27. Jesus Predicts Peter's Denial

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27. यीशुपतरसकेइनकारकीभविष्यवाणीकरताहै

यहुन्ना के सुसमाचार में हमारे सम्मुख इस खंड में, दृश्य यीशु और शिष्यों का एक नीची मेज़ के चारों ओर झुक-कर फसह का भोज खाने का है। यह मसीह के क्रूस पर चढ़ने से एक दिन पहले था। इसी रात, यीशु को गतसमनी के बाग में गिरफ्तार किया जाएगा। इकतीस पद यहूदा, जो गद्दार था, उसके ऊपरी कक्ष में सभा को छोड़कर जाने के साथ शुरू होता है। उसे पहले से ही चांदी के तीस टुकड़ों का भुगतान किया गया था, और उसने अग्वों को यह बताने के लिए प्रस्थान किया था कि उस रात मसीह कहाँ मिलेगा। यहूदा के चले जाने के साथ, प्रभु ने अपने हृदय को खोल दिया और बहुत सी ऐसी बातें सिखाईं जो उसके चेलों को आगे आने वाले अन्धकार भरे समय के लिए तैयार करेंगी।

 

31जब वह बाहर चला गया तो यीशु ने कहा, “अब मनुष्य के पुत्र की महिमा हुई, और परमेश्वर की महिमा उस में हुई। 32और परमेश्वर भी अपने में उसकी महिमा करेगा, वरन तुरन्त करेगा। 33 हे बालको, मैं और थोड़ी देर तुम्हारे पास हूँ; फिर तुम मुझे ढूंढोगे, और जैसा मैंने यहूदियों से कहा, कि जहाँ मैं जाता हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते वैसा ही मैं अब तुम से भी कहता हूँ। 34मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ, कि एक दूसरे से प्रेम रखो : जैसा मैंने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। 35यदि आपस में प्रेम रखोगे तो इसी से सब जानेंगे, कि तुम मेरे चेले हो।” 36शमौन पतरस ने उससे कहा, “हे प्रभु, तू कहाँ जाता है?” यीशु ने उत्तर दिया, “जहाँ मैं जाता हूँ, वहाँ तू अब मेरे पीछे आ नहीं सकता! परन्तु इस के बाद मेरे पीछे आएगा।” 37पतरस ने उससे कहा, “हे प्रभु, अभी मैं तेरे पीछे क्यों नहीं आ सकता? मैं तो तेरे लिये अपना प्राण दूँगा।” 38यीशु ने उत्तर दिया, “क्या तू मेरे लिये अपना प्राण देगा? मैं तुझ से सच सच कहता हूँ कि मुर्ग बांग न देगा जब तक तू तीन बार मेरा इन्कार न कर लेगा।” (यहुन्ना 13:31-38)

 

पुत्र ने पिता की महिमा की

 

कलाकार होल्मन हंट, जो यीशु के प्रसिद्ध चित्रों के लिए जाने जाते हैं, ने एक बार बढ़ई की दुकान को चित्रित किया जिसमें युफुस बालक यीशु के साथ काम कर रहा था। जब यीशु अपने काम में रुक कर अंगड़ाई लेने लगा, सूरज के द्वारा दीवार पर क्रूस की परछाई बनी। उनकी एक और तस्वीर एक प्रसिद्ध नक्काशी है जिसमें शिशु यीशु को हाथ फैलाये अपनी माँ की ओर दौड़ते हुए दिखाया गया है, जिससे उसके दौड़ने के द्वारा क्रूस की परछाई बन रही थी। दोनों चित्र रूप में काल्पनिक हैं, लेकिन उनका अंतर्निहित विचार निश्चय ही सत्य है। यदि हम सुसमाचार को वैसे ही पढ़ते हैं जैसे वे हैं, तो यह स्पष्ट है कि यीशु मसीह के सूली पर चढ़ने और मृत्यु की अपेक्षा उसके पृथ्वी पर आने के समय से ही है।1 अब जब यहूदा इस्करियोती ऊपरी कक्ष से चला गया था जहाँ यीशु और शिष्य उसके अंतिम फसह भोज को खा रहे थे, तो प्रभु ने उन्हें ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर शिक्षा देते हुए उनके सामने अपने हृदय को खोल दिया जो यहुन्ना की पुस्तक में तेरह अध्याय से शुरू होकर सत्रह अध्याय तक, पाँच अध्यायों में हैं। बार-बार, यीशु ऐसी घड़ी की बात करता है जब वह पिता की महिमा करेगा (यहुन्ना 2:4, 7:30, 8:20, 12:23, 12:27-28), अब वह घड़ी उसी पर था। क्रूस की छाया हमेशा से उसपर थी, यातना और मृत्यु का वह साधन जिसे परमेश्वर अपने पुत्र की महिमा के लिए और पिता की महान महिमा के लिए भी उपयोग करेगा।

 

अब मनुष्य के पुत्र की महिमा हुई, और परमेश्वर की महिमा उस में हुई। और परमेश्वर भी अपने में उसकी महिमा करेगा, वरन तुरन्त करेगा। (यहुन्ना 13:31-32)

 

आइए विचार करें कि यह कैसे काम करता है; क्रूस के द्वारा, यीशु ने परमेश्वर की महिमा की, और परमेश्वर, पिता ने पुत्र की महिमा की। पद 32 कहता है कि परमेश्वर भी अपने में उसकी महिमा तुरंत करेगा (अर्थात उसका पुनरुत्थान)

 

इस शब्द महिमा देने का क्या अर्थ है? यह शब्द महिमा यूनानी शब्द ड़ोक्साजो से आता है, जिसका अर्थ है कुछ मानना या किसी चीज़ के बारे में राय रखना। नए नियम में इसका उपयोग परमेश्वर की गरिमा और मूल्य के प्रकट और स्वीकृत होने का वर्णन करने के लिए किया जाता है, यह विचार कि परमेश्वर शानदार है और वैभव ओढ़े हुए है। यह संसार में यीशु का मुख्य उद्देश्य था – परमेश्वर पिता की महिमा करना – परमेश्वर की गरिमा और मूल्य को उसकी सम्पूर्ण सृष्टि पर प्रकट करना और उनका उसे स्वीकृत करना। आमतौर पर हम यीशु के मुख्य उद्देश्य को केवल क्रूस के संदर्भ में सोचते हैं, जो पाप के लिए दंड भुगतना है जिससे वे सब छुटकारा (अपने लहू के द्वारा परमेश्वर के पास वापस मोल ले लेना) पाएंगे, सभी जो अपने पापों के लिए मसीह के भुगतान पर विश्वास करेंगे। प्रेरित पतरस ने मसीह के आने के उद्देश्य के बारे में यह लिखा;

 

इसलिये कि मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिये धर्मी ने पापों के कारण एक बार दुख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाये; वह शरीर के भाव से तो घात किया गया, पर आत्मा के भाव से जिलाया गया। (1 पतरस 3:18)

 

मसीह का उद्देश्य अपनी मृत्यु के द्वारा परमेश्वर की महिमा को प्रकट करना था, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसका पहला और प्राथमिक उद्देश्य पृथ्वी पर परमेश्वर को महिमा दिलाना था। यही कारण है कि यीशु ने प्रार्थना की, "जो काम तूने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैंने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है" (यूहन्ना 17:4)। परमेश्वर को महिमा दिलाना हमारा भी उद्देश्य है, हममें से प्रत्येक जो कलीसिया का हिस्सा हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा चुनकर बुलाया गया है। जब वह धरती पर रहा, तब प्रभु यीशु ने हमें जीवन जीने के लिए एक नमूना पेश किया - पिता को महिमा दिलाना। हम में से प्रत्येक की ज़िम्मेदारी है कि हम औरों के लिए उस जीवन का नमूना या उदहारण बनें जो यीशु ने जिया। आपके और मेरे पास वही उद्देश्य है जो यीशु को दिया गया था, परमेश्वर को महिमा दिलाना!

 

प्रभु को महिमा दिलाने की उसकी इच्छा के बारे में बात करने के बाद, वह अपने चेलों से भी इस विषय पर बात करता है कि कैसे उन्हें भी प्रभु को महिमा दिलानी है। वे एक दूसरे के लिए अपने अगापे (नि:स्वार्थ, बलिदानी) प्रेम से प्रभु की महिमा करते हैं।

 

यीशु एक नई आज्ञा देता है

 

34मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ, कि एक दूसरे से प्रेम रखो: जैसा मैंने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। 35यदि आपस में प्रेम रखोगे तो इसी से सब जानेंगे, कि तुम मेरे चेले हो।” (यहुन्ना 13:34-35)

 

यह आज्ञा परमेश्वर के पुराने नियम में दी गई आज्ञा से भिन्न थी।

 

पलटा न लेना, और न अपने जाति भाइयों से बैर रखना, परन्तु एक दूसरे से अपने समान प्रेम रखना; मैं यहोवा हूँ। (लैव्यव्यवस्था 19:18)

 

पुराने नियम में दी गयी आज्ञा से यह किस तरह से अलग है?

 

येशु द्वारा एक दूसरे से प्रेम करने के बारे में दो बार दी गई इस आज्ञा का यह बात करने का पहला मौका है (यहुन्ना 13:34, 15:12), लेकिन केवल इस मौके पर वह इसे 'नई' आज्ञा कहता है। पुराने नियम में इस्राएलियों को निर्देश दिया गया था कि वे अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखें, लेकिन अब यीशु इसे और भी आगे ले जाता है। एक दूसरे के प्रति उनके प्रेम के माप का नमूना वह था जिस तरह से यीशु ने उनसे प्रेम किया था। यीशु ने उनसे कैसे प्रेम किया था? उसने उनके लिए अपने प्राण दे दिए। परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।(रोमियों 5:8)। प्रेम का प्रकट किया जाना आवश्यक है अन्यथा यह बाइबिल आधारित प्रेम नहीं। परमेश्वर का प्रेम एक ऐसा प्रेम है जो अन्य सभी प्रकार के प्रेम को पार कर जाता है, एक आत्म-बलिदानी प्रेम, जिसे आम तौर पर “अगापे” प्रेम कहा जाता है। ऐसा प्रेम जो प्रेम किये जाने वाले के लिए सर्वश्रेष्ठ की चाह रखता है, अक्सर बलिदान करने के द्वारा। यह एक 'नए' प्रकार का प्रेम था क्योंकि यह ये मांग करता था कि वे उसी रीति से एक दूसरे से प्रेम करें जैसे मसीह ने उनसे किया था। इस प्रकार के प्रेम के द्वारा, यीशु उनके बीच देखा जाएगा। उनमें उसका प्रेम इस बात का चिन्ह होगा कि वह उसके हैं।

 

1977 में, मसीही बनने के छह महीने के भीतर, मैं प्रभु के नेतृत्व में यरूशलेम, इज़राइल में रहने वाले मित्रों से मिलने गया था। यह मित्र यरूशलेम में और उसके आसपास कई घरों में एक मसीही समुदाय में रह रहे थे। वे यहूदी और अरबी लोगों को उस भूमि में बसे लोगों, और एक दूसरे की सेवा कर मसीह का जीवन जीकर दिखाना चाहते थे।

 

अगले कुछ वर्षों में, मैंने डेढ़ साल में इजरायल की तीन यात्राएँ कीं। मैंने समर्पित मसीही विश्वासियों के साथ रहकर मसीही जीवन के बारे में बहुत कुछ सीखा। हम गैलीकंटू में सेंट पीटर कलीसिया में सप्ताह में तीन बार आराधना करते, एक आराधनालय जो कैफा के महल के खंडहरों पर बनाया गया था जहाँ यीशु को गतसमनी के बाग से पकड़ लेने के बाद ले जाया गया था। परमेश्वर ने मेरे जीवन में इस समय का उपयोग मुझे मसीह की देह का एक दूसरे के लिए प्रेम का अनुभव करने के लिए किया। हमारा जीवन सिद्ध नहीं था, लेकिन अब तक मैंने उस आनंद का अनुभव नहीं किया है जो मुझे अन्य चेलों के साथ समुदाय में वहीँ रहकर हुआ था। हम कई अलग-अलग देशों और पृष्ठभूमियों से आए थे, लेकिन मसीह के लिए हमारा प्रेम एक विशेष बंधन था। हम एक समुदाय में रहते थे और हमारे पास जो कुछ भी था, सब एक-दूसरे के साथ साझा था। अपना समय बातचीत में बिताते हुए, प्रभु के प्रति अपने प्रेम को साझा करते हुए हम अपने जीवन को उद्देश्य के साथ व्यतीत करते थे। पीछे मुड़ उस समय को देखते हुए, मुझे लगता है कि हम उस तरह के सामुदायिक जीवन का अनुभव कर रहे थे जिसका आनंद बारह चेलों ने अपने स्वामी के साथ तब उठाया होगा जब वह उनके बीच था। यह घनिष्ठ संगति ही थी जिसने मेरे जीवन में उस समय को इतना अनमोल बनाया था। दिन-प्रतिदिन स्वयं प्रभु के साथ घनिष्ठ संगती में जीवन जीना कितना अद्भुत रहा होगा!

 

लेकिन अब, उन 11 चेलों के लिए, चीजें बदलने वाली थीं, और उन्हें आगे के अन्धकार भरे घंटों के लिए तैयार रहने की आवश्यकता थी। प्रभु उनसे कह रहा था कि उसे जाना होगा और जबतक वह नहीं जाता, वह पवित्र आत्मा, जो उनकी सहायता करेगा और उनका सलाहकार होगा, वह नहीं आएगा। अब से, वे एक दूसरे पर निर्भर होंगे और उन्हें एक दूसरे से ऐसा प्रेम करना होगा जिसकी मिसाल उनके साथ पिछले साढ़े तीन वर्षों में सेवा करने के दौरान उसने उन्हें दी थी। एक-दूसरे से पहले सम्मान का स्थान हासिल करने की कोशिश करने जैसी कलह अब उनके बीच नहीं रहनी चाहिए। उनकी शिष्यता की परीक्षा उनका वह प्रेम होगा जो उनके आस-पास के लोग देखेंगे। जैसा कि हम इंग्लैंड में कहते हैं, "हलवे का प्रमाण उसके खाए जाने में है।" हम एक व्यक्ति के जीवन में शिष्यता के स्तर को उनके परिवार और परमेश्वर के परिवार में उनके भाइयों और बहनों के लिए उनके प्रेम से जानते हैं। यदि आपकी शिष्यता आपके परिवार और आपके आसपास के अन्य लोगों को आपके द्वारा दी जा रही सेवा के स्तर से आपके ही घर में कार्य नहीं कर रही है, तो यह कार्य नहीं कर रही है! बार-बार, मैं एक नए मसीही विश्वासी की परिवार के लिए सेवा की गहराई द्वारा सम्पूर्ण परिवारों के मसीह के पास आने बारे में सुनता हूँ। आपके आस-पास, काम और घर पर लोग, जब आपके जीवन में चरित्र के बदलाव का स्तर देखेंगे, तो वे परमेश्वर की महिमा करेंगे। चेलों को एक दूसरे को वैसे ही अपने से पहले रखना था जैसा नमूना यीशु ने उनको लिए दर्शाया था। प्रेरित पौलुस ने प्रारंभिक शिष्यों में इस तरह के प्रेम के बारे में लिखा, जो न केवल एक दूसरे के लिए था, बल्कि उन लोगों के लिए भी जो उनके विश्वास के समुदाय से परे थे:

 

3हम किसी बात में ठोकर खाने का कोई भी अवसर नहीं देते, कि हमारी सेवा पर कोई दोष न आए। 4परन्तु हर बात से परमेश्वर के सेवकों की नाई अपने सद्गुणों को प्रगट करते हैं, बड़े धैर्य से, क्लेशों से, दरिद्रता से, संकटो से। 5कोड़े खाने से, कैद होने से, हुल्लड़ों से, परिश्रम से, जागते रहने से, उपवास करने से। 6पवित्रता से, ज्ञान से, धीरज से, कृपालुता से, पवित्रा आत्मा से। 7सच्चे प्रेम से, सत्य के वचन से, परमेश्वर की सामर्थ से; धार्मिकता के हथियारों से जो दहिने, बाएं हैं। 8आदर और निरादर से, दुरनाम और सुनाम से, यद्यपि भरमानेवालों के जैसे मालूम होते हैं तौभी सच्चे हैं। 9अनजानों के सदृश्य हैं; तौभी प्रसिद्ध हैं; मरते हुओं के जैसे हैं और देखों जीवित हैं; मार खानेवालों के सदृश हैं परन्तु प्राण से मारे नहीं जाते। 10शोक करनेवाले के समान हैं, परन्तु सर्वदा आनन्द करते हैं, कंगालों के जैसे हैं, परन्तु बहुतों को धनवान बना देते हैं; ऐसे हैं जैसे हमारे पास कुछ नहीं तौभी सब कुछ रखते हैं। (2 कुरिन्थियों 6:3-10)

 

जब लोग परेशानियों, कठिनाइयों, संकटों, मार-पीट और कारावास से गुज़र रहे होते हैं और फिर भी पवित्रता, समझदारी, धैर्य, दया और सच्चे प्रेम का प्रदर्शन करते हैं, तो यह अलौकिक है। इस तरह के प्रेम को देखना मसीही समुदाय से बाहर के लोगों के लिए बाधाओं को तोड़ता है। दुखी होना, फिर भी हमेशा आनन्दित रहना, गरीब होना और फिर भी दूसरों को अमीर बनाना उन लोगों को बहुत अलग दिखता है जिन्होंने मसीह के प्रेम और सामर्थ का अनुभव नहीं किया है। इस प्रकार के प्रेम से, लोग जान जाएंगे कि हम मसीह के शिष्य हैं। मसीह में विश्वासी होना एक बात है, लेकिन हमें चेले होने के लिए बुलाया गया है - वे जो मसीह से सीख रहे हैं और उसकी नई आज्ञा को जी रहे हैं।

 

हम एक दूसरे से ऐसा प्रेम कैसे कर सकते हैं जैसा मसीह ने हमसे किया? प्रेम एक क्रिया है, भावना नहीं। कलीसिया को वास्तव में एक दूसरे से प्रेम करने के लिए, हमें एक दूसरे को जानने और एक दूसरे के लिए प्रतिबद्ध होने की आवश्यकता है। हम परमेश्वर के परिवार में अपने भाइयों और बहनों के लिए अपने प्राण कैसे दे सकते हैं? इस तरह का प्रेम अलौकिक है और यह हम विश्वासियों को परमेश्वर द्वारा तब दिया जाता है जब हम अपना जीवन उसे सौंपते हैं। प्रेरित यहुन्ना ने लिखा;

 

हमने प्रेम इसी से जाना, कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिये प्राण देना चाहिए(1 यहुन्ना 3:16)

 

क्या आपको लगता है कि हमारी आधुनिक संस्कृति हमें उस जीवनशैली को जीने से रोकती है जिसका प्रोत्साहन यहुन्ना यहाँ देता है?

 

आज आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, और इन शब्दों को सक्रिय रूप से जीने में मदद करने के लिए आप अपनी जीवनशैली में क्या बदलाव ला सकते हैं?

 

जहाँ मैं जाता हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते

 

पतरस ने येशु द्वारा कही एक-दूसरे से प्रेम करने की नई आज्ञा को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया। उसने उन डरावने शब्दों पर ध्यान केंद्रित किया कि यीशु उन्हें छोड़कर जा रहा है, "जहाँ मैं जाता हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते” (पद 33)। उसने यह कहते उत्तर दिया, हे प्रभु, तू कहाँ जाता है?” यीशु ने उत्तर दिया, “जहाँ मैं जाता हूँ, वहाँ तू अब मेरे पीछे आ नहीं सकता! परन्तु इस के बाद मेरे पीछे आएगा” (पद 36)। प्रभु यह कह रहा था कि वह कुछ ऐसा करने जा रहा है जो केवल वह ही कर सकता है – पाप के लिए प्रतिस्थापन बलिदान के रूप में क्रूस पर चढ़ाए जाना। पिता द्वारा उसे दिया कार्य पूर्ण करने के बाद, वह स्वर्ग में पिता के पास वापस चला जाएगा। बाद में, जब सभी चेले सुसमाचार प्रचार करने के अपने कार्य को पूरा करते हैं, उसके पीछे प्रत्येक व्यक्ति मृत्यु के द्वार से होते हुए उसके साथ होने के लिए आएगा, लेकिन अभी कुछ समय के लिए, उन प्रत्येक के सामने कुछ कार्य था। पतरस यह समझ गया था कि यीशु अपनी मृत्यु के बारे में बात कर रहा था, क्योंकि उसने कहा, हे प्रभु, अभी मैं तेरे पीछे क्यों नहीं आ सकता? मैं तो तेरे लिये अपना प्राण दूँगा” (पद 37)

 

यह संभव है कि शमौन पतरस उन शब्दों को कहने में सच्चा था, लेकिन यीशु समय से पहले ही जानता था कि उस रात और अगले दिन क्या होने वाला है। जल्द ही ग्यारह उसके साथ गतसमनी के बाग में होंगे, और पतरस प्रार्थना के लिए जागने में सक्षम नहीं रहेगा। प्रभु को अपने सबसे कठिन घंटों का सामना अकेले ही करना पड़ा, उस समय प्रार्थना में लहू स्वरुप पसीना बहाते हुए जब उसके सबसे करीबी मित्र निकट ही सो रहे थे। गतसमनी के बाग में, यीशु ने पतरस से कहा, "आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है" (मत्ती 26:41)। पतरस, एक बार फिर जल्दबाज़, अपनी निष्ठा की प्रतिज्ञा करने में तेज था, लेकिन उसके पास स्वयं के लिए मृत और परमेश्वर के लिए जीवित होने के लिए विश्वास की सामर्थ नहीं थी। हममें से कई लोग मसीह का अनुसरण करने की इच्छा में सच्चे हैं, लेकिन क्या हमारे पास मसीह के लिए जीने और उसके लिए मरने के लिए जो आवश्यकता है, वह है? कभी-कभी हमारी सबसे महत्वपूर्ण चुनौती मसीह के लिए जीना है। परमेश्वर का धन्यवाद कि हमारे पास हमारी मदद करने के लिए पवित्र आत्मा है, और हमें अपनी सामर्थ पर भरोसा करने की आवश्यकता नहीं है। हमें उस पर निर्भर होना है।

वियतनाम में एक साम्यवादी अधिग्रहण की कहानी बताई गई है। चार विएतकोंग सैनिक एक कलीसिया की बैठक में घुस आए और उन्होंने अंदर आकर लोगों में घोषणा की कि उन्हें केवल मसीहियों को मारना है, अन्य सभी को छोड़ने की अनुमति थी। जब अधिकांश लोग निकल गए थे, और केवल कुछ ही शेष रह गए थे, तो सैनिकों ने अपने हथियार डाल दिए और मसीह में अपने भाइयों को गले लगाया। अब सैनिक वास्तविक मसीहियों के साथ हो सकते थे और साथी विश्वासियों के साथ सच्ची घनिष्ठ संगति का आनंद ले सकते थे! हम में से कुछ लोगों का मसीह के लिए बलिदान करने से सामना हो सकता है, अपने भाइयों की सेवा में अपने प्राण दे देना। जो लोग हमारे मसीही होने के लिए हमें मारने की धमकी देते हैं हमें महिमा की धमकी नहीं दे सकते हैं! मसीह के लिए मरना लाभ है! (फिलिप्पियों 1:21)। पतरस सोचता था कि वह मसीह के साथ पूरे सफ़र तक जाने के लिए काफी बलवान है - उसकी आत्मा तैयार थी, लेकिन उसका शारीर दुर्बल था। जीवन में अभी भी एक और सबक बाकी था जिससे पतरस को वह अगवा बनने के लिए होकर गुज़ारना पड़ेगा जो प्रभु उसे बना रहा था। इस परीक्षा को जानने के लिए जिस से होकर उसे गुज़रना पड़ेगा, हमें ऊपरी कक्ष में उसी वार्तालाप के लूका के विवरण की ओर रुख करना पड़ेगा। यहुन्ना ने शैतान की माँग कि पतरस और अन्य चेलों को गेहूं की नाई फटका जाए का उल्लेख नहीं किया है।

 

31शमौन, हे शमौन, देख, शैतान ने तुम लोगों को मांग लिया है कि गेंहूं की नाई फटके। 32परन्तु मैंने तेरे लिये विनती की, कि तेरा विश्वास जाता न रहे; और जब तू फिरे, तो अपने भाइयों को स्थिर करना।” 33उसने उससे कहा, “हे प्रभु, मैं तेरे साथ बन्दीगृह जाने, वरन मरने को भी तैयार हूँ।” 34उसने कहा, “हे पतरस मैं तुझ से कहता हूँ, कि आज मुर्गा बांग न देगा जब तक तू तीन बार मेरा इन्कार न कर लेगा कि मैं उसे नहीं जानता।” (लूका 22:31-34)

 

जोर देने के लिए दो बार, प्रभु ने उसे उसी नाम - शमौन से पुकारा, जब यीशु उससे मिला था। यह ऐसा था जैसे कि प्रभु उसे याद दिला रहा था कि कभी-कभी पतरस अपने स्वयं के शारीरिक संसाधनों पर निर्भर था, उसी तरह के व्यक्ति पर जो मसीह में आने से पहले वह था। कभी-कभी पतरस अपने पुराने चरित्र में लौट जाता था, और जब वह तनाव में होता तब यह सामान्य कमजोरी प्रकट होती।

यह सामान्य कमजोरी यह थी कि पतरस बहुत ज्यादा आत्मनिर्भर था। यह आत्मनिर्भरता परमेश्वर की अपरिपक्व संतान की कमजोरी है। जब हम विश्वासियों के रूप में परिपक्वता की ओर बढ़ते हैं, तब हम पवित्र आत्मा के हम में और हमारे द्वारा कार्य करने की निर्भरता सीखते हैं। जब भी हमें अपने संसाधनों पर भरोसा करने की परीक्षा होती है, हमें इस सबक को याद रखना चाहिए जिससे होकर पतरस को गुजरना पड़ा था। यह समझना महत्वपूर्ण है कि यदि आप एक मसीही हैं, तो शैतान को आपके विरुद्ध कुछ भी करने के लिए परमेश्वर की अनुमति मांगनी पड़ेगी। जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के साथ चल रहा होता है, तो वह एक वाचा रखने वाले परमेश्वर के साथ बंधी वाचा के अधीन होता है। शमौन पतरस के जीवन में शत्रु क्या करना चाहता थे, यह समझाने के लिए यीशु ने एक बहुत ही वर्णनात्मक शब्द का प्रयोग किया। उसने पतरस की परीक्षा को फटके जाने की प्रक्रिया के रूप में बात की। शैतान, उस चेले के जीवन को हिला कर गेहूं को भूसे से अलग कर उसे एक चेला होने से बाहर फटक देना चाहता था। शत्रु उसके जीवन और गवाही को नष्ट करना चाहता था। हम सभी के लिए भी यह ऐसा ही है।

विश्वासियों के रूप में हमारे जीवन में कई बार परमेश्वर शत्रु को हमें हमारे विश्वास में हिलाने की अनुमति देता है। आप कई बार महसूस कर सकते हैं कि आपके जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब आप अपने प्राण में इतनी गहराई तक हिल जाते हैं कि ऐसे प्रश्न पूछते हैं कि "मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?" हमारे लिए यह सामान्य है कि हम अपने मार्ग में आने वाली ऐसी परिस्थिति या “पहाड़” के बगल से होकर निकल जाना चाहते हैं, लेकिन परमेश्वर चाहता है कि हम उस पर भरोसा करें और परीक्षा से होकर गुजरें। प्रभु ने पतरस को बताया कि दिन समाप्त होने से पहले, वह तीन बार इनकार करेगा कि उसने कभी अपने प्रभु को जाना भी था। पतरस ने हिम्मत करके उन सैनिकों से लड़ाई की जो गतसमनी के बाग में उसके प्रभु को लेने आए थे। उसने अपनी तलवार भी निकाल ली और महायाजक के दास मलखुस का कान काट दिया (यहुन्ना 18:10) लेकिन जैसे-जैसे उस रात अंधेरा छाया, शायद उसने समझा कि यीशु को जानने का अंगीकार कर अपना जीवन खो देना व्यर्थ था।

पतरस के पाप और यहूदा के पाप में क्या अंतर है?

आपको क्या लगता है कि परमेश्वर ने उसके चरित्र और प्रतिबद्धता की इस परीक्षा की अनुमति क्यों दी होगी?

किसी ने भी पतरस के पतन की भविष्यवाणी नहीं की होगी। महान प्रेरित सटीक रूप से अपनी महानतम मानवीय ताकत के बिंदु पर विफल रहे। यह बहिर्मुखी और स्वाभाविक रूप से बहादुर आदमी भीड़ का उपहास नहीं सह सका। अच्छाई पर बुराई की स्पष्ट विजय देखने के सदमे और तनाव ने उसके विश्वास को हिला दिया। मलखुस का डर था, महायाजक का दास, जिसका कान उसने गतसमनी के बाग में काट दिया था, और साथ ही इस आग के आसपास वह सभी लोग जो उससे पूछ रहे थे कि क्या वह मसीह का है। हमारी सबसे बड़ी मानवीय ताकत (वे चाहे जो भी हों) मसीह का पालन करने के लिए कभी भी पर्याप्त नहीं होगी। आपकी सबसे बड़ी स्वाभाविक ताकत क्या है? शायद यह एक विजेता व्यक्तित्व है, या शायद मोहकता, अनुशासन, बोलने की क्षमता, बुद्धि, धन, या आकर्षक उपस्थिति है? मसीह इन सभी चीजों का उपयोग कर सकता है, लेकिन अगर हमें लगता है कि हम अपने स्वाभाविक वरदानों के कारण उसका पालन और सेवा कर पाएंगे, तो हम पतरस की तरह ही खुद को ठोकर खाने के लिए तैयार कर लें। स्वाभाविक भक्ति और शारीरिक बल हमेशा कहीं न कहीं यीशु को नकार देंगे। कोई भी कभी भी प्राण की उस भयानक पीड़ा को नहीं जान पाएगा जिससे होकर पतरस गुजरा था – उन घंटों का घोर अन्धकार और उलझन जब मसीह का शरीर कब्र में पड़ा था। उस रात पतरस के अंदर कुछ मर गया! शमौन, एक स्वाभाविक व्यक्ति अपनी सभी आत्म-विश्वासी प्रकल्पना के साथ मरने वाला था। पतरस ने स्वयं को जानना शुरू किया था। वह उस रात पराजित और सांत्वना से परे हो गया, लेकिन अभी परमेश्वर उसके साथ निपटा नहीं था!

क्या आपको कभी ऐसा महसूस हुआ है कि आपको छाना और हिलाया जा रहा है? यदि ऐसा है, तो जिससे आप होकर गुज़रे थे, उसके परिणाम क्या थे?

वैकल्पिक: दो या तीन के समूहों में बंट कर अपने जीवन में कमजोरी का एक ऐसा क्षेत्र साझा करें, जिसके लिए आप प्रार्थना चाहते हैं।

प्रार्थना : पिता, मैं बिलकुल वह सब नहीं हूँ जो मैं होना चाहता हूँ, लेकिन मैं आपका धन्यवाद देता हूँ कि आपके पुत्र, प्रभु यीशु ने मेरे लिए आपके पास आने का एक मार्ग बनाया है। मुझे मेरे चारों ओर उपस्थित लोगों से उसी तरह प्रेम करने में मेरी मदद कीजिये, जिस तरह यीशु ने चेलों से प्रेम किया था। पतरस का हमें यह दिखाने के लिए उपयोग करने के लिए धन्यवाद, कि जब हम असफल होते हैं तब भी आप हमसे प्रेम करते हैं। आप वास्तव में अद्भुत हैं!

कीथ थॉमस

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