26. Judas Betrays Jesus

26. यहूदायीशुकोधोखादेताहै

परमेश्वर की कहानी या उसका - इतिहास

 

हर अच्छी कहानी किसी लेखक के एक महान विचार को जीवंत करने के साथ शुरू होती है। लेखक कहानी को बुनने में विशेष ध्यान देगा ताकि कहानी वह चित्रित कर सके जो लेखक अपने मन में देखता है। क्या आपको लगता है कि यह परमेश्वर और उसकी कहानी से कुछ अलग है? आखिरकार, इसे "आज तक सुनाई गई सबसे महान कहानी" कहा गया है, और प्रभु इसका लेखक है। सभी चीजों के रचयिता ने अपने छुटकारा दिलाने वाले प्रेम की कहानी को प्रकट करने का इरादा किया। वह आरंभिक कहानी वाचक है। अनंत काल में एक समय था जब परमेश्वर ने मनुष्य जाति बनाने के बारे में सोचा, और उसने योजना बनाई कि वह कैसे उनके सामने खुद को प्रकट करेगा। किसी समय पर, उसने निर्धारित किया कि वह कैसे अपनी दुल्हन, कलीसिया, अर्थात्, चुने हुए लोगों को अपने साथ घनिष्ठ संबंध में बुलाएगा। जिस तरह का प्रेम परमेश्वर उनके हृदयों में विकसित करना चाहता था, वह केवल आज्ञा-पालन या आज्ञाकारिता वाले प्रेम से अधिक था। इसे एक ऐसा प्रेम होना था जो एक धन्यवादित हृदय द्वारा स्वेच्छा और तत्परता से किया गया हो, अर्थात्, सराहना, आत्म-बलिदान, और स्वयं को दे देने के लिए तैयार प्रेम। वह जिनके हृदय उसके इस हृदय के संपर्क में थे, वही वे होंगे जो बाकी लोगों के आदर्श, अग्वे और उदाहरण होंगे। वह अपनी सृष्टि को निरंतर अपनी कहानी का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित करते हुए पुकार रहा है।

 

प्रश्न 1) आपने अब तक कौन सी सबसे अच्छी कहानी पढ़ी है? यह आपकी देखी कोई फिल्म भी हो सकती है।

 

कहानी जो भी हो, संभावना है कि, आपकी पुस्तक या फिल्म में एक खलनायक है। वह विरोधी के रूप में जाना जाता है। यह व्यक्ति वह है जिससे हर कोई नफरत करता है, अर्थात, एक ऐसा व्यक्ति, कि जब वह प्रकट होता है, तो हर कोई उसे धिक्कारता है। आज के हमारे अध्ययन में, हम यहूदा को देखेंगे, जो नए नियम के इतिहास के इस अध्याय में विरोधी के रूप में प्रकट होता है, वह जो यीशु से गद्दारी करने और उसे धोखा देने वाला था। जब इसका खुलासा होता है, तो कहानी बहुत वास्तविक है। यीशु के जीवन की सच्ची कहानी में, हम धोखे, विश्वासघात, और अंततः एक ऐसे मोड़ के बारे में गवाह होने जा रहे हैं जो आपके द्वारा पढ़ी किसी भी कहानी के अंत को मात दे सकता है। यदि आप एक मसीही हैं, तो आप शायद इस कहानी से बहुत वाकिफ हैं क्योंकि आपने इसे पहले भी कई बार सुना है। मैं आपको आमंत्रित करता हूँ, कि जब हम पृथ्वी पर यीशु मसीह के आखिरी दिनों के विवरण को पढ़ते हैं, तो आप इस कहानी को नए कानों से सुनें और ताजा आँखों से देखें। आप हमारे उद्धारकर्ता के साथ दोबारा प्यार में पड़ जाएंगे! जब हम यहुन्ना के सुसमाचार में अगले पदों को पढ़ते हैं, तो दृश्य यीशु और उसके शिष्यों का एक नीची मेज़ के आसपास झुके हुए अंतिम भोज खाने का है। यीशु पहले ही चेलों के पैर धो चुका है और मेज के सिर पर अपनी जगह पर लौट आया है। उसने कहा कि उनमें से एक को छोड़कर सभी नहाए हुए हैं और केवल उनके पैरों के धोए जाने की आवश्यकता थी (पद 10-11)। पद 18 में, वह उस एक के विषय पर लौटता है जो शुद्ध नहीं था :

 

18मैं तुम सब के विषय में नहीं कहता; जिन्हें मैंने चुन लिया है, उन्हें मैं जानता हूँ। परन्तु यह इसलिये है, कि पवित्र शास्त्र का यह वचन पूरा हो, ‘जो मेरी रोटी खाता है, उसने मुझ पर लात उठाई।’ 19अब मैं उसके होने से पहिले तुम्हें बताए देता हूँ कि जब हो जाए तो तुम विश्वास करो कि मैं वहीं हूँ। 20मैं तुम से सच सच कहता हूँ, कि जो मेरे भेजे हुए को ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है, और जो मुझे ग्रहण करता है, वह मेरे भेजनेवाले को ग्रहण करता है।” 21ये बातें कहकर यीशु आत्मा में व्याकुल हुआ और यह गवाही दी, “मैं तुम से सच सच कहता हूँ, कि तुम में से एक मुझे पकड़वाएगा।” 22चेले यह संदेह करते हुए, कि वह किस के विषय में कहता है, एक दूसरे की ओर देखने लगे। 23उसके चेलों में से एक जिससे यीशु प्रेम रखता था, यीशु की छाती की ओर झुका हुआ बैठा था। 24तब शमौन पतरस ने उस की ओर संकेत करके पूछा, “बता तो, वह किस के विषय में कहता है?” 25तब उस ने उसी तरह यीशु की छाती की ओर झुक कर पूछा, “हे प्रभु, वह कौन है?” यीशु ने उत्तर दिया, “जिसे मैं यह रोटी का टुकड़ा डुबोकर दूँगा, वही है।” 26और उसने टुकड़ा डुबोकर शमौन के पुत्र यहूदा इस्करियोती को दिया। 27और टुकड़ा लेते ही शैतान उसमें समा गया; तब यीशु ने उस से कहा, “जो तू करता है, तुरन्त कर।” 28परन्तु बैठनेवालों में से किसी ने न जाना कि उसने यह बात उससे किसलिए कही। 29यहूदा के पास थैली रहती थी, इसलिये किसी किसी ने समझा, कि यीशु उससे कहता है, कि जो कुछ हमें पर्व के लिये चाहिए वह मोल ले, या यह कि कंगालों को कुछ दे। 30तब वह टुकड़ा लेकर तुरन्त बाहर चला गया, और रात्रि का समय था। (यहुन्ना 13:18-30)

 

परमेश्वर ने जो गाथा रची है, वह ईश्वर के पुत्र के अपनी दुल्हन को लुभाने के बारे में है। वो अपने लोगों का दिल इस तरह से जीतना चाहता था कि वे हमेशा के लिए इसलिए उसकी सेवा करें क्योंकि वे उससे उसी तरह से प्रेम करना चाहते थे जिस तरह से उसने उनसे प्रेम किया था। इस गाथा में यह एक महान रहस्य है, क्योंकि यह प्रकट होते समय उसके द्वारा रचे लोगों की स्वतंत्र इच्छा के कारण कई मोड़ और घुमावों से होकर जाती है। उनमें से प्रत्येक के पास हाँ या ना कहने की स्वतंत्र इच्छा है। उसे उन्हें सम्पूर्ण जगत में सबसे अधिक मूल के प्रेम के उदहारण द्वारा, अर्थात आत्म-बलिदानी प्रेम के द्वारा, यह दर्शाना था कि वह उन्हें कितना प्रेम करता है। लेकिन वो ऐसा कैसे करेगा? वो इस संसार में एक ऐसे शत्रु को अनुमति देगा जो उन्हें उसकी इच्छा, ज्योति के मार्ग के बजाय अन्धकार के मार्गों में चलने को उकसाएगा। उसने अपने पुत्र को संसार में इसलिए भेजने का निर्णय लिया ताकि वह उस तरह के प्रेम का नमूना हो सके जैसा वह लोगों को दिखाना चाहता था। प्रभु यीशु मानव जाति में से एक बन गया ताकि वो वह सब अनुभव कर सके जो वे अनुभव करेंगे ताकि कोई भी कभी उसे यह न कहे, "आप वो नहीं जानते जो मैं अनुभव कर रहा हूँ, कि उससे होकर गुज़रना कैसा लगता है।"

 

14इसलिये जब कि लड़के मांस और लोहू के भागी हैं, तो वह आप भी उनके समान उनका सहभागी हो गया; ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात् शैतान को निकम्मा कर दे। 15और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फंसे थे, उन्हें छुड़ा ले। 16क्योंकि वह तो स्वर्गदूतों को नहीं वरन इब्राहीम के वंश को संभालता है। 17इस कारण उसको चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिससे वह उन बातों में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिये प्रायश्चित करे। 18क्योंकि जब उसने परीक्षा की दशा में दुख उठाया, तो वह उनकी भी सहायता कर सकता है, जिन की परीक्षा होती है(इब्रानियों 2:14-18)

 

प्रश्न 2) यीशु का परीक्षा में दुःख उठाना हमें हमारी परीक्षा, दुःख या पीड़ा में कैसे सहायता करता है?

 

परमेश्वर अपने पुत्र को विश्वासघात से गुजरने की अनुमति क्यों देगा?

 

क्या आपने कभी सोचा है कि परमेश्वर ने अपनी गाथा में यहूदा जैसे गद्दार को आने की अनुमति क्यों दी? आइए इसका सामना करें: परमेश्वर यहूदा के बजाय पौलुस की तरह किसी को चुन सकता था, क्या वह ऐसा नहीं कर सकता था? यदि आपने चोट खाई है, तो मसीह को और भी अधिक चोट खानी थी। क्या आपने दर्द सहा है? वह दर्द का अनुभव करना चाहता था ताकि वो वह महसूस कर सके जो आप महसूस करते हैं ताकि वह आपके दर्द में आपके साथ आने में सक्षम हो सके। क्या किसी ऐसे ने जिसे आपने प्रेम किया है आपको धोखा दिया है? आह, अब हम आज के अपने खंड के निकट पहुँच रहे हैं। हाँ, उसे यह अनुभव करना था कि उसके निकट – कोई ऐसा जिससे वह प्रेम करता हो - किसी व्यक्ति का उसे धोखा देना कैसा होता है। आप में से कुछ ने ऐसे व्यक्ति द्वारा धोखा खाया है जो आपके विचार में आपसे प्रेम करता था, लेकिन प्रेम के बजाय, उस व्यक्ति ने आपकी पीठ में छुरा घोंप दिया। यीशु को भी इससे गुजरना पड़ा। हाँ, वह उस सभी दर्द को जानता है जो आपने दूसरों के हाथों अनुभव किए हैं। उसने जानबूझकर उसके करीब किसी को उसे धोखा देने की अनुमति दी। जी हाँ, यीशु ने यहूदा को अपने शिष्यों में से एक चुना, लेकिन यह यहूदा ही था जिसने प्रभु को धोखा देने का मन बना लिया था।

 

यहूदा का चरित्र

 

यहूदा को छोड़कर अधिकांश शिष्य गलील की झील के आस-पास के क्षेत्र से थे। उसका उपनाम, इस्करियोती, हमें उस शहर के बारे में बताता है जहां से वो आता था, केरिओथ का इश (“व्यक्ति”), यहूदिया के दक्षिण में एक छोटा शहर, जो राजधानी येरुशलम के आसपास का क्षेत्र है। उस क्षेत्र में अधिक परिष्कृत यहूदी लोग थे, इसलिए संभवतः वह अन्य शिष्यों द्वारा बहुत सराहा और सम्मानित था। उसे इस नज़र से देखा गया था कि उसके पास पैसे की थैली, उनके धन की जिम्मेदारी थी। हमें नहीं पता कि यह किस समय शुरू हुआ था, लेकिन सेवकाई के साढ़े तीन साल के कार्यकाल में, यहूदा ने पैसे की थैली में अपना हाथ डाल खुद की निजी ज़रूरत के लिए उसमें से पैसे प्रयोग किए। वह दूसरे शिष्यों से इसे छिपाकर रखने में पर्याप्त चतुर था, लेकिन मसीह जानता था। कुछ दिन पहले, जब यीशु को मरियम, लाज़र की बहन द्वारा, महंगे इत्र से अभिषेक किया गया था, तब यहूदा ने यह कहते हुए शिकायत की थी कि कितने पैसे बर्बाद हुए हैं, यह इत्र तीन सौ दीनार में बेचकर कंगालों को क्यों न दिया गया? यह एक वर्ष के वेतन के बराबर था” (यूहन्ना 12:5,6) प्रेरित यहुन्ना को बाद में पता चला कि यहूदा को मरियम की आलोचना करने के लिए किस बात ने प्रेरित किया था : उसने यह बात इसलिये न कही, कि उसे कंगालों की चिन्ता थी, परन्तु इसलिये कि वह चोर था और उसके पास उन की थैली रहती थी, और उस में जो कुछ डाला जाता था, वह निकाल लेता था” (यूहन्ना 12: 5-6)

 

यहूदा के लिए यह कितना निराशाजनक है। उसने एक व्यक्ति की सालाना मज़दूरी को अपनी मुट्ठी से निकलते देखा। क्या किसी व्यक्ति के पैरों में एक साल की मजदूरी उड़ेलना बर्बादी लगता है? यदि वह व्यक्ति परमेश्वर का पुत्र है, तब तो नहीं! किसी तरह, यहूदा को यह समझ नहीं आया, या यदि आया भी, तो उसने यह अनदेखा करने का विकल्प चुना कि यीशु कौन था। प्रभु ने यहूदा से कहा, उसे मेरे गाड़े जाने के दिन के लिये रहने दे। क्योंकि कंगाल तो तुम्हारे साथ सदा रहते हैं, परन्तु मैं तुम्हारे साथ सदा न रहूंगा” (यूहन्ना 12: 8)। यह संभव है कि यहूदा इस आलोचना और धन की हानि पर बहुत अपमानित हुआ। मत्ती लिखता है कि यह इस अभिषेक के बाद था जब यहूदा मुख्य याजकों के पास गया और उनके साथ एक बैल द्वारा सींग से मारे गए दास की कीमत के लिए मसीह को बेचने का एक सौदा किया, यानी तीस चांदी के सिक्के (निर्गमन 21:32)

 

यदि मैं उसे तुम्हारे हाथ पकड़वा दूँ, तो मुझे क्या दोगे? उन्होंने उसे तीस चान्दी के सिक्के तौलकर दे दिए। और वह उसी समय से उसे पकड़वाने का अवसर ढूंढ़ने लगा। (मत्ती 26:15-16)

 

मसीह से पांच सौ साल पहले, भविष्यवक्ता जकर्याह ने उस कीमत की बात की थी जो इस्राएल के भ्रष्ट अग्वे मसीह की लगाएंगे :

 

12तब मैंने उनसे कहा, “यदि तुम को अच्छा लगे तो मेरी मजदूरी दो, और नहीं तो मत दो।” तब उन्होंने मेरी मजदूरी में चान्दी के तीस टुकड़े तौल दिए। 13तब यहोवा ने मुझसे कहा, “इन्हें कुम्हार के आगे फेंक दे, यह क्या ही भारी दाम है जो उन्होंने मेरा ठहराया है?” तब मैंने चान्दी के उन तीस टुकड़ों को लेकर यहोवा के घर में कुम्हार के आगे फेंक दिया। (जकर्याह 11:12-13)

 

यह दिलचस्प है कि उसने जो किया, उसके अपराध-बोध में, यहूदा ने चांदी के तीस सिक्के याजकों पर फेंके दिए। क्योंकि यह खून की कीमत पर खर्च किया गया था, अग्वों ने अनजाने में जकर्याह की भविष्यवाणी को पूरा किया :

 

6महायाजकों ने उन सिक्कों को लेकर कहा, “इन्हें भण्डार में रखना उचित नहीं, क्योंकि यह लहू का दाम है।” 7सो उन्होंने सम्मति करके उन सिक्कों से परदेशियों के गाड़ने के लिये कुम्हार का खेत मोल ले लिया। 8इस कारण वह खेत आज तक लहू का खेत कहलाता है। (मत्ती 27:6-8)

प्रश्न 3) क्या आपको लगता है कि यहूदा का आत्मा से नए सिरे से जन्म हुआ था, लेकिन उसने अपना विश्वास खो दिया था? यहूदा जैसा व्यक्ति जो यीशु के साथ घनिष्ठ संबंध में था, चोर कैसे हो सकता है?

 

यहूदा शिष्यों के साथ रहा था और उसने कई शक्तिशाली आश्चर्य-कर्म देखे थे। उसे अन्य ग्यारह के साथ सुसमाचार प्रचार करने के लिए भी भेजा गया था (लूका 8:1), लेकिन उसने कभी अपना हृदय खोलकर परमेश्वर का उपहार, अर्थात, मसीह में नया जीवन प्राप्त नहीं किया। यीशु ने यहूदा की मदद करने के लिए ऐसे शब्दों से चेतावनी भी दी, क्या मैं ने तुम बारहों को नहीं चुन लिया? तौभी तुम में से एक व्यक्ति शैतान है!” (यूहन्ना 6:70)। उसने यह कहकर यहूदा को चेतावनी नहीं दी कि वह शैतान बन रहा है, लेकिन यीशु ने कहा कि वह शैतान था। हमें इस तथ्य का सामना करना है कि इस संसार में ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने प्राण को शत्रु के उपकरण के रूप में बेच दिया है (1 राजा 21:25)। वे जंगली बीज के दृष्टांत में गेहूँ के साथ मिश्रित जंगली बीज हैं (मत्ती 13:38-39)

 

यहूदा को पश्चाताप करने का अवसर मिला, लेकिन उसका हृदय नहीं बदला; इसलिए, उसे अपने पापों से उद्धार प्राप्त नहीं हुआ। शैतान उसमें कार्य कर रहा था और अपने व्यक्तिगत उद्देश्यों के लिए पैसे की थैली से चोरी कर शिष्यों से अनियंत्रित धोखे के द्वारा उसे पाप की अधिक गहराई में जाने के लिए प्रेरित कर रहा था। यद्यपि प्रभु ने कभी धोखा नहीं खाया। उसे पता था कि क्या चल रहा है। शत्रु द्वारा इस तरह का धोखा हमारे लिए एक बड़ा सबक है। शत्रु हमारे मन में ऐसे विचारों को डालने की कोशिश करेगा जिससे हम पाप में पड़ने के लिए उकसाए जाएँ, इस उम्मीद में कि वह हमें अपने कार्य के लिए उपयोग होने के लिए किसी समय हमारे दिल का द्वार खुला पाएगा। आप किसकी आवाज पर प्रतिउत्तर देंगे? क्या प्रभु आपके विचारों को उकसा रहा है? यीशु अपनी सेवकाई के शुरुआती समय से ही जानता था कि यहूदा किसे सुन रहा था और उसका हृदय कहाँ केंद्रित था :

 

परन्तु तुम में से कितने ऐसे हैं जो विश्वास नहीं करते; क्योंकि यीशु तो पहले ही से जानता था कि जो विश्वास नहीं करते, वे कौन हैं? और कौन मुझे पकड़वाएगा। (यहुन्ना 6:64)

 

यहुन्ना हमें बताता है कि यहूदा कभी भी विश्वासी नहीं बना था; उसके हृदय में कोई विश्वास नहीं था जो उसके जीवन में बदलाव लाए। उसने मसीह के व्यक्ति को एक मानसिक स्वीकृति तो दी थी, लेकिन उसके अस्तित्व के मूल स्तर पर, यहूदा ने अपने पाप के लिए अनुग्रह और क्षमा कभी प्राप्त नहीं की थी। मानसिक स्वीकृति से हमारा क्या अर्थ है? जब लोग सच्चाई को मानसिक स्वीकृति देते हैं, तो वे इसे अपने दिमाग में मानते हैं, अर्थात् वे वास्तविकता के बारे में सच्चाई से सहमत होते हैं। वे इसे स्वीकार करते हैं और पुष्टि करते हैं कि यह सही, उचित और परमेश्वरीय है, लेकिन सत्य अभी भी उस व्यक्ति की इच्छा से जुड़ा नहीं होता। वे उनके द्वारा सुने परमेश्वर के वचन की ओर कोई कदम नहीं उठाते। सुसमाचार के तथ्यों पर लोगों का समर्थन हो सकता है, लेकिन उन्हें इस बात का एहसास नहीं है कि बाइबिल आधारित सत्य पर विश्वास करना केवल दिमागी ज्ञान से कहीं अधिक है। हृदय के ज्ञान का होना आवश्यक है जिससे व्यक्ति सच्चाई पर कार्य करते हुए उसका पालन करता है। यीशु ने यहूदी अग्वों को इसी के बारे में चेतावनी दी थी :

 

39तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है। 40फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते(यहुन्ना 5:39-40)

 

एक व्यक्ति पवित्रशास्त्र को पढ़ सकता है, स्वीकार कर सकता है कि उसमें सच्चाई है, लेकिन फिर खुद को दीन कर उद्धारकर्ता के पास आने से इंकार कर सकता है। यहूदा ने यीशु मसीह के व्यक्ति के बारे में जो भी उसने देखा, वह कौन है और उसने क्या हासिल किया, इस पर कभी कोई कदम नहीं उठाया। वह एक उत्कृष्ट पाखंडी था - जीवन के मंच पर एक अभिनेता।

 

यहूदा में शक्तिशाली धोखा कार्यरत था, धोखेबाज और चोर, और हम में से प्रत्येक को यह ध्यान रखना चाहिए कि शत्रु हमारे जीवन में कुछ ऐसा ही ना करे। हमारा शत्रु, शैतान, एक बहुत ही वास्तविक आत्मिक प्राणी है, जो संसार में हृदयों और मनों को मसीह के विषय में सच्चाई से अंधा बनाये रखने के लिए कार्य कर रहा है (2 कुरिन्थियों 4:4)। वह सभी लोगों को प्रभावित करने की मंशा रखता है और उन्हें उस वास्तविकता पर क्रियाशील होने से रोकता है जो पवित्र आत्मा हमारे हृदयों और मनों में लाएगा। हमारा शत्रु हमें मसीह के व्यक्ति और उसके उद्धार के बारे में हमें एक मानसिक आश्वासन के छलावे में रखने में खुश रहता है, लेकिन केवल वास्तविक पश्चाताप और हमारे जीवन का मसीह के व्यक्ति की ओर मुड़ना ही हमें अपनी आत्मिक रूप से मृत दशा से बाहर लाएगा (इफिसियों 2:1)

 

यदि आपने कभी भी अपना जीवन मसीह को नहीं दिया है और आत्मा को अपने ऊपर प्रभुता और शासन करने की अनुमति नहीं दी है, तो वापस मुड़ने (पश्चाताप) के लिए आपके पास इस समय से बेहतर समय नहीं है। दुर्भाग्य से, यहूदा कभी वापस नहीं मुड़ा।

 

ऊपरी कक्ष का दृश्य

 

यहुन्ना (13:1-17) में अपने आखिरी अध्ययन में, हमने इस तथ्य के बारे में बात की थी कि शिष्य यू-आकार की तीन तरफा मेज के चारों ओर बैठे हुए थे जिसे ट्राइक्लिनियम कहा जाता था। मेज के शीर्ष पर मेजबान (यीशु) बैठा था जिसकी दाहिनी और बाएँ ओर दो सबसे उल्लेखनीय व्यक्ति बैठे थे। यह सम्मान का वह स्थान था जिसे याकूब और यहुन्ना की माँ अपने दो बेटों के लिए परमेश्वर के राज्य के आने के समय चाहती थीं (मत्ती 20:20-21)। जब ऐसे किसी औपचारिक भोज के लिए आमंत्रित किया जाता था जैसा वह कर रहे थे, तो यह हमेशा मेजबान का विशेषाधिकार होता था कि उसके बाएँ और दाएँ ओर कौन बैठे। ये स्थान सम्मानित मेहमानों के लिए आरक्षित थे (लूका 14:10)

 

यह अखमीरी रोटी के पर्व का पहला दिन था, जिसे फसह के नाम से भी जाना जाता है। मसीह ने ट्राइक्लिनियम की गद्दियों के चारों ओर जाकर, यहूदा सहित, अपने चेलों के पैर धोने के द्वारा सेवक अगवाई का नमूना पेश किया था। ट्राइक्लिनियम ज़मीन से लगभग अट्ठारह इंच ऊँची तीन लंबी मेज़ों को एक साथ जोड़कर बनाई जाती थी। मेज़ों के साथ-साथ गद्दियाँ भी थीं, जिन पर चेले और यीशु अपनी बाईं कोहनी पर झुके और अपने दाहिने हाथ को मेज से भोजन लेने के लिए स्वतंत्र रखते हुए बैठे थे।

 

मेज़ पर बातचीत

 

यीशु ने अभी चेलों को यही बताना समाप्त किया था कि जिस तरह उसने, उनके प्रभु और शिक्षक ने, उनके पैर धोए थे, उन्हें भी एक दूसरे के पाँव धोना चाहिए (यहुन्ना 13:14)। एक बार फिर, यीशु ने यहूदा को बिना उसकी ओर देखे, चेतावनी देते हुए कहा :

 

मैं तुम सब के विषय में नहीं कहता; जिन्हें मैंने चुन लिया है, उन्हें मैं जानता हूँ। परन्तु यह इसलिये है, कि पवित्र शास्त्र का यह वचन पूरा हो, ‘जो मेरी रोटी खाता है, उसने मुझ पर लात उठाई।’ (यहुन्ना 13:18)

 

जब उसने उनका प्रभु और शिक्षक होने के बारे में बात की, तो वह उन सभी का जिक्र नहीं कर रहा था। उनमें से एक था, उसने खुलासा किया, जो उसे प्रभु के रूप में नहीं जानता था। वह यहूदा का जिक्र कर रहा था। वह उन्हें समय से पहले बता रहा था, ताकि जब यहूदा गत्सम्नी के बाग में मंदिर के सैनिकों के साथ आएगा, तो उन्हें याद रहेगा कि वह अब भी नियंत्रण में था। शुरुआत से परमेश्वर की योजना यही थी कि परमेश्वर का पुत्र विश्वासघात का अनुभव करेगा।

 

पद 21 हमें बताता है कि यीशु आत्मा में व्याकुल था क्योंकि उसने कक्ष में चारों ओर देखते हुए यह कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूँ, कि तुम में से एक मुझे पकड़वाएगा।” यह तीसरी बार है जब पवित्रशास्त्र इन शब्दों का ज़िक्र करता है कि यीशु "व्याकुल हुआ।" पहला तब था जब वह मरियम से उसके भाई लाजर की मृत्यु के बाद मिला था (यहुन्ना 11:33)। बाइबल कहती है कि वह आत्मा में बहुत ही उदास और व्याकुल था। दूसरी बार तब था जब संसार के पाप उसके ऊपर थे और यीशु पिता से अलग होने की ओर ताक रहा था। प्रभु ने कहा, "अब, मेरा जी व्याकुल हो रहा है।" (यहुन्ना 12:27)। प्रेरित यहुन्ना अब उस तीसरे मौके के बार लिखता है जब प्रभु धोखा दिए जाने के बारे में बाँटते हुए व्याकुल हुआ। उसने कहा कि उनके साथ रोटी खाने वाले में से एक उस भविष्यवाणी को पूरा करेगा जो राजा दाऊद ने की थी :

 

मेरा परम मित्र जिस पर मैं भरोसा रखता था, जो मेरी रोटी खाता था, उसने भी मेरे विरूद्ध लात उठाई है। (भजन 41:9)

 

इस बात से अनजान कि प्रभु और स्वामी को धोखा देने की योजना उनमें से किसने बनाई है, चेले कमरे में एक दूसरे की ओर देखने लगे। क्या आपको नहीं लगता कि यहूदा को इस बयान पर पश्चाताप करना चाहिए था? यीशु इस आखिरी घड़ी में भी यहूदा तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था और वास्तव में, कह रहा था कि वह इस योजना से पलट सकता है जो उसने बनाई थी। हालाँकि प्रभु जानता था कि योजना का यह हिस्सा पूरा होगा, फिर भी यहूदा को यह चुनने की स्वतंत्रता थी कि क्या वह विश्वासघात करने के लिए शैतान का मोहरा बनाया जाएगा या नहीं। यीशु के शब्दों से उसे दोष भावना का एहसास हुआ होगा, लेकिन यहूदा ने अपने दिल को कठोर करने और अपने धोखे में आगे बढ़ने का फैसला लिया।

 

पद 21 में जब हम इस वाक्यांश के बारे में सोचते हैं "आत्मा में व्याकुल,” यह हमें यीशु की मानवता को एक बार फिर से दिखाता है। यदि यहुन्ना, यीशु के सबसे करीबी शिष्यों में से एक, यह देख सकता था कि यीशु व्याकुल था, तो इसके कुछ बाहरी संकेत अवश्य रहे होंगे। हमारे लिए यह भूलना आसान है कि यीशु को एक मनुष्य के रूप में दुःख सहना पड़ा।

 

प्रश्न 4) उस समय यीशु ने जिस भावनात्मक दर्द का अनुभव किया होगा उसके बारे में सोचने के लिए कुछ समय लें। आप क्या सोचते हैं, कि यूहन्ना ने क्या बाहरी संकेत देखे होंगे जो इस बात को दर्शा रहे होंगे कि यीशु अपनी आत्मा में व्याकुल था?

 

आइए अब जिस मेज़ पर वे झुककर बैठे थे, उस पर बैठने की व्यवस्था पर विचार करें। जब यीशु ने कहा कि एक उसके साथ विश्वासघात करेगा, तो पतरस मसीह के बाएँ या दाएँ सबसे सम्मानित स्थानों में से एक पर नहीं बैठा होगा; अन्यथा, वो यीशु से पूछ लेता कि विश्वासघात करने वाला कौन था। इसके बजाय, पतरस ने उस चेले से पुछा जो मसीह की छाती की ओर झुका हुआ बैठा था, प्रेरित यूहन्ना। "उसके चेलों में से एक जिससे यीशु प्रेम रखता था, यीशु की छाती की ओर झुका हुआ बैठा था (पद 23)। तीन बार, यहुन्ना स्वयं को वह चेला कहता है जिसे यीशु ने प्रेम किया (यहुन्ना 13:23, 19:26, और 21:7)। हमारे लिए परमेश्वर के व्यक्तिगत प्रेम की यह जागरूकता मसीह के एक चेले की सबसे बड़ी ताकत है। जब लोग मसीह के प्रेम को जानने के घनिष्ठ संबंध में आते हैं, तो वे सहन कर सकते हैं और वे सब बन सकते हैं जो वे परमेश्वर में हो सकते हैं। विश्वासियों के रूप में, मसीह में परमेश्वर के प्रेम को जानना हममें से प्रत्येक का लक्ष्य है।

 

यहुन्ना यीशु के दाएँ ओर था, और पतरस यहुन्ना के दाएँ ओर था। हमारे पास इस बारे में एक अच्छा संकेत है कि उसकी बाईं ओर कौन था, जब पतरस ने यहुन्ना से “बता तो, वह किस के विषय में कहता है?” (यहुन्ना 13:24)

 

25तब उस ने उसी तरह यीशु की छाती की ओर झुक कर पूछा, “हे प्रभु, वह कौन है?” यीशु ने उत्तर दिया, “जिसे मैं यह रोटी का टुकड़ा डुबोकर दूँगा, वही है।” 26और उसने टुकड़ा डुबोकर शमौन के पुत्र यहूदा इस्करियोती को दिया। 27और टुकड़ा लेते ही शैतान उसमें समा गया।” (यहुन्ना 13:25-27)

 

प्रश्न 5) पद 27 कहता है कि शैतान यहूदा में समा गया। यदि शैतान यहूदा के कार्यों को प्रेरित कर रहा था, तो आपको क्या लगता है कि क्या वह विश्वासघात के पाप के लिए जिम्मेदार था?

 

इस जीवन में हम जो कुछ भी करते हैं, उसके लिए हम सभी जिम्मेदार और परमेश्वर के सामने जवाबदेह हैं, इससे फर्क नहीं पड़ता कि हमारे विचारों को कौन उकसाता है। अपनी बाईं कोहनी के बल झुके होने से, प्रभु यीशु के लिए उसकी बाईं ओर सम्मान के स्थान पर बैठे व्यक्ति, यहूदा, तक पहुँचना अथक प्रयास नहीं होगा। क्या यहूदा ने चेलों संग "तिकड़म भिड़ा" खुद को पतरस के आगे सम्मान के स्थान को अपने लिए सुरक्षित कर लिया था? या फिर क्या आपको लगता है कि यीशु ने यहूदा को इस उम्मीद में अपने करीब आमंत्रित किया था कि वह उससे निजी तौर पर उस से उसके धोखे के विषय में बात कर सके? प्रभु ने अपनी रोटी का टुकड़ा चाज़ेरेट में डुबाया और उसे यहूदा को दे दिया। चाज़ेरेट एक मीठा, गहरे रंग का फल और बादाम आदि से बना मोटा पिसा लेप होता है, जो मिस्र में ईंट बनाने के लिए उपयोग किये जाने वाले गारे का प्रतीक था।

 

जैसे ही यहूदा ने यीशु से रोटी और चाज़ेरेट लिया, शैतान ने उसके जीवन में प्रवेश किया। यीशु ने उससे कहा, जो तू करता है, तुरन्त कर” (यूहन्ना 13:27)। प्रभु के इस वचन पर, यहूदा अपने झुके हुए आसन से उठकर बाहर चला गया, बिना दूसरों के यह जाने कि वह कहाँ जा रहा है। खंड के अंत में यहुन्ना लिखता है, "रात्रि का समय था" (पद 30)। अन्धकार यहूदा पर छा गया, और मुझे यकीन है कि वह अभी भी अपने कृत्य पर पछता रहा है, क्योंकि वह आशाहीनता में अनंत काल में चला गया। पवित्रशास्त्र में केवल दो लोगों को, "विनाश का पुत्र" कहा गया है, यहूदा (यूहन्ना 17:12) और पाप का पुरुष अर्थात मसीह विरोधी (2 थिस्सलुनीकियों 2:3)

 

मैं विश्वासघात से आगे कैसे बढूँ?

 

मसीह के कई चेलों को विश्वासघात के अन्धकार से गुजरना पड़ा है। परमेश्वर ऐसी परीक्षाओं को हमारे पास आने की अनुमति इसलिए देता है कि क्षमा पाने के द्वारा धोखे से उबरना, उसके लोगों में फल उत्पन्न कर सकता है। यदि आपने कभी यह कहा है कि आप मसीह की दाखलता पर एक फलदायक डाली बनना चाहते हैं, तो आप छंटाई के समय से गुजरेंगे (यहुन्ना 15:1-8)। विश्वासघात का दर्द दिल में गहराई तक उतर जाता है। केवल मसीह और उसकी क्षमा की सामर्थ ही आपको भीतर पनप रही कड़वी जड़ से मुक्ति दिला सकती है। यदि आपने इस तरह के विश्वासघात का अनुभव किया है, तो जान लें कि किसी करीबी द्वारा धोखा दिया जाना एक परीक्षा भरा सबक है जो परमेश्वर के सेवक को सहना पड़ता है। यह एक बहुत ही अकेलेपन का अनुभव है और, शायद, भावनात्मक रूप से सबसे दर्दनाक है। अन्याय और विश्वासघात का दर्द कुछ ऐसा है जिसका उपयोग, अगर संभव हो, शैतान आपके जीवन में अपने पैर जमाने के लिए करेगा। शत्रु की प्रतिक्रिया घायल व्यक्ति को पीछे हटकर और चोट की देखभाल करने की ओर ले जाने की होती है, जिससे कड़वाहट पैदा होती है। हमें यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि यह कड़वाहट जड़ पकड़ कर, अंकुरित और विकसित न हो। यदि ऐसा होता है, तो यह अपनी तरह का फल देगा :

और ध्यान से देखते रहो, ऐसा न हो, कि कोई परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित रह जाए, या कोई कड़वी जड़ फूटकर कष्ट दे, और उसके द्वारा बहुत से लोग अशुद्ध हो जाएं। (इब्रानियों 12:15)

 

कड़वाहट न केवल आपके जीवन को प्रभावित करेगी, बल्कि उपरोक्त पद यह भी बताता है कि जब यह बढ़ती है, तो यह कईयों को अशुद्ध करके परेशानी पैदा करेगी। परिभाषा के अनुसार, अशुद्धता का अर्थ है, दाग लगना, धब्बा लगना, मैला या दूषित होना। कड़वाहट अतिप्रवाह कर बहुत जल्दी दूसरों में जड़ जमा सकती है। इस तरह के अंदरूनी घावों के कारण ही हमें परमेश्वर के अनुग्रह पर ध्यान देना चाहिए। अगर विश्वासघात ने आपको चोट पहुँचाई है, तो इसे प्रभु के पास ले जाएं और उससे दर्द और कड़वाहट को दूर करने के लिए मांगें। प्रार्थना में समय बिताएं और जिसने आपको चोट पहुँचाई है उसके लिए हृदय से क्षमा व्यक्त करें। जब दूसरे हमारे विरुद्ध पाप करते हैं, तो यह हम पर भारी भावनात्मक असर डाल सकता है। कलीसिया में कई लोग किसी और के द्वारा की गई किसी गलत बात के कारण तबाह हो गए हैं, आखिर में यह निष्कर्ष निकाल कर कि वे अब कलीसिया का हिस्सा नहीं बनना चाहते हैं। आखिरकार, कौन स्वेच्छा से ऐसे बेकार, टूटे हुए लोगों के साथ हाथ मिलाना चाहेगा? इस तरह की सोच में बड़ी समस्या यह है कि यीशु के पास “दूसरी योजना” नहीं है। कलीसिया उसकी अपनी है, उसकी दुल्हन, और उसने उसके लिए अपनी जान दी है।

 

अगर हमें कभी ऐसा सोचने का विचार आए कि परमेश्वर नहीं जानता कि यह कैसा महसूस होता है, यह कि किसी प्रियजन द्वारा विश्वासघात आपके दिल को चीरने जैसा है। वह जानता है क्योंकि उसने हर तरह से मानवीय पीड़ा को सहा है, यहाँ तक ​​कि मित्रों के विश्वासघात, अपनी सबसे बड़ी जरूरत के समय में हर एक मित्र के विश्वासघात को सहा है, और हमारी कल्पना से परे, क्रूस पर परमेश्वर द्वारा उसके मानवीय स्वरुप पर पिता के क्रोध के रूप में सम्पूर्ण अस्वीकृति का अनुभव किया है। मसीह द्वारा सही यह पीड़ा एक महान रहस्य है। हमें उस चरम तक कभी पीड़ा नहीं सहनी पड़ेगी। हालाँकि, हमें अपने विरुद्ध किया कोई भी अपराध क्षमा करना आवश्यक है। लेकिन यह भी ऐसा कुछ नहीं है जो हमें अपने दम पर करना है। वह हमें अपनी सामर्थ प्रदान करता है, लेकिन हमें अपनी इच्छा उसके आधीन करनी होगी।

 

पछतावा पश्चाताप नहीं है

 

कई लोगों ने यहूदा की व्यथा को समझा है, कि उसने कैसे अपना जीवन समाप्त किया और आश्चर्य किया कि क्या उसने वास्तव में पश्चाताप किया है। मेरा मानना ​​है कि उसने नहीं किया। मैं कुछ कारणों से यह निष्कर्ष निकालता हूँ। यहूदा के पास कई बार पश्चाताप करने का अवसर था, और यीशु ने उसे ऐसा करने के कई अवसर दिए। यद्यपि उसके विश्वासघात के अपने कार्य को अंजाम देने से पहले “शैतान उसमें समा गया", उसका हृदय तो शुरुआत से ही कहीं और था। अन्यथा, उन सभी से इस बेधड़क तरह से चोरी कर, यहूदा मसीह के साथ रहते हुए भी समूह को धोखा देना जारी कैसे रख सकता था? उसने फांसी लगाते हुए अपने जीवन को आशाहीनता में समाप्त कर लिया। सच्चा पश्चाताप जीवन की ओर ले जाता है, मृत्यु की ओर नहीं। "क्योंकि परमेश्वर भक्ति का शोक ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है जिस का परिणाम उद्धार है और फिर उससे पछताना नहीं पड़ता, परन्तु सांसारिक शोक मृत्यु उत्पन्न करता है” (2 कुरिन्थियों 7:10)। यहूदा की कहानी का अंत दुखद हुआ।

 

मुक्ति का एक मार्ग

 

शायद, आप में से कुछ लोग किसी को क्षमा नहीं कर पाए हैं। पिता आपसे अपने बल का सहारा लेने की उम्मीद नहीं करता, लेकिन वह हर समय आपको अपनी सामर्थ प्रदान करता है। यदि आप क्षमा करने में सक्षम महसूस नहीं करते हैं, तो अपनी इच्छा को प्रार्थना में उसके आधीन करें और उससे उसका बल मांगें। इस क्षमा के कार्य का यह अर्थ नहीं है कि आप चोट पहुँचाने वाले व्यक्ति के कार्यों को स्वीकारते हैं। वास्तव में, कभी-कभी आपको एक हानिकारक व्यक्ति से दूरी बनाने और अपनी रक्षा करने की आवश्यकता हो सकती है। लेकिन, आपको क्षमा नहीं कर पाने की कड़वी जड़ के बंधन में बने रहने की आवश्यकता नहीं है। यदि आपको क्षमा करने की आवश्यकता है, तो आज ही क्षमा करने का निर्णय लें और अपनी भावनाओं को परमेश्वर के हाथों में सौंप दें। वह इसे करने के लिए वचन पर खरा उतरेगा और आपके लिए "मुक्ति का मार्ग" प्रदान करेगा। उसकी क्षमा और उसके प्रति आपके अनन्त प्रेम के लिए आभारी रहें और घाव को पिघलने दें। कभी-कभी, यह समय लेगा, लेकिन वह विश्वासयोग्य है! यह आपकी इच्छा के एक कार्य के साथ शुरू होता है। जब आपके साथ गलत होता है तो आप अपनी भावनाओं को अपने नियंत्रण में नहीं रख सकते, लेकिन आप अपनी इच्छा और अपने विचारों को नियंत्रित कर सकते हैं। आप अपने दर्द को उस पिता के आधीन करना चुन सकते हैं जो आपको चंगा कर सकता है। इसमें समय लग सकता है, लेकिन आप अभी, जैसे आप हैं, वैसे ही पिता की ओर बढ़ सकते हैं।

 

प्रार्थना: पिता, मुझे मेरे पापों के लिए क्षमा करें, और उसी तरह दूसरों को क्षमा करने में मेरी मदद करें जिस तरह से आपने मुझे क्षमा किया है। मैं आपको उन सभी को क्षमा करने में मदद करने के लिए कहता हूँ जिन्होंने मुझे चोट पहुँचाई है। कृपया मुझे यह देखने में मदद करें कि आपने मेरे लिए भी यह दर्द उठाया है। मैं यह दर्द आपको देता हूँ और अपने जीवन में आपकी चंगाई माँगता हूँ। अपने जीवन में हर यहूदा के लिए, मैं उनके प्रति कोई बुरी भावना न रखने के लिए अपना हृदय खोलता हूँ। कृपया उनके जीवन में अपने प्रेम और दया को प्रकट करें। प्रत्येक परिस्थिति में, मैं आपसे कार्य करने और पुन: स्थापना माँगता हूँ। आमिन!

 

कीथ थॉमस

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