5. You Must Be Born Again!

5. तुम्हें नए सिरे से जन्म लेने की आवश्यकता है

हम में से कई इस कथन से वाकिफ हैं: “तुम्हें नए सिरे से जन्म लेने की आवश्यकता है!” यह वचन का बहुत अच्छे से जाना जाने वाला पद है जो मसीही समुदाय के कुछ वर्गों के लिए तकियाकलाम है, खास तौर पर पश्चिमी संसार में। इसीलिए, इस कथन “नए सिरे से जन्म लेने” को मसीही होने के एक विशेष वर्ग के साथ जोड़कर देखना आसान है। लेकिन, हमें इस बात को नहीं भूलना है कि वह यीशु था जिसने इस मनोहर कथन को कहा, और सबसे महत्वपूर्ण कि यह कथन “तुम्हें नए सिरे से जन्म लेने की आवश्यकता है, सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न के उत्तर में यीशु ने दिया। संषेप में प्रश्न यह है; “मैं अनंत जीवन पाने के लिए क्या करूँ?” हम इस प्रश्न में, और इसके उत्तर में, सुसमाचार का निचोड़ पाते हैं। उस समय जीवित होना जब यीशु हमारे बीच में शिक्षा देता और चलता-फिरता था अद्भुत रहा होगा। उसकी सेवकाई की शुरुआत होने के बाद से, जब लोगों ने उसकी शिक्षा और चंगाई के कार्यों की कहानियाँ सुनीं, यीशु ने वह जहाँ भी गया वहाँ निरंतर भीड़ को आकर्षित किया। अक्सर उसकी कहानियाँ या सन्देश सुनने वालों के लिए एक प्रश्न खड़ा कर देते, या फिर उनसे प्रतिउत्तर की माँग करते। कई यीशु को सुन निर्णय लेने की आवश्यकता के कारण वहाँ से चले जाते।

 

उसके उपदेश “सुनने में आसान” किस्म के नहीं कहे जा सकते। मुझे संदेह है कि अगर उसके कुछ उग्र सुधारवादी कथनों को आज के सन्दर्भ में कहा जाए, तो वह आज की ज़्यादातर कलीसियाओं में अच्छे से ग्रहण नहीं होंगे। वचनों से स्पष्ट है कि अक्सर यीशु की शिक्षा के प्रति लोगों की असामान्य प्रतिक्रिया रहती थीउसके शब्द अन्य धार्मिक अग्वों, गुरुओं और फरीसियों जैसे नहीं होते थे। जो जन उसे सुनते थे उन्हें ऐसा लगता था कि वह अन्य लोगों से भिन्न है। वह एक ऐसे अधिकार के साथ शिक्षा देता था जो सच सुनाई देता था। कई आम लोग यीशु के साथ होने की चाह रखते थे। उसके आस-पास रहते हुए उसके पीछे चलना सुरक्षित था, क्योंकि इसमें खोने के लिए कुछ नहीं था। अन्य, जो उस समय के धार्मिक अग्वे थे, उन्हें यीशु के साथ सावधानी बरतनी पड़ती। शायद वह उसके सन्देश से लुभान्वित होते थे, लेकिन जीवन में अपने पड़ाव के कारण दूरी बनाए रखते। उन्हें पता था कि यीशु के पीछे चलने या उसकी शिक्षा को मंजूरी देने का मतलब होगा अपनी प्रतिष्ठा को जोखिम में डालना। वह ऐसे व्यक्ति के रूप में देखे जाने का जोखिम उठाते जो एक धर्म के विरोधी के साथ मिले हुए थे, एक षड्यंत्र करने वाले या यहाँ तक कि कट्टर धार्मिक जन के साथ, क्योंकि कुछ धार्मिक प्रतिष्ठानों में उसे इसी नज़र से देखा जाता था। वह उस समय और आज भी एक विवादास्पद व्यक्ति था।

 

और लोग उसके उपदेश से चकित हुए; क्योंकि वह उन्हें शास्त्रियों की नाईं नहीं, परन्तु अधिकारी की नाई उपदेश देता था। (मरकुस 1:22)


जो प्रश्न उन सब लोगों के मन में आता होगा जब उनका आमना-सामना इस अद्भुत व्यक्ति यीशु से होता होगा, यह होगा, “यह कौन है” और “इसे यह अधिकार कहाँ से मिलता है?”
अगर उसके शब्दों को सुनने के बाद, एक व्यक्ति अपने हृदय में इस निष्कर्ष तक पहुँचता है कि यह आदमी वाकई मसीह है, फिर अगला लाज़मी प्रश्न जो इस सत्य से खड़ा होता है कि, “मेरा प्रतिउत्तर क्या होना चाहिए?”

 

इस अध्यन में हम दो अलग शताब्दियों से दो ऐसे आदमियों पर केन्द्रित होंगे जिनकी खोज एक ही थी। यह दोने ऐसे पुरुष थे जिनके पालन-पोषण और धार्मिक पृष्ठभूमि ने उन्हें बहुत आदर किये जाने वाले सहकर्मियों के समूह में ला दिया था; एक ऐसा समूह जिसे अपने समय में बुद्धिमान और जज़्बा रखने वाले धार्मिक लोगों में माना जाता होगा। यह दोनों ऐसे पुरुष थे जिनसे और लोग आत्मिक निर्देश और मार्गदर्शन की अपेक्षा करते थे। हालाँकि इन दोनों पुरुषों के अपनी आत्मिक यात्रा और अनंत नियति के बारे में अपने भी प्रश्न थे। इनमें से एक जॉन वेस्ली थे और दूसरे नीकुदेमुस थे। आइये देखते हैं कि कैसे इनकी कहानियाँ एक जैसी हैं और यह दोनों किसकी खोज में थे।

 

दो धार्मिक पुरुष

 

जॉन वेस्ली, मेथोडिस्ट मूलवर्ग की कलीसियाओं के संस्थापक, का जन्म 1703 में हुआ था। वह अपने पिता के, जो एप्वोर्थ के प्रचारक थे, पन्द्रहवें बच्चे थे। पाँच वर्ष की कोमल उम्र में, जॉन का मृत्यु से अत्यंत निकट का अनुभव तब हुआ जब उस भवन में जहाँ वह रहते थे आग लग गयी। उन्हें एक ऐसे समूह के लोगों के द्वारा बचाया गया जिन्होंने एक के उपर एक खड़े हो, उन तक पहुँचने के लिए एक मानवीय सीढ़ी बना उन्हें वहाँ से खींचा गया। वह उन्हें छत के गिरने से बिलकुल पहले ही बचाने में कामयाब हुए। इस बचाव का उन्हे मन पर गहरा असर पड़ा, और जॉन अपने आप को सौभाग्यशाली रूप से अलग किया हुआ मानने लगे, “आग के चंगुल से बचाए” एक व्यक्ति के जैसे। वह इस गहरे अंदरूनी एहसास के साथ बड़े हुए कि उन्हें एक उद्देश्य के लिए बचाया गया है।

 

18 वर्ष की उम्र में वह इंग्लैंड में ऑक्सफ़ोर्ड कॉलेज गए, और उन्होंने अपने भाई चार्ल्स के साथ मिल मिलकर ऑक्सफ़ोर्ड पवित्र क्लब की शुरुआत की, धार्मिक जज़्बा रखने वाले ऐसे लोगों का समूह जो उपवास, वचन के अध्यन, कैदियों से मिलने जाने और गरीबों को देने के एकदम कठोर, व्यवस्थित जीवनशैली जीते थे (यही कारण था कि उन्हें मेथोडिस्ट कहा गया) सच कहें तो वह परमेश्वर और अपने सह मानव के प्रति बलिदान के कर्तव्य का जीवन जीने का ऐसा इरादा रखते थे कि उन्होंने अपने स्वास्थ्य और आहार की उपेक्षा की। आत्मिकता की उनकी खोज में उनकी सेहत बिगड़ती गयी, लेकिन फिर भी उन्हें एक अंदरूनी खालीपन महसूस होता। जबकि वो अपने जीवन में बहुत अच्छे कार्य कर रहे थे, वह अपने भीतर इस बात से अवगत थे कि वह परमेश्वर के साथ उस आनंद या शांति को अनुभव नहीं कर रहे थे जिसकी खोज में वो थे। वह परमेश्वर की कृपा पाने के अपने कठिन प्रयासों के फल पर प्रश्न खड़ा करने लगे। वह इस भावना से पीछा नहीं छुड़ा पाए कि कुछ ज्यादा होना चाहिए, जैसे कि उनके लिए कहीं कुछ कमी थी।

 

उन्होंने अमेरिका की यात्रा करने का निर्णय लिया, और जाने से पूर्व लिखा: “मेरी मुख्य मंशा अपने प्राण के उद्धार पा लेने की आशा है। मैं आशा करता हूँ कि अन्य जातियों को मसीह के सुसमाचार प्रचार करने के द्वारा उसके सच्चे मतलब को सीख लूँ।” जब वह अपनी यात्रा में अटलांटिक महासागर पार कर रहे थे, तो उनका पानी का जहाज़ तूफ़ान में फंस गया जिसने उन्हें अपने जीवन और अनंत नियति के विषय में भय में डाल दिया। परमेश्वर ने अपनी पूर्ति के रूप में कई मोरेवियन लोगों को, मसीह लोगों का ऐसा समूह जो प्रार्थना और सुसमाचार प्रचार के लिए समर्पित हैं, जॉर्जिया में अमरीकी मूल निवासी लोगों के साथ सेवकाई के लिए उसी जहाज़ में भेजा। उस तूफ़ान के दौरान जॉन वेस्ली ने गौर किया कि यह लोग आनंदित थे और स्तुति के गीत गा रहे थे, जबकि वह इस बात से खौफ में थे कि तूफ़ान में जहाज़ डूब जाएगा और वह अपना जीवन खो देंगे। वेस्ली ने अपनी अमेरिका में सेवकाई की यात्रा को एक बुरी विफलता बताया। “मैं अमेरिका वहाँ के मूल निवासियों का मन परिवर्तन करने गया था” उन्होंने बाद में लिखा, “लेकिन हाय! मेरा मन परिवर्तन कौन करेगा?” उन्होंने मोरेवियन लोगों के साथ अपने सम्बन्ध जारी रखे और उन्होंने उन्हें सिखाया कि परमेश्वर की धार्मिकता एक विश्वासी पर रोपित की जाती है न कि धार्मिक कार्यों और प्रयासों द्वारा अर्जित की जाती। उद्धार एक उपहार के रूप में है कार्यों के द्वारा नहीं। उनका जीवन बदल गया, जबकि, कुछ ही समय बाद लंदन में एक मोरेवियन सभा के दौरान; उनके हृदय में “अजीब सी गर्माहट” महसूस हुईउनके भीतर कुछ बदल गया था। उनका जीवन जागृत हो गया और जब उन्होंने कार्यों के बजाय विश्वास द्वारा धर्मी ठहराए जाने के सिद्धांत का प्रचार करना शुरू किया तो वह अपने कार्यों का फल देखने लगे।

 

आप अपने जीवन से ऐसे एक समय के बारे में बाँटें जब आपको भीतर से किसी बात के बारे में यकीन था, आपको बस किसी तरह से यह पता था लेकिन इसे साबित करने के लिए कोई बाहरी प्रमाण नहीं था

 

आइये अब अपना ध्यान एक दूसरे धर्मिक व्यक्ति पर लगाते हैं, नीकुदेमुस नामक एक फरीसी:

 

1फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। 2उस ने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की आरे से गुरू हो कर आया है; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ हो, तो नहीं दिखा सकता।3यीशु ने उस को उत्तर दिया कि मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से जन्में तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता। 4नीकुदेमुस ने उस से कहा, मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो क्योंकर जन्म ले सकता है? 5यीशु ने उत्तर दिया कि मैं तुझ से सच सच कहता हूँ; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। 6क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है। 7अचम्भा कर, कि मैं ने तुझ से कहा कि तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है’। 8हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।” 9नीकुदेमुस ने उस को उत्तर दिया कि ये बातें कैसे हो सकती हैं? 10यह सुनकर यीशु ने उस से कहा तू इस्त्राएलियों का गुरू हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता। 11मैं तुझ से सच सच कहता हूँ कि हम जो जानते हैं, वह कहते हैं, और जिसे हम ने देखा है उस की गवाही देते हैं, और तुम हमारी गवाही ग्रहण नहीं करते। 12जब मैं ने तुम से पृथ्वी की बातें कहीं, और तुम प्रतीति नहीं करते, तो यदि मैं तुम से स्वर्ग की बातें कहूँ, तो फिर क्योंकर प्रतीति करोगे? (यहुन्ना 3:1-12)

 

हमें वचन के इस खंड से नीकुदेमुस के बारे में तीन बातें बताई गयीं हैं जो हमें इस बात का संकेत देती हैं कि वह कहाँ से आ रहा है

 

1) वह एक फरीसी था (पद 1) फरीसी एक समय पर ज़्यादा से ज़्यादा 6000 गहरे धार्मिक व्यक्तियों का समूह था जो शास्त्रियों और शिक्षकों द्वारा समझी इजराइल की व्यवस्था के हर एक पहलु को पूर्ण रूप से पालन करने के प्रति समर्पित थेफरीसियों के लिए, केवल मूसा द्वारा बाइबिल की पहली पाँच पुस्तकों में दी गयी आज्ञाओं का पालन करना काफी नहीं था। उन्हें हर आज्ञा स्पष्ट रूप से परिभाषित और नियम के रूप में चाहिए थी; उदहारण के लिए, वह जानना चाहते थे कि सब्त के दिन काम न करने का अर्थ क्या था। क्या कोई सब्त के दिन पैदल घूमने जा सकता था? क्या इसे काम गिना जायेगा? कोई कितनी दूर घूमने जा सकता था? ऐसी किसी पैदल यात्रा पर एक व्यक्ति अपने साथ क्या ले जा सकता था? शास्त्रियों ने ऐसे ही नियम और कानूनों को समझाने के लिए तल्मुद नामक 63 संस्करणों का आलेख लिख दिया था जिन्हे इजराइलियों को मानना था शास्त्रियों द्वारा परिभाषित एक सब्त दिन की यात्रा 2000 कबित की होती थी (एक हज़ार गज़), लेकिन अगर एक गली के अंत में एक रस्सी को बांध दिया जाए, तो पूरी गली एक ही हो जाती थी और एक व्यक्ति उस गली से आगे और एक हज़ार गज़ जा सकता था। यह नियम इतने विस्तृत और कठोर बन गए थे। इस तरह के छोटे-छोटे नियमों के 63 संस्करण थे।

2) न केवल नीकुदेमुस एक फरीसी था, लेकिन वह यहूदी महासभा, सैनहेड्रिन के सत्तर सदस्यों में से एक था। महासभा यहूदियों की ताकतवर उच्चतम न्यायालय के समान थी, जिसका संसार के हर एक यहूदी व्यक्ति पर अधिकार था।

3) यीशु जानता था कि वह कौन था, उस ने कहा वह इजराइल का गुरु था(पद 10) यीशु जानता था कि वो कौन था, जैसे कि हर एक यहूदी व्यक्ति जानता होगानीकुदेमुस को इजराइल के गुरु होने का उल्लेख करने वाले इस वाक्य का यूनानी भाषा में स्पष्ट रूप से यह निश्चित संकेत है कि नीकुदेमुस इजराइल राष्ट्र का मुख्य शिक्षक था यह काफी संभव है कि कई शास्त्री धर्मी फरीसी होने के लिए माने जाने वाले इन छोटे-छोटे नियमों के बारे में उत्तर लिए उसकी ओर देखते हों

 

नीकुदेमुस जैसा व्यक्ति यीशु के पास रात में क्यों आयेगा, और आप क्या सोचते हैं कि उसके मन में ऐसे क्या प्रश्न होंगे जिन्हें वो पूछ न सका होगा?

 

हम मान सकते हैं कि नीकुदेमुस के साथ अकेले में यह मुलाकात येरूशलेम में हुई, क्यूंकि इससे पहले के खंड में हमें बताया गया है कि यीशु फसह के पर्व में शामिल था, और कि वहाँ कई लोगों ने उसके द्वारा किये जा रहे आश्चर्य-कर्म देख अपना भरोसा उसमें रख दिया(यहुन्ना 2:23). यीशु ने स्वयं कहा कि वह अक्सर येरूशलेम के मंदिर के दरबारों में शिक्षा देता था (यहुन्ना 18:20), तो यह मानना तार्किक है कि नीकुदेमुस भी इन्हीं उल्लेखित चिन्हों और आश्चर्य-कर्मों को देख रहा होगा। वह रात को क्यों आया? शायद यह इसलिए था कि उसने देखा होगा कि दिन के समय यीशु लोगों के प्रति कितना सजग रहता है, और वह यीशु के साथ उसके सामान्य सेवकाई के समय से अलग कुछ अच्छा समय बिताना चाहता था। यह भी संभव है कि दिन के समय नीकुदेमुस जैसे व्यक्ति की कई ज़िम्मेदारियाँ होंगी और उसके प्राण के इन चुभने वाले प्रश्नों के उत्तर ढूँढने के लिए उसके पास दिन में कम ही समय रहता होगा। तो इसलिए, जब उसका काम का समय ख़त्म हो गया, उसने यीशु को खोजा?तीसरी संभावना यह हो सकती है कि नीकुदेमुस अन्य यहूदी प्राचीन अग्वों की ओर से अपने ऊपर विरोध या ठट्ठा नहीं चाहता था। वह रात में इसलिए आया ताकि दिन में महायाजक के उन धार्मिक भेदियों द्वारा उसे न देखा जाए जो दिनभर यीशु के हर कार्य पर नज़र रखे रहते थे। नीकुदेमुस महायाजक और महासभा में अन्य लोगों की ईर्ष्या और शत्रुता से वाकिफ था। आगे जा कर, जब नीकुदेमुस ने अपने आप को एक विश्वासी न होकर अन्य फरीसियों में शामिल पाया, तब उसने यहूदियों की सभा के सामने यीशु का बचाव करने की कोशिश की, लेकिन सभा में औरों ने जो यीशु से घृणा करते थे, उसे चुप करा दिया

 

50नीकुदेमुस ने, जो पहिले उसके पास आया था और उन में से एक था, उन से कहा, 51क्या हमारी व्यवस्था किसी व्यक्ति को जब तक पहिले उस की सुनकर जान ले, कि वह क्या करता है; दोषी ठहराती है?” 52उन्हों ने उसे उत्तर दिया; “क्या तू भी गलील का है ढूंढ़ और देख, कि गलील से कोई भविष्यद्वक्ता प्रगट नहीं होने का”। (यहुन्ना 7:50-52)

 

क्या आपने मसीह में रूचि होने के कारण औरों से घृणा या शत्रुता अनुभव की है? क्या कहा गया था और आप इस से कैसे निपटे?

 

हमारे प्राणों का शत्रु, शैतान, हमपर प्रभु में अपने विश्वास के बारे में बात करने को लेकर हावी होने की फिराक में रहता है। जब हम उसे छुपाते हैं जिसपर हम विश्वास करते हैं तो इसमें प्राण का एक कंगलापन है जो हमें जकड़ लेता है। बाइबिल कहती है कि धर्मी लोग जवान सिहों के समान निडर रहते हैं (नीतिवचन 28:1) जब अविश्वासियों के बीच मसीह के लिए खड़े होने की बारी आए तो साहसी रहें

 

नीकुदेमुस के रात को आने का जो भी कारण रहा हो, यह स्पष्ट है कि उसके हृदय में कुछ उफन रहा था। उसे इस बात में यकीन था कि यीशु के पास कुछ ऐसा है जो नीकुदेमुस के पास, अपनी सारी जिम्मेदारियों और उपलब्धियों के बाद भी, नहीं था। उसे बिलकुल वह बात कहने का मौका नहीं दिया गया जो उसे लेकर आई थी; बस केवल इतना ही कहने का मौका दिया गया कि वह देख सकते है कि परमेश्वर यीशु के साथ है, और कि उसे यकीन है कि यीशु परमेश्वर द्वारा भेजा गया है (पद 2) यहाँ एक सहज-ज्ञान था, एक भीतरी गवाही, या एक बढती जागरूकता जो नीकुदेमुस के पास मसीह के बारे में, और अपने अपने आत्मिक कंगलेपन के बारे में थी। इस बात को स्वीकारना कि यीशु परमेश्वर द्वारा भेजा गया था नीकुदेमुस के लिए महत्वपूर्ण कदम था, क्योंकि यह उसके सबसे नजदीकी सामाजिक घेरे में लोगों के बीच गरम चर्चा का विषय होगा, और इस परिस्तिथि में यह राय रखना बहुत अलोकप्रिय होगा निश्चित रूप से, जिन आश्चर्य-कर्मों का गवाह वह ठहरा था, उन्होंने उसे यह देखने में मदद की कि मसीह में पहले नज़र में जो दिखता है उसमें कहीं बढकर है। जॉन वेस्ली की तरह, व्यवस्था के पालन और भले कार्य करने की धार्मिकता तो काफी नहीं थी। उसके पास परमेश्वर के साथ सही होने की कोई भीतरी गवाही नहीं थी तो इसीलिए नीकुदेमुस यह जानने के लिए आया कि आखिर क्या कमी है जो वह महसूस करता है। प्रेरित पौलुस, रोम की कलीसिया को लिखते हुए, हमें बताते हैं कि हर व्यक्ति जो मसीही है उसके पास अपने जीवन में इस बात की एक भीतरी गवाही है जो उसे यह बताती है कि वह मसीह के हैं।

 

...15 क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली, कि फिर भयभीत हो परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिस से हम हे अब्बा, “हे पिता” कहकर पुकारते हैं। 16आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं। 17और यदि सन्तान हैं, तो वारिस भी, बरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, जब कि हम उसके साथ दुख उठाएं कि उसके साथ महिमा भी पाएं। (रोमियों 8:15-17 ज़ोर मेरे द्वारा जोड़ा गया)

 

आप अपने जीवन के अंत में, जब आप मसीह के सम्मुख होंगे, अगर वह आपसे पूछे, “मैं तुम्हें अपने स्वर्ग में क्यों जाने दूँ?” आप क्या उत्तर देंगे? क्या आपके पास इस बात की भीतरी गवाही है कि आप उसके हैं और उसने आपके पाप क्षमा कर दिए हैं?

 

एक शासक के, एक शिक्षक के, और एक फरीसी के रूप में, इस व्यक्ति के पास ऐसी धार्मिकता थी जिससे संपूर्ण राष्ट्र ईर्ष्या रखता था, लेकिन फिर भी कुछ कमी थी। वह अपने आप में काफी नहीं था! यीशु ने सिखाया कि केवल भले कार्यों की प्रणाली को बनाए रखने से बढ़कर किसी चीज़ की आवश्यकता थी:

 

20क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों (और नीकुदेमुस दोनों था) की धार्मिकता से बढ़कर हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने पाओगे।

 

(मत्ती 5:20 कोष्टक में टिपण्णी मेरी ओर से)

 

यीशु ने ऐसे प्रश्न का उत्तर दिया जिसका भार असल में नीकुदेमुस अपने मन से हल्का नहीं कर सकायदि कोई नये सिरे से जन्में तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।(यहुन्ना 3:3) जिस शब्द का अनुवाद यहाँ “नए सिरे से” जन्म के साथ किया है वह यूनानी शब्द है एनोथेन एक ऐसा शब्द जिसके दो अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं इसका अर्थ दोबारा हो सकता है जैसे कि दूसरी बार, या फिर इसका अर्थ उपर से हो सकता है जैसे कि परमेश्वर को हमारे प्राण में इसके लिए कार्य करना होगायीशु के शब्द नीकुदेमुस के लिए झटका देने वाले होते हैं, क्यूंकि यहूदी सोचते थे कि क्योंकि वह अब्राहम की संतान हैं और उन्होंने व्यवस्था का पालन किया है,वह सब परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करेंगे। यहूदी लोगों की एक मान्यता यह थी कि अगर कोई व्यक्ति धनवान होता तो यह एक अच्छा संकेत है कि वह व्यक्ति स्वर्ग के राज्य की ओर अपने मार्ग पर अग्रसर है। जब यीशु ने चेलों को बताया कि एक धनवान व्यक्ति के लिए राज्य में प्रवेश करना कठिन है, तो उन्हें ऐसे कथन से बड़ा झटका लगावह धन को महान आशीष के संकेत के रूप में देखते थे, तो वह यह मानते थे कि नीकुदेमुस जैसे व्यक्ति तो स्वत: “पहुँच जाएंगे” ज़ाहिर है कि वह बहुत धनवान था क्योंकि वह एक ऊँचे औहदे पर था। वचन में लिखा है कि यीशु के दफ़नाने के समय उसने 75 पौंड मुर और एलवा, जो बहुत्र महँगा था, ख़रीदा था(यहुन्ना 19:39) यीशु ने स्पष्ट कर दिया कि एक व्यक्ति के जीवन में परमेश्वर के कार्य के हुए बिना परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना असंभव है, चाहे आप कितने धनवान क्यों न हों:

 

23तब यीशु ने अपने चेलों से कहा, “मैं तुम से सच कहता हूँ, कि धनवान का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन है। 24फिर तुम से कहता हूँ, कि परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है”। 25यह सुनकर, चेलों ने बहुत चकित होकर कहा, “फिर किस का उद्धार हो सकता है?” 26यीशु ने उन की ओर देखकर कहा, “मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है”। (मत्ती 19:23-26 ज़ोर मेरे द्वारा)

 

केवल एकमात्र परमेश्वर ही है जो इसे संभव कर सकता है, तो यह बुद्धिमता होगी कि हम स्पष्टता से सुनेंहमारे लिए इस सत्य को पहचान लेना अति आवश्यक है कि केवल इसी खंड में यीशु ने तीन बार मैं तुम से सच कहता हूँ (पद 3, 5, और 11) कथन कहा, एक ऐसा कथन जो उसके शब्दों के महत्व को दर्शाने के लिए रचा गया हैएक ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने कभी आत्मिक मुद्दों को न टटोला हो आत्मिक जन्म की आवश्यकता के बारे में बातचीत को समझ पाना कठिन हैनीकुदेमुस ने उसी प्रकार प्रतिक्रिया दी जैसी हम में से कईयों ने जो मसीही हैं अपने जीवन में एक समय पर दी होगी। वह केवल स्वाभाविक रीती से सोचता है। उसके लिए इस कथन को समझने का कोई तार्किक तरीका नहीं है और यह उसे चकित कर देता है। अगर इसे शाब्दिक रूप से लिया जाए, तो उसे नए सिरे से जन्म लेने के लिए अपनी माँ के गर्भ में वापस जाना होगा। वह शाब्दिक रीती से सोच रहा था और अचरज करने लगा कि यह बातें कैसे हो सकती हैं

यीशु उसे बताता है कि परमेश्वर का राज्य परमेश्वर द्वारा आत्मिक जीवन के प्रदान किये जाने के अलावा बूझा भी नहीं किया जा सकता। यीशु इस बारे में इतना जोर देता है कि वह इसे नीकुदेमुस को और हमारे फायदे के लिए हमारे लिए भी साफ़ शब्दों में कहता है: मैं तुझ से सच सच कहता हूँ; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। 6क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है। (पद 5-6) वह ये नहीं कहता कि कुछ लोग तब तक प्रवेश नहीं कर सकते जब तक वह नए सिरे से जन्म न ले लें, लेकिन वह इन शब्दों का प्रयोग करता है कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता जबतक उसके जीवन में दो बातें न हों। यह दो बातें, जैसा वह बताता है, हैं जल और आत्मा से जन्म लेना। बाइबिल हमें शिक्षा देती है कि मनुष्य के अस्तित्व के तीन तत्व हैं, मतलब वह शारीर, प्राण और आत्मा से बना है (1 थिस्सलुनीकियों 5:23)। प्राण हमारे मन, इच्छा और भावनाओं से बना है, लेकिन हमारा आत्मा है जो हमें परमेश्वर के साथ जोड़ता है। आदम को अदन की वाटिका में चेतावनी दी गयी थी कि अगर वह भले और बुरे की पहचान के फल को खायेगा तो वह निश्चित ही मर जाएगा (उत्पत्ति 2:17). शारीर में आदम तब तक नहीं मारा जब तक वह 930 वर्ष का नहीं हो गया (उत्पत्ति 5:5), लेकिन परमेश्वर के साथ सम्बन्ध और संगति की उसकी क्षमता उस दिन खंडित हो गयी थी जब उसने परमेश्वर की अनाज्ञा कर उस फल को खाने का चुनाव किया। यीशु इस सम्बन्ध को पुन: स्थापित करने आया। उसने कहा, मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं” (यहुन्ना 10:10) प्रेरित पौलुस इफिसुस की कलीसिया को अपनी पत्री में यही बात लिखते हैं, जब वह कहते हैं, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे....” (इफिसियों 2:1 and 5) जब एक व्यक्ति मसीह के पास आ अपने पाप से मन फिरा कर मसीह को ग्रहण करता है, वह नए सिरे से जन्म लेता है (यहुन्ना 1:12) इस मनुष्य की आत्मा में जीवन का संचार उत्सर्जित किया जाता है उसके हृदय के मंदिर से पर्दा हटा दिया जाता है, और यह व्यक्ति परमेश्वर के साथ सम्बन्ध रखने की क्षमता पा लेता है, जबकि वह पाप का मुद्दा जिसने मनुष्य को परमेश्वर से अलग किया हुआ है वह रास्ते से हट जाता है

 

जब यीशु यहाँ “जल से जन्म” लेने के बारे में बात करता है तो इससे उसका क्या तात्पर्य हो सकता है?

 

इसके चार संभव व्याख्याएं हैं:

 

1.जल का तात्पर्य मानव के शारीरिक जन्म से है। जीवन के शुरुआती नौ महीने हम अपनी माँ के गर्भ में जल में रहते हैं। वह जो इस विचारधारा को अपनाते हैं यह मानते हैं कि यीशु यह कह रहा है कि एक व्यक्ति को न केवल शारीरिक जन्म की आवश्यकता है, लेकिन आत्मिक जन्म की भी।
 

2. जल परमेश्वर के वचन का प्रतीक है। हमें वचनों में बताया गया है कि मसीह कलीसिया को पवित्र बनता है, कि उस को वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्रा बनाए...” (इफिसियों 5:26) यीशु इसे ऐसे भी कहता है: तुम तो उस वचन के कारण जो मैं ने तुम से कहा है, शुद्ध हो। (यहुन्ना 15:3) इस व्याख्या में जल परमेश्वर के वचन के हमारे मार्ग को पवित्र करने के सामर्थ का प्रतीक है – परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन जीने के द्वारा (भजन 119:9).
 

3. एक और व्याख्या यह है कि जल एक व्यक्ति के जीवन में जब वह मसीह की ओर फिर जाता है, आत्मा द्वारा शुद्धि और जागृति के कार्य का प्रतीक है: “4पर जब हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर की कृपा, और मनुष्यों पर उसकी प्रीति प्रगट हुई। 5तो उस ने हमारा उद्धार किया: और यह धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार, नए जन्म के स्नान, और पवित्रा आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हुआ।” (तीतुस 3:4-5)
 

4. चौथी व्याख्या यह है कि पानी मनफिराव का एक जरिया है नीकुदेमुस के साथ आमना-सामना होने के समय भी, यहुन्ना बप्तिस्मा देने वाला मन फिराव के बपतिस्मे का प्रचार कर रहा था(मरकुस 1:4; प्रेरितों 19:4) पानी के नीचे होना संसार से यह कहने का तरीका था कि एक व्यक्ति ने मन फेर लिया है (मन फिराव का शाब्दिक अर्थ मन फेर लेना है) और अपने पुराने जीवन के प्रति मृत हो गया है और अब मसीह के आगमन के साथ आत्मा के आने की प्रतीक्षा कर रहा हैमन फिराव हमारे आज के समय में प्रसिद्ध शब्द नहीं है। हमें केवल बताया जाता है कि हमें मसीह पर विश्वास करना है, लेकिन मसीह का सन्देश यह था कि जब तक एक पुरुष या स्त्री मन फिरा और विश्वास नहीं करेंगे, वह नाश हो जाएंगे। (लूका 13:3-5) हाल ही में biblegateway.com द्वारा की अपनी खोज में मैंने पाया कि “मन फिराव” शब्द का बाइबिल में 75 बार प्रयोग किया गया है, जो इस बात को दर्शाता है कि यह एक महत्वपूर्ण विषय है और किसी भी तरह से इसे नज़रंदाज़ करना या कम आंकते हुए नहीं देखना चाहिए

 

मैं जानता हूँ कि आप यह सोच रहे होंगे कि मेरी व्यक्तिगत व्याख्या क्या है? इन चारों की अपनी जगह है, तो हमें किसी एक के बारे में कट्टर होने की आवश्यकता नहीं। हमें इस बारे में सावधान रहने की आवश्यकता है कि हमने सब पाप से सच्चा बाइबिल आधारित मन फिराव किया है, और अब पवित्र आत्मा से हमें उन धब्बों से शुद्ध और पुन: स्थापित करने को माँग रहे हैं इन्होने हमारे चरित्र और प्राण पर घात किया है। अगर हमने सभी ज्ञात पापों से वाकई में मन फिराव कर लिया है, तो हमें परमेश्वर को नापसंद किसी चीज़ को करने में कोई ख़ुशी नहीं होगी अगर एक व्यक्ति सच में आत्मा में नए सिरे से जन्मा है, सभी ज्ञात पाप से घृणा करते, तो आत्मा हमें ऐसी किसी भी बात को करने में शांति नहीं देगा जो परमेश्वर को नाखुश करेगी। कोई इसे जिस भी नज़रिए से देखे, यह एक आत्मिक जागृति है, या जन्म, जो परमेश्वर द्वारा जीवन प्रदान करने के द्वारा होती है, उसके वचन और आत्मा के द्वारा, न कि हमारे धार्मिकता के कार्यों के द्वारा

 

एक व्यक्ति को कैसे पता लगेगा कि वह जल और आत्मा से जन्मा है या नहीं? आप क्या सोचते हैं? एक ऐसे व्यक्ति के जीवन में जिसने सच में उद्धार के उपहार को ग्रहण कर नए सिरे से जन्म ले लिया हो (या उपर से जन्म लिया हो), क्या प्रमाण दिखने चाहिए?

 

यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है क्योंकि एक व्यक्ति को यह मानने में धोखे में रखा गया हो कि उनके पास अनंत जीवन है, और उसे अपने जीवन के अंत में आकर यह पता लगे कि उन्हें तो अनंत अन्धकार में भेजा जा रहा है, इस बात से दुखद: मैं किसी और बात के बारे में नहीं सोच सकता। आइये एक व्यक्ति के नए सिरे से जन्म लेने के कुछ प्रमाणों को देखने में कुछ समय लें:

 

1. क्या आप सच्चाई से सुसमाचार में विश्वास रखते हैं? यह संदेश के सत्य के बारे में एक मनो-ज्ञान नहीं है, लेकिन एक ऐसे हृदय का विश्वास जो प्रतिदिन के जीवन में ईश्वरीय मूल्यों के अनुसार जीता है। आपका जीवन दर्शायेगा कि आप विश्वास करते हैं या नहीं। यीशु ने कहा, उन के फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे क्या झाड़ियों से अंगूर, वा ऊंटकटारों से अंजीर तोड़ते हैं?(मत्ती 7:16) आपके जीवन में पवित्र आत्मा का बढ़ता हुआ फल होना चाहिए(गलातियों 5:16-25)

 

2. क्या जो यीशु ने आपके लिए क्रूस पर मरने के द्वारा किया उसके लिए आपके पास एक सराहना से भरा धन्यवाद और प्रेम का हृदय है?

3. क्या आपके पास परमेश्वर के वचन को जानने की भूख है? 5पर जो कोई उसके वचन पर चले, उस में सचमुच परमेश्वर का प्रेम सिद्ध हुआ है: हमें इसी से मालूम होता है, कि हम उस में हैं। (1 यहुन्ना 2:5)

 

4. क्या आपके हृदय में मसीह के वापस आने के लिए एक अपेक्षा है? 2हे प्रियों, अभी हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्या कुछ होंगे! इतना जानते हैं, कि जब वह प्रगट होगा तो हम भी उसके समान होंगे, क्योंकि उस को वैसा ही देखेंगे जैसा वह है। 3और जो कोई उस पर यह आशा रखता है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है, जैसा वह पवित्र है। (1 यहुन्ना 3:2-3 यहाँ जोर मेरी ओर से जोड़ा गया है)
 

5. क्या जब आप पाप करते हैं तो अपने आप से नाखुश और निराश होते हैं? अगर हमने मसीह को अपने जीवन के सिंहासन पर बैठने और उसका नियंत्रण करने का आमंत्रण दिया है, तो जब हम पाप करेंगे तब आत्मा हमें हमारे पाप का बोध कराएगा
 

6. क्या आप उन लोगों से प्रेम रखते हैं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं? क्या आप मसीही लोगों के बीच होने में आनंद महसूस करते हैं? 14 हम जानते हैं, कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं; क्योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं: जो प्रेम नहीं रखता, वह मृत्यु की दशा में रहता है। (1 यहुन्ना 3:14)
 

7. क्या आपके पास अपने जीवन में आत्मा के कार्य की एक सजग जागरूकता है? 13 इसी से हम जानते हैं, कि हम उस में बने रहते हैं, और वह हम में; क्योंकि उस ने अपने आत्मा में से हमें दिया है। (1 यहुन्ना 4:13)

 

मेरे स्वयं का आत्मिक असंतोष

 

मैंने पाँच महाद्वीपों और कई देशों में जाकर मसीह को लगभग पाँच वर्ष की अवधि की लम्बी खोज के बाद पाया। मेरे साथ एकदम मृत्यु के निकट जैसा अनुभव हुआ था जिससे मैं इस बात से अवगत हो गया था कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है, लेकिन बस शुरुआत का आँगन। जब मैं मृत्यु और जीवन के बीच झूल रहा था तब मैं ऐसे परमेश्वर को रो-रो कर गुहार लगा रहा था जिसे मैं जानता तक नहीं था न उसमें विश्वास करता था। मैं सोच रहा था, यही अंत है। “अगर तू मेरा जीवन बक्श दे और मुझे जीने दे तो मैं तुझे अपना जीवन दे दूंगा और जो तू चाहे वो करूँगा।” उस समय से मैं अनुभव करने लगा कि मेरी अगवाई किसी अदृश्य जन द्वारा की जा रही है – परमेश्वर कौन था इसका मुझे ज़रा भी इल्म नहीं था! किसी ने कभी मुझे मसीह का सुसमाचार नहीं बताया था, तो मैंने धर्म को हिन्दू और बौध धर्म के रूप में आज़माया। इसने भी तृप्त नहीं किया, तो मैं दर्शनशास्त्र पढने चल पड़ा और कुछ ऐसी अजीबोगरीब बातें जो जादू-टोने की कगार पर थीं

 

जब मैंने यह जानकर कि यह निष्फल रहीं हैं अपनी खोज समाप्त कर दीं, मेरे हाथ हैल लिंडसे की एक पुस्तक पड़ी, द लेट ग्रेट प्लेनेट अर्थ उस पुस्तक को पढ़ने से मेरी आँखें इस सच्चाई के लिए खुल गयीं कि परमेश्वर इस संसार में हमारे बीच कार्य कर रहा था और उसने हमें अपने हाल पर ही नहीं छोड़ा था। मैंने अपने लिए उसके व्यक्तिगत प्रेम के बारे में पढ़ा और कुछ ही हफ़्तों बाद मसीह के बारे में खोजने और ज्यादा जानने के लिए पश्चिम में अमेरिका की ओर हवाई-जहाज़ पर सवार हो गया। परमेश्वर ने सुनिश्चित किया कि मैं हवाई-जहाज़ में एक विश्वासी के बगल में बैठूं। उसने मुझे अपनी किराए की गाडी में वर्जिनिया प्रान्त में आयोजित बाइबिल भाविश्य्द्वाणी के अध्यन के लिए एक गर्मियों की कार्यशाला में आमंत्रित किया। किसी तरह जब अवर्जन के अफसर मेरे पासपोर्ट पर उन कई देशों पर गौर कर रहे थे जहाँ मैं गया था, हम अलग हो गए। अंतत: अवर्जन से मुक्ति पा कर मैंने एक सरकारी बस ली, और इस बात में निश्चित कि यह परमेश्वर की अगवाई है जो मेरा पीछा कर रही थी, मैं रिचमंड, वर्जिनिया पहुँचा

 

दो दिन के बाद मैंने बस अड्डे पर जाकर एक ऐसे स्थान के लिए टिकट ख़रीदा जो मेरे अनुसार रिचमंड से 20 मील की दूरी पर था। वहाँ बस की कतार में वह एकमात्र अमरीकी था जिसे में पूरे देश में जानता था, वह व्यक्ति जो मुझे हवाई-जहाज़ में मिला था। उसने उसी दिन और बिलकुल उसी समय यह चुनाव किया कि वह अपनी गाड़ी को निकटतम शहर नहीं लेकर जाएगा ताकि उसे गाड़ी का और किराया न देना पड़े उसने मेरे साथ वही बस पकड़ी और मुझे पहली बार सुसमाचार सुनने के लिए ले आया। मैंने बसावट से मीलों दूर उस गर्मियों की कार्यशाला में मसीह को ग्रहण किया और साथ ही साथ परमेश्वर के आत्मा से भर गया। जब मैंने प्रभु यीशु को अपने जीवन में ग्रहण कर नए सिरे से जन्म लिया तब मैंने अपने उपर से एक भरी बोझ तो हटते अनुभव किया। मेरे लिए यह एक ऐसा अनुभव था जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। मैं जानता था कि मैं अलग हूँ! मैं कितना खुश था! मैंने परमेश्वर के प्रेम को अनुभव किया और मेरे पास औरों के लिए प्रेम था, जो मैंने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। उस समय मेरे हृदय में आया, परमेश्वर के वचन के लिए प्रेम, और मसीही लोगों के लिए प्रेम, और उन लोगों को लिए जो अभी तक उससे दूर हैं यह बताने की इच्छा कि उनसे भी कितना प्रेम किया गया है। मेरा प्राण तृप्त था और है

 

अपना मसीह का अनुभव एक दूसरे के साथ बाँटिये अगर आप अभी भी उसकी खोज कर रहे हैं तो अपने समूह में किसी को बताएं उनसे अपने लिए प्रार्थना करने को कहें

 

ज़ाहिर है कि नीकुदेमुस मसीह के साथ अपनी मुलाकात के कारण विश्वासी बना। हम उसे अरमतियाह के यूसुफ के साथ यीशु की कब्र पर पाते हैं, 39निकुदेमुस भी जो पहिले यीशु के पास रात को गया था पचास सेर के लगभग मिला हुआ गन्धरस और एलवा ले आया। 40तब उन्हों ने यीशु की लोथ को लिया और यहूदियों के गाड़ने की रीति के अनुसार उसे सुगन्ध द्रव्य के साथ कफन में लपेटा। (यहुन्ना 19:39-40)

 

आपके बारे में क्या? क्या आपके ह्रदय में पूर्ण निश्चिंतता है, आत्मा की वह भीतरी गवाही कि आप एक नए सिरे से जन्मे परमेश्वर की संतान हैं? क्या यह संभव है कि जॉन वेस्ली या नीकुदेमुस की तरह ही आप भी महसूस करते हैं कि कहीं कुछ तो कमी है? परमेश्वर के आत्मा द्वारा नए सिरे जन्म लेकर परमेश्वर के साथ शांति का आनंद उठाने के लिए, आपको पाप से मन फिराने (परमेश्वर की ओर हृदय और मन का बदलना) और मसीह को अपने जीवन में आमंत्रित कर, इस समय से आगे अपने जीवन का नियंत्रण ले लेने की आवश्यकता है यहाँ एक प्रार्थना है जिसे आप कर सकते हैं:

 

प्रार्थना: पिता, मैं तुझे अब जाना हूँ, इस बात पर विश्वास करते हुए कि तू मुझसे प्रेम करता है और तेरे पास मेरे जीवन के लिए एक योजना है। धन्यवाद कि तूने मुझसे इतना प्रेम किया कि तूने अपने पुत्र को मेरे पापों की कीमत चुकाने के लिए इस संसार में भेज दिया, जिसने मुझे इतने लम्बे समय से तेरी उपस्तिथि का आनंद उठाने से दूर रखा। मैं अपने पाप से मन फिरा उससे मुड़ता हूँ, और जब मैं मसीह को अपने जीवन का नियंत्रण देता हूँ, मैं उसे अपने भीतर आकर रहने का आमंत्रण देता हूँ। धन्यवाद पिता, इस बिना कीमत वाले अनंत जीवन के उपहार के लिए। अमीन!

 

पास्टर कीथ थॉमस

वेबसाइट: www.groupbiblestudy.com

-मेल: keiththomas7@gmail.com