4. The First Miracle of Jesus

4. यीशु का पहला आश्चर्य-कर्म

शुरुआती प्रश्न: क्या आप पर कभी किसी ऐसी बात का दोष लगाया गया है जो आपने नहीं की? आप पर दोष किसने लगाया, क्या यह आपके माता-पिता थे, भाई-बहन या एक शिक्षक? अपनी कहानी बाटें

 

1फिर तीसरे दिन गलील के काना में किसी का ब्याह था, और यीशु की माता भी वहाँ थी। 2और यीशु और उसके चेले भी उस ब्याह में नेवते गए थे। 3जब दाखरस घट गया, तो यीशु की माता ने उस से कहा, “उन के पास दाखरस नहीं रहा।” 4यीशु ने उस से कहा, “हे महिला मुझे तुझ से क्या काम? अभी मेरा समय नहीं आया।“ 5उस की माता ने सेवकों से कहा, “जो कुछ वह तुम से कहे, वही करना।” 6वहाँ यहूदियों के शुद्ध करने की रीति के अनुसार पत्थर के छ: मटके धरे थे, जिनमें दो-दो, तीन-तीन मन समाता था। 7यीशु ने उन से कहा, “मटकों में पानी भर दो।” उन्होंने उन्हें मुँहामुँह भर दिया। 8तब उसने उनसे कहा “अब निकालकर भोज के प्रधान के पास ले जाओ।” और वे ले गए। 9जब भोज के प्रधान ने वह पानी चखा, जो दाखरस बन गया था, और नहीं जानता था, कि वह कहाँ से आया हे, (परन्तु जिन सेवकों ने पानी निकाला था, वे जानते थे) तो भोज के प्रधान ने दूल्हे को बुलाकर, उस से कहा। 10हर एक मनुष्य पहिले अच्छा दाखरस देता है और जब लोग पीकर छक जाते हैं, तब मध्यम देता है; परन्तु तू ने अच्छा दाखरस अब तक रख छोड़ा है।” 11यीशु ने गलील के काना में अपना यह पहिला चिन्ह दिखाकर अपनी महिमा प्रगट की और उसके चेलों ने उस पर विश्वास किया। (यहुन्ना 2:1-11)

 

मरियम के लिए, जो येशु की माता थीं, जीवन आसान नहीं रहा था। आइये देखते हैं कि अभी तक उसके साथ क्या-क्या हुआ था और येशु के जन्म के प्रभाव ने किस प्रकार उसका पूरा जीवन बदल दिया था। येशु के जन्म से उसके जीवन के साथ एक कलंक जुड़ गया, उसके चरित्र पर ऐसा दाग़ जिसके साथ वह अब तक लगभग 30 वर्ष से जी रही थी। उन दिनों में, अगर एक स्त्री को व्यभिचार में पाया जाता, तो पथराव कर मृत्यु देना उसकी सज़ा होती थी। युसुफ ने इस कारण से समाज के सामने कभी उसपर दोष नहीं लगाया, लेकिन उसके लिए समझना कठिन रहा होगामरियम किसी आदमी के साथ सम्बन्ध बनाए बिना कैसे गर्भवती हो सकती है? वाकई यह प्रश्न उसके परिवार में और जो उसे अच्छे से जानते थे, उनमें फुसफुसाहट का विषय रहा होगा उसपर विवाह से बाहर शारीरिक सम्बन्ध का झूठा आरोप लगाया गया था, जो एक जवान यहूदी लड़की के लिए भयंकर पाप था। युसुफ को एक स्वर्गदूत द्वारा उसके आश्चर्यकर्म से गर्भ धारण के बारे में बताया गया था, लेकिन अलौकिक प्रकाशन से परे, कौन ऐसी कहानी पर विश्वास करता? वह अपने परिवार तक को भी यह कैसे समझती कि वह येशु के जन्म के समय तक कुंवारी थी। आपको क्या लगता है कि उसे कैसा महसूस हुआ होगा जब उसने सुना कि हेरोदेस बेतलेहम में दो वर्ष से कम आयु के हर बालक का क़त्ल रहा था? क्या आप नहीं सोचते कि उसे इस बात का डर था कि अगर कभी यह बात पता लग जाती कि उसका पुत्र प्रतिज्ञा किया हुआ मसीह है तो उसे मार दिया जायेगा? मत्ती का सुसमाचार इस बात को बताता है कि एक स्वर्गदूत ने युसुफ को हेरोदेस की इस खूनी मंशा के बारे में चेतावनी दी थी और यह कहा कि उसे मरियम और शिशु येशु को कुछ समय के लिए मिस्र ले जाना है (मत्ती 2:13) जब युसुफ और मरियम वापस नाज़रथ लौटे, उन्होंने इस तथ्य को छुपाते हुए कि येशु के जन्म के समय वह कुंवारी थी, एक शांत और आम जीवन जीने का सोचायह नाज़रथ में ही था कि मरियम को बिना विवाह के “गर्भवती पाया गया” हम वचन से जानते हैं कि युसुफ, जिसकी मरियम के साथ मंगनी हुई थी, उसका झुकाव विवाह समारोह से पूर्व चुपके से उसे त्याग देने का था (मत्ती 1:18-21), ताकि उसे सामाजिक बदनामी न सहनी पड़े। येशु के बेतलेहम में जन्म और उसके पश्चात् मिस्र की यात्रा के बाद, येशु नाज़रथ में अपनी माँ के साथ जुड़े इस कलंक के साथ बड़ा हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि उन फरीसियों और यहूदी अग्वों ने जो उससे घृणा करते थे, नाज़रथ में उसके जन्म की जानकारी जुटाने के लिए भेदी भेजे। एक जगह पर उन्होंने उस पर इलज़ाम लगाया कि वह नाजायज़ है, तुम अपने पिता के समान काम करते हो: उन्होंने उस से कहा, हम व्यभिचार से नहीं जन्मे; हमारा एक पिता है अर्थात् परमेश्वर। (यहुन्ना 8:41) एक अन्य स्थान पर जन्म से अंधे उस आदमी से बात करते हुए जिसे येशु ने चंगा किया था, उन्होंने मसीह के बारे में कहा था “परमेश्वर को महिमा दो, उन्होंने कहा। हम जानते हैं यह मनुष्य पापी है। मुझे निश्चय है मरियम इस बात के खुले रूप से बाहर आने की गहरी लालसा रखती होगी कि येशु वाकई में कौन है ताकि उसके सही होने की पुष्टि पूर्ण रूप से हो जाए। उसके शहरवासियों द्वारा इस कटाक्ष को येशु के जन्म के विषय पर हाल ही की फिल्म द नेटिविटी स्टोरी में जागृत किया गया है। जब येशु ने यहुन्ना द्वारा बप्तिस्मा दिए जाने के लिए निकलते हुए नाज़रथ में अपने परिवार से विदा ली होगी, तब शायद मरियम को लगा होगा कि आखिरकार अब समय आ गया। उसके बपतिस्मे के पश्चात् उसकी सेवकाई शुरु होगी और शायद आखिरकार इस सत्य के द्वारा ही की वह असल में कौन है, उसे सही ठहराया जायेगा।

 

अवसर गालील के काना में एक विवाह समारोह था, नातानियेल का ग्रह स्थान, मरियम और येशु के ग्रह स्थान नाज़रथ शहर से लगभग 10 मील दूर हम अनुमान लगा सकते हैं कि क्यूंकि मरियम, येशु और उसके चेलों को आमंत्रण था, विवाह किसी नजदीकी मित्र या रिश्तेदार का रहा होगा। हमारे पास यह जानने का कोई साधन नहीं कि यह कब हुआ, लेकिन युसुफ की मृत्यु लगभग येशु के बारहवें जन्मदिन के बाद हुई होगी, जहाँ आखिरी बार उसके मरियम और येशु के साथ होने का वर्णन है (लूका 2:41-51) यह काफी संभव है कि जिस भी समय युसुफ की मृत्यु हुई होगी, अपने भाइयों के बड़ा होने तक, सबसे बड़ा होने के नाते परिवार की रोज़ी-रोटी कमाने की और आर्थिक ज़िम्मेदारी येशु पर आई होगी। हमें बताया गया है कि येशु के जन्म के बाद मरियम के चार पुत्र और कम से कम दो पुत्रियाँ हुईं, और कि येशु को बढ़ई के बेटे के नाम से जाना जाता था (मत्ती 13:54-57) हम नहीं जानते कि काना में विवाह समारोह के खान-पान का ज़िम्मेदार कौन था, लेकिन यह अनुमान लगाना तार्किक है कि मरियम के पास कुछ हद तक इसकी ज़िम्मेदारी और देख-रख थी क्यूंकि भोज के प्रधान की बजाय वह वो जन थी जिसे दाखरस के खत्म होने के बारे में बताया गया। भोज के प्रधान को तो निश्चित ही इस समस्या के बारे में कुछ नहीं पता था, जैसा कि उसकी पानी के दाखरस बनाए जाने में जानकारी की कमी से प्रमाणित होता है (पद 9)। जिस प्रकार सेवकों ने निर्देशों के लिए मरियम की ओर देखा शायद इस बात का संकेत है कि विवाह का अवसर किसी रिश्तेदार या नजदीकी मित्र का होगा। निश्चित ही वह दाखरस के खत्म होने पर, सेवकों को निर्देश देती है कि इस समस्या के बारे में क्या करना है।

 

मध्य पूर्व में मेहमान नवाज़ी बहुत बड़ी बात होती थी और अब तक है। उस संस्कृति में दूल्हा विवाह के खर्च के लिए ज़िम्मेदार होता था। अगर लोग जश्न में से बगैर तृप्त हुए निकल जाएं या महसूस करें कि भोजन अच्छा नहीं था, तो दुल्हन के माँ-बाप दूल्हे के परिवार पर मुक़दमा कर सकते थे लोग पानी के बजाय दाखरस पीते थे क्यूंकि जिस पवित्रिकर्ण की प्रक्रिया से यह गुज़रता था वह ज्यादा सुरक्षित था; पानी के स्वच्छ होने पर कुछ प्रश्न रहते थेकिसी को कभी नहीं पता होता था कि बहाव के ऊपरी क्षेत्र में पानी के साथ क्या हुआ हो। मध्य पूर्व में विवाह समारोह में दाखरस महत्वपूर्ण होता था। बाइबिल बताती है कि, दाखमधु से मनुष्य का मन आनन्दित होता है(भजन 104:15) यहूदी संस्कृति में, दाखरस आनंद का प्रतीक था। रब्बी लोगों की कहावत थी: “दाखरस के बिना, आनंद नहीं।” हालाँकि दाखरस पीकर मतवाले हो जाने को घृणा से देखा जाता था, और अक्सर अगर दाखरस तेज़ किस्म का होता तो उसमें पानी मिलाया जाता, लेकिन भू-मध्य क्षेत्र और मध्य पूर्व में रात्रि भोज और उत्सव मानाने में वयस्कों का दाखरस पीना आम बात थी और है। मुझे एक छोटी मिशन यात्रा पे जाना याद है जिसमें हम कलीसिया स्थापना करने वाले लोगों से मिलते हुए फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल में होकर आए। पुर्तगाल में मैं एक पासबान से मिलने गया और जब हम रात्रि भोज कर रहे थे, मैंने साथ में दाखरस लेने से इंकार कर दियाउन्होंने मुझे बताया कि रात्रि भोजन के साथ दाखरस न लेना उस क्षेत्र के लिए कितनी असहज बात है। जब मैंने स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस, इटली, यूगोस्लाविया, ग्रीस और इजराइल जैसे दाखरस बनाने वाले देशों में यात्रा की है, मैंने इसपर अक्सर गौर किया है। दाखरस मित्रों के साथ लिए जाने वाली आनंद की प्रतीक हैइस विवाह में कितनी बुरी बात हो गयी थी। एक तरह से मरियम कह रही थी, “उनका आनंद ख़त्म हो गया।” जीवन भी ऐसा हो सकता है, यह दैनिक संघर्ष बन सकता है, जीवन में ऐसी नीरसता जिसमें हम किसी बात के लिए उत्साहित नहीं होते10यदि कुल्हाड़ा थोथा हो और मनुष्य उसकी धार को पैनी न करे, तो अधिक बल लगाना पड़ेगा. (सभोपदेशक 10:10) हमारा जीवन ज्यादा काम के द्वारा फीका हो जाता है और जब हम मज़ा नहीं कर पाते और आनंद जब नहीं होता हमारी उर्जा भी समाप्त होती जाती है कई लोग सफलता के पीछे भाग आनंद को खोजते हैं, लेकिन मैंने कभी अपनी मृत्यु-शैया पर किसी व्यक्ति को यह कहते नहीं सुना, “काश मैंने अपने ऑफिस में ज्यादा समय बिताया होता” अन्य लोग आर्थिक चुनौतियों के कारण परिवार और मित्रों के साथ घनिष्ठ संबंधों का आनंद उठाने जैसे बिना रुपये की आवश्यकता के मज़े का कार्य करने के बजाय कठोर परिश्रम करने के जाल में पड़ जाते हैं (अगर आपके निकट परिवार और मित्र नहीं हैं, तो एक छोटा समूह शुरू कीजिये!) अपने घर को औरों के लिए खोलें। ऐसा जीवन जीने के द्वारा जिसमें संबंधों और पारिवारिक समय का आनंद शामिल हो, प्रभु के आनंद को अपनी समर्थ बनने दें:

 

"आओ सब प्यासे लोगो, पानी के पास आओ; और जिनके पास रूपया न हो, तुम भी आकर मोल लो और खाओ! दाखमधु और दूध बिन रूपए और बिना दाम ही आकर ले लो।” (यशायाह 55:1 यहाँ बल मैंने जोड़ा है)

 

हम यहाँ वास्तविक दाखरस के बारे में बात नहीं कर रहे; हम यहाँ बिना किसी रूपये और बिना किसी कीमत के आनंद के दाखरस को मोल लेने की बात कर रहे हैं हम इसे कैसे मोल ले सकते हैं? रूपये से नहीं। हमें जीवित पानी के सोते के पास आना है, सच्ची दाखलता के पास (यहुन्ना 15:1), प्रभु येशु मसीह, और उसे तृप्त होने तक पीना है। हम ऐसा उसके वचन, बाइबिल, को पढ़ने के द्वारा और प्रार्थना में व्यक्तिगत समय बिता कर कर सकते हैं। इसका लेन-देन तब पूरा होता है जब हम अपनी गरीबी और कंग्लेपन द्वारा भुगतान कर, उसके परिपूर्ण जीवन की प्रतिज्ञाओं को स्वीकारते हुए अपना सर्वस्व उसके हाथों में देते हैं। क्या यह अच्छा लेन-देन प्रतीत नहीं होता? शेयर बाज़ार में तो आपको ऐसा उत्तम लेन-देन नहीं मिलेगा! अगर हमें इस जीवन में खरीदने और बेचने के विषय में बुद्धिमान होना है, तो अपने सीमित संसाधनों को उसके असीमित संसाधनों की दौलत से बदल कर, हम जानेंगे कि यह ज्यादा इस बारे में है कि हम अपना जीवन किस बात के लिए समर्पित करते हैं। वह प्रतिज्ञा देता है कि अगर हम जीवन के सोते के पास आयेंगे, हम कभी प्यासे नहीं रहेंगे। उसने हमें बहुतायत के जीवन की प्रतिज्ञा दी है। (यहुन्ना 10:10)

 

किसी ऐसे समय के बारे में सोचें जब आपने अपने जीवन का अधिक आनंद उठाया हो उस समय के बारे में ऐसा क्या था जिसने उसे इतना आनंद भरा बनाया? एक दूसरे के साथ अपने आनंद की यादें साझा करें

 

मेरे जीवन में सबसे आनंद से भरे समय तब रहे हैं जब मैं लोगों से और परमेश्वर से नजदीकी सम्बन्ध में रहता हूँ। जीवन में मेरा सबसे पसंदीदा कार्य है भोजन पर मित्रों के साथ एक मेज़ पर बैठना। मित्रों के साथ उत्सव के समय ज़्यादातर लोगों के लिए सबसे यादगार लम्हों में होते हैं। अगर हम काना में अपने विवाह समारोह में वापस जाएं, तो समारोह में दाखरस की कमी की समस्या ऐसी थी जो वहां उपस्थित लोगों को निराश कर देती। यह एक ऐसी उलझन थी जिसके उपाय की आवश्यकता थी। मरियम ने समस्या के साथ कुछ किया। वह येशु के पास गयी और उस से कहा, उन के पास दाखरस नहीं रहा।

 

आप क्या सोचते हैं कि मरियम येशु से इस समस्या के विषय में क्या करने की अपेक्षा रख रही थी?

क्या मरियम यह जानती थी कि येशु इस समस्या के बारे में क्या करेगा? याद रखिये, यह उसका पहला आश्चर्य-कर्म था, जैसा हमें 11 पद में बताया गया है, तो हमें नहीं पता कि वह किसी आश्चर्य-कर्म की अपेक्षा कर रही थी, केवल इतना कि वह इस कठिन परिस्तिथि में उसपर निर्भर हो रही थी, आशा करते हुए कि उसके पास कोई उत्तर हो शायद वह अपेक्षा कर रही थी कि वो वहां शामिल लोगों से कोई अच्छा बहाना बना देगा। संभव है कि वह येशु से किसी प्रकार के भाषण की अपेक्षा कर रही थी ताकि लोगों का ध्यान दाखरस पीने से हट जाए और दूल्हा जाकर कुछ और दाखरस ले आए। हालाँकि यह उसका पहला आश्चर्य-कर्म था, वचन इस बात का संकेत देता है कि येशु की आश्चर्यजनक सामर्थ उसके यहुन्ना बप्तिस्मा देने वाले के द्वारा बप्तिस्मा दिए जाने के साथ ही शुरू हुई, जब आत्मा कबूतर की नाई उसपर आया। मत्ती इस बात को लिखता है कि जब येशु यर्दन में बप्तिस्में से वापस आया तो वह पवित्र आत्मा से भरा हुआ था (लूका 4:1,14) जबकि इस समय तक मरियम को येशु की योग्यता के बारे में कुछ नहीं पता था। वचन के अनुसार, वह अब तक उसके आश्चर्य-कर्म करने की गवाह नहीं बनी थी। याद करिए कि जब येशु, अपने बपतिस्मे के बाद, अपने ग्रह निवास नाज़रथ आ प्रचार और बीमारों को चंगा करने लगा, लोगों ने चौंकते हुए, यह प्रतिक्रिया दी; और यह कौन सा ज्ञान है जो उस को दिया गया है? और कैसे सामर्थ के काम इसके हाथों से प्रगट होते हैं?” (मरकुस 6:2) उनकी गवाही यही थी कि जितने भी समय से वह उनके बीच रह रहा था, उन्होंने कभी उसके आश्चर्य-कर्म करने के बारे में नहीं सुना। हमें याद रखना है कि येशु के ग्रह स्थान में वह अभी भी केवल बढ़ई का पुत्र था। लेकिन मरियम ने, यह जानते हुए की वह मसीह है, हमेशा से अपने हृदय में उसकी असली पहचान को संजोये रखा था। हो सकता है उसने सोचा हो कि शायद इस विवाह समारोह में आखिरकार समय आ गया है कि यह सत्य औरों पर उजागर हो जाए। मरियम को इस बात का भरोसा था कि येशु इस समस्या से निपटने के लिए सक्षम है। हालाँकि मरियम को प्रतिउत्तर देने में, शुरुआत में तो प्रतीत होता है कि उसका उत्तर नकारात्मक है; यीशु ने उस से कहा, “हे महिला मुझे तुझ से क्या काम? अभी मेरा समय नहीं आया।” (पद 4)

 

इस कथन, “मेरा समय अभी नहीं आया है” से उसका क्या तात्पर्य था?

 

वह अपनी नहीं लेकिन अपने पिता की महिमा खोजता आया, और वह महिमा का मुख्य कार्य था मानव के छुटकारे के लिए स्वयं के जीवन को देना। येशु अपने उद्देश्य पर केन्द्रित था। वह जानता था कि जैसी ही उसकी ओर ध्यान किया जायेगा, उसके पास अपनी सेवकाई पूर्ण करने का सीमित समय होगा। वो यह भी जानता था कि वह धार्मिक अग्वों का ध्यान आकर्षित करेगा, और उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी। येशु जानता था कि उसका उद्देश्य उसके जीवन के बलिदान के साथ अंत होगा, और कि इसके होने का एक समय है। केवल एकमात्र तरीका था कि मानव को पाप के दासत्व से छुड़ाया जाए, मनुष्य के स्थान पर किसी विकल्प की मृत्यु के द्वारायह विकल्प कोई अन्य मनुष्य नहीं हो सकता था:

 

7उन में से कोई अपने भाई को किसी भांति छुड़ा नहीं सकता है; और न परमेश्वर को उसकी सन्ती प्रायश्चित्त में कुछ दे सकता है, 8(क्योंकि उनके प्राण की छुड़ौती भारी है वह अन्त तक कभी न चुका सकेंगे)9कोई ऐसा नहीं जो सदैव जीवित रहे, और कब्र को न देखे। (भजन 49:7-9)

 

उद्धार केवल परमेश्वर द्वारा ही हासिल किया जा सकता था। छुड़ोती का दाम किसी आम मनुष्य द्वारा नहीं चुकाया जा सकता था। परमेश्वर स्वयं उस स्थान पर आ मानव बन गया ताकि केवल परमेश्वर की महिमा हो सके। सच्चा आनंद केवल मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध में आने से पुन: स्थापित हो सकता है। उसने पाप के उचित दण्ड- मृत्यु को चुकाने के द्वारा हमारे लिए उद्धार का मार्ग खोल दिया है। जो कुछ भी येशु ने अपनी शिक्षाओं और आश्चर्य-कर्मों के द्वारा हासिल किया वह इस पल की ओर लेकर आए, उसका अति महान परम बलिदान। जब उसके क्रूस पर चढ़ाये जाने से कुछ दिन पूर्व उसके येरूशालेम में प्रवेश करने वाला रविवार आया, यूनानियों का एक समूह येशु से मिलने आयायेशु ने उनसे कहा कि उसका समय आ गया है:

 

23इस पर यीशु ने उन से कहा, वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र की महिमा हो।” 24मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि जब तक गेहूं का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है परन्तु जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है। 25जो अपने प्राण को प्रिय जानता है, वह उसे खो देता है; और जो इस जगत में अपने प्राण को अप्रिय जानता है; वह अनन्त जीवन के लिये उस की रक्षा करता करेगा। 26यदि कोई मेरी सेवा करे, तो मेरे पीछे हो ले; और जहां मैं हूं वहां मेरा सेवक भी होगा; यदि कोई मेरी सेवा करे, तो पिता उसका आदर करेगा। 27जब मेरा जी व्याकुल हो रहा है। इसलिये अब मैं क्या कहूँ? हे पिता, मुझे इस घड़ी से बचा? परन्तु मैं इसी कारण इस घड़ी को पहुँचा हूँ। 28हे पिता अपने नाम की महिमा कर!” (यहुन्ना 12:23-28 बल मेरी ओर से दिया गया है)

 

येशु उन्हें बता रहा था कि वह केवल इसी कार्य के लिए आया – दोषी मनुष्य के लिए, आपके और मेरे, स्थान पर मरने के लिए। हमारे “मिट्टी में मिल अपने प्रति मृत होने” से परमेश्वर की सबसे अधिक महिमा होती है। इसका अर्थ अपना क्रूस उठा उसके पीछे होना है। अगर हम अपने प्रति मृत हो जाते हैं, इसकी कटनी हमें कई बीजों के रूप में मिलेगी। जब एक बीज को भूमि में गाड़ा जाता है तो क्या होता है? बाहरी छिलका फूट पड़ता है और बीज के अंदर का भीतरी जीवन प्रकट होने और बढ़ने लगता है। येशु की घड़ी आई और उसने आज्ञाकारिता में अपना जीवन दे दिया, ताकि हमारे छुड़ाने का दाम उसके द्वारा पूर्ण किया जा सके। (यहुन्ना 7:30; 8:20; 13:1; 17:1).

 

जब आपके जीवन में समस्या आती है तो आप किसकी ओर रुख करते हैं?

 

कुछ लोग श्रीमान वीज़ा क्रेडिट कार्ड या श्रीमान मास्टर कार्ड की ओर रुख करते हैं। अन्य कुछ अपनी बुद्धि, या समझ या स्वाभाविक योग्यताओं की ओर देखते हैं। ऐसे भी कुछ होते हैं जो मदद के लिए मरियम की ओर तांकते हैं, लेकिन मरियम द्वारा दिया गया वचन में लिखा एकमात्र निर्देश क्या था? जो कुछ वह तुम से कहे, वही करना। (पद 5) मरियम के शब्दों के अनुसार, हमें हमारे सामने खड़ी हर एक समस्या में प्रभु की ओर देख उसके मन को टटोलना है

 

येशु ने शुद्ध करनी की रीती के लिए हाथ-पैर धोने में प्रयोग के लिए रखे पत्थर के छ: मटके देखेइनमें से हर एक में दो से तीन मन पानी समाता थायेशु ने सेवकों से हर एक मटके को मुँहामुँह भर फिर उसमें से कुछ पानी को भोज के प्रधान के पास ले जाने को कहावह अचरज कर रहे होंगे कि आखिर वो क्या सोच रहा है! वो मेहमानों को वह पानी क्यों परोसेंगे जो उनके हाथ-पैर धोने के लिए था? उस हर सेवक के चौंकने की कल्पना कीजिये जिन्होंने धारा में से पानी लेकर हर एक मटके में भरा था। फिर एक चमचा अंदर डाला गया, और बहार निकला दाखरस, और न केवल अच्छा दाखरस, उत्तम दाखरस! भोज का प्रधान इस दाखरस की गुणवत्ता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने दूल्हे से कहा: हर एक मनुष्य पहिले अच्छा दाखरस देता है और जब लोग पीकर छक जाते हैं, तब मध्यम देता है; परन्तु तू ने अच्छा दाखरस अब तक रख छोड़ा है।”

 

आप क्या सोचते हैं कि येशु ने इतनी उत्तम गुणवत्ता का दाखरस क्यों बनाया?

 

मरकुस येशु के बारे में गवाही देता है कि… उस ने जो कुछ किया सब अच्छा किया है" (मरकुस 7:37) तो क्या तुक होता कि वह ठीक-ठाक दाखरस बनाए, ख़ास तौर से यह जानते हुए कि दूल्हा और दुल्हन हमेशा इस दिन को याद रखते हुए अपने विवाह समारोह की इस कहानी के बारे में अपने पूरे जीवनभर बात करते रहेंगे मैं सोचता हूँ कि मरियम अपने मुख पर एक बड़ी मुस्कान लेकर घूमी रही होगी, “यह मेरा लड़का है!” एक गर्व करती यहूदी माँ की तरहक्या आपको नहीं लगता की मरियम उस दिन सही ठहराया महसूस करती और अपने पुत्र पर गर्व करती घर गयी होगी? वचन हमें बताता है कि अपने इस पहले आश्चर्य-कर्म द्वारा उसने अपनी महिमा प्रकट की और उसके चेलों ने उसपर अपना भरोसा रखा

 

येशु ने मंदिर पवित्र किया

 

12इस के बाद वह और उस की माता और उसके भाई और उसके चेले कफरनहूम को गए और वहां कुछ दिन रहे। 13यहूदियों का फसह का पर्व निकट था और यीशु यरूशलेम को गया। 14और उस ने मन्दिर में बैल और भेड़ और कबूतर के बेचनेवालों ओर सर्राफों को बैठे हुए पाया। 15और रस्सियों का कोड़ा बनाकर, सब भेड़ों और बैलों को मन्दिर से निकाल दिया, और सर्राफों के पैसे बिखरा दिए, और पीढ़ों को उलट दिया। 16और कबूतर बेचनेवालों से कहा; “इन्हें यहाँ से ले जाओ: मेरे पिता के भवन को व्यापार का घर मत बनाओ।” 17तब उसके चेलों को स्मरण आया कि लिखा है, `तेरे घर की धुन मुझे खा जाएगी'18इस पर यहूदियों ने उस से कहा, “तू जो यह करता है तो हमें कौन सा चिन्ह दिखाता हे?” 19यीशु ने उन को उत्तर दिया कि “इस मन्दिर को ढा दो, और मैं उसे तीन दिन में खड़ा कर दूंगा।” 20यहूदियों ने कहा, “इस मन्दिर के बनाने में छियालीस वर्ष लगे हें, और क्या तू उसे तीन दिन में खड़ा कर देगा?” 21परन्तु उस ने अपनी देह के मन्दिर के विषय में कहा था। 22सो जब वह मुर्दों में से जी उठा तो उसके चेलों को स्मरण आया, कि उस ने यह कहा था; और उन्हों ने पवित्रा शास्त्रा और उस वचन की जो यीशु ने कहा था, प्रतीति की। 23जब वह यरूशलेम में फसह के समय पर्ब्ब में था, तो बहुतों ने उन चिन्हों को जो वह दिखाता था देखकर उसके नाम पर विश्वास किया। 24परन्तु यीशु ने अपने आप को उन के भरोसे पर नहीं छोड़ा, क्योंकि वह सब को जानता था। (यहुन्ना 2:12-24)

इस खंड में आपके लिए क्या बातें उभरकर आई हैं?

 

यह वर्ष में एक बार होने वाला फसह का पर्व था। जोसेफुस, जो यहूदी इतिहासकार था, मूसा की अगवाई में इजराइल के मिस्र छोड़ने के इस महत्वपूर्ण समय की याद में कहता है कि इस समय लगभग 25 लाख लोग येरूशालेम चले आते थे। कल्पना करें कि आप उन अनगिनत श्रद्धालुओं में से एक हैं जिन्होंने इजराइल के परमेश्वर और येरूशालेम में उसके मंदिर में जाने के लिए वर्षों से पैसा जोड़ है। लोग मोरिया नमक पहाड़ी पर राजा हेरोदेस द्वारा बनवाए मंदिर में जाने के लिए कई हफ़्तों तक सड़क और समुद्री जहाज़ पर सफ़र करते, वही स्थान जहाँ अब्राहम की परीक्षा हुई थी और उसे अपने पुत्र इसहाक की बलि देने के लिए कहा गया था। ऐसे एक श्रद्धालु की तरह, आप परमेश्वर की उपस्तिथि को अनुभव करने और उसकी शांति को अनुभव करते हुए उस वातावरण का आनंद उठाने की लालसा रख रहे होते। केवल इस स्थान के इतिहास पर मनन करना श्रद्धायुक्त भय का एहसास उत्पन्न करेगा। राजा दाऊद और उसका पुत्र, सुलेमान, हेज़ेकिया और नेहम्याह, सब इस स्थान पर रहे थे और उसी स्थान पर चले थे जहाँ अब लोग चल रहे थे। पीढ़ी दर पीढ़ियों ने इस पवित्र स्थान के दर्शन किये हैं। मैंने भी मंदिर की इस पहाड़ी पर कई बार जा इसकी उस दीवार के प्राचीन पत्थरों को देख जो सुलेमान के मंदिर के दिनों के हैं और लगभग 200 टन वजन के होंगे, अद्भुत महसूस किया है। यह अद्भुत महिमामय दृश्य है, शब्द के सही मायनों में, एक महिमामय नज़ारा है। जब एक व्यक्ति मंदिर की पहाड़ी की सीढ़ियों पर चढ़ता है, स्वयं परमेश्वर की उपस्तिथि अनुभव होने लगती है, जबकि मंदिर तो अब वहां नहीं है, और चट्टान की “मोस्लेम डोम” अब उस स्थान पर है। जब उस दिन येशु मंदिर के दरबार में जो अन्य जातियों के लिए था, गया और उसने देखा कि क्या कुछ चल रहा है तो उसका दिल बैठ गया। अन्य जातियों का पूरा दरबार उस समय के महायाजक अन्ना और कैफा द्वारा रखे पैसा बदलने वालों और सामान बेचनेवालों से भरा पड़ा था। अगर आप एक अन्यजाति होते (गैर यहूदी) तो यह आपके लिए परमेश्वर की उपस्तिथि को अनुभव करने के लिए वो स्थान है जहाँ आप मंदिर की पहाड़ी के सबसे नज़दीक तक जा सकते हैं। अन्यजाति और आगे नहीं बढ़ सकते। येशु अन्ना और कैफा की जेब भरने के लिए पक्षियों और जानवरों को अति ऊँचे दामों पर बिकते और खरीदते देख गुस्से से भर गया। मंदिर की पहाड़ी को एक बाज़ार बनाने के द्वारा, व्यवसायीकरण किया जा रहा था! जो गरीब थे, और जिन्होंने फसह के पर्व पर बलि देने के लिए एक निष्कलंक मेमना ख़रीदा था, उनके मेमनों को जाँच के बाद केवल इस कारण से नकार दिया जाता कि अन्ना चाहता था कि केवल उसके जानवरों की बलि दी जाए। इसका अर्थ यह था कि उन्हें वहाँ मंदिर की पहाड़ी से ही जानवर खरीदने पड़तेअन्ना और कैफा का उस भक्ति के स्थान पर पैसा बनाने का कार्य चल रहा था। मंदिर के दरबार में खरीदा मेमना बहार से 15 गुना महंगा होता। अन्ना जो कुछ भी चल रहा था उसकी देखरेख करता और इस खरीदने और बेचने की प्रणाली के लिए जो गरीबों का शोषण कर रही थी, पूरी तरह ज़िम्मेदार था। मंदिर का कर भी देना होता था। विभिन्न देशों से आए लोगों से ज्यादा वसूली होती। यह अनुचित था और बेईमानी से भरा कार्य था यह किसी भी सच्चे भक्त के हृदय को खेदित करता जो समझ सकते थे कि कैसे परमेश्वर के नाम पर लोगों के साथ अनुचित व्यवहार हो रहा है। जब येशु मंदिर की पहाड़ी के निकट पहुँचा, यह आमना-सामना करने का समय था! एक व्यक्ति येशु, महायाजक और उसके परिवार और उन अन्य भ्रष्ट अधिकारीयों के विरुद्ध खड़ा हुआ जो परमेश्वर के हृदय को खेदित करते इस पैसा बनाने की योजना की देखरेख कर रहे थे।

 

अपने पिता के नाम और महिमा के लिए उसका जज़्बा नियंत्रिक क्रोध के रूप में फूट पड़ा। येशु उनकी धृष्टता और लालच से अति क्रोधित हुआ। बस इस तस्वीर की कल्पना करें! सब जगह पैसा गिरता हुआ, लोग जो कुछ भी उनके हाथ लगे उसे झपटते हुए, जैस-जैसे मेजें उलटी गयीं, गलत रीती से फायदे के लिए प्रयोग होने के बजाय स्वतंत्र किये हुए कबूतर सभी दिशाओं में उड़ते हुए। अन्य जातियों के दरबार के भीतर की यह तस्वीर बस अव्यवस्था की है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यहूदी अधिकारीयों को किसी ऐसे से चुनौती मिली हो जिसे वह नाजरेथ से आया एक नाजायज़ पुत्र मानते थे? उनके विचार इस व्यक्ति के प्रति जिसने उनके तरीकों को चुनौती दी, हिंसा की ओर गए होंगे। उसके पास इस तरह से कार्य करने का अधिकार कहाँ से मिला? उन्होंने सोचा होगा: “यह हमें यह बताने की हिम्मत कैसे कर सकता है कि हम मंदिर के प्रांगण में अपने सामान नहीं बेच सकते?” निश्चित ही येशु तो जानता होगा कि मंदिर के दरबार में अपने इस व्यवहार से तो वह मित्र या पक्षधर अर्जित नहीं कर सकता होगा। उसके साहसी कार्य ने अपने पिता के घर के लिए उसके जज़्बे और समर्पण को दर्शाया। एक बार फिर, हम देखते हैं कि वह पिता को महिमा देने के अपने उद्देश्य में एकाकी है।

 

आज-कल धर्म को काफी बेचा जाता है। आपको परमेश्वर की बातों को अधिक लाभ की चीज़ों में बदले जाने के बारे में क्या महसूस होता है? आप इस प्रकार के चलन के क्या खतरे देखते हैं?

 

येशु ने गरीबों, लाचार और समाज से निकाले हुए लोगों के लिए प्रेम और चिंता ज़ाहिर की क्या हम, मसीह के प्रतिनिधियों के रूप में, इन लोगों को ऐसा ही महत्व देते हैं? दुःखद है, लेकिन हम अपने भीतर मसीह से ज्यादा अपने आस-पास संस्कृति से प्रभावित होते हैं हम हो रहे अन्याय को या अपनी आँखों के सामने लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के अवसर हमेशा नहीं देख पाते। येशु के समय के लोगों का भी मंदिर में हो रहे अन्याय पर ध्यान नहीं गया होगा। जब हम पाप के बीच में रहते हैं, तो हम उसके प्रति सुन्न हो सकते हैं। लेकिन जब परमेश्वर किसी परिस्तिथि में आता है, वह उन बातों में ज्योति लाता है जिन्हे गुप्त में किया गया हैइनमें से कुछ बातें अपनाई और सही माने जाने वाली बन गयी होंगी, लेकिन एक दिन ऐसा आयेगा जब वह उन्हें और बर्दाश्त नहीं करेगावचन हमें बताता है कि न्याय की शुरुआत परमेश्वर के घर से होगी (1 पतरस 4:17) वह उन लोगों का बचाने वाला है जो कमज़ोर और असहाय हैं। जब प्रभु का दिन आयेगा, वह अपने साथ न्याय लेकर आयेगा।

 

आप परमेश्वर की किन बातों की सुरक्षा और बचाव करने का जज़्बा रखते हैं? आप क्या सोचते हैं कि अगर येशु आज ऐसे ही एकदम प्रकट हो गया जैसे हम इस खंड में देखते हैं, तो वह आज की भारतीय कलीसिया के बारे में क्या बातें बदलेगा?

 

जब यहूदियों ने येशु से पैसा बदलने वालों और जानवर बेचने वालों को मंदिर से खदेड़ने में उसके अधिकार के विषय में चिन्ह की माँग की, उसने उन्हें यह कहकर उत्तर दिया, “इस मन्दिर को ढा दो, और मैं उसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा।” बिलकुल, वह अब यहाँ मंदिर के विषय में नहीं लेकिन अपनी देह के बारे में बात कर रहा था, पवित्र आत्मा का मंदिर। हम भी वही पवित्र आत्मा के मंदिर हैं। प्रेरित पौलुस कुरिन्थियों को अपनी पहली पत्री में कहता है:

 

19क्या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह पवित्रात्मा का मन्दिर है; जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है, और तुम अपने नहीं हो? 20कयोंकि दाम देकर मोल लिये गए हो, इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो। (1 कुरिन्थियों 6:19-20)

 

पवित्र आत्मा चाहता है कि हम उसके मंदिर से वह सब निकाल फैंकें जो एक मनुष्य के जीवन को भ्रष्ट करता और उसके जीवन से शांति को छीनता है। आज अच्छा दिन होगा कि आप प्रभु येशु को एक नई ताज़गी के साथ अपने मंदिर में उस हर एक बात को निकालने के लिए जिससे वह नाखुश है आमंत्रित करें। अगर हम उस बात के प्रति असंवेदनशील हो गए हैं तो शायद हम उस बात से अवगत भी न हों जो प्रभु का अपमान करती हैपवित्र आत्मा का एक कार्य हमारे उन क्षेत्रों को उजागर कराना है जिन्हे परमेश्वर बदलना चाहता है। इस बारे में सोचने का समय लें कि वह कौन सी बातें हैं जिन्हें परमेश्वर आपको और ज्यादा आत्मिक स्वतंत्रता देने के लिए आपके जीवन से निकालेगा

 

प्रार्थना: पिता, जिस कार्य को तू कर रहा है उसमें शामिल होने से बड़ा मैं जीवन में किसी उद्देश्य के बारे में नहीं सोच सकतामुझे अपने उद्देश्यों में शामिल करने के लिए और अपने और निकट आने के लिए मार्ग उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद अगर मेरे जीवन में ऐसा कुछ भी है जो तुझे खेदित करता है, उसे अभी मुझपर प्रकट करमैं उन सारी बातों को त्यागना चाहता हूँ जो मुझे वह सब पूर्ण करने से रोके रखती हैं जिन्हें आपने मेरे करने के लिए तैयार किया है। उस समर्थ और आनंद के लिए धन्यवाद जो तू मुझे देता है जब मैं तेरे पीछे चलने का चुनाव करता हूँ।