37. The Trials of Jesus

37. यीशु पर मुकद्दमा

मानव जाति के अस्तित्व में आने के बाद से ही राजनीति मानवीय अनुभव का हिस्सा रही है। राजनीति की विकिपीडिया परिभाषा यूनानी शब्द, पॉलिटिकोस से है, जिसका अर्थ नागरिकों की, के लिए या उससे संबंधित है; "एक नागरिक या व्यक्तिगत स्तर पर अन्य लोगों को प्रभावित करने का अभ्यास और सिद्धांत।"

 

कॉमेडियन रॉबिन विलियम्स के पास इस शब्द की एक और परिभाषा थी। उन्होंने कहा कि यह शब्द राजनीति "पोली", जिसका अर्थकईहै, और शब्द "टिक्स", जिसका अर्थ "रक्त चूसने वाले परजीवी" है, से लिया गया है। जब से राजनीतिक दलों का अस्तित्व है तब से राजनीतिक व्यंग्य रहा है। अक्सर, राजनेता एक बात का वादा करते हैं पर करते कुछ और हैं। एक कॉमेडियन ने राजनेता शब्द को इस तरह परिभाषित किया है "एक व्यक्ति जो चुनाव से पहले आपसे हाथ मिलाता है और उसके बाद आपका आत्मविश्वास हिलाता है।" राजनीति और सच्चाई का मेल कराना मुश्किल है। सत्य की खोज में, राजनीति अक्सर सत्ता हासिल करने या बनाए रखने के लिए सच्चाई को उपेक्षित या अनदेखा कर देती है। यीशु के मुकद्दमे के बारे में सोचते हुए, हमें यह समझने की ज़रूरत है कि यीशु, सत्तारूढ़ अगवों और पीलातुस, वह लोग जिनके सामने उसके अपराधी या निर्दोष होने का निर्णय प्रस्तुत किया गया था, के लिए एक राजनीतिक दुविधा का कारण बना।

 

काइफा और महासभा के सम्मुख यीशु का मुकद्दमा

 

यहुन्ना हमें काइफा के सम्मुख यीशु के मुकद्दमे के बारे में कुछ नहीं बताता, शायद इसलिए कि उसने मत्ती, मरकुस और लूका के बाद अपना सुसमाचार लिखा था, इसलिए यह संभव है कि वह दूसरों के समान बातें फिर नहीं लिखना चाहता था। अपदस्थ महायाजक, हन्ना, द्वारा प्रश्न पूछे जाने के और पतरस के तीन बार इनकार के बाद, यीशु को महासभा और प्राचीनों के सम्मुख मुकद्दमे के लिए महायाजक काइफा के आँगन में भेज दिया गया, जो कि कई मयनो में एक अवैध मुकद्दम था। एक बात तो यह है कि यह रात के दौरान आयोजित किया गया था, और यहूदी कानून ऐसे समय में मुकद्दमे करने की अनुमति नहीं देता था। इसके अलावा, जबकि महायाजक उस पर हावी होने की कोशिश कर रहा था, यीशु के पास उसकी तरफ से बोलने वाला कोई वकील नहीं था। गवाह भी एक दूसरे के साथ सहमत नहीं हो पा रहे थे, इसलिए अंत में, झुंझलाए काइफा ने मसीह को सीधे शपथ के अधीन आरोपों का जवाब देने का आदेश दिया, और इस प्रकार मसीह को जीवित परमेश्वर की गवाही के तहत बाध्य किया। मत्ती ने काइफा को इन शब्दों में यीशु को आज्ञा देते दर्ज किया है; "मैं तुझे जीवते परमेश्वर की शपथ देता हूँ, कि यदि तू परमेश्वर का पुत्र मसीह है, तो हम से कह दे" (मत्ती 26:63) मरकुस हमें यीशु की प्रतिक्रिया देता है;

 

60तब महायाजक ने बीच में खड़े होकर यीशु से पूछा, “तू कोई उत्तर नहीं देता? ये लोग तेरे विरोध में क्या गवाही देते हैं?” 61परन्तु वह मौन साधे रहा, और कुछ उत्तर दिया। महायाजक ने उससे फिर पूछा, “क्या तू उस परम धन्य का पुत्र मसीह है?” 62यीशु ने कहा; हाँ मैं हूँ; और तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी और बैठे, और आकाश के बादलों के साथ आते देखोगे। 63तब महायाजक ने अपने वस्त्र फाड़कर कहा, “अब हमें गवाहों का और क्या प्रयोजन है 64तुम ने यह निन्दा सुनी, तुम्हारी क्या राय है?” उन सब ने कहा, वह वध के योग्य है। 65तब कोई तो उस पर थूकने, और कोई उसका मुंह ढांपने और उसे घूसे मारने, और उससे कहने लगे, “भविष्यवाणी कर!” और प्यादों ने उसे लेकर थप्पड़ मारे। (मरकुस 14:60-65)

 

ध्यान दें कि यीशु ने परमेश्वर के आलौकिक नाममैं हूँका उपयोग फिर से करा (पद 62) यहूदी प्राचीनों के लिए यह वह उत्तर है जिसने यीशु का भाग्य तय कर दिया। इस बिंदु पर मुकद्दमा समाप्त हो गया था, "अब हमें गवाहों का और क्या प्रयोजन है" (पद 63) मसीह को इस बात के लिए दोषी ठहराया गया कि उसने यह सच्चाई बताई कि वह कौन है। यीशु ने महायाजक के सामने खड़ा होकर उसके मुंह पर दावा किया कि वह नबी दानिय्येल के द्वारा लिखा गया जन है, अर्थात् वह जिसे मनुष्य का पुत्र कहा गया है, मसीहा, जो दाऊद के सिंहासन पर बैठेगा, और उसकी आराधना की जाएगी।

 

13मैंने रात में स्वप्न में देखा, और देखो, मनुष्य के सन्तान सा कोई आकाश के बादलों समेत रहा था, और वह उस अति प्राचीन के पास पहुंचा, और उसको वे उसके समीप लाए। 14तब उसको ऐसी प्रभुता, महिमा और राज्य दिया गया, कि देश-देश और जाति-जाति के लोग और भिन्न-भिन्न भाषा बालने वाले सब उसके आधीन हों; उसकी प्रभुता सदा तक अटल, और उसका राज्य अविनाशी ठहरा। (दानिय्येल 7:13-14 बल मेरी ओर से जोड़ा गया है)

 

काइफा और महासभा के मसीह पर मुकद्दमे का फैसला सुनाए जाने के बाद, मरकुस लिखता है कि उन्होंने यीशु को ऐसे शब्द बोलने के लिए, जो उनके लिए परमेश्वर की निंदा के शब्द थे, उसपर थूका। फिर, मसीह की आंखों पर पट्टी बांध दी गई ताकि वह उस सुबह महासभा में उन लोगों के घूंसे का अनुमान लगा कर अपना बचाव न कर सके (मरकुस 14:65) लूका ने यह भी लिखा कि उन्होंने उसे घूंसे मारे और उन्होंने उसे पीलातुस के सामने लाने से पहले पीटा (लूका 22:63)

 

पिन्तूस पीलातुस को प्रभावित करने वाली राजनीति

 

जब पीलातुस का सामना स्वयं सत्य, प्रभु यीशु के साथ हुआ, तो फिर से यह राजनीति ही थी जिसने उसके कठिन निर्णय को प्रभावित किया। पहली नज़र में, ऐसा लग सकता है कि केवल यीशु की ही परीक्षा थी, लेकिन करीब से देखने पर, हम देख सकते हैं कि यह पीलातुस और सत्तारूढ़ प्राचीन की अपने प्राण के लिए परीक्षा थी। आइए रोमी शासक के आसपास की राजनीति को करीब से देखें।

 

यहूदी नागरिक और शुद्ध करने के नियम की पुस्तक तल्मूड में यह दर्ज है कि, यरूशलेम के मंदिर के विनाश से चालीस वर्ष पहले, यानी, मसीह के सूली पर चढ़ाए जाने से दो वर्ष पूर्व, जीवन और मृत्यु के मामलों में निर्णय इज़राइल से छीन लिया गया था। टिबेरियस कैसर ने यह निर्णय लिया था कि केवल शासक को ही किसी व्यक्ति को मृत्युदंड देने का अधिकार था, लेकिन इसका सख्ती से पालन नहीं किया गया था, क्योंकि कुछ ही महीनों बाद सतीफुनुस की पथराव कर हत्या कर दी गई थी, जो कि एक अवैध कार्य था (प्रेरितों 7), और साथ ही अगवों ने व्यभिचार में पाई महिला को पथराव कर मार डालने की कोशिश भी की (यहुन्ना 8:5)

 

टिबेरियस कैसर ने रोम में अपने विश्वासी साथी लुसिअस सेजेनस को प्रशासन सौंपा था। क्योंकि यहूदिया (इज़राइल) की भूमि को शासन करने के लिए एक समस्याग्रस्त भूमि के रूप में जाना जाता था, सेजेनस ने पीलातुस को यहूदिया के शासक के रूप में चुना था क्योंकि वह एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाता था जो अपने अधीन लोगों की कोई फालतू बात नहीं चलने देता। लेकिन, पीलातुस के आगमन पर, उसने गलतियाँ करना शुरू कर दीं। उसने उनके मानकों पर कैसर की छवि छपवाते हुए कैसरिया में समुद्र के किनारे स्थित अपने भंडार से येरुशलम तक अपने सैनिकों की परेड निकलवाई। रोम के लोगों का मानना ​​था कि कैसर एक देवता था, जो निश्चित रूप से यहूदी लोगों के लिए आपत्तिजनक था। पीलातुस ने निर्णय कर लिया था कि यहूदिया और यरूशलेम के रोमी प्रांतों को रोम के किसी अन्य प्रांत की तरह माना जाना चाहिए। सभी तरह के धार्मिक विरोध फूट पड़े। इतिहासकार जोसेफस ने लिखा है कि जब रोमी सेना और पीलातुस कैसरिया लौट आए, तो यहूदियों का एक समूह उससे उनका मामला सुनने की गुहार के साथ उनके पीछे आए। जोसेफस ने जो लिखा वह यहाँ है;

 

[विरोध के] छठे दिन उसने अपने सैनिकों को अपने हथियार [छुपाने] का आदेश दिया, जबकि वह आकर अपनी मुकद्दमे की गद्दी पर बैठ गया, जो कि शहर के खुले स्थान में इस प्रकार तैयार की गई थी कि यह उस सेना को छुपा ले जो उन्हें प्रताड़ित करने के लिए तैयार थी; और जब यहूदियों ने फिर से उस से विनती की, तो उसने सैनिकों को उन्हें घेरने का एक संकेत दिया, और धमकी दी कि अगर वह उसे परेशान करने से बाज़ आकर अपने घरों के मार्ग में नहीं निकलेंगे, तो उनकी सजा तत्काल मृत्यु से कम नहीं होगी। लेकिन उन्होंने खुद जमीन पर लेटाकर, और अपनी गर्दन को नंगा करते हुए कहा कि वे स्वेच्छा से अपनी मृत्यु को अपनाएँगे, बजाय इसके कि उनके कानूनों की बुद्धिमता के साथ खिलवाड़ किया जाए; जिस पर पीलातुस उनके अपने कानूनों के न तोड़े जाने के दृढ़ संकल्प से प्रभावित हुआ, और छवियों को यरूशलेम से कैसरिया वापस ले जाने की आज्ञा दी।

 

इस घटना के कुछ ही समय बाद, एक और दंगा भड़का और कई लोगों के मारे जाने के साथ पीलातुस द्वारा क्रूर बल के दम पर इसे कुचला गया, इसलिए कुछ ही दिनों के भीतर, यहूदी नेतृत्व ने टिबेरियस कैसर को पीलातुस को उसके पद से बर्खास्त करने की याचिका दी। पीलातुस जानता था कि उसे यहूदी संवेदनशीलता से सावधान रहना होगा; अन्यथा, वह अपनी नौकरी से हाथ धो बैठेगा।

 

पीलातुस से यीशु को मृत्युदंड देने की मांग (यहुन्ना 18:28-32)

 

पीलातुस के सम्मुख यीशु का पेश होना अपेक्षित था क्योंकि रात को यीशु को गिरफ्तार करने गई सैनिकों की बड़ी टुकड़ी के पास पीलातुस की अनुमति होनी ही चाहिए थी। अब दिन का उजाला था और शायद सुबह 6 बजे के आसपास का समय होगा जब प्राचीन प्रभु यीशु, और महायाजक का जुलूस यरूशलेम में पीलातुस के मुख्यालय में पहुँचा। यहूदियों ने इस कठोर नियम के कारण इमारत में प्रवेश नहीं किया कि अन्यजातियों के घर एक यहूदी के लिए शुद्ध नहीं माने जाते थे। अल्फ्रेड एडर्सहाइम ने अपनी पुस्तक, लाइफ एंड टाइम्स ऑफ जीसस मसायाह में इस तथ्य को उजागर किया है कि यहूदियों का मानना ​​था कि अन्यजाति के लोग अपने बच्चों का गर्भपात करा अवशेषों को नालियों में बहाते हैं। एक मृत शरीर के संपर्क में होने के बाद अनुष्ठान की शुद्धि के लिए सात दिनों की आवश्यकता होती थी। फसह का नियम भी यह कहता है कि, फसह के दिनों से पहले, घर को सावधानीपूर्वक स्वच्छ किया जाना था और सभी खमीर को अखमिरी रोटी के पर्व के सात दिनों की शुरुआत से पहले हटा दिया जाना चाहिए, जिसका पहला दिन फसह था (निर्गमन 12:15) इस बात पर निर्भर कि भवन में क्या छुआ गया था, अन्यजाति के निवास में होने के बाद, अनुष्ठान की शुद्धि एक दिन से लेकर सात दिनों के बीच हो सकती थी।

 

28और वे यीशु को काइफा के पास से किले को ले गए और भोर का समय था, परन्तु वे आप किले के भीतर गए ताकि अशुद्ध हों परन्तु फसह खा सकें। 29तब पीलातुस उनके पास बाहर निकल आया और कहा, “तुम इस मनुष्य पर किस बात की नालिश करते हो?” 30उन्होंने उसको उत्तर दिया, “यदि वह कुकर्मी होता तो हम उसे तेरे हाथ सौंपते।31पीलातुस ने उनसे कहा, “तुम ही इसे ले जाकर अपनी व्यवस्था के अनुसार उसका मुकद्दमे करो; यहूदियों ने उससे कहा, “हमें अधिकार नहीं कि किसी का प्राण लें।

 

32यह इसलिये हुआ, कि यीशु की वह बात पूरी हो जो उस ने यह पता देते हुए कही थी, कि उसका मरना कैसा होगा (यहुन्ना 18:28-32)

 

पहले, एक समय में, यीशु ने धर्मगुरुओं और फरीसियों पर मच्छर को छान निकालने और ऊंट को निगलने का आरोप लगाया था (मत्ती 23:24) इसका क्या अर्थ है, और यह खंड इससे कैसे संबंधित है?

 

धार्मिक अगवों ने मुकद्दमे और दया को भुला दिया, और यीशु के उनके मसीहा होने की बात की सच्चाई बताने के लिए पीट कर और चोट पहुँचते हुए, अवैध रूप से अपने मसीहा को एक अपराधिक अदालत में धकेल दिया, और फिर वे यहाँ एक अन्यजाति के घर में प्रवेश करने के लिए अनुष्ठान की अशुद्धि के विषय में चिंतित थे! अक्सर, कलीसिया के लोग आत्मिक जीवन के अधिक आवश्यक मसलों को छोड़ते हुए छोटी चीजों का बतंगड़ बना देते हैं।

 

पीलातुस आंगन में प्राचीनों और भीड़ के पास बाहर आया। उसने उनसे पूछा, तुम इस मनुष्य पर किस बात की नालिश करते हो?” (यूहन्ना 18:29) महायाजकों और फरीसियों को उसका यह सवाल पूछना पसंद नहीं आया क्योंकि उनके पास रोमी अदालत में मसीह के खिलाफ कोई आरोप नहीं था। उनका अभियोग धार्मिक था, अर्थात्, परमेश्वर के खिलाफ निंदा का आरोप। वे जानते थे कि पीलातुस के सामने यह आरोप नहीं टिकेगा। एक आरोप के बजाय, उन्हें लगा कि उनके पास पहले से ही पीलातुस के साथ एक समझौता है। यदि वह कुकर्मी होता तो हम उसे तेरे हाथ सौंपते(पद 30) पीलातुस को पहले से ही यीशु के प्रति ईर्ष्या और घृणा का पता था और उसे उनपर विश्वास नहीं था, इसलिए उसका उत्तर था, तुम ही इसे ले जाकर अपनी व्यवस्था के अनुसार उसका मुकद्दमे करो (पद 30) पीलातुस महायाजकों और प्राचीनों के यीशु के लिए मृत्यु की सजा की ज़िद्द की उम्मीद नहीं कर रहा था, इसलिए उसने उनसे कहा कि वह उसकी अदालत के बाहर, अपने आप मसीह के साथ इस परिस्थिति को निपटाएँ। शायद, यह इसी समय पर था कि पीलातुस की पत्नी एक मजबूत चेतावनी के संदेश के साथ उसके पास आई जो उसने एक स्वप्न में देखा था। यदि हम इसे सुनने और ग्रहण करने का मन रखते हैं, तो परमेश्वर अक्सर एक विचार, स्वप्न, कलीसिया में संदेश, या यहाँ तक ​​कि हमारे किसी मित्र के शब्दों का उपयोग कर हमारे पाप करने से पहले हमें रोकते हैं।

 

पीलातुस की पत्नी के शब्दों को मत्ती ने लिखा;

 

जब वह मुकद्दमे की गद्दी पर बैठा हुआ था तो उस की पत्नी ने उसे कहला भेजा, कि तू उस धर्मी के मामले में हाथ डालना; क्योंकि मैंने आज स्वप्न में उसके कारण बहुत दुख उठाया है। (मत्ती 27:19)

 

पीलातुस ने उन्हें स्वयं मसीह का मुकद्दमे करने की अनुमति दी। उन्होंने पीलातुस के शब्दों को व्यावहारिक रूप से लेते हुए उसे तुरंत क्यों नहीं मार डाला? (यहुन्ना 18:31)

 

यह संभव है कि महायाजक और प्राचीन रोमी लोगों को मसीह की मृत्यु का दोषी ठहराने की योजना बना रहे थे क्योंकि इस तरह वे खुद को दोष मुक्त घोषित कर सकते थे। पीलातुस के फैसले के जवाब में, उन्होंने आपत्ति जताते हुए कहा, हमें अधिकार नहीं कि किसी का प्राण लें।यह इसलिये हुआ, कि यीशु की वह बात पूरी हो जो उस ने यह बताते हुए कही थी, कि उसका मरना कैसा होगा (यहुन्ना 18:32) यीशु ने कुछ समय पहले भविष्यवाणी की थी कि उसे क्रूस पर चढ़ाया जाएगा; 18और मनुष्य का पुत्र महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ पकड़वाया जाएगा और वे उसको घात के योग्य ठहराएंगे। 19और उसको अन्यजातियों के हाथ सोंपेंगे, कि वे उसे ठट्ठों में उड़ाएं, और कोड़े मारें, और क्रूस पर चढ़ाएं, और वह तीसरे दिन जिलाया जाएगा (मत्ती 20: 18-19), और यहुन्ना ने यीशु को यह कहते हुए दर्ज किया कि वह ऊंचे पर चढ़ाये जाने के द्वारा मारा जाएगा; और मैं यदि पृथ्वी पर से ऊंचे पर चढ़ाया जाऊंगा, तो सब को अपने पास खीचूंगा(यूहन्ना 12:32) यहूदी नेतृत्व उसके ऊपर श्राप मढ़ कर उसके मसीहा (मसीह) होने के दावे को भी झुठलाना चाहते थे। वे चाहते थे कि मसीह फांसी की यहूदी पद्धति के बजाय क्रूस पर मरे, जो कि पथराव कर मृत्यु के समान था। काठ के एक टुकड़े (पेड़/ वृक्ष) पर लटका दिया जाना परमेश्वर द्वारा शापित होने के समान था;

 

22फिर यदि किसी से प्राणदण्ड के योग्य कोई पाप हुआ हो जिससे वह मार डाला जाए, और तू उसकी लोथ को वृक्ष पर लटका दे, 23तो वह लोथ रात को वृक्ष पर टंगी रहे, अवश्य उसी दिन उसे मिट्टी देना, क्योंकि जो लटकाया गया हो वह परमेश्वर की ओर से शापित ठहरता है; इसलिये जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तेरा भाग करके देता है उसकी भूमि को अशुद्ध करना (व्यवस्थाविवरण 21:22-23)

इस सब के पीछे, परमेश्वर अपने पुत्र को हमारे स्थान पर देने का कार्य कर रहा था। यीशु हमारे ऊपर लटका हुआ अभिशाप ले लेगा। प्रेरित पौलुस गलातियों की कलीसिया को लिखता है कि एक कारण था कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को एक पेड़ पर लटकाने दिया और उसे श्रापित होने दिया;

 

10सो जितने लोग व्यवस्था के कामों पर भरोसा रखते हैं, वे सब श्राप के आधीन हैं, क्योंकि लिखा है, कि जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह श्रापित है। 11पर यह बात प्रगट है, कि व्यवस्था के द्वारा परमेश्वर के यहाँ कोई धर्मी नहीं ठहरता क्योंकि धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा। 12पर व्यवस्था का विश्वास से कुछ सम्बन्ध नहीं; पर जो उनको मानेगा, वह उनके कारण जीवित रहेगा। 13मसीह ने जो हमारे लिये श्रापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया क्योंकि लिखा है, “जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित है। 14 यह इसलिये हुआ, कि इब्राहिम की आशीष मसीह यीशु में अन्यजातियों तक पंहुचे, और हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें, जिसकी प्रतिज्ञा हुई है (गलातियों 3:10-14)

 

टिप्पणीकार विलियम बार्कले हमें बताते हैं कि क्रूस पर चढ़ाये जाने का उद्भव "फारस में हुआ था, और इसकी उत्पत्ति इस बात से हुई कि पृथ्वी को ओरमुज़ देवता के लिए पवित्र माना जाता था, और अपराधी को इसलिए उठा दिया जाता था कि वह पृथ्वी को अपवित्र कर सके, क्योंकि वह उस देवता की संपत्ति थी। फारस से, क्रूस पर चढ़ाया जाना उत्तरी अफ्रीका में कार्थेज के पास गया, और यह कार्थेज से था कि रोम ने इसे सीखा।" इजरायल के रोमी कब्जे के दौरान रोम ने यह चेतावनी देने के लिए कि जो कोई भी रोम के विरुद्ध जाएगा उसके साथ ऐसा ही होगा, कम से कम 30,000 यहूदियों को सूली पर चढ़ा दिया था। यहूदी नेतृत्व यीशु के लिए ऐसी मौत चाहते थे जो सबसे बुरी हो, और इसके साथ ही, वो उसे जिसे लोगों ने सोचा कि वह मसीहा था, उस पर एक अभिशाप डालकर आम लोगों को झटका भी देना चाहते थे। परमेश्वर हमें दिखा रहा था कि यीशु ने अपने सिर पर श्राप के कांटे पहन लिए। अदन की वाटिका में, जब आदम ने परमेश्वर के बजाय सर्प की आवाज को मानने का फैसला किया, तो प्रभु ने कहा; भूमि तेरे कारण शापित है तू उसकी उपज जीवन भर दु:ख के साथ खाया करेगा और वह तेरे लिए कांटे और ऊंटकटारे उगाएगी, तू खेत की उपज खाएगा(उत्पत्ति 3:17-18) क्रूस पर लाए गए श्राप की पूर्ति में, उन्होंने "काटों को मुकुट गूंथकर उसके सिर पर रखा" (मत्ती 27:29 बल मेरी ओर से जोड़ा गया है)

 

पीलातुस ने यीशु से उसके राजा होने के बारे में पूछा (यहुन्ना 18: 33-38a)

 

33तब पीलातुस फिर किले के भीतर गया और यीशु को बुलाकर उससे पूछा, “क्या तू यहूदियों का राजा है?” 34यीशु ने उत्तर दिया, “क्या तू यह बात अपनी ओर से कहता है या औरों ने मेरे विषय में तुझ से कही?” 35पीलातुस ने उत्तर दिया, “क्या मैं यहूदी हूँ? तेरी ही जाति और महायाजकों ने तुझे मेरे हाथ सौंपा, तूने क्या किया है? 36यीशु ने उत्तर दिया, “मेरा राज्य इस जगत का नहीं, यदि मेरा राज्य इस जगत का होता, तो मेरे सेवक लड़ते, कि मैं यहूदियों के हाथ सौंपा जाता; परन्तु अब मेरा राज्य यहाँ का नहीं।37पीलातुस ने उससे कहा, “तो क्या तू राजा है?” यीशु ने उत्तर दिया, “तू कहता है, क्योंकि मैं राजा हूँ; मैंने इसलिये जन्म लिया, और इसलिये जगत में आया हूँ कि सत्य पर गवाही दूँ जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द सुनता है।38पीलातुस ने उससे कहा, “सत्य क्या है?” और यह कहकर वह फिर यहूदियों के पास निकल गया और उनसे कहा, “मैं तो उसमें कुछ दोष नहीं पाता। 39पर तुम्हारी यह रीति है कि मैं फसह में तुम्हारे लिये एक व्यक्ति को छोड़ दूँ सो क्या तुम चाहते हो, कि मैं तुम्हारे लिये यहूदियों के राजा को छोड़ दूँ?” 40तब उन्होंने फिर चिल्लाकर कहा, “इसे नहीं परन्तु हमारे लिये बरअब्बा को छोड़ दे; और बरअब्बा डाकू था(यहुन्ना 18:33-40)

 

जिस तरह से यह सब चल रहा था, पीलातुस को पहले से ही यह अच्छा नहीं लग रहा था। वह यीशु को धार्मिक अभिजात वर्ग से अलग लेकर आया और उसने मसीह से अपने कक्ष के अंदर से निजी तौर पर बात की। उसने मसीह से पूछा, क्या तू यहूदियों का राजा है?” उसने यह इसलिए पूछा क्योंकि यहूदी अगवे पीलातुस को उसपर दोष सिद्ध करने के लिए यही आरोप लगा रहे थे। रोम में केवल एक राजा हो सकता था और उनके लिए वह कैसर था। लेकिन अपने हृदय में, पीलातुस को लगा कि यीशु निर्दोष है, लेकिन अगर उसे यहूदी प्राचीनों की मांग को स्वीकृति देनी होगी, तो उसे किसी अभियोग की आवश्यकता थी।

 

आपको क्या लगता है कि पीलातुस ने किस बात से प्राचीनों के दबाव में झुकना शुरू किया? क्या है जो एक व्यक्ति को अपने मूल्यों से समझौता करने का कारण बनता है?

 

पीलातुस यहूदियों के इन अगवों के दबाव में इसलिए भी आया क्योंकि वह पहले से ही जानता था कि वे मामले की कैसर से शिकायत कर इसे और बढ़ाएँगे, और इस प्रकार वह इस स्थिति को संभालने के लिए अक्षम दिखेगा। इज्ज़त या पद खोने का डर अपने आंतरिक मूल्यों से समझौता करने के लिए एक मजबूत प्रेरक है। उसने यीशु से कहा, क्या तू यहूदियों का राजा है?” (यहुन्ना 18:33) मसीह के उत्तर में, प्रभु प्रश्न के संदर्भ को जानना चाहता था। यदि पीलातुस राजनीतिक या सांसारिक दृष्टिकोण से प्रश्न पूछ रहा है, तो नहीं, उस संदर्भ में, यीशु एक राजा नहीं था। मसीह का राज्य बल और भयभीत करने की इस विश्व व्यवस्था का नहीं है, लेकिन अगर पीलातुस पवित्र-शास्त्र के दृष्टिकोण से यह सवाल पूछ रहा है - तो हाँ, वह यहूदियों का राजा है, और वह परमेश्वर के सत्य की गवाही देने, जीत हासिल करने और पृथ्वी पर शैतान के शासन को शून्य करने के लिए आया है।

 

मसीह का शासन पूर्णत: अलग क्रम का है। उसकी प्रतिक्रिया ने पीलातुस को उसके रोम के खिलाफ हथियार उठाने वाला होने का दोषी ठहराने के लिए कोई सबूत नहीं दिया। यीशु ने कहा, मैंने इसलिये जन्म लिया, और इसलिये जगत में आया हूँ कि सत्य पर गवाही दूँ जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द सुनता है(पद 37) प्रभु पीलातुस को अपने द्वारा कहे सत्य पर प्रतक्रिया देने की अनुमति दे रहा था, ठीक वैसे ही जैसा वह हम सभी के साथ करना चाहता है, अर्थात, उस पाप से बाहर निकलने का जिसके बारे में हम जानते हैं कि यदि हम इसमें आगे बढ़ना जारी रखेंगे तो वह हमारे प्राण के लिए हानिकारक होगा। यदि मनुष्य के पास एक ईमानदार हृदय है और वह सत्य की खोज कर रहा है, तो निश्चित ही सत्य बोल सुनकर उसे स्पष्टता से मालूम हो जाएगा। परमेश्वर की सच्चाई एक तलवार की तरह है जो हमें एक पक्ष चुनने को उकसाती है। जब सच्चाई हमारे सामने प्रस्तुत की जाती है, तो एक विभाजन रेखा होती है, यानी एक चुनाव; या तो हम अधिक भूख के साथ प्रतिक्रिया देंगे, या फिर हम अपने मन और हृदय को बंद कर परमेश्वर की सच्चाई को अस्वीकार कर देंगे।

 

क्या आपको वह समय याद है जब आपने पहली बार सुसमाचार की सच्चाई सुनी थी? क्या कोई दर्दनाक परिस्थितियाँ थीं जिनके कारण आपको सच्चाई की खोज करनी पड़ी?

 

यीशु कह रहा था कि वह सब जो सत्य से प्रेम करते हैं उसकी सुनते हैं। जब हम यीशु के बारे में सच्चाई सुनते हैं, तो हम एक तरफ या दूसरी तरफ हो जाते हैं। कोई बीच का रास्ता नहीं है, अर्थात्, बैठने के लिए कोई बाड़ नहीं है, और हम या तो परमेश्वर के वचन को अस्वीकार करते हैं या अधिक के लिए भूख रखते हैं। यीशु ने