32. The Work of the Holy Spirit

32. पवित्र आत्मा का कार्य

वर्षों पहले, मेरी पत्नी सैंडी और मैं सात लोगों की एक टीम के साथ इंग्लैंड, स्पेन, और पुर्तगाल की एक अल्पकालिक मिशन यात्रा पर गए। हम उन देशों में मिशनरियों और पासबानों से मिले और हमने उनके प्रचार के प्रयासों में उनकी मदद की। हमने भाषा की बाधाओं के बावजूद सुसमाचार के साथ लोगों तक पहुंचने के लिए सड़क पर उपदेश, मूक नाटक और विभिन्न रचनात्मक साधनों का उपयोग किया। कई हजार मील की इस यात्रा को पूरा करने के लिए, हमारे पास बीस साल पुरानी एक गाड़ी थी! हमने पीछे की सीटों को निकाल उसे सोने के लिए एक कमरा बना दिया। क्या मैं एक सलाह दे सकता हूँ? जब आप इस तरह की एक लंबी यात्रा करते हैं, तो एक पुरानी गाड़ी का उपयोग करना बुद्धिमता नहीं है!

 

हम फ्रांस में कई सौ मील भीतर आधी रात को बियाबान क्षेत्र से गुज़र रहे थे, जब अचानक डैशबोर्ड पर लाल बत्ती जल उठी। ऐसे में आप क्या करते? हमने वो ही किया जो कोई भी उस परिस्थिति में करेगा। हम नहीं चाहते थे कि हमारा इंजन उड़े या बैठ जाए, इसलिए हम रात भर रुक कर गाड़ी में सो गए और अगली सुबह निकटतम गैराज में गए। अपनी गाड़ी के डैशबोर्ड पर लाल बत्ती के जल उठने के बाद उसे चलाते रहना मूर्खता है। चेतावनी की लाल बत्ती आपको यह बताने के लिए ही है कि कुछ गड़बड़ है।

 

आज हम जिस खंड का अध्ययन कर रहे हैं, उसमें हम पवित्र आत्मा केलाल बत्ती जलानेकी सेवकाई, अर्थात्, हमें सचेत करने और हमें पाप का बोध कराने के पहलुओं को देखेंगे। पवित्र आत्मा के पास हमारे जीवन के इंजन के लिए चेतावनी की बत्ती जलाने का एक तरीका है। एक आंतरिक चेतावनी की बत्ती, यानी आत्मा में हमारे पाप का बोध होने पर, ठहर कर इसपर चिंतन करना बुद्धिमानी है।

 

इससे पहले कि हम पवित्र आत्मा के बारे में पढ़ना और बात करना शुरू करें, हमें इन वचनों के संदर्भ को देखना होगा जिन का अध्ययन हम कर रहे हैं। यह यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले की आखिरी रात की घटना है। प्रेरित यहुन्ना, याद करता है कि बारह ऊपरी कक्ष को छोड़ कर, जो कि अंतिम भोज का स्थान था (यहुन्ना अध्याय 14 का अंतिम पद), यरूशलेम में मंदिर टापू के पूर्व में गतसमनी के बगीचे की ओर अपने मार्ग पर थे। यह संभावना है कि यीशु मंदिर के पास रास्ते में वहाँ रुक गया जहाँ बाहर सुनहरे अंगूर की दाखलता लटकी थी, और शिष्यों से बात करने लगा कि वह इज़राइल की सच्चा दाखलता है और वे फल देने वाली डालियाँ हैं (यहुन्ना 15) ), और पिता वह किसान है जो उनके जीवनों में महान फल लाएगा। यीशु उन्हें आगे आने वाले उन घंटों के लिए तैयार करना शुरू कर रहा था जब वह, चरवाहा, मारा जाएगा, और भेड़ जकर्याह (13:7) द्वारा की गई भविष्यवाणी के अनुसार बिखर जाएंगी। अपनी सेवकाई के आखिरी महीनों में, उसने उन्हें अपनी आने वाली मृत्यु के बारे में बार-बार चेतावनी दी, लेकिन वे अपने प्रिय स्वामी और शिक्षक के साथ ऐसा होने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। अपने शिष्यों के लिए मसीह की चिंता एक संकेत था कि समय निकट था। उस रात शिष्यों से कहे उसके शब्दों को पढ़ें;

 

5अब मैं अपने भेजने वाले के पास जाता हूँ और तुम में से कोई मुझ से नहीं पूछता, कि तू कहाँ जाता है6परन्तु मैं ने जो ये बातें तुम से कही हैं, इसलिये तुम्हारा मन शोक से भर गया। 7तौभी मैं तुम से सच कहता हूँ, कि मेरा जाना तुम्हारे लिये अच्छा है, क्योंकि यदि मैं न जाऊं, तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा, परन्तु यदि मैं जाऊंगा, तो उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा। (यहुन्ना 16:5-7)

 

वे अंततः समझ गए थे कि वह उन्हें छोड़कर जा रहा है, और वे यह सोचकर दुःख से भर गए। जब उसने इन शब्दों को कहा होगा जिन्हें हमने अभी पढ़ा है, तो शायद वहाँ बहुत आँसू और रोना-बिलखना हुआ होगा। तीन साल से अधिक समय से, वे मसीह के साथ रह रहे थे, और उन्होंने घनिष्ठ संगति का अनुभव किया था, और अब जब वह अलविदा कह रहा था, तो यह स्वाभाविक रूप से उनके लिए बहुत दु: और मार्मिक भावनाएं लेकर आया। उनकी मृत्यु के विचार पर उनके मन में संभवतः विशिष्ट प्रश्न उठे होंगे, "वह हमें कैसे छोड़ सकता है?" "कुछ और मार्ग होना चाहिए!" उसकी मृत्यु के विचार पर ही उनके तर्क पर आक्रमण हो रहा था, लेकिन क्रूस के मार्ग के अलावा कोई और रास्ता नहीं था।

 

जब बारह गतसमनी के बगीचे में पहुंचे, तो प्रभु के मन और हृदय को अदृश्य बुरी ताकतों के विरोध में प्रार्थना में ध्यान केंद्रित करना ही था। इसलिए उसने उन्हें अपनी मृत्यु के बाद शैतान और उसके साथियों के हमले के लिए तैयार करना जारी रखा। जब वह अपनी योजना को सफल होते देख रहा होगा, तो हम शत्रु, शैतान के उल्लास की कल्पना कर सकते हैं। आत्मिक शैतानी ताकतों के साथ मसीह के भौतिक शत्रु जैसा वे चाहते थे, जल्द ही प्रभु को अपने वश में करने वाले थे। उनका भ्रष्ट दुष्ट स्वभाव उसकी दाढ़ी को खींचने, उसकी पीठ पर कोड़े बरसाने, चेहरे पर मुक्का मारना और उसके शरीर के साथ क्रूरता में आनंद पाता। कठोर बुराई शिष्यों को हैरान करने वाली होगी जब वे देखेंगे कि उनके प्रिय स्वामी के साथ क्या हो रहा है। उसकी मृत्यु के पलों का सामना करने के समय उन्हें कमजोर पड़ पीछे नहीं हटना है।

 

उनके आंसुओं और बिलखने के बीच, उसने उन्हें बताया कि यह उनके लिए अच्छा था कि वह दूर जा रहा था, क्योंकि उसके जाने के साथ, वह पवित्र आत्मा भेजेगा। हम यहाँ एक बार फिर मसीह की प्रभुता का अप्रत्यक्ष कथन देखते हैं। अगर वह सिर्फ एक मनुष्य होता, तो वह परमेश्‍वर पवित्र आत्मा को भेजने की बात नहीं करता। कोई भी मनुष्य अपनी आज्ञाओं को पूरा करने के लिए परमेश्वर को नहीं भेजता, लेकिन यीशु परमेश्वर-मनुष्य था, जिसे उसके पिता ने संसार में मनुष्यों का परमेश्वर के साथ सही संबंध स्थापित करने के लिए भेजा।

 

उसकी देह के द्वारा मसीह के कार्य और सेवकाई को मानवता के संसार में पवित्र आत्मा के आने से काफी गुणा और बढ़ाया जाएगा। जबकि यीशु अपनी देह में था, तो परमेश्वर के राज्य की वृद्धि सीमित होगी, लेकिन अब, मनुष्य के लिए धार्मिकता के उसके उपहार के कारण, वह पवित्र आत्मा के लिए विश्वासी के जीवन में निवास करना संभव कर देगा। यह कथन शिष्यों के सुनने के लिए अद्भुत था। उस समय तक, पवित्र आत्मा की उपस्थिति केवल विशेष कार्यों और असाधारण लोगों पर आया था, लेकिन यहाँ उन्हें बताया गया था कि आत्मा उन पर आएगा, और निश्चित रूप से, हम पर भी जो इक्कीसवीं सदी में विश्वासी हैं। यह कितना सुंदर विचार है कि आत्मा पुरुषों और स्त्रियों के हृदयों के मंदिरों में रहने के लिए आता है! (1 कुरिन्थियों 6:19)

 

संसार में आत्मा का कार्य

 

8और वह आकर संसार को पाप और धामिर्कता और न्याय के विषय में निरूत्तर करेगा। 9पाप के विषय में इसलिये कि वे मुझ पर विश्वास नहीं करते। 

10और धामिर्कता के विषय में इसलिये कि मैं पिता के पास जाता हूँ

11और तुम मुझे फिर न देखोगे; न्याय के विषय में इसलिये कि संसार का सरदार दोषी ठहराया गया है। (यहुन्ना 16:8-11).

 

आप क्या कहेंगे कि वह सबसे महत्वपूर्ण चीजें क्या हैं जो यीशु ने 8-11 पद में "सहायक" (पद 7), पवित्र आत्मा, के कार्य के बारे में कही हैं? पवित्र आत्मा को क्या साबित करना या गवाही देनी है?

 

यीशु ने उन्हें बताया कि संसार में आत्मा के काम के तीन पहलू होंगे। वह पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में संसार के पाप को "साबित" या "दोषी" ठहराएगा (पद 8) इससे पहले कि हम इन तीनों पर एक नज़र डालें, हम हिन्दी अनुवाद के इन शब्दों "साबित" या "दोषी" के बारे में बात करें। यहाँ प्रयोग किया गया यूनानी शब्द एलेगको है। यह एक ऐसा शब्द था, जिसका उपयोग अदालत के परिवेश में न्याय के तहत किसी व्यक्ति की जिरह का वर्णन करने के लिए किया जाता था, जहाँ प्रमाण इस हद तक बढ़ाए जाते कि एक व्यक्ति अपने अपराध को स्वीकार करने के दबाव में झुक जाता। जब कोई व्यक्ति अपने उद्धार की आवश्यकता को देखता है, तभी तो वह सुसमाचार के प्रति उत्तर देगा। यूनानी शब्द एलेगको का प्रयोग किसी व्यक्ति को दोषी साबित करने, दोषी ठहराने या साबित करने के लिए किया जाता था।

 

मैंने इतिहास में जागृति के बारे में बहुत कुछ पढ़ा और सुना है, और जिन चीजों को मैंने देखा है उनमें से एक यह है कि मसीहत में जागृति विश्वास की प्रार्थना करने के परिणामस्वरूप होती है। जब अपने शहर या देश के पाप के कारण विश्वासियों की एक देह परमेश्वर के सम्मुख रोती है, तो पवित्र आत्मा उस क्षेत्र, कस्बे, या शहर में पाप के बोध और परमेश्वर की प्रबल उपस्थिति के साथ आता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में महान जागृति पुनरुत्थान के दौरान, जब चार्ल्स फिनी एक शहर में पहुँचते, तो लोग शहर भर में आत्मिक वातावरण में अंतर महसूस करते। लोग अपने पाप के विषय में अपराध की भावना और खालीपन के भाव से सन्न हो जाते। फिनी के जीवन पर पवित्र आत्मा का एक शक्तिशाली स्पर्श था जो उनके गाँव-गाँव परमेश्वर के वचन का प्रचार करते हुए बड़ी सामर्थ्य से उनके साथ रहता था। जब वह मसीह के बारे में बात करते, तो लोग पवित्र आत्मा द्वारा पाप के बोध के कारण परमेश्वर से अपनी आत्माओं पर दया करने के लिए रोते हुए फर्श पर गिर जाते थे। ऐसा प्रतीत होता था कि जिस इलाके में वह प्रचार करते, वहाँ परमेश्वर की एक अनोखी मौजूदगी होती थी। फिनी एक समय के बारे में लिखते हैं;

 

गांव और आसपास के क्षेत्र की स्थिति ऐसी थी कि कोई भी इस भाव को महसूस करे बिना की परमेश्वर वहाँ एक बहुत अद्भुत रीति से कार्य कर रहा है वहाँ प्रवेश नहीं कर पाता था। इसके उदाहरण के रूप में, मैं एक विशेष घटना बताना चाहता हूँ। शहर की पुलिस का मुखिया यूटिका मे रहता था। क्षेत्र में दो न्यायालय थे, एक रोम में और दूसरा यूटिका (न्यूयॉर्क राज्य) में।

 

नतीजतन, पुलिस का मुखिया, जिसका नाम ब्रायंट था, अक्सर रोम आया-जाया करता था। उसने बाद में मुझे बताया कि उसने रोम में हालातों के बारे में सुना था, और यूटिका में अन्य कई लोगों के साथ मिलकर इस सब पर बहुत हंसी-ठठा किया था। एक दिन उसे रोम जाना अनिवार्य था। उसने कहा कि उसे खुशी थी कि उसे वहाँ कुछ काम है क्योंकि वह स्वयं देखना चाहता था कि वहाँ चीजें वाकई कैसी थीं। वह मन में बिना किसी खास विचार के, अपने एक घोड़े के तांगे पर सवारी करता चल रहा था, जब तक कि वह शहर से लगभग एक मील पहले पुरानी नहर कहलाई जाने वाली जगह तक नहीं पहुंचा। उसने कहा कि जैसे ही उसने नहर पार करी, एक अजीब सा भाव उन पर हावी हो गया, एक ऐसा गहरा श्रद्धायुक्त भय जिससे वह बाहर नहीं निकल पाए। उन्होंने अनुभव किया कि जैसे परमेश्वर संपूर्ण वातावरण में बसा हुआ था। उन्होंने बताया कि यह भावना उनके गांव में पहुंचने तक बढ़ती ही रही। वह श्री फ्रैंकलीन के होटल पर रुके, और तबेले की देखभाल करने वाला व्यक्ति आकर उनके घोड़े को ले गया। वह बताते हैं कि उन्होंने गौर किया कि उस व्यक्ति की दशा भी बिल्कुल उन्हीं के जैसी थी, ठीक जैसा उन्हें महसूस हो रहा था - कि वह कुछ बोलने से घबरा रहा था। वह होटल के भीतर गए और वहाँ उस व्यक्ति से मिले जिनसे उन्हें काम था। उन्होंने कहा कि वह दोनों प्रकट रूप से इतने हिले हुए थे कि वह तो कुछ भी काम की बात नहीं कर पाए। उन्होंने बांटा कि उस थोड़े समय के दौरान उन्हें रोने से अपना ध्यान बंटाने के लिए कई बार अचानक मेज़ से उठकर खिड़की से बाहर देखना पड़ा। उन्होंने देखा कि हर कोई ऐसा ही अनुभव करता प्रतीत हो रहा था जैसा कि वह। इतना विस्मय, इतनी गंभीर पवित्रता, एक ऐसी दशा जिसकी कल्पना तक उन्होंने पहले कभी नहीं की थी। वह जल्दी अपना कार्य निपटा कर यूटिका वापस लौट गए - लेकिन (जैसा कि उन्होंने बाद में बताया) उन्होंने फिर कभी आत्मा के कार्य के विषय में हल्के में बात नहीं की। कुछ हफ्तों के बाद यूटिका में, जब फिनी ने वहाँ उस शहर में यात्रा की, उन्होंने स्वयं मसीह को ग्रहण किया।"

 

एक क्षेत्र में इस तरह की सामर्थ परमेश्वर का एक संप्रभु कार्य है। इसी तरह, परमेश्वर, अपने संप्रभु तरीके से, व्यक्तिगत लोगों के निकट आता है। इस खंड में, जिसे हम अब देख रहे हैं, प्रभु आत्मा के उनके और हमारे लिए व्यक्तिगत रूप से आने की बात कर रहे हैं। वचन सात में, यीशु ने कहा कि वह आत्मा को "तुम्हारे पास" भेजेगा। अविश्वासी लोग विश्वासी के जीवन में आत्मा की उपस्थिति की गवाही देखेंगे, और उन्हें अपने पाप के बारे में बोध या दोष महसूस होगा। भले ही वे हमेशा इस बोध के अपने विचारों को स्वीकार करें, लेकिन आत्मा विश्वासी की गवाही और जीवन जीने के तरीके का उपयोग करता है।

 

संसार में पवित्र आत्मा का कार्य

अपनी कहानियों को साझा करें कि कैसे आप मसीह में विश्वास करने वाले व्यक्ति के जीवन से प्रभावित हुए थे।

 

1) सबसे पहला कार्य जो आत्मा करता है वह है संसार को पाप का बोध कराना। शब्द पाप एकवचन (पद 8 और 9) में है। यह व्यक्तिगत पाप नहीं हैं जिनका यहाँ उल्लेख किया गया है, लेकिन यह आपके लिए और आपके बदले क्रूस पर मसीह के सम्पूर्ण कार्य के विकल्प के रूप में अविश्वास का पाप है। जब कोई पुरुष या स्त्री अपने जीवन के अंत में परमेश्वर के न्यायालय में खड़े होते हैं, तो एक सवाल होगा जो पूछा जाएगा, "बिना कीमत चुकाए पाप से क्षमा के उपहार और प्रभु यीशु मसीह के व्यक्ति के साथ आपने क्या किया?" क्या आपने पश्चाताप (अपने पाप से मुड़ना) करते हुए आपके लिए क्रूस पर जो कुछ भी हासिल हुआ उसपर विश्वास (पूरे दिल से भरोसा) किया है? अविश्वास का पाप कई लोगों को परमेश्वर से अलग अनंत काल की ओर भेज देगा। "जिस के पास पुत्र है, उसके पास जीवन है; और जिस के पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन भी नहीं है।” (1 यहुन्ना 5:12)

2) आत्मा का दूसरा कार्य संसार को धार्मिकता में सही ठहराना है क्योंकि मसीह पिता के पास जा रहा है (पद 10) जब मसीह पिता के पास लौटा, तो बाइबल हमें बताती है कि एक महायाजक के रूप में उसकी सेवकाई मसीह की उस धार्मिकता का श्रेय हमारे खाते में देना है जो उसने क्रूस पर हमारे लिए हासिल की है। "पर यह व्यक्ति तो पापों के बदले एक ही बलिदान सर्वदा के लिये चढ़ा कर परमेश्वर के दाहिने जा बैठा" (इब्रानियों 10:12) बैठना कार्य पूरा होने के बाद के आराम की तस्वीर है। यह धार्मिकता जो मसीह के बिना लोगों को दोषी ठहराती है, वह उनके मसीह को अपनाने के समय उनपर रोपित की गई धार्मिकता है। रोपित धार्मिकता से हमारा क्या तात्पर्य है? "रोपित" शब्द का अर्थ है, "किसी के खाते में पारित करना, उसे उसका समझना।" इसका मतलब है कि जब हम उद्धार के लिए उस पर भरोसा करते हैं, तो यीशु हमारे आत्मिक बैंक खाते में अपनी धार्मिकता रखता है। हमें मसीह की धार्मिकता उपहार के रूप में दी जाती है;

 

जो पाप से अज्ञात था, उसी को उस ने हमारे लिये पाप ठहराया, कि हम उस में होकर परमेश्वर की धामिर्कता बन जाएं। (2 कुरिन्थियों 5:21)

 

प्रभु यीशु कह रहा है कि जब पवित्र आत्मा शिष्यों पर आएगा, तो उन पर और उन में आत्मा की उपस्थिति उस धार्मिकता की तरह देखी जाएगी जिसे बहुत से लोग खोज रहे हैं। एक मसीही का भरोसा, विश्वास, और परमेश्वर के सम्मुख खराई से खड़ा होना एक अविश्वासी के लिए बहुत दोष का बोध कराने वाला है। यही वह खराई से खड़ा होना और धार्मिकता थी जिसे शाऊल (पौलुस) ने स्तिुफनुस के चेहरे पर देखी जब उसका चेहरा एक स्वर्गदूत की तरह चमक रहा था (प्रेरितों के कार्य 6:15) उस उत्पीड़न के बीच जिसमें वह मारा गया, स्तिुफनुस के चेहरे पर परमेश्वर की महिमा और धार्मिकता उसका पथराव देखने वालों के लिए एक शक्तिशाली गवाही थी।

 

3) पवित्र आत्मा का तीसरा कार्य संसार को न्याय के प्रति दोषी ठहराना या विश्वास दिलाना है। न्याय का समय रहा है जब इस संसार में सभी चीजें सही की जाएंगी। पिन्तेकुस्त के दिन पवित्र आत्मा का आगमन मानवों के संसार को याद दिलाता है कि इस संसार में उनके जीवन का लेखा-जोखा लिया जाएगा; "सो हम में से हर एक परमेश्वर को अपना अपना लेखा देगा" (रोमियों 14:12) लेकिन प्रभु इस वाक्यांश में यह क्यों जोड़ता है, "संसार का सरदार दोषी ठहराया गया है?" (पद 11) यह कथन उस से बहुत मेल खाता है जो यीशु ने पहले कहा था, अब इस जगत का न्याय होता है, अब इस जगत का सरदार निकाल दिया जाएगा” (यहुन्ना 12:31)

 

इस संसार का सरदार कौन है जिसे यीशु इस खंड में संदर्भित कर रहा है? उसे दोषी क्यों ठहराया गया है? इस संसार के सरदार के साथ क्या होने वाला था?

 

क्रूस पर शैतान का न्याय

 

आइए हम यह समझने की कोशिश करें कि संसार के सरदार, शैतान को, मसीह के क्रूस पर चढ़ाए जाने के द्वारा कैसे दोषी ठहराया गया है।

 

यदि आप एक विश्वासी हैं, जब यीशु क्रूस पर मारा गया, तो उसने आपको दुश्मन के गढ़ से मुक्त कराने के लिए छुटकारे के मूल्य का भुगतान किया; क्योंकि दाम देकर मोल लिये गए हो, इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो” (1 कुरिन्थियों 6:20); मसीह का कीमती लहू शैतान के पाप के दासत्व के बाजार से प्रतिस्थापन का भुगतान था। लेकिन, हम जिस प्रश्न का उत्तर देना चाहते हैं वह है "क्रूस पर शैतान को दोषी कैसे ठहराया गया है?”

 

आइए हम यीशु के सेवकाई की शुरुआत में वापस जाएँ। जब शैतान रेगिस्तान में यीशु की परीक्षा ले रहा था, तो शैतान मसीह को बहुत ऊँचे पहाड़ पर ले गया और उसे संसार के सभी राज्यों और उनके वैभव का दर्शन कराया। "उससे कहा, कि यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूंगा" (मत्ती 4: 8) शैतान मसीह को कुछ ऐसा कैसे दे सकता है जो उसका नहीं था? वचन स्पष्ट हैं कि पृथ्वी परमेश्वर की है (भजन 24:1) यीशु ने शैतान के इस दावे पर कभी विवाद नहीं किया कि पृथ्वी पर उसका प्रभुत्व था। असल में, प्रभु ने दो अन्य स्थानों पर शैतान को "इस संसार का सरदार" कहकर शैतान के कानूनी दावे को सही ठहराया है (यहुन्ना 12:31 और 14:30)

 

शैतान अदन की वाटिका में पृथ्वी पर कानूनी शासन और प्रभुत्व हासिल करने में तब कामयाब रहा जब आदम और हव्वा ने परमेश्वर के बजाय शैतान की आज्ञा-पालन करना चुना। परमेश्वर ने शुरू से ही मनुष्य को शासन और प्रभुत्व दिया था;

26फिर परमेश्वर ने कहा, “हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगने वाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।” 27 तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की। 28 और परमेश्वर ने उन को आशीष दी और उन से कहा, “फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगने वाले सब जन्तुओ पर अधिकार रखो। (उत्पत्ति 1:26-28; बल मेरी ओर से जोड़ा गया है)

आदम की जाति, यानी मानव जाति, शैतान के अधीन हो गई और उसे पृथ्वी पर वह प्रभुत्व प्रदान किया जो परमेश्वर ने मनुष्य को शुरूआत से दिया था। इब्रानी शब्द, राडाह, जिसका अनुवाद हमारे हिन्दी शब्द "अधिकार" से किया गया है, का अर्थ है "शासन या अधीन करना।" आत्मा की अगवाई में, राजा दाऊद ने भी कुछ इसी तरह कहा;

3जब मैं आकाश को, जो तेरे हाथों का कार्य है, और चंद्रमा और तरागण को जो तू ने नियुक्त किए हैं, देखता हूँ4 तो फिर मनुष्य क्या है कि तू उसका स्मरण रखे, और आदमी क्या है कि तू उसकी सुधि लेक्योंकि तू ने उसको परमेश्वर से थोड़ा ही कम बनाया है, और महिमा और प्रताप का मुकुट उसके सिर पर रखा है। 6 तू ने उसे अपने हाथों के कार्यों पर प्रभुता दी है; तू ने उसके पांव तले सब कुछ कर दिया है। (भजन 8:3-6; बल मेरी ओर से जोड़ा गया है)

इब्रानी शब्द माशाल, जिसका अनुवाद भजन 8, पद 6 में हिन्दी शब्द "प्रभुता" के साथ किया गया है, यह दर्शाता है कि आदम (और उसके वंशज के रूप में हम) पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रबंधक, शासक या भंडारी हैं। माशाल का अर्थ है "राज, प्रभुता, शासन, संप्रभुता रखना और प्रबंधन।" मनुष्य को महिमा और सम्मान के साथ मुकुट पहनाए जाने के कारण, वह रचे गए बाकी प्राणियों से अलग था और उसे पृथ्वी पर शासक बनाया गया। केवल वह परमेश्वर के स्वरूप में बना था और अनुग्रह और सच्चे न्याय के साथ शासन कर सकता था।

 

स्वर्ग तो यहोवा का है, परन्तु पृथ्वी उसने मनुष्यों को दी है। (भजन 115:16; बल मेरी ओर से जोड़ा गया है)

 

आदम पूरे वंश का संघीय प्रमुख था। उसके साथ जो हुआ वह हम सभी के साथ हुआ, ठीक उसी तरह जैसे मसीह ने क्रूस पर जो हासिल किया, अर्थात, उसकी स्थानापन्न मृत्यु, हमारे लिए और हमारे बदले में थी। अदन की वाटिका में पतन के समय, आदम ने अपना शासन करने का अधिकार और प्रभुत्व शैतान को दे दिया। शैतान साहसपूर्वक रीति से मसीह को परीक्षा के समय में कह सका था, "मैं यह सब अधिकार, और इन का विभव तुझे दूंगा, क्योंकि वह मुझे सौंपा गया है; और जिसे चाहता हूँ, उसी को दे देता हूँ" (लूका 4:6) शैतान यीशु को किसी ऐसी चीज़ से नहीं लुभा रहा था जो उसके पास नहीं थी; वह यीशु को कुछ ऐसी चीजें भेंट कर रहा था जो उपयोग करने के लिए उसके हाथ में थीं। उसने मसीह को उसके सामने झुककर पिता की इच्छा के बाहर कार्य करते हुए क्रूस से बचकर निकल जाने के लिए लुभाने की कोशिश की।

 

मानवता पृथ्वी की संरक्षक थी, और पृथ्वी का छुटकारा केवल एक मानव के माध्यम से ही आ सकता था। कानूनी तौर पर शैतान आदम की संतान (वंशजों) के साथ वह कुछ भी कर सकता था जो वह करना चाहता था क्योंकि वे परमेश्वर के बजाय शैतान का पालन करने के आदम के चुनाव के कारण शैतान के गुलाम बन गए थे। इसका कारण केवल एक अवज्ञा थी। एक ऐसे मानव को आना था, जिस पर शैतान का कोई दावा हो। इसलिए मसीह को कुँवारी से जन्म लेना पड़ा। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि कुँवारी से जन्म के सिद्धांत पर हमला किया जा रहा है और यह ऐसा है जिसे शत्रु मूर्खता के नाम पर नकारना चाहता है। यह छुटकारे की कहानी में एक आवश्यक तत्व है।

 

मसीहा, क्रीष्ट, को आदम के वंश में से एक होना था, लेकिन वह पाप द्वारा दागी नहीं हो सकता था; अन्यथा, वह आदम के स्वभाव के साथ शैतान के स्वामित्व और प्रभुत्व वाला होता। मसीह केवल 100% मनुष्य था, बल्कि पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण के साथ वह 100% परमेश्वर भी था। इसलिए, यीशु में आदम का डी.एन. होने के कारण शैतान के पास निर्दोष मसीह पर कोई दावा नहीं था।

 

मैं अब से तुम्हारे साथ और बहुत बातें न करूंगा, क्योंकि इस संसार का सरदार आता है, और मुझ में उसका कुछ नहीं।  (यहुन्ना 14:30; बीएल मेरी ओर से जोड़ा गया है)

 

जब शैतान ने यीशु को क्रूस पर लाने की ठान ली, तो लौकिक कानून के तहत, वह पहली बार हत्यारा बना क्योंकि यीशु पूरी तरह से निर्दोष था, उसने कभी पाप नहीं किया था। क्रूस पर उस पर न्याय की घोषणा हुई। प्रत्येक व्यक्ति जो यह विश्वास और भरोसा कर मसीह की मृत्यु को अपना बनाता है कि उसकी मृत्यु उसके पाप का भुगतान है, परमेश्वर के सामने धर्मी ठहरता है। सनातन न्याय सूली पर संतुष्ट हुआ। स्वर्ग की अदालतों में, शैतान एक हत्यारे के रूप में कानूनी रूप से अपराधी ठहरा है क्योंकि यीशु के पाप रहित जीवन के कारण उसके पास उसे मारने का कोई अधिकार नहीं था।

 

14 इसलिये जब कि लड़के मांस और लोहू के भागी हैं, तो वह आप भी उन के समान उन का सहभागी हो गया; ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात शैतान को निकम्मा कर दे। 15और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फंसे थे, उन्हें छुड़ा ले। (इब्रानियों 2:14-15)

 

शैतान और उसके साथी नहीं चाहते कि आप ऊपर के पदों के पूर्ण निहितार्थ को समझें। वाकई, वे यह नहीं समझ पाए कि परमेश्वर ने दुष्ट और उसके गिरे हुए स्वर्गदूतों और दुष्ट आत्माओं को मसीह को क्रूस पर चढ़ाने की अनुमति क्यों दी।

 

जिसे इस संसार के हाकिमों में से किसी ने नहीं जाना, क्योंकि यदि जानते, तो तेजोमय प्रभु को क्रूस पर न चढ़ाते।  (1 कुरीन्थियों 2:8)

इस संसार के हाकिम कौन हैं? निश्चित रूप से यह महायाजक, फरीसी और इस्राएल के अगवे ही नहीं थे जो मसीह की मृत्यु का कारण बने। जो कुछ भी हुआ, वे उसके लिए जवाबदेह थे, लेकिन शैतान, उसके दुष्ट स्वर्गदूत और दुष्ट बुरी ताकतों को भी मानव के संसार में अपने छल और धोखे के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा। मैं शैतान की प्रतिक्रिया को देखना बहुत पसंद करता, जब मसीह ने क्रूस पर अपनी आत्मा को छोड़ दिया और अधलोक के निचले क्षेत्रों (1 पतरस 3:19; मत्ती 12:40) पर उतर गया। हम जानते हैं कि उसने दुश्मन के हाथों से मृत्यु और नरक की चाबी ली;

 

17जब मैं ने उसे देखा, तो उसके पैरों पर मुर्दा सा गिर पड़ा और उस ने मुझ पर अपना दाहिना हाथ रख कर यह कहा, “मत डर; मैं प्रथम और अन्तिम और जीवता हूँ। 18 मैं मर गया था, और अब देख; मैं युगानुयुग जीवता हूँ; और मृत्यु और अधोलोक की कुंजियां मेरे ही पास हैं। (प्रकाशितवाकय 1:17-18)

 

मसीह का क्रूस केवल शैतान का न्याय था, बल्कि उसके चंगुल से हमारा उद्धार भी था। जब वे रो रहे थे, तो यीशु चेलों यही बता रहा था; कि वह पिता के दाहिने हाथ पर बैठा होगा और परमेश्वर की बलि के मेमने के रूप में मरने की उसकी आज्ञाकरिता उन सभी के लिए उद्धार लाएगी जो उसकी मृत्यु को स्वयं के लिए बलिदान के भुगतान के रूप में लेंगे।

 

विश्वासी में पवित्र आत्मा का कार्य

 

12मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। 13परन्तु जब वह अर्थात सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा। 14वह मेरी महिमा करेगा, क्योंकि वह मेरी बातों में से लेकर तुम्हें बताएगा। 15जो कुछ पिता का है, वह सब मेरा है; इसलिये मैं ने कहा, कि वह मेरी बातों में से लेकर तुम्हें बताएगा। 16थोड़ी देर तुम मुझे न देखोगे, और फिर थोड़ी देर में मुझे देखोगे। (यहुन्ना 16:12-16)

 

हमने अविश्वासियों में पवित्र आत्मा के बोध दिलाने के कार्य के बारे में बात की है, लेकिन अब यीशु विश्वासी के जीवन में आत्मा के कार्य के तीन पहलुओं की बात करता है; 1) वह सत्य के सभी मार्गों में विश्वासियों का मार्गदर्शन करेगा (पद 13b); 2) वह हमें आने वाली बातें बताएगा (पद 13b); 3) वह मसीह की महिमा करेगा (पद14)

1) वह सम्पूर्ण सत्य के सभी मार्गों में विश्वासियों का मार्गदर्शन करेगा (पद 13)

 

यीशु हमें बताता है कि पवित्र आत्मा हमारा सत्य के सभी मार्गों में मार्गदर्शन करेगा। क्या आप अपने जीवन में ऐसा अनुभव करते हैं? साझा करें कि यह कैसा दिखता है। यह कैसे होता है?

 

सत्य कुछ ऐसा नहीं है जिसकी मनुष्य खोज करता है; यह ऐसा है जिसे पवित्र आत्मा प्रकट करता है। सत्य हमसे अलग मौजूद है, लेकिन अगर हमारे पास सीखने का हृदय है, तो आत्मा परमेश्वर की सच्चाई को प्रकट करेगा। लेकिन, सच्चाई के साथ एक जवाबदेही आती है। हमारे सामने प्रकट सत्य ऐसा है जिसके विषय में परमेश्वर उम्मीद करता है कि हम उसे जीएंगे। हमारे जीवन में पवित्र आत्मा द्वारा जितना अधिक सत्य प्रकट और क्रियान्वित किया जाता है, उतना ही हम मसीह में ढलते जाएंगे और उसमें परिपक्व होंगे।

 

2) वह हमें आने वाली बातें बताएगा। उस रात यीशु ग्यारह शिष्यों के साथ यही कर रहा था, अर्थात्, उन्हें बता रहा था कि आगे क्या होगा, ताकि जब सताव आएगा, तो उन्हें पता रहे कि वे अभी भी परमेश्वर की इच्छा में थे। "इसी प्रकार से प्रभु यहोवा अपने दास भविष्यद्वक्ताओं पर अपना मर्म बिना प्रकट किए कुछ भी न करेगा।" (आमोस 3:7) अगर हम खुले हृदय से पवित्र-शास्त्र में गहरी खुदाई करते हैं, तो हम अभी आने वाले भविष्य के बारे में भी बहुत कुछ लिखा हुआ पाएंगे। भविष्यवाणी के वचनों के साथ-साथ, मैं यह भी मानता हूँ, कि प्रभु इन दिनों में भविष्यवाणी की सेवकाई को पुन: स्थापित कर रहा है। हमें अपने सुनने में सतर्क रहना चाहिए कि जो भी कहा जा रहा है, वह पवित्र-शास्त्र के आदर्श के अनुसार है। मेरा मानना है कि हम उन दिनों में जी रहे हैं जहाँ आत्मा आगे आने वाले सताव के उन दिनों के लिए कलीसिया को तैयार करने के लिए हमारी आँखों को भविष्यवाणी के वचनों के प्रति अधिक से अधिक खोल रहा है।

 

3) वह मसीह की महिमा करेगा। मैंने पाया है कि मैं जितना अधिक प्रभु यीशु मसीह और क्रूस पर उनके सम्पन्न कार्य के विषय में सिखाना चाहता हूँ, आत्मा उस कार्य को उतना ही अशीष देता है। शिक्षक और उपदेशक, छोटे समूह के अगवे, और वे सभी जो प्रभु की सेवा करना चाहते हैं, यीशु मसीह की महानता लोगों के सामने रखते हैं, और आप पाएंगे कि पवित्र आत्मा की स्वीकृति की मुहर और उसकी उपस्थिति आपके कार्य पर होगी क्योंकि उसका जुनून प्रभु यीशु की महिमा करना है। सुसमाचार को अक्सर पढ़ें और अपने आप को मसीह की शिक्षा से संतृप्त करें।

 

मैंने पहले भी यह कहा है, लेकिन यह दोहराने लायक है; दूसरों को मसीह के निकट लाना पवित्र आत्मा का लक्ष्य है। हमें उसके संदेशवाहक बनने की जरूरत है। यीशु अभी भी हमसे वैसे ही बात कर रहा है जैसे वह तब करता था