36. The Three-Time Denial of Peter

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36. पतरस का तीन बार इंकार

रूपान्तरण की प्रक्रिया

 

18उसने गलील की झील के किनारे फिरते हुए दो भाइयों अर्थात शमौन को जो पतरस कहलाता है, और उसके भाई अन्द्रियास को झील में जाल डालते देखा; क्योंकि वे मछवारे थे। 19और उनसे कहा, मेरे पीछे चले आओ, तो मैं तुम को मनुष्यों के पकड़ने वाले बनाऊंगा। 20 वे तुरन्त जालों को छोड़कर उसके पीछे हो लिए। (मत्ती 4:18-20)

 

अगर मैं आपसे यह पूछूँ कि ऊपर लिखे शब्दों से यीशु का क्या अर्थ है, तो आप शायद कहेंगे कि यीशु दो मछुआरों, शमौन पतरस और अन्द्रियास को, मछ्ली के बजाय मनुष्यों को पकड़ने के लिए बुला रहा है, और आप सही भी होंगे। लेकिन, इस कथन में चार ऐसे शब्द हैं जो उस सब को समाहित करते हैं जो यीशु अपने सभी समर्पित अनुयायियों के साथ करता है। ये शब्द हैं: "मैं तुम को बनाऊंगा।" मछुआरों को उसकी पुकार यह थी कि वह उसके पास आएं, उसके पीछे चलें और उनके उसके पीछे चलने की प्रक्रिया में, वह उनके जीवन में अपने कार्य के द्वारा उन्हें मनुष्यों के पकड़ने वाले बनाएगा। मैं इन चार शब्दों को करीब से देखना चाहता हूँ, कि यीशु के अनुयायियों के रूप में वे हमारे लिए क्या मायने रखते हैं।

 

यदि मैं आपसे पूछूँ, कि आप अपने कार्य में क्या बनाते हैं, तो उदाहरण के लिए, यदि आप एक कलाकार हैं, आप शायद यह कहकर जवाब देंगे कि आप चित्रकला बनाने के व्यवसाय में हैं। यदि आप एक खानसामा होंगे, तो आप यह कहकर जवाब दे सकते हैं कि आप रोटी बनाते हैं। हम सभी अपने जीवनों में कुछ बना रहे हैं। मैं इस आशा में सिखाने और लिखने के व्यवसाय में हूँ कि मैं शिष्य बनाने के लिए प्रभु के हाथ में एक उपकरण बनूँ। मसीह रूपांतरित, सामर्थी शिष्यों को बनाने का कार्य करता है। शिष्य सीखने वाले और अनुयायी होते हैं, वे लोग जिन्होंने मसीह का अनुसरण करने के लिए अपने पुराने जीवन को त्याग दिया है और उसके और उसके राज्य के उद्देश्यों के प्रति समर्पण और अधीनता में अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

 

आइए पवित्रशास्त्र में एक और वचन को देखें जो हमें यह समझने में मदद करेगा कि परमेश्वर हमारे जीवन में क्या कर रहा है;

 

क्योंकि जिन्हें उसने पहले से जान लिया है उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों (रोमियों 8:29)

 

यदि जीवन केवल मसीह को खोजने के बारे में है, तो जब हम उसके पास आते हैं और पवित्र आत्मा द्वारा नए सिरे से जन्म लेते हैं, तो वह हमें घर क्यों नहीं ले जाता? क्या सिर्फ मसीह को खोजने से ज्यादा जीवन में कुछ है?

 

कई वर्षों से अपने उद्धारकर्ता की सेवा करने में, मैंने एक राय बनाई है कि जब हम मसीह में आते हैं और उसके पीछे चलना शुरू करते हैं, तो प्रभु हमारे बाकी जीवन भर का उपयोग हमें यीशु की तरह बनाने के लिए हमें भीतर से रूपांतरित करने के लिए करता है। पौलुस इस प्रक्रिया के बारे में बात करता है, जो धीरे-धीरे शुरू होती है और जब हम परमेश्वर की आत्मा के प्रति लगातार आज्ञाकारी बने रहते हैं, तब समय के साथ यह बढ़ती जाती है;

 

परन्तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता है, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं (2 कुरिन्थियों 3:18)

 

यूनानी शब्द मेटामोरफू वह शब्द है जिसका अनुवाद हमारी हिन्दी भाषा में बदलतेके रूप में किया गया है। इसका अर्थ है "स्थान, स्थिति या रूप का बदलना; रूपांतरित होना, काया पलट होना, मौलिक रूप से बदलना। यह शब्द आत्मिक परिवर्तन के लिए उपयोग किया जाता है, और यह मसीहीयों में एक अदृश्य प्रक्रिया है। यह परिवर्तन इस युग में हमारे जीवन के दौरान होता है।प्रेरित यहुन्ना भी इस बदलाव की बात करता है जो परमेश्वर हमारे भीतर कर रहा है;

 

हे प्रियों, अभी हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्या कुछ होंगे! इतना जानते हैं, कि जब वह प्रगट होगा तो हम भी उसके समान होंगे, क्योंकि उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है। (1 यहुन्ना 3:2)

 

जे. आर. मिलर ने लिखा, ''कब्र से, शोक करने वालों के साथ वापस जाने वाली और दफन होने से इंकार करने वाली एकमात्र चीज है उस मृतक का चरित्र। मनुष्य जो है, वह उसके बाद भी जीवित रहता है। इसे कभी दफनाया नहीं जा सकता।" हेनरी वार्ड बीचर ने इसे इस तरह कहा; "खुशी नहीं, चरित्र जीवन का अंत है।" एक बार हम मसीही बन जाते हैं, परमेश्वर हमारे जीवन में हमें चरित्रवान बनाने के कार्य पर लग जाता है, और हमारे चरित्र को जीवन की परीक्षाओं और कठिनाइयों के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं से मापा जाता है। थॉमस चाल्मर्स ने भी चरित्र के विषय में इस तरह से लिखा है; "जिस चरित्र के साथ हम मृत्यु के समय कब्र में दफनाए जाते हैं, वही वह चरित्र है जिस में हम पुनरुत्थान के समय प्रकट होंगे।"

 

स्वयं को संपूर्णता से परमेश्वर के कार्य के लिए दिये जाने की अपनी बुलाहट के बाद के वर्षों में, मैंने कई अगवों की नेतृत्व में प्रशिक्षण और मदद की है। कलीसिया जितनी बड़ी होती है, उतने ही अगवों की बुलाहट होने, सिखाने और तैयार करने की आवश्यकता होती है। मैंने पाया है कि लोग खुद को अगवा नहीं मानते हैं, और जब भी मैंने उन्हें समूह की अगवाई करने के लिए कहा है, तो यह उनके लिए एक झटके के रूप में आता है। जब मैं अगवों की तलाश करता हूँ, तो सबसे पहली चीज जिसे मैं खोजता हूँ वह परमेश्वर के प्रति और लोगों के प्रति प्रेम है। बाकी सब कुछ सिखाया जा सकता है। मैं यह भी देखना चाहता हूँ कि क्या वह व्यक्ति जोखिम उठाने को तैयार है और उसका क्या दिल बाहर की ओर केंद्रित है। लेकिन, आज हमारे सामने सवाल यह है कि परमेश्वर हमें अपने स्त्री और पुरुष कैसे बनाता है, और हम इसमें उसका सहयोग कैसे कर सकते हैं? परमेश्वर लोगों के चरित्र को कैसे निखारता है और उन्हें अनंत काल के लिए कैसे तैयार करता है। यहुन्ना की पुस्तक में पतरस के बारे में खंड हमें यह देखने में मदद करेगा कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है।

 

पतरस का रूपान्तरण

 

जब मसीह ने शमौन पतरस को बुलाया, तो उसने देखा कि उसके आत्मिक डी.एन. में वह अनिर्मित नेतृत्व था। पतरस जोखिम लेता, जबकि अन्य नहीं। वह साहसपूर्वक नाव से बाहर निकला और यीशु के आदेश पर पानी पर चला (मत्ती 14:30) उसने अपना साहस तब दिखाया जब उसने यीशु को पकड़वाए जाने से बचाने के लिए गतसमनी में महायाजक के सेवक मलखुस पर हमला किया (यहुन्ना 18:10) हमने यीशु के प्रति उसकी आज्ञाकारिता को तब भी देखा जब यीशु ने मछली पकड़ने के लिए उसे अपनी नाव को गहरे पानी में उतारने के लिए कहा। उसने ऐसा तब भी किया जब वह मानता था कि यह असंभव है क्योंकि वे गलील सागर में पूरे दिन मछली नहीं पकड़ पाए थे। मछली को रात में पकड़ा गया जब मछली द्वारा जाल देखा नहीं जा सका होगा (लूका 5:4)

 

एक अगवे में चरित्र के कौन से गुण या लक्षण आपको उन पर भरोसा करने में मदद करते हैं?

 

जबकि पतरस अक्सर बहुत विश्वास दिखाता था और जोखिम से नहीं डरता था, लेकिन यदि पतरस को वह आदमी बनाना था जिसकी आवश्यकता परमेश्वर को नए नियम की कलीसिया के स्तंभ के रूप में थी, तो उसके अन्य गुणों को निखारना आवश्यक था। पतरस के लिए आगे बड़ी योजनाएँ थीं, और उसे आगे के कार्य के लिए उपयुक्त बनाने के लिए प्रभु को उसके जीवन में कार्य करना था। पतरस के आत्मिक विकास में बाधा डालने वाली बातें उसकी दीनता की कमी और उसका अहंकार था, जो उसके उतावले और आवेगपूर्ण शब्दों और कार्यों द्वारा प्रदर्शित होता था। अंतिम भोज में होने वाले इस विवाद में कि उन में से कौन बड़ा समझा जाता है, संभावना यही है कि उकसाने वाला पतरस ही होगा। "उन में यह वाद-विवाद भी हुआ; कि हम में से कौन बड़ा समझा जाता है" (लूका 22:24) हो सकता है, कि पतरस इसलिए नाराज़ था क्योंकि मेज पर यहूदा यीशु के साथ सम्मान का स्थान हासिल करने में कामयाब रहा। निश्चित रूप से, यहूदा यीशु के इतना निकट बैठा होगा कि यीशु उसे रोटी का टुकड़ा दे सके (यहुन्ना 13:26), इसलिए वह संभवतः प्रभु के बाईं ओर बैठा था। अंतिम भोज की मेज़ पर इस विवाद के ठीक बाद, यीशु ने पतरस से कहा कि दुश्मन उसके विश्वास को हिला देगा:

 

31शमौन, हे शमौन, देख, शैतान ने तुम लोगों को मांग लिया है कि गेंहूँ की नाईं फटके। 32परन्तु मैंने तेरे लिये विनती की, कि तेरा विश्वास जाता रहे: और जब तू फिरे, तो अपने भाइयों को स्थिर करना।” 33उसने उस से कहा; “हे प्रभु, मैं तेरे साथ बन्दीगृह जाने, वरन मरने को भी तैयार हूँ। 34उसने कहा; “हे पतरस मैं तुझ से कहता हूँ, कि आज मुर्ग बांग देगा जब तक तू तीन बार मेरा इन्कार कर लेगा कि मैं उसे नहीं जानता” (लूका 22:31-34)

 

इन शब्दों को पढ़ना कठिन है। यह हमें बताते हैं कि शैतान ने मांग (मूल यूनानी में प्रयोग किया गया शब्द मांग बहुत ही बलपूर्ण है) की एक आत्मिक फटकने कि प्रक्रिया में चेलों (पद 31 में शब्द तुम बहुवचन में है) में से भूसे को अलग किया जाए। शैतान ने पतरस को भूसे के रूप में देखा और मसीह से उसके "गेंहूँ की नाईं फटके" जाने की अनुमति मांगी क्योंकि भूसे के साथ यही होता है। मसीह की इच्छा के कारण कि वह पतरस को उपयोग करना चाहता था, उसने शैतान को पतरस के विश्वास को चुनौती देने की अनुमति दी।

 

इस परीक्षा की अनुमति देने में प्रभु का उद्देश्य क्या था? पतरस को अपने चरित्र के दोषों को देखने के लिए टूटेपन में आने की आवश्यकता थी। जब अन्य शिष्य नहीं देख रहे होते, तब इस परीक्षा से प्रकट होता की पतरस किस मिट्टी का बना था। डी.एल. मूडी ने एक बार कहा था, "चरित्र वह है जो एक मनुष्य अंधेरे में होता है।" क्या यह संभव है कि परमेश्वर हमारे चरित्र को प्रकट करने और निखारने के लिए इस प्रकार की परीक्षाओं को रचता है? क्या वह यह सारी परेशानी उठाएगा? हमारे पास अय्यूब के जीवन में से एक उदाहरण है जब शैतान परमेश्वर के दास की परीक्षा लेने की अनुमति मांगता है (अय्यूब 1:9-12) हमारे पास एक राष्ट्र के रूप में इज़राइल के इतिहास में भी इसका एक उदाहरण है।

 

और स्मरण रख कि तेरा परमेश्वर यहोवा उन चालीस वर्षों में तुझे सारे जंगल के मार्ग में से इसलिये ले आया है, कि वह तुझे नम्र बनाए, और तेरी परीक्षा करके यह जान ले कि तेरे मन में क्या क्या है, और कि तू उसकी आज्ञाओं का पालन करेगा या नहीं। (व्यवस्थविवरण 8:2)

 

परमेश्वर इज़राइल के लोगों को चालीस वर्षों के लिए रेगिस्तान में उन्हें नम्र बनाने और उनकी परीक्षा करने के लिए लेकर गया। मुझे आपसे एक सवाल पूछने दें। क्या परमेश्वर जानता है कि उनके दिल में क्या था, और आपके, और मेरा दिल में भी क्या है? निश्चित रूप से, वह जानता है! तो, क्या परीक्षा उसके लाभ के लिए है या मेरे? स्वर्ग का परमेश्वर चाहता है कि हम खुद को उसी रीति से देखें जैसे वह हमें देखता है। लेकिन तभी जब हम अपनी वास्तविक दशा देखें, और हम अपने पाप की प्रवृति से उबरने के लिए उसके साथ निकटता से चलने में सहयोग करें। परीक्षा परमेश्वर द्वारा हमें अपने बारे में ऐसा कुछ दिखाने के लिए निर्मित की गई है जिसे हम परीक्षा के समय तक देखते नहीं हैं।

 

क्या आप ऐसी घटना के बारे में सोच सकते हैं जिसने आपका जीवन बादल दिया हो? इसके परिणामस्वरूप आपके चरित्र में क्या बदलाव आए?

 

आत्मिक रूपान्तरण कुछ ऐसा नहीं है जो हम करते हैं, लेकिन कुछ ऐसा जो परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ से हमारे भीतर करता