभी भी सोच रही है कि वह पानी के बारे में बात कर रहा है। वह कहता है कि जो कोई इस जीवित जल को ग्रहण करेगा फिर कभी प्यासा न होगा। पुराने नियम में, कई वचन परमेश्वर के लिए उसी रीते से प्यासा होने के बारे में बात करते हैं जैसे कोई पानी के लिए प्यासा रहता है। (भजन 42:1; यशायाह 55:1; यिर्मियाह 2:13; ज़कर्याह 13:1) वचन में, हमारे शरीर की भूख और प्यास को हमारे आत्मा की भूख और प्यास, परमेश्वर या उन आत्मिक बातों की भूख और प्यास के समानांतर देखा गया है जिसे परमेश्वर हमें अपने साथ पुन: स्थापित करने के लिए देता है। ऐसे समय होते हैं जब एक व्यक्ति को अपने जीवन में “एक खालीपन” का एहसास होता है, लेकिन सटीक रूप से उस बात को पहचान नहीं पाते कि क्या बात उन्हें खोखला सा महसूस करा रही है। कई वर्ष पूर्व, इंग्लैंड के राजकुमार चार्ल्स ने अपनी इस धारणा के बारे में बात की थी कि विज्ञान की सभी प्रगतियों के बावजूद, “हमारे प्राण (अगर मैं इस शब्द को प्रयोग करने की जुर्रत करूँ) की गहराईयों में फिर भी एक निरंतर, अनजानी सी व्याकुलता रहती है कि कुछ कमी है, कुछ ऐसा जो जीवन को जीने योग्य बनाती है” बाइबिल इस एक निरंतर, अनजानी सी व्याकुलता को प्राण की प्यास बताती है यह एक ऐसी अंदरूनी लालसा है जो एक व्यक्ति की समझ से परे है। परमेश्वर ने हमें “गहनता” से अपने साथ सम्बन्ध के लिए रचा है, और जबतक पाप से मनफिराने के द्वारा, और मसीह को ग्रहण करने के द्वारा हमारा उसके साथ मेल नहीं हो जाता, हमारे भीतर किसी बात की यह लालसा बरकरार रहते हुए अतृप्त रहेगी। हम इस खालीपन को शारीरिक सम्बन्ध, मादक पदार्थों, मौज-मस्ती, गाड़ियों, बंगलों, नौकरियों और कई अन्य बातों से भरने की कोशिश करते हैं, लेकिन परमेश्वर के अलावा, कुछ भी हमारी प्यास को तृप्त नहीं करता।

 

बीते समय में आपने अपने जीवन को ऐसी कौन सी बातों से भरने की कोशिश की है जो खोखली साबित हुईं?

 

आगे जाकर, मण्डपों के पर्व के दौरान, पर्व के अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन, पूरा राष्ट्र उस समय को याद करेगा जब मूसा ने मिस्र से निकलने के बाद, मरुस्थल में सूखे और बंजर इजराइल के लिए पत्थर से पानी निकाला था(निर्गमन 17:6) वह भाविश्य्द्वानी के ऐसे समय की ओर भी देखते थे जिसके बारे में यहेजकेल नबी ने लिखा था (यहेजकेल 47:1-12), जब धरती की गोद से जीवन देने वाला सोता निकलेगा, यरूशलेम से मृत सागर तक, जो कि इस सोते के कारण जीवन से फलने फूलने लगेगा रब्बियों की प्रथा के अनुसार, इजराइल धरती का मध्य था, और यरूशलेम इजराइल का मध्य, जहाँ मंदिर यरुशलेम का मध्य था। महायाजक, हजारों लोगों के सामने, सिलोम के तालब पे एक प्याला ले जाकर उसमें पानी भरता था। वर्ष में एक बार, इस पर्व के दौरान, महायाजक इस पानी को वेदी के पश्चिमी भाग से एक कुप्पी द्वारा भूमि में छोड़ता था, इस अपेक्षा से कि यह महान सोता यरूशलेम में मंदिर की नीव के नीचे से शुरू होते हुए बहेगा। यह इसी क्षण में था कि यीशु ने मंदिर के आँगन में हजारों के बीच खड़ा होने का चुनाव किया, और ऊँची आवाज़ में चिल्ला कर कहा:

 

37......यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए। 38जो मुझ पर विश्वास करेगा, जैसा पवित्र शास्त्र में आया है उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेगी। 39उस ने यह वचन उस आत्मा के विषय में कहा, जिसे उस पर विश्वास करनेवाले पाने पर थे; क्योंकि आत्मा अब तक न उतरा था। (यहुन्ना 7:37-39)

 

यीशु कह रहा था कि वो यहेजकेल के खंड की भाविश्य्द्वानी की पूर्ति है। कि जब लोग उसके पास आ परमेश्वर के आत्मा दिए जाने वाले जीवन के जल से पियेंगे, वह अपने हृदय की गहराईयों से अंदरूनी जीवन को प्रवाहित होते अनुभव करेंगे, उनके मंदिर रुपी शरीर के मध्य से। (1 कुरिन्थियों 6:19) एकमात्र चीज़ जिसकी माँग परमेश्वर हमसे करता है वह यह है कि हम उसके लिए प्यासे हों और पीने के लिए उसके पास आएं

 

सामरी स्त्री का रूपांतरण

 

जब स्त्री ने उत्तर दिया कि उसे यह जीवित जल चाहिए तो यीशु ने उस से कहा,जा, अपने पति को यहाँ बुला ला।” (पद 16 )

 

यीशु ने उसे अपने पति को बुलाने के लिए क्यों कहा? उसने उसे सीधे वह जल क्यों नहीं दे दिया जिसके बारे में उसने बात की थी?

 

स्त्री इस जीवन देने वाले जल से पीना चाहती थी, लेकिन उस जीवन से पीने के लिए जिसे यीशु उसे पेश कर रहा था; उसके पाप का मुद्दा भुलाया नहीं जा सकता। यह जानते हुए भी कि उसका कोई पति नहीं है, यीशु ने उसे अपने पति को बुलाने के लिए कहा जबतक एक व्यक्ति अपने पाप का सामना कर मसीह की ओर देखने के द्वारा अपने पाप से मुँह नहीं फेर लेता, वह मसीह में नए जीवन को अनुभव करने में प्रवेश नहीं कर सकता। यीशु ने कहा कि किसी भी व्यक्ति के दो स्वामी नहीं हो सकते (मत्ती 6:24), यह तो वही तरीका था जिसके द्वारा सामरी धर्म का जन्म हुआ, जिसमें वह यहोवा की आराधना तो करते थे, लेकिन अपने मूल स्थान के देवताओं का पूजन भी किया करते थे(2 राजाओं 17:33) हम में से हर एक को अपने पाप का अंगीकार कर उसे उसी नज़रिए से देखना होगा जैसे परमेश्वर उसे देखता है, उसपर विजय प्राप्त करने की सामर्थ के लिए यीशु पर निर्भर होते हुए। जब आप अपने पाप का अंगीकार करते हैं – वह आपको क्षमा कर आपको पवित्र बनाएगा:

 

जब मैं ने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया और अपना अधर्म न छिपाया, और कहा, मैं यहोवा के सामने अपने अपराधों को मान लूंगा; तब तू ने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया। (भजन 32:5)

 

तब प्रभु ने सामरी स्त्री को दिखाना शुरू किया कि वह कौन था, इजराइल का मसीहा उसने उसे उसके जीवन के बारे में ऐसी बातें बताईं जो केवल परमेश्वर जान सकता था। यहुन्ना केवल एक का वर्णन करता है, यह तथ्य कि पहले उसके पाँच पति रह चुके हैं और वह अब जिस पुरुष के साथ रह रही है वह उसका पति नहीं है। सच्चाई तो यह है, हमें आगे जाकर बताया जाता है कि वह स्त्री नगरवासियों के पास जाकर कहती है: “देखो, एक ऐसा व्यक्ति जिसने सब कुछ जो मैं ने किया है, मुझे बता दिया”। हमें पूरी कहानी नहीं पता; हमें तो बस हमारे लिए प्रेरित यहुन्ना द्वारा लिखी गई यह झलकी ही मिली है। इस वार्तालाप में ऐसी कई बातें होंगी जो हमारे लिए लिखी नहीं गई। हम तो यह जानते हैं कि यीशु ने उसके बीते हुए पाप के जीवन के बारे में बात की, लेकिन इसके बावजूद भी उसे प्रेम किया और अनंत जीवन के वरदान (उपहार) का प्रस्ताव दिया

 

रूपांतरित जीवन का प्रमाण

 

उसके प्राण में अब क्या आनंद भर गया! वह अपने आप में फूली न समाई और अपने पानी के घड़े को भूल (पद 28) नगर की ओर दौड़ गई। हम तुरंत बदले हृदय का प्रमाण देखते हैं क्योंकि उसके विचार औरों के लिए थे। उसने रत्ती भर भी इस बात की चिंता नहीं की कि किस तरह से नगरवासियों ने उसे उसकी अनैतिकता के लिए अपने से दूर कर दिया। उसे उन्हें उसके बारे में बताना था। अगर औरों के लिए कोई चिंता नहीं है, तो हमें प्रश्न उठाना होगा कि क्या वाकई मसीह उस व्यक्ति के जीवन का केंद्र बन गया है। उसने उन्हें यीशु के पास आने के लिए बुलाया। उसकी कठोरता छू हो गयी, उसका पाप क्षमा हुआ, और वह ग्लानी और शर्मिंदगी से मुक्त हो एक घर से दूसरे, सबको कुँए पर यीशु से मिलने आने के लिए बुलाने लगी यह स्त्री अब आत्मा से भरी हुई थी! वह अपने आप में फूली न समा सकी। उसके परमेश्वर के पुत्र के साथ एक सामने ने और उसके प्रेम के अनुभव ने उसके जीवन को एक झटके में बदल दिया। उसकी शीघ्रतम इच्छा यही थी कि और लोगों का भी उससे सामना हो जिसने “सब कुछ जो उसने किया है उसे बता दिया” “क्या यह मसीह हो सकता है?” उसने उत्साह से कहा। वह आत्मा द्वारा इतनी ज्वलंत हो गई कि उसके जज़्बे और नए जीवन ने तुरंत नगर के कई सामरियों का ध्यान खींचा, और वह इस यहूदी रब्बी से मिलने आए। आगे जाकर वह इस बात की गवाही देते हैं कि शुरुआत में उन्होंने केवल उसके बदले जीवन और गवाही के बल पर ही उसपर विश्वास किया, जब उन्होंने कहा, अब हम तेरे कहने ही से विश्वास नहीं करते; क्योंकि हम ने आप ही सुन लिया, और जानते हैं कि यही सचमुच में जगत का उद्धारकर्ता है। (पद 42) किस तरह मसीह ने आपके प्राण में आ आपके जीवन को बदला, इस बात की अपनी सरल कहानी की समर्थ को कभी कम न आंकिये हमारे आस पास कई नए जीवन के लिए प्यासे हैं और उन्हें केवल किसी के यह बताने की आवश्यकता है कि वह भी मसीह के द्वारा अनंत जीवन के इस वरदान (उपहार) का अनुभव कर सकते हैं

 

कौन है जिसकी मसीह के लिए अवश्यकता के विषय में आप प्रार्थना कर सकते हैं? आप अपनी कहानी किसे बता सकते हैं?

 

शायद आप आज शाम का समय अपने मित्रों या सम्बन्धियों में लोगों के लिए प्रार्थना पर समाप्त कर सकते हैं, कि वह मसीह द्वारा अपने जीवन को बदलने की आपकी कहानी के लिए खुले हों

 

प्रार्थना: “परमेश्वर पिता, मेरे आस-पास उन लोगों के लिए जो आत्मिक रीती से भूखे हैं मेरी आँखें खोलिए। उनकी आत्मिक भूख को उजागर करने के लिए मुझे सही शब्द दें। पिता, मुझे उन्हें तेरे निकट लाने में प्रयोग कर। मुझे औरों की ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील होना सिखा और मुझे दिखा कि कैसे मैं तेरे प्रेम के बारे में दूसरों को बता सकता हूँ। मेरे द्वारा औरों तक पहुँच। अमिन।

 

कीथ थॉमस

नि:शुल्क बाइबिल अध्यन के लिए वेबसाइट: www.groupbiblestudy.com

-मेल: keiththomas7@gmail.com