18. Jesus and the Man Born Blind

18. यीशु और जन्म से अँधा व्यक्ति

जगत की ज्योति

 

हमारे हाल के अध्ययनों में, हम यीशु के इस दावे पर विचार कर रहे हैं कि वह जगत की ज्योति है: जगत की ज्योति मैं हूँ; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा” (यहुन्ना 8:12) उन्होंने मंदिर के आँगन में (यहुन्ना 8:2) और उन चार विशाल दीवटों की पृष्ठभूमि में जो मरुस्थल में उनके भटकने के दौरान परमेश्वर के उनकी अगवाई कर रही ज्योति का प्रतीक हैं, स्वयं के बारे में यह कहा। उन्होंने यह नहीं कहा कि “मैं एक ज्योति हूँ,” लेकिन उन्होंने कहा, “मैं जगत की ज्योति हूँ।” उन्होंने विशेष रूप से इजराइल की ज्योति होने का दावा किया।

 

प्रेरित यहुन्ना इस विचार को अध्याय नौ में लेकर आगे बढ़ता है, हालाँकि जब उसने इसे लिखा था, तब कोई अध्याय विभाजन नहीं थे। यीशु ने एक के बाद एक साक्ष्य दिए, संकेत के बाद संकेत, ताकि सभी सबूत धीरे-धीरे जमा होकर साबित कर दें कि वह कौन है, यानी, देह में प्रकट परमेश्वर। पिछले अध्याय में, प्रभु ने कहा था कि वह महान “मैं हूँ” था और है (यहुन्ना 8:58), वह नाम जो परमेश्वर ने स्वयं को मूसा को प्रकट करने के लिए लिया था (निर्गमन 3:14)। यहूदी लोगों के लिए, इस तरह की घोषणा करना अकल्पनीय था! उसकी हिम्मत कैसे हुई, स्वयं को परमेश्वर कहने की! वे उसके अपने बारे में कहे कथनों पर इतने नाराज थे कि वह पत्थर उठा परमेश्वर की निन्दा करने के लिए उसपर पथराव करने के लिए तैयार थे (यहुन्ना 8:59)। यद्यपि पवित्रशास्त्र हमें इस घटना का समय नहीं देता है, लेकिन ऐसा लगता है कि यह उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने से छ: महीने पहले, झोंपड़ियों के पर्व के समय के आसपास होगा। जब यीशु मंदिर परिसर निकल रहा था, वह जन्म से अंधे व्यक्ति की सहायता करने के लिए रुक गया, और ऐसा करने में, अपने कार्यों के द्वारा उसने अपनी पहचान के बारे में अपना कथन भी साबित किया:

 

1फिर जाते हुए उसने एक मनुष्य को देखा, जो जन्म का अन्धा था। 2और उसके चेलों ने उससे पूछा, “हे रब्बी, किसने पाप किया था कि यह अन्धा जन्मा, इस मनुष्य ने, या उसके माता पिता ने?” 3 यीशु ने उत्तर दिया, “न तो इसने पाप किया था, न इसके माता पिता ने: परन्तु यह इसलिये हुआ, कि परमेश्वर के काम उस में प्रगट हों। 4 जिसने मुझे भेजा है; हमें उसके काम दिन ही दिन में करना अवश्य है: वह रात आनेवाली है जिस में कोई काम नहीं कर सकता। 5जब तक मैं जगत में हूँ, तब तक जगत की ज्योति हूँ।” 6यह कहकर उसने भूमि पर थूका और उस थूक से मिट्टी सानी, और वह मिट्टी उस अन्धे की आंखों पर लगाकर 7 उससे कहा; “जा शीलोह के कुण्ड में धो ले, (जिस का अर्थ भेजा हुआ है) सो उसने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया।” (यहुन्ना 9:1-7)

 

परमेश्वर की आराधना से नम्र हुए हृदय वाले किसी भी आराधक के सामने हाथ फ़ैलाने के लिए तैयार, भिखारी अक्सर मंदिर के प्रवेश द्वार के पास बैठे हुए देखे जाते थे। आज भी, जबकि वहाँ कोई मंदिर नहीं है, लोग अक्सर यरूशलेम के पुराने शहर के द्वारों में से एक के पास भीख मांगते दिखते हैं। यीशु अंधे आदमी को देख रुक गया। शिष्यों ने यीशु से पूछा कि यह आदमी इस स्थिति में कैसे आया, अर्थात, अँधा पैदा होना। “किसने पाप किया...इस मनुष्य ने, या उसके माता पिता ने?” (पद 2)

 

प्रश्न 1) आप क्या समझते हैं यह अँधा आदमी किन कठिनाइयों का सामना करता होगा? (इस बारे में सोचें कि उसकी अक्षमता ने उसे शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से कैसे प्रभावित किया होगा)

 

उस समय यहूदी लोगों के बीच प्रचलित धारणा यह थी कि परमेश्वर माता-पिता के पापों के लिए उनकी संतानों को दण्ड देते थे। झूठी मूर्तियों के भेश में शैतान की आराधना के विषय में बात करते हुए, परमेश्वर ने उन्हें चेतावनी दी थी:

 

5तू उनको दण्डवत् न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मै तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखने वाला ईश्वर हूँ, और जो मुझसे बैर रखते है, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पित्रों का दण्ड दिया करता हूँ, 6और जो मुझसे प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं, उन हजारों पर करूणा किया करता हूँ। (निर्गमन 20:5-6)

 

इस बात से कई लोगों ने यह निष्कर्ष निकाला था कि शायद उस व्यक्ति के माता-पिता ने पाप किया था और उनके पाप के कारण यह मनुष्य अँधा पैदा हुआ था। फरीसी उसके अंधेपन के कारण अंधे व्यक्ति को तुच्छ जानते थे : उन्होंने उसको उत्तर दिया, “तू तो बिलकुल पापों में जन्मा है, तू हमें क्या सिखाता है?” (पद 34)। शिष्य जानना चाहते थे कि यह आदमी दृष्टिहीन क्यों पैदा हुआ था। प्रभु ने इस चर्चा में प्रवेश नहीं किया, वह मनुष्य के अंधेपन के कारण को लेकर इतना चिंतित नहीं था, बल्कि, इस बारे में कि वो इस परिस्थिति में क्या करेगा। वह इस बात पर टिप्पणी नहीं करता कि आदमी इस दशा में कैसे आया। इसी तरह, हमें भी हमेशा उन कारणों को जानने की आवश्यकता नहीं है जिनसे कोई अपनी परिस्थितियों तक कैसे पहुँचा; हमारा लक्ष्य परमेश्वर की करुणा और प्रेम को दर्शाने के अवसर पाकर उन परिस्थितियों में सुसमाचार लाने का है। यीशु यह दर्शाने के लिए कि जो भी अंधकार में है, उसे जीवन की ज्योति को जानने की आवश्यकता है, पिता के नेतृत्व की ओर संवेदनशील था।

 

अंधे को रौशनी का आश्चर्य-कर्म

 

अपने आप को जन्म से अंधे व्यक्ति की जगह रखिये। वह प्रभु और उसके शिष्यों के बीच बातचीत सुन सकता था लेकिन उसे पता नहीं था कि क्या हो रहा है। मुझे लगता है कि प्रभु ने उसे बताया होगा कि वह उसकी आँखों पर कुछ लगाने वाला था। क्या उस आदमी को उस समय पता था कि उससे कौन बात कर रहा था या उसकी आँखों पर मिट्टी किसने लगाई? उसने बाद में समझाया, यीशु नामक एक व्यक्ति ने मिट्टी सानी, और मेरी आँखों पर लगाकर मुझ से कहा, कि शीलोह में जाकर धो ले; सो मैं गया, और धोकर देखने लगा” (पद 11)। अगर वह शुरुआत से जानता कि वह यीशु था, तो वह कहता, "यीशु ने मुझे शिलोह जाकर धोने के लिए कहा था।"

 

प्रश्न 2) प्रभु ने अपने थूक से मिट्टी सानने के बजाय केवल उस पर हाथ रख उसे चंगा क्यों नहीं किया? उसे अपनी आंखों से मिट्टी धोने के लिए ठोकर खाते हुए शिलोह क्यों भेजा गया?

 

कभी-कभी, प्रभु अपनी आवाज के प्रति हमारी आज्ञाकारिता की परीक्षा लेता है। सुसमाचार लेखक, लूका ने हमें दस कुष्ठरोगियों की कहानी बताई जो दूर खड़े होकर यीशु को उनपर दया करने के लिए पुकार रहे थे। यीशु ने क्या किया? उसने उन्हें याजकों के पास जाने के लिए कहा। उसने उन पर हाथ नहीं रखे; बजाय इसके, उसने उन्हें कुछ ऐसा करने को दिया जो उसके वचन के प्रति उनकी आज्ञाकारिता को परखता। जब वे गए, तो जाते हुए उन्हें चंगाई प्राप्त हुई (लूका 17:11-19)। यह प्रभु के वचन के प्रति उनका विश्वास और आज्ञाकारिता थी जिसने उन्हें चंगा किया। तर्क उन्हें कहता : यदि यीशु ने उन्हें छू कर चंगा नहीं किया तो समुदाय और आराधनालय में प्रवेश करने के लिए याजक की आशीष और अनुमति लेने उनके पास क्यों जाएं? लेकिन, उसके वचन की आज्ञाकारिता में, उन्होंने याजकों से मिलने की दूरी पैदल तय की और अपने जाते समय चंगे हो गए।

 

क्या सीरियाई योद्धा नामान के साथ भी ऐसा ही नहीं हुआ था? नामान को कुष्ठ रोग था और उसने सुना कि भविष्यद्वक्ता एलीशा उसे चंगा कर सकता था। इसलिए, वह और उसके साथी सैनिक एलीशा के घर सोना, चाँदी और कीमती वस्त्र लेकर आए लेकिन एलीशा ने अपने दास को यह बताने बाहर भेजा कि यदि वह यरदन नदी में सात बार डुबकी लगाए तो वह चंगा हो जाएगा। नामान ने इसे एलिया द्वारा असम्मान के रूप में देखा। पहले तो वह गुस्सा और नाराज होकर चला गया।

 

11परन्तु नामान क्रोधित हो यह कहता हुआ चला गया, “मैंने तो सोचा था, कि अवश्य वह मेरे पास बाहर आएगा, और खड़ा होकर अपने परमेश्वर यहोवा से प्रार्थना करके कोढ़ के स्थान पर अपना हाथ फेरकर कोढ़ को दूर करेगा! 12क्या दमिश्क की अबाना और पर्पर नदियाँ इजराइल के सब जलाशयों से उत्तम नहीं हैं? क्या मैं उन में स्नान करके शुद्ध नहीं हो सकता हूँ?” इसलिये वह जलजलाहट से भरा हुआ लौटकर चला गया। 13तब उसके सेवक पास आकर कहने लगे, “हे हमारे पिता, यदि भविष्यद्वक्ता तुझे कोई भारी काम करने की आज्ञा देता, तो क्या तू उसे न करता? फिर जब वह कहता है, कि ‘स्नान करके शुद्ध हो जा’, तो कितना अधिक इसे मानना चाहिये।” 14तब उसने परमेश्वर के भक्त के वचन के अनुसार यरदन को जाकर उसमें सात बार डुबकी मारी, और उसका शरीर छोटे लड़के का सा हो गया; और वह शुद्ध हो गया। (2 राजाओं 5:11-14)

कभी-कभी प्रभु आपके हृदय को प्रकट करने के लिए आपके मन को अपमानित करेगा। नामान के पूर्वकल्पित विचार थे कि एलीशा उसे कैसे चंगा करेगा। यार्दन नदी की तरह छोटी, मटमैली, तुच्छ नदी में डुबकी लेना उसकी इच्छा से परे था। लेकिन, कभी-कभी आज्ञाकारिता में हमें कुछ ऐसा करने की आवश्यकता होती है जो हमारे तर्क के विपरीत हो। परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का कार्य अक्सर हमारे मन को अपमानित करेगा। परमेश्वर के मार्ग हमारे मार्गों से विशाल हैं:

 

8क्योंकि यहोवा कहता है, “मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। 9क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है।” (यशायाह 55:8-9)

 

उस समय, लोगों का मानना ​​था कि एक व्यक्ति के थूक में उपचार के गुण थे। वाकई, यह खण्ड यीशु के किसी व्यक्ति को चंगा करने के लिए अपने थूक का उपयोग करने की एकमात्र घटना नहीं है। मरकुस के सुसमाचार में, यीशु ने एक बहरे व्यक्ति को तब चंगा किया जब लोग चाहते थे कि प्रभु उसपर अपने हाथ रखे। उसने एक अलग तरीके का उपयोग करना चुना:

 

32और लोगों ने एक बहरे को जो हक्ला भी था, उसके पास लाकर उससे विनती की, अपना हाथ उस पर रखे। 33तब वह उस को भीड़ से अलग ले गया, और अपनी उंगलियाँ उसके कानों में डालीं, और थूक कर उसकी जीभ को छूआ। 34और स्वर्ग की ओर देखकर आह भरी, और उससे कहा; इप्फत्तह!” (अर्थात् “खुल जा”)35और उसके कान खुल गए, और उसकी जीभ की गाँठ भी खुल गई, और वह साफ साफ बोलने लगा। (मरकुस 7:32-35)

 

प्रश्न 3) क्या आपको अपने जीवन में ऐसा समय याद है जब आपको प्रार्थना का उत्तर उस रीती से मिला जिस रीती आप उम्मीद नहीं कर रहे थे?

 

अंधे व्यक्ति को धोने के लिए शीलोह के कुण्ड में भेजा गया। यह कुण्ड शायद मंदिर से लगभग 400 गज दूर, राजा दाऊद के सिय्योन शहर की पहाड़ी के नीचे दक्षिणी तरफ स्थित था।

 

कल्पना कीजिए कि यह इस व्यक्ति के लिए कैसा होगा। उसे शिलोह के कुण्ड तक पहुँचने के लिए देखे बिना चलना था। किसी तरह, वह यीशु के शब्दों की आज्ञा मानते हुए चला गया। कुण्ड तक पहुँचने के लिए उसे सहायता की आवश्यकता हुई होगी। हम इन विवरणों को नहीं जानते हैं, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मार्ग में क्या था या कौन उसे ले जा रहा था, वह जैसा यीशु ने कहा बिलकुल वैसा ही करने के लिए दृढ़ था। जब वह कुण्ड की सीढ़ियों से होते पानी में उतरा तब उसे बढ़िया इनाम मिला। उसने धोया और तुरंत चंगा हो गया।

 

फरीसियों द्वारा तीन जाँच-पड़ताल

 

8तब पड़ोसी और जिन्होंने पहले उसे भीख मांगते देखा था, कहने लगे; “क्या यह वही नहीं, जो बैठा भीख मांगा करता था?” 9 कितनों ने कहा, “यह वही है” औरों ने कहा, “नहीं; परन्तु उसके समान है”: उसने कहा, “मैं वही हूँ”। 10 तब वे उससे पूछने लगे, “तेरी आँखें कैसे खुल गईं?” 11उसने उत्तर दिया, “यीशु नामक एक व्यक्ति ने मिट्टी सानी, और मेरी आँखों पर लगाकर मुझ से कहा, कि शीलोह में जाकर धो ले; सो मैं गया, और धोकर देखने लगा।” 12उन्होंने उससे पूछा, “वह कहाँ है?” उसने कहा, “मैं नहीं जानता”। 13लोग उसे जो पहले अन्धा था फरीसियों के पास ले गए। 14जिस दिन यीशु ने मिट्टी सानकर उसकी आँखें खोली थी वह सब्त का दिन था। 15फिर फरीसियों ने भी उस से पूछा, “तेरी आँखें किस रीति से खुल गई?” उसने उनसे कहा, “उसने मेरी आँखों पर मिट्टी लगाई, फिर मैं ने धो लिया, और अब देखता हूँ।” 16 इसपर कई फरीसी कहने लगे, “यह मनुष्य परमेश्वर की ओर से नहीं, क्योंकि वह सब्त का दिन नहीं मानता।” औरों ने कहा, “पापी मनुष्य ऐसे चिन्ह कैसे दिखा सकता है?” सो उन में फूट पड़ी। 17उन्होंने उस अन्धे से फिर कहा, “उसने जो तेरी आँखें खोली, तू उसके विषय में क्या कहता है?” उसने कहा, “यह भविष्यद्वक्ता है।” 18परन्तु यहूदियों को विश्वास न हुआ कि यह अन्धा था और अब देखता है जब तक उन्हों ने उसके माता-पिता को जिस की आँखें खुल गई थी, बुलाकर 19उनसे पूछा, “क्या यह तुम्हारा पुत्र है, जिसे तुम कहते हो कि अन्धा जन्मा था? फिर अब वह कैसे देखता है?” 20उसके माता-पिता ने उत्तर दिया, “हम तो जानते हैं कि यह हमारा पुत्र है, और अन्धा जन्मा था। 21परन्तु हम यह नहीं जानते हैं कि अब कैसे देखता है; और न यह जानते हैं कि किसने उस की आँखें खोलीं; वह सयाना है; उसी से पूछ लो; वह अपने विषय में आप कह देगा।” 22ये बातें उसके माता-पिता ने इसलिये कहीं क्योंकि वे यहूदियों से डरते थे; क्योकि यहूदी एका कर चुके थे, कि यदि कोई कहे कि वह मसीह है, तो आराधनालय से निकाला जाए। 23इसी कारण उसके माता-पिता ने कहा, “वह सयाना है; उसी से पूछ लो।” 24तब उन्होंने उस मनुष्य को जो अन्धा था दूसरी बार बुलाकर उससे कहा, “परमेश्वर की स्तुति कर; हम तो जानते हैं कि वह मनुष्य पापी है।” 25उसने उत्तर दिया: “मैं नहीं जानता कि वह पापी है या नहीं: मैं एक बात जानता हूँ कि मैं अन्धा था और अब देखता हूँ।” 26उन्होंने उससे फिर कहा, “उसने तेरे साथ क्या किया? और किस तरह तेरी आँखें खोली?” 27उसने उनसे कहा, “मैं तो तुम से कह चुका, और तुमने नहीं सुना; अब दूसरी बार क्यों सुनना चाहते हो? क्या तुम भी उसके चेले होना चाहते हो?” 28तब वे उसे बुरा-भला कहकर बोले, “तू ही उसका चेला है; हम तो मूसा के चेले हैं। 29हम जानते हैं कि परमेश्वर ने मूसा से बातें कीं; परन्तु इस मनुष्य को नहीं जानते की कहाँ का है।” 30उसने उनको उत्तर दिया, “यह तो अचम्भे की बात है कि तुम नहीं जानते कि कहाँ का है तौभी उस ने मेरी आँखें खोल दीं। 31हम जानते हैं कि परमेश्वर पापियों की नहीं सुनता परन्तु यदि कोई परमेश्वर का भक्त हो, और उस की इच्छा पर चलता है, तो वह उस की सुनता है। 32जगत के आरम्भ से यह कभी सुनने में नहीं आया, कि किसी ने भी जन्म के अन्धे की आँखें खोली हों। 33यदि यह व्यक्ति परमेश्वर की ओर से न होता, तो कुछ भी नहीं कर सकता।” 34उन्होंने उसको उत्तर दिया, “तू तो बिलकुल पापों में जन्मा है, तू हमें क्या सिखाता है?” और उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया। (यहुन्ना 9:8-34)

 

मुझे यकीन है कि वह सभी चीजों को पहली बार देख सकने में कितना आनंदित होगा। क्या आपको नहीं लगता कि वह आकाश, हरी घास, और उन दोस्तों और लोगों के चेहरों को देखने में विस्मित हुआ होगा जिन्हें वह अबतक केवल आवाज़ से जानता था? उसके लिए अंतत: परमेश्वर की सृष्टि की सुंदरता को देखना कितना अद्भुत होगा! यह आश्चर्य-कर्म उन सभी लोगों में काफी हलचल लाया होगा जिन्होंने इस घटना को देखा था क्योंकि कई लोग उस व्यक्ति से परिचित थे और शायद उन्होंने उसे द्वार पर भीख मांगते देखा भी होगा।

 

उसकी चंगाई के कुछ ही समय बाद ही सब तरफ अफरा-तफरी मच गई। उनके आनंद को जारी न रहने दिया गया, क्योंकि धार्मिक अग्वों ने जल्द ही उसके आनंद में खलल डाल दिया। वह शहर के द्वार पर भीख मांगने के कारण शायद कई लोगों द्वारा अच्छे से पहचाना जाता था। जब लोगों ने उसे अपनी चंगाई में आनंद से भरा देखा, तो वे जानना चाहते थे कि उसके साथ क्या हुआ था, क्योंकि किसने कभी किसी जन्म से अंधे व्यक्ति को किसी के द्वारा चंगाई पाने के विषय में सुना था? यह चंगाई विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी। एक जन्म से अंधे व्यक्ति की चंगाई में यह लाज़मी प्रश्न भी उठेगा: वह पाप की समस्या से कैसे निपटें? यीशु ने इस घटना से पहले भी अंधे को चंगा किया था, लेकिन यह पहली बार था जब एक जन्म से अंधा व्यक्ति चंगा हुआ था। जब उन्होंने सुना कि यह आश्चर्य-कर्म यीशु ने किया था तो वे उसे फरीसियों के पास ले गए (पद 13)। शायद, जो लोग उस व्यक्ति को फरीसियों के पास ले गए थे, वे सोच रहे थे कि क्या यह मसीह का कार्य था, या शायद जो लोग उसे लाए थे वे यीशु के प्रति सहानुभूति रखते थे और साबित करना चाहते थे कि यीशु वही था जो होने का दावा वो करता था: इजराइल का मसीहा।

 

मुझे विश्वास है कि इस आश्चर्य-कर्म में नज़र आने वाली बातों से कुछ और अधिक था। यह चंगाई इजराइलियों के लिए एक संकेत था कि यह वास्तव में मसीहा था, और इसी कारण यहुन्ना प्रेरित इस आश्चर्य-कर्म के विवरण और उसके बाद की प्रतिक्रिया के बारे में बहुत गहराई से बताता है। इज़राइल के बच्चों का मानना ​​था कि, जब मसीहा आएगा, तो वह अपने बारे में भविष्यवाणी की गई कम से कम चार चीजों को करेगा। ये बातें भविष्यवक्ता यशायाह के लेखों में लिखी गई थीं:

 

3ढीले हाथों को दृढ़ करो और थरथराते हुए घुटनों को स्थिर करो। 4घबरानेवालों से कहो, “हियाव बान्धो, मत डरो! देखो, तुम्हारा परमेश्वर पलटा लेने और प्रतिफल देने को आ रहा है। हाँ, परमेश्वर आकर तुम्हारा उद्धार करेगा। 5तब अन्धों की आँखें खोली जाएंगी और बहरों के कान भी खोले जाएंगे; 6तब लंगड़ा हरिण की सी चौकड़ियाँ भरेगा और गूंगे अपनी जीभ से जयजयकार करेंगे(यशायाह 35:3-6)

 

माना जाता है कि उपरोक्त खण्ड मसीहा के बारे में बात कर रहा है। यह स्पष्ट कहता है कि वह एक जो आएगा वह स्वयं परमेश्वर होगा (पद4)। पवित्रशास्त्र का यह खण्ड कहता है कि जब वह आएगा, तो चार चीजें होंगी जिन्हें वह करेगा:  

 

1) वह अंधों की आँखें खोलेगा (पद 5)

2) वह बहरों के कानों को खोलेगा (पद 5)

3) लंगड़े चंगे हो जाएंगे (पद 6)

4) गूंगे फिर से बोल पाने में प्रसन्नता से चिल्लाएंगे (पद 6)

 

बिलकुल, यीशु ने अपनी लगभग तीनों वर्षों की सेवकाई के दौरान इन सभी चीजों को और इससे भी अधिक को किया। लेकिन हाल ही में की गई यह चंगाई बहुत बड़ा सबूत थी और इसीलिए फरीसियों के सहन के बाहर थी। उन्होंने यीशु को मसीहा के रूप में नहीं देखा या स्वीकार किया। उनका मानना ​​था कि मसीहा एक महान राजा होगा जो महान शक्ति और महिमा के साथ आएगा, न कि यह विनम्र व्यक्ति जो पवित्रशास्त्र को पूरा करते हुए शहर में गधे पर सवारी करते हुए आएगा (जकर्याह 9:9)। वे यह नहीं समझ पाए थे कि मसीहा के दो आगमन हैं : एक आगमन पाप को दूर करने के लिए एक विकल्प के रूप में, और दूसरा एक धार्मिक योद्धा राजा के रूप में जो अपने सभी शत्रुओं को मार डालेगा। भले ही उनकी आँखें थीं, फिर भी उन्होंने अपने सामने सरल सत्य को देखने से इनकार कर दिया। उन्होंने पहले चार संकेत (आश्चर्य-कर्म) देखे थे, लेकिन अब यह यरूशलेम में था, करीबी और व्यक्तिगत – वह शहर जिसे वह अपना क्षेत्र होने का दावा करते थे!

 

फरीसियों का अंधापन

फरीसी जो कुछ हुआ था उसके प्रति आत्मिक रूप से अंधे थे। इस व्यक्ति की चंगाई के लिए परमेश्वर के लिए किसी प्रकार का आनंद या प्रशंसा की अनुपस्थिति यहाँ बहुत विचित्र लगती है। हम सोचते हैं कि किसी भावना, उत्सव, जश्न या किसी और बात द्वारा अभिव्यक्ति होनी चाहिए। कम से कम "परमेश्वर की स्तुति हो!" या एक "हल्लेलुयाह!" ही सही! इसके बजाय, वहाँ एक धार्मिक विवाद, बहस और एक पड़ताल हो उठी। उनके लिए, व्यवस्था की उनकी कठोर व्याख्या ने उन्हें सब्त के दिन किए गए किसी भी अच्छे कार्य को देखने से रोक दिया। यीशु ने निम्नलिखित कृत्यों से उनकी कठोर व्याख्या तोड़ दी थी:

 

1) उसने सब्त के दिन मिट्टी बनाई। मिट्टी के साथ लार मिलाना अग्वों द्वारा गूंदने के रूप में माना जाता था, जो उनके लिए सब्त के दिन काम करने जैसा ठहरता था।

2) सब्त के दिन चंगा करना मना था। केवल अगर किसी का जीवन वास्तविक खतरे में था, तो ही उसे सब्त के दिन चंगा किया जा सकता था।

 

उन्होंने जल्दी ही निष्कर्ष निकाल लिया कि यह चंगाई नहीं हो सकती थी, क्योंकि उनकी राय में यीशु एक पापी था क्योंकि उसने व्यवस्था की उनकी व्याख्या तोड़ दी थी। कुछ और स्पष्टीकरण होना चाहिए था। सबसे पहले, उन्होंने यह कहकर इसे समझाने की कोशिश की कि यह वह व्यक्ति नहीं था जो अंधा पैदा हुआ था। लेकिन उसने कहा,मैं वही हूँ” (पद 9)। शायद यह सोचकर कि यह सब एक बड़ा छलावा है, वे जो हुआ था उसके लिए एक स्पष्टीकरण चाहते थे। अपनी प्रतिक्रिया में, वह व्यक्ति हमारे लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण है। हो सकता है कि वो इस सब को धार्मिक रूप से एक-साथ से संजोने में सक्षम न हो, लेकिन उसने वो प्रमाणित किया जो वह जानता था और जो उसने अनुभव किया था और अपने कार्यों के परिणामों को लेकर उसमें शांति थी, चाहे कुछ भी हो जाए। उसने केवल जो कुछ उसके साथ हुआ उनकी कहानी साझा की। हम सुसमाचार की सामर्थ के विषय में लोगों के साथ बहस करने में सक्षम न हों, लेकिन हम अपनी कहानी साझा कर सकते हैं कि हमारे साथ क्या हुआ है। यह अक्सर एक दिल को छू देने वाली व्यक्तिगत कहानी होती है जो लोगों को याद रहती है और उनके हृदयों को सच्चाई के लिए खोल देती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि, यदि आप मसीह को जानते हैं, तो आपकी कहानी आकर्षक है और बौद्धिक तर्क या आत्मिक अन्धकार को चीर सकती है। व्यक्तिगत गवाही में, परमेश्वर का प्रेम और सामर्थ प्रकट होता है।

 

प्रश्न 4) आप क्या सोचते हैं कि इस बिंदु से आगे, उसकी शारीरिक दशा को छोड़, इस व्यक्ति की जिंदगी कैसे बदली होगी? आपको क्या लगता है कि इसने समुदाय में दूसरों के लिए क्या मुद्दे उठाए होंगे?

 

फरीसियों ने उसकी चंगाई के बारे में उसके माता-पिता से सवाल किए। वे विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि वह अंधा पैदा हुआ था। उसने पूछा, “क्या यह तुम्हारा पुत्र है” (पद 19)। यहुन्ना हमें यह समझने में मदद करने के लिए कि माता-पिता उसे अपने बेटे के रूप में क्यों स्वीकार करें एक टिपण्णी जोड़ता है, लेकिन क्या हुआ इसके बारे में कोई विवरण नहीं देता है : ये बातें उसके माता-पिता ने इसलिये कहीं क्योंकि वे यहूदियों से डरते थे; क्योकि यहूदी एका कर चुके थे, कि यदि कोई कहे कि वह मसीह है, तो आराधनालय से निकाला जाए। इसी कारण उसके माता-पिता ने कहा, “वह सयाना है; उसी से पूछ लो।” (पद 22-23)। इस कहानी में अंतर्निहित विषय फरीसियों का यीशु के मसीह में विश्वास और भरोसा रखने वाले किसी के खिलाफ भयभीत करने और धमकियों का उपयोग करना है। हम में से कई लोगों के लिए जो धर्मनिरपेक्ष पश्चिमी देशों में रहते हैं, यह समझना असंभव है कि पहली शताब्दी की संस्कृति में यहूदी व्यक्ति के लिए आराधनालय से बाहर किये जाने का अर्थ क्या है। इस बहिष्कार का मतलब था कि अन्य यहूदी उनके साथ कोई मेल-जोल नहीं करेंगे। बहिष्कार इससे भी अधिक था, क्योंकि, यदि आपने अग्वों के आदेशों का पालन नहीं किया, तो आपकी संपत्ति भी ली जा सकती है: "उसकी समस्त धन- सम्पत्ति नष्ट की जाएगी और वह आप बन्धुआई से आए हुओं की सभा से अलग किया जाएगा” (एज्रा 10:8)। सबकुछ यहूदी सामजिक ताने-बाने के इर्द-गिर्द घूमता हुआ, जिसमें आराधनालय केवल इसका एक हिस्सा था। इसका अर्थ था अकेले में अस्तित्व। अंधे व्यक्ति के माता-पिता इसमें पड़ना नहीं चाहते थे; उन्होंने कहा, वह सयाना है; उसी से पूछ लो।” (पद 23)

 

उन्होंने यीशु के खिलाफ अपना मुद्दा बनाने के लिए संघर्ष किया, लेकिन जो व्यक्ति चंगा किया गया था वह धमकी से नहीं डरा। वो पीछे हटने वाला नहीं था। उन्होंने उसे फिर से बुलाया और कहा,

 

24तब उन्होंने उस मनुष्य को जो अन्धा था दूसरी बार बुलाकर उससे कहा, “परमेश्वर की स्तुति कर; हम तो जानते हैं कि वह मनुष्य पापी है।” 25उसने उत्तर दिया: “मैं नहीं जानता कि वह पापी है या नहीं: मैं एक बात जानता हूँ कि मैं अन्धा था और अब देखता हूँ।” (यहुन्ना 9:24-25)

 

परमेश्वर की स्तुति कर जाँच-पड़ताल में प्रयोग एक अभिव्यक्ति थी। वे कह रहे थे, "हमें सच बताओ""परमेश्वर के सामने एक साफ विवेक रखो।" लेकिन, यह व्यक्ति थोड़ा भी नहीं डरा। उसे बहिष्कृत होने की परवाह नहीं थी, वह जीवन में अपने अंधेपन में इससे भी बहुत ज्यादा बुरी चीजों में से गुजर चुका था। हम उसमें सच्चाई और उसे चंगा करने वाले के लिए सच्चाई का हृदय देखते हैं। वह जो हुआ उसे साझा करने के लिए वफादार रहने वाला था और पीछे नहीं हटता। उन्होंने कहा, “उसने तेरे साथ क्या किया?" चंगाई पाया व्यक्ति उनकी बनावटी जाँच को भाँप पा रहा था। वे सच्चाई नहीं चाहते थे; वह उसकी गवाही को नष्ट करना चाहते थे।

 

उसने उनसे कहा, “मैं तो तुम से कह चुका, और तुमने नहीं सुना; अब दूसरी बार क्यों सुनना चाहते हो? क्या तुम भी उसके चेले होना चाहते हो?” (पद 27)

 

यहाँ वह व्यक्ति अपना निर्णय लेता है और अडिग हो जाता है। यह मेरी जगह है! "भी" शब्द के साथ, वह बता रहा है कि वह किसका शिष्य होगा। वह कहता है, "मैं मसीह का शिष्य बनूँगा! क्या तुम भी उसका शिष्य होगे?" बहुत क्रोध के साथ, फरीसियों ने उसे श्राप दिया और उसे आराधनालय से बाहर कर दिया। ये श्राप के शब्द तब बोले जाते थे जब कोई मूसा की व्यवस्था के पालन से पीछे हट जाता था (व्यवस्थाविवरण 11:28)। वे केवल इस व्यक्ति को बुरा-भला नहीं कह रहे थे; वे आधिकारिक तौर पर समुदाय से उसका बहिष्कार कर रहे थे। इस पल से आगे, एक व्यक्ति जो अपनी आजीविका के लिए समुदाय में दूसरों की दया पर निर्भर था, वह अब इस तरह से नहीं जी पाता। उसकी कहानी, उसकी घोषणा, शायद कहने के लिए एक महंगा कथन था, लेकिन जो उसके साथ हुआ वह उससे इनकार नहीं कर सकता था। उसने केवल सच कहा। जब परमेश्वर हमारे जीवन में अंतररोध करता है, और हमारा उसके साथ आमना-सामना होता है, तो यह केवल शुरुआत ही है। इस आदमी का जीवन इस तरीके से बदलने वाला था जिसकी वह तब कल्पना भी नहीं कर सकता जब उस उसकी आँखों पर मिट्टी लगाई जा रही थी।

 

दो प्रकार का अंधापन

 

35यीशु ने सुना, कि उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया है; और जब उसे भेंट हुई तो कहा, “क्या तू परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करता है?” 36उसने उत्तर दिया, “हे प्रभु; वह कौन है कि मैं उस पर विश्वास करूँ?” 37यीशु ने उससे कहा, “तूने उसे देखा भी है; और जो तेरे साथ बातें कर रहा है वही है।” 38उसने कहा, “हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ: और उसे दंडवत किया।” 39तब यीशु ने कहा, “मैं इस जगत में न्याय के लिये आया हूँ, ताकि जो नहीं देखते वे देखें, और जो देखते हैं वे अन्धे हो जाएं।” 40जो फरीसी उसके साथ थे, उन्होंने ये बातें सुन कर उससे कहा, “क्या हम भी अन्धे हैं?” 41यीशु ने उनसे कहा, “यदि तुम अन्धे होते तो पापी न ठहरते परन्तु अब कहते हो, कि हम देखते हैं, इसलिये तुम्हारा पाप बना रहता है।” (यहुन्ना 9:35-41)

 

मुझे यह बहुत पसंद है कि प्रभु उसे कैसे आकर्षित करता है! यह हमारे प्रभु, जो चरवाहा है बिलकुल उसी का कार्य है। जब उस व्यक्ति को संगती से बाहर निकाल दिया गया, तो प्रभु उसे खोजने गया और उसे पाया। यीशु उसे अपने साथ संगति में लेकर आया। वह अपनी उन खोई हुई भेड़ों की परवाह करता है जो झुंड से भटक गई हैं। यीशु ने उससे कहा, “क्या तू परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करता है?” यह शब्द, "परमेश्वर का पुत्र" एक मसीही शब्द था जिसे आने वाले मसीहा को दिया गया था, जिसका उल्लेख सबसे पहले दानिय्येल की पुस्तक में किया गया है (डैनियल 7:13)। अंग्रेजी किंग जेम्स संस्करण इसे तरह से प्रस्तुत करता है: "क्या आप परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करते हैं?" प्रभु कहता है कि वह संसार में इसलिए आया ताकि अंधे देखें और जो लोग सोचते हैं वे देखते हैं वह अंधे हो जाएंगे (पद 38)। हमारा यीशु के व्यक्ति के साथ हर आमना-सामना हमें या तो उसके करीब ले आता है या हमें उससे और दूर धकेल देता है।

 

इस आदमी के विश्वास की प्रगति पर ध्यान दें। शुरुआत में देखें, यीशु के विषय में उसके विचार स्पष्ट नहीं थे, यानी “यीशु नामक एक व्यक्ति (पद 11)। हालांकि, जैसे-जैसे उसपर यीशु का प्रकाशन गहरा हुआ, उसने यीशु को “भविष्यद्वक्ता” कहा (पद 17)। इस आमने-सामने के अंत में, उसने कहा; हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ: और उसे दंडवत किया” (पद 38)

 

रंगावाली के दूसरे छोर पर, यानी, वह जिनके हृदय बंद हैं और विश्वास करने से इनकार करते हैं, वे आत्मिक रूप से अंधे हो गए। यीशु के प्रति उनकी प्रतिक्रिया थी, क्या हम भी अन्धे हैं?” (पद 40)। वे प्रभु से “नहीं” के उत्तर की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन उन्हें यह नहीं मिला! वे आत्मिक रूप से अंधे थे! ऐसे लोगों से ज्यादा अँधा कोई नहीं हैं जो देखने से इनकार करते हैं। बहुत से लोग सच्चाई को देखने से डरते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि सच्चाई उनके जीवन को बदल देगी, इसलिए वे उन्हें प्रस्तुत किये स्पष्ट तथ्यों को सुनने और चिंतन-मनन करने से इनकार करते हैं। जब लोग जिद्द के साथ यीशु की सच्चाई को देखने से इनकार करते हैं, यानी, वह कौन है और उसने उनके लिए क्या किया है, तो वे अपने पाप में आगे बढ़ जाते हैं, और उनका अपराध बना रहता है। परमेश्वर न्याय के दिन उन सभी को उत्तरदायी ठहराएगा जो सत्य को जानते थे और फिर भी इसके खिलाफ दृढ़ता से खड़े रहे। भले ही वे मानते थे कि वे समुदाय में सबसे आत्मिक लोग हैं, लेकिन यह फरीसी आत्मिक चीजों के प्रति अंधे थे।

 

जब परमेश्वर की सामर्थ प्रकट होती है, तो आप अक्सर एक सीधी चुनौती और संघर्ष देखेंगे। इस अंधे व्यक्ति की अविश्वसनीय चंगाई ने तुरंत उन लोगों के लिए एक प्रश्न खड़ा किया होगा जिन्होंने जो उन्होंने देखा उसपर विश्वास किया। क्या वे इस अंधे व्यक्ति के साथ खड़े होंगे और विश्वास करेंगे कि परमेश्वर ने वास्तव में उसे चंगा किया था, या फिर वे उसे नकार देंगे और फरीसियों के साथ समझौते में खुद को ले आएंगे? एक बार फिर, यीशु अपनी ज्योति को एक परिस्थिति में लाया और उस अन्धकार का खुलासा किया जो उसके विरोध करने वालों के हृदयों में था। उनके कार्यों ने एक सवाल उठाया जिसका हम में से प्रत्येक को जवाब देना है : क्या हम उसके लिए हैं या उसके विरोध में हैं? आप किसकी तरफ आएंगे? क्या आप जिद्दी-हृदय वाले होंगे, या आप खुद को मसीह की ज्योति में खींचे जाने की अनुमति देंगे? प्रार्थना करें कि परमेश्वर आपको मसीह के ज्ञान और सत्य में चलने के लिए एक कोमल, संवेदनशील हृदय देगा।

 

प्रार्थना : पिता, कृपया अपने वचन में पाए गए सत्य के लिए हमारी आंखें खुली रखें। कृपया मुझे वैसे ही आपको प्रतिउत्तर देने के लिए एक संवेदनशील आत्मा दें जैसा इस जन्म से अंधे व्यक्ति को दी थी। आप उससे इतना प्रेम करते थे कि आपने उसके जीवन में प्रवेश कर उसे सदा के लिए बदल दिया। कृपया मुझे उसी के जैसे ही आपके लिए खुले रहने और विश्वासयोग्य होने में मदद करें। आमिन!

 

कीथ थॉमस

नि:शुल्क बाइबिल अध्यन के लिए वेबसाइट: www.groupbiblestudy.com

-मेल: keiththomas7@gmail.com