14. All Who Are Thirsty

14. वे सभी जो प्यासे हैं

यहुन्ना हमारे लिए यह बाँटकर अध्याय सात में सन्दर्भ स्थापित करता है, कि तम्बू के पर्व के समय तक यीशु ने गलील के क्षेत्र में सेवकाई की। यह त्यौहार हमारे पश्चिमी कैलेंडर में सितंबर या अक्टूबर के दौरान पड़ता है। जैसा कि एक अन्य अध्ययन में बताया गया है, सभी व्यस्क पुरुषों को परमेश्वर द्वारा तीन मुख्य उत्सवों में भाग लेने के लिए आज्ञा दी गई थी; फसह (जिसे अखमीरी रोटी के पर्व के रूप में भी जाना जाता है), पेंतेकूस्त (जिसे सप्ताहों का पर्व भी कहा जाता है), और मण्डपों का पर्व (जिसे झोपड़ियों का पर्व भी बुलाया जाता है व्यवस्थाविवरण 16)। एक फसल की कटनी का उत्सव होने के अलावा, तम्बू का पर्व इज़राइल के लिए परमेश्वर के प्रयोजन का उस समय का स्मरण भी था जब चालीस वर्षों तक भटकने के दौरान परमेश्वर ने उन्हें तम्बुओं और अस्थायी घरों में रहने के लिए उनकी अगवाई की और उन्हें वहाँ रखा।

 

यह उत्सव एक सप्ताह तक चलता था (व्यवस्थाविवरण 16:13-15), और यह एक आनंद का समय था, जहाँ परिवार त्यौहार के दौरान रहने के लिए अस्थायी निवास बनाते। यह आठवें दिन समाप्त होता, जो एक "पवित्र दिन" था, जब कोई काम नहीं किया जाना था (गिनती 29:35)। यहुन्ना हमें कुछ महत्वपूर्ण बात बताता है जो यीशु ने आठवें दिन (यहुन्ना 7:37) किया था। इससे पहले कि हम यीशु की उस महत्वपूर्ण बात तक जाएँ, आइए उस वार्तालाप को सुनें जो इसका कारण बनी।

 

1इन बातों के बाद यीशु गलील में फिरता रहा, क्योंकि यहूदी उसे मार डालने का यत्न कर रहे थे, इसलिये वह यहूदिया में फिरना न चाहता था। 2और यहूदियों का मण्डपों का पर्व निकट था। 3इसलिये उसके भाइयों ने उससे कहा, “यहाँ से कूच करके यहूदिया में चला जा, कि जो काम तू करता है, उन्हें तेरे चेले भी देखें। 4क्योंकि ऐसा कोई न होगा जो प्रसिद्ध होना चाहे, और छिपकर काम करे: यदि तू यह काम करता है, तो अपने आप को जगत पर प्रगट कर।” 5क्योंकि उसके भाई भी उस पर विश्वास नहीं करते थे। 6तब यीशु ने उनसे कहा, “मेरा समय अभी नहीं आया; परन्तु तुम्हारे लिये सब समय है। 7जगत तुम से बैर नहीं कर सकता, परन्तु वह मुझ से बैर करता है, क्योंकि मैं उसके विरोध में यह गवाही देता हूँ, कि उसके काम बुरे हैं। 8तुम पर्व में जाओ: मैं अभी इस पर्व में नहीं जाता; क्योंकि अभी तक मेरा समय पूरा नहीं हुआ।” 9वह उनसे ये बातें कहकर गलील ही में रह गया। 10परन्तु जब उसके भाई पर्व में चले गए, तो वह आप ही प्रगट में नहीं, परन्तु मानों गुप्त होकर गया। (यहुन्ना 7:1-10, बल मेरी ओर से जोड़ा गया है)

 

यह यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने से सिर्फ छह महीने पहले का समय था, और यहूदी शासकों के अभिजात वर्ग ने यह कह दिया था कि प्रभु को मृत्यु दी जानी थी (पद 1)। शास्त्री, फरीसी, सदूकी, और यहूदी धार्मिक अग्वे केवल यीशु के विरुद्ध नहीं थे; वे उसे मारने का इरादा रखते थे! कोई भी न्याय के दिन परमेश्वर को यह नहीं कह पाएगा, "आप नहीं जानते कि वह कैसा था," क्योंकि परमेश्वर ने हर मायने से मानव पीड़ा में प्रवेश किया है, यहाँ तक ​​कि अपने लोगों द्वारा अस्वीकारे जाने तक भी। यीशु इस बात से अवगत था कि उसे मारने की योजना थी, लेकिन वह यह भी समझ गया कि उसका समय आ रहा है और वह उन सभी के लिए जो उसके ऊपर विश्वास रखेंगे फसह के बलिदान का मेमना होगा।

 

कॉयरोस समय

 

वचन बताता है कि यीशु के चार भाई और कम से कम दो बहनें थीं (मत्ती 12:55-56, मरकुस 3:31), और उसके भाई उसे त्यौहार के लिए यरूशलेम जाने के लिए जोर दे रहे थे।

 

प्रश्न 1) उनके भाइयों ने यीशु से यरूशलेम जाने और प्रसिद्ध व्यक्ति बनने का आग्रह क्यों किया? (पद 3-4) यीशु ने सही समय के बारे में बात कर जवाब क्यों दिया? (पद 6)

 

शायद, उन्होंने सोचा होगा कि गलील में साधारण लोगों के बीच मेहनत करने, उन्हें चंगाई और शिक्षा देने से वो आगे नहीं बढ़ रहा था। अगर वह इज़राइल में शिक्षक बनने की इच्छा रखता है, तो यरूशलेम वह जगह थी जहाँ वो विश्व के सामने खुद को साबित कर सार्वजनिक पहचान और प्रशंसा प्राप्त कर सकता है। सार्वजनिक पहचान दिलाने और ख्याति पाने लिए संसार का तरीका खुद को आगे बढ़ाना है। यीशु को इन चीजों की तलाश नहीं थी। "क्या तू अपने लिये बड़ाई खोज रहा है? उसे मत खोज" (यिर्मयाह 45:5) परमेश्वर के पुरुष या स्त्री इस प्रकार दूसरों की सेवा करने में अपना जीवन उड़ेलने में प्रसन्न होते हैं जैसे वह स्वयं प्रभु की सेवा कर रहें हों; यह रवैया सच्चा आनंद है। यहुन्ना हमें बताता है कि उसके भाइयों ने उस पर विश्वास नहीं किया (पद 5) बेशक, पुनरुत्थान के बाद, कहानी कुछ अलग थी। वास्तव में, हम जानते हैं कि मसीह के कम से कम दो भाई प्रारंभिक कलीसिया के अग्वे बने, याकूब और यहूदा, और उन्होंने नए नियम की दो पुस्तकें लिखीं जो उनके नाम पर हैं।

 

जब यीशु से पर्व के लिए यरूशलेम जाने का आग्रह किया गया, तो उसका प्रतिउत्तर था "अभी तक मेरा समय पूरा नहीं हुआ” (पद 8)। इस उदाहरण को छोड़कर प्रत्येक उदाहरण में, मसीह अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने के समय का वर्णन करने के लिए यूनानी शब्द होरा का प्रयोग करता है, जिसका अर्थ है "घंटा"। लेकिन आठवें वचन में, इस सुसमाचार के लेखक, यहुन्ना, सही समय का वर्णन करने के लिए कॉयरोस शब्द का प्रयोग करता है। इस यूनानी शब्द का अर्थ है समय में एक निर्णायक या कार्यनीति का क्षण जो यह समझाता है कि परमेश्वर मण्डपों के पर्व में क्या करना चाहता था। पिता अपने पुत्र के बारे में यहूदी लोगों को कुछ नया प्रकट करना चाहता था। हालांकि, अभी के लिए, यीशु को कॉयरोस समय, यानी, उपयुक्त समय, निर्णायक क्षण, आने के लिए इंतजार करना था। यह संभव है कि इस उत्सव में जाने के लिए हजारों लोगों के साथ तीन या चार दिवसीय यात्रा करने के बजाय, यीशु नहीं चाहता था कि यरूशलेम में प्रवेश के समय उसे जनता की प्रशंसा मिले। वह समय तब आएगा जब मसीह छह महीने बाद फसह के रविवार के दिन एक गधे पर सवारी कर यरूशलेम में प्रवेश करेगा, फसह के मेमने के रूप में क्रूस पर चढ़ाए जाने से कुछ दिन पूर्व। इस त्यौहार के लिए, वह गुप्त रूप से यरूशलेम जाएगा (पद 10)

 

प्रश्न 2) यीशु ने कहा कि सही समय अभी तक नहीं आया है। क्या आपके जीवन में कोई ऐसा निर्णायक या पारिभाषिक करने वाला क्षण रहा है जो एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने परमेश्वर की कृपा से, आपको हमेशा के लिए बदल दिया?

 

इस समय तक, यहूदी शासन के नेतृत्व में यीशु के प्रति विरोध काफी बढ़ गया था, आंशिक रूप से सब्त के दिन पर बतहसदा के कुण्ड में बीमार व्यक्ति की चंगाई के कारण (यहुन्ना 5:16), और इसलिए भी क्योंकि मसीह परमेश्वर के साथ समानता का दावा कर रहा था (यहुन्ना 5:19)। वह याजकों की सत्ता के लिए भी खतरा था क्योंकि उसने मंदिर से धन परिवर्तन करने वाले व्यापारियों को भी बाहर निकाल दिया था। ऐसा करने में, उसने यहूदी अग्वों को उस बहुत सारे धन से वंचित कर दिया जो वह लोगों से मंदिर कर जमा करने के लिए अत्यधिक धन परिवर्तन शुल्क के रूप में वसूलते थे (यहुन्ना 2:13-17)। यह बात उन सब लोगों के बीच फैल गई थी जिनके पास कोई नेतृत्व अधिकार था कि जैसे ही उन्हें सही मौका मिले, यीशु को मारा जाना है।

 

यीशु ने जो भी किया वह सब हमें इस बात का नमूना पेश करने के लिए था कि हमें किस प्रकार मसीह केंद्रित जीवन जीना है, यानी, प्रभु के समय का इंतज़ार करना। मसीह ने अपना जीवन पिता पर निर्भरता में जिया। कभी-कभी, परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करना मुश्किल होता है। हम जाकर परमेश्वर का काम करने के लिए इतने उत्सुक हो सकते हैं कि हम परमेश्वर के बिना ही जा सकते हैं। मूसा ने मिस्र में इस्राएलियों की मदद करने के लिए परमेश्वर के समय के बाहर अपने तैयार होने से पहले काम किया, और इससे पहले कि यहोवा ने उसे इज़राइल के पुत्रों को मिस्र से बाहर लाने के लिए बुलाया, उसे मिस्र के रेगिस्तान में एक चरवाहे के रूप में चालीस वर्ष बिताने पड़े (प्रेरितों 7: 23-30)। ऐसी बातें हैं जो परमेश्वर हमें उपयोग करने से पहले हमारे साथ करना चाहता है। ए.डब्लू. टोज़र ने कहा, "यह संदिग्ध है कि क्या परमेश्वर एक व्यक्ति को गहराई से चोट पहुँचाने से पहले बहुत आशीष दे सकता है।"

 

यह राष्ट्रों के लिए भी है। चीनी लोगों को अपना कॉयरोस समय आने तक कई परीक्षाओं और सताव से जाना पड़ा है। उनके लिए पारिभाषिक क्षण अब है जब वह अब कई राष्ट्रों में प्रभु के सवकों को भेज रहे हैं। कभी-कभी, परमेश्वर के समय पर ठहरे रहना दर्दनाक हो सकता है। परमेश्वर के लोगों के साथ सबसे बुरी चीज यह हो सकती है कि वो तैयार होने से पहले ही सेवकाई में आगे बढ़ जाएँ। कई लोगों ने पूरी तरह से तैयार होने से पहले जाने के कारण अपने विश्वास को तहस-नहस कर दिया है। यीशु को सही समय के लिए इंतजार करना था, वह कार्यनीति का समय जब पर्व में जाने के लिए उसे परमेश्वर ने निर्देशित करना था।

 

प्रश्न 3) किसी व्यक्ति को कैसे पता चलेगा कि किसी चीज़ के लिए सही समय गया है? क्या यह सहज-बोध या अनुकूल परिस्थितियों पर निर्भर है? क्या बाधाओं के बावजूद विश्वास में आगे बढ़ने का कोई समय है?

 

उसके चेलों द्वारा पूरा किए जाने वाले प्रभु के किसी महत्वपूर्ण कार्य से पहले तैयारी का एक समय है। यशायाह 49 में परमेश्वर के दास की तैयारी की एक तस्वीर है:

 

यहोवा ने मुझे गर्भ ही में से बुलाया, जब मैं माता के पेट में था, तब ही उसने मेरा नाम बताया। 2 उसने मेरे मुंह को चोखी तलवार के समान बनाया और अपने हाथ की आड़ में मुझे छिपाए रखा; उसने मुझको चमकिला तीर बनाकर अपने तर्कश में गुप्त रखा। 3ओर मुझ से कहा, “तू मेरा दास इजराइल है, मैं तुझ में अपनी महिमा प्रगट करूँगा।” (यशायाह 49:1-3)

 

परमेश्वर के पुरुष या स्त्री को आकृत करने में परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दें। सबसे पहले, उसके जीवन पर एक बुलाहट है। गर्भ से ही परमेश्वर कार्य कर रहा है, उसे नाम से बुला रहा है। परमेश्वर द्वारा आकृत किये जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक यह है कि उस व्यक्ति के होठों से क्या बातें निकलती हैं। उस मनुष्य की जीभ को एक ऐसी तेज तलवार बनना है जो आत्मा द्वारा सशक्त है और उसके नेतृत्व में चलती है। अशिष्ट भाषा या धोखा देने वाले होंठों के लिए कोई जगह नहीं है (याकूब 3:10-11)। यहाँ जो तस्वीर दी गई है वो एक तीर बनाने की है। इसके मेज़ पर सीधा किये जाने से पहले इसे तीर बनाने वाले के हाथों में लचीला बनाना होगा। इस प्रक्रिया में फिर चमकाए जाने की आवश्यकता होती है, जो गलत तरीके से रगड़ने और परमेश्वर के लिए महत्वपूर्ण रूप से उपयोग होने से पहले हमारे चरित्र को गर्मी द्वारा खरा करने के विषय में बात करता है।

 

परमेश्वर के परिवर्तन के कार्य का अंतिम भाग तरकश में रखा जाना है (जो तीरंदाज़ की पीठ पर टंगा तीरों को ले जाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला एक चमड़े का थैला है), स्वामी के उसे अपने धनुष में रख अपने समय के अनुसार चुनाव कर छोड़े जाने (इस्तेमाल) का इंतजार करना। आप में से कई तैयार किए गए हैं और परमेश्वर के सही समय के लिए तरकश में शेष हैं। हम यहाँ एक महत्वपूर्ण कार्य के लिए तैयार होने के बारे में बात कर रहे हैं। हमें परमेश्वर के प्रकट वचन का पालन करने के लिए कभी इंतजार नहीं करना है।

 

जब आप तरकश में इंतज़ार का अनुभव कर रहे हैं, तो आपको परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता में चलकर अपने चरित्र को और चोखा करना चाहिए, यानी, समझाने के लिए, अपने जीवन को चमकाना, ताकि जब आप उसके धनुष से छोड़े जाते हैं, तब आप सीधे उसी लक्ष्य की ओर सही उड़ान भरेंगे जिसके लिए उसने आपको तैयार किया है। तरकश अनुभव का हिस्सा धैर्य रखना और उसकी आवाज़ को सुनना व सीखना है। परमेश्वर हमसे अक्सर बात करता है; समस्या आमतौर पर हमारी तरफ से होती है। हम बस उसकी आवाज नहीं सुन रहे या समझ रहे होते हैं:

 

क्योंकि ईश्वर तो एक क्या वरन दो बार बोलता है, परन्तु लोग उस पर चित्त नहीं लगाते। (अय्यूब 33:14)

 

धैर्य एक ऐसी बात है जिसपर आत्मा हम में तब कार्य करता है जबकि हम तरकश में होते हैं। जबकि हम प्रशिक्षण में हैं, हम इस समय की सराहना कर सकते हैं क्योंकि परमेश्वर हमारे जीवन में अपने चरित्र को प्रकट करने के लिए हमारे भीतर कार्य कर रहा है।

 

मसीह का साहस

 

11तो यहूदी पर्व में उसे यह कहकर ढूंढ़ने लगे कि वह आदमी कहाँ है? 12और लोगों में उसके विषय चुपके चुपके बहुत सी बातें हुईं: कितने कहते थे; “वह भला मनुष्य है”: और कितने कहते थे; “नहीं, वह लोगों को भरमाता है।” 13 तौभी यहूदियों के भय के मारे कोई व्यक्ति उसके विषय में खुलकर नहीं बोलता था। 14और जब पर्व के आधे दिन बीत गए; तो यीशु मन्दिर में जाकर उपदेश करने लगा। 15तब यहूदियों ने अचम्भा करके कहा, “कि इसे बिन पढ़े विद्या कैसे आ गई?” 16 यीशु ने उन्हें उत्तर दिया कि “मेरा उपदेश मेरा नहीं, परन्तु मेरे भेजनेवाले का है। 17यदि कोई उसकी इच्छा पर चलना चाहे, तो वह इस उपदेश के विषय में जान जाएगा कि वह परमेश्वर की ओर से है, या मैं अपनी ओर से कहता हूँ। 18जो अपनी ओर से कुछ कहता है, वह अपनी ही बढ़ाई चाहता है; परन्तु जो अपने भेजनेवाले की बड़ाई चाहता है वही सच्चा है, और उस में अधर्म नहीं। 19क्या मूसा ने तुम्हें व्यवस्था नहीं दी? तौभी तुम में से काई व्यवस्था पर नहीं चलता। तुम क्यों मुझे मार डालना चाहते हो?” 20लोगों ने उत्तर दिया कि “तुझमें दुष्टात्मा है; कौन तुझे मार डालना चाहता है?” 21यीशु ने उनको उत्तर दिया, “मैंने एक काम किया, और तुम सब अचम्भा करते हो। 22इसी कारण मूसा ने तुम्हें खतने की आज्ञा दी है (यह नहीं कि वह मूसा की ओर से है परन्तु बाप-दादों से चली आई है), और तुम सब्त के दिन को मनुष्य का खतना करते हो। 23जब सब्त के दिन मनुष्य का खतना किया जाता है ताकि मूसा की व्यवस्था की आज्ञा टल न जाए, तो तुम मुझ पर क्यों इसलिये क्रोध करते हो, कि मैंने सब्त के दिन एक मनुष्य को पूरी रीति से चंगा किया। 24मुँह देखकर न्याय न चुकाओ, परन्तु ठीक ठीक न्याय चुकाओ।” 25 तब कितने यरूशलेमी कहने लगे, “क्या यह वह नहीं, जिसके मार डालने का प्रयत्न किया जा रहा है। 26परन्तु देखो, वह तो खुल्लम-खुल्ला बातें करता है और कोई उससे कुछ नहीं कहता; क्या सम्भव है कि सरदारों ने सच-सच जान लिया है; कि यही मसीह है। 27इसको तो हम जानते हैं, कि यह कहाँ का है; परन्तु मसीह जब आएगा, तो कोई न जानेगा कि वह कहाँ का है।” (यहुन्ना 7:11-27)

प्रश्न 4) जब यीशु जगत के उससे बैर रखने के बारे में बात करता है (पद 7), तो आपको क्या लगता है कि वह "जगत" शब्द के प्रयोग से किसके बारे में बात कर रहा है? लोग उसे क्यों मारना चाहते होंगे? (पद 1 और 25)

 

पर्व के मध्य में, यीशु पहुँचकर मंदिर के आँगन में शिक्षा देने लगता है। लोग उसके बारे में विभाजित थे। कुछ ने कहा कि वो एक भला मनुष्य था, जबकि अन्य ने उसपर धोखेबाज़ होने का आरोप लगाया (पद 12)। प्रभु यीशु लोगों को बाँटता है: या तो आप उसके साथ हैं या उसके विरोध में हैं। आज भी ऐसा है। जब पवित्रशास्त्र जगत की मसीह के लिए और उसके शिष्यों के रूप में हमारे लिए नफरत के विषय में बोलता है, तो इसका अर्थ यह है कि विश्व व्यवस्था मसीह और उसके राज्य के उद्देश्यों के सीधे विरोध में है। मसीह में प्रिय भाइयों और बहनों, हम युद्ध में हैं। इस संसार में आत्मिक शक्तियाँ काम पर हैं जो अब्राहम, इसहाक, याकूब और बाइबिल आधारित मसीहत के परमेश्वर के विश्व में सब कुचल देना चाहती हैं। यह इज़राइल राष्ट्र के लिए भी है, क्योंकि परमेश्वर ने अभी तक यहूदी लोगों से किये अपने सभी वादों को पूरा नहीं किया है। भले ही हम मसीहों के लिए विरोध होगा, फिर भी लोग कभी भी हमारे शत्रु नहीं होते हैं। ऐसी आत्मिक शक्तियाँ हैं जो लोगों को इस संसार में बुराई के विकास के लिए प्रेरित करती हैं। पौलुस प्रेरित ने कहा:

 

11परमेश्वर के सारे हथियार बान्ध लो; कि तुम शैतान की युक्तियों के सामने खड़े रह सको। 12क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं। (इफिसियों 6:11-12)

 

मुझे आपसे एक सवाल पूछने दें। यदि आप जानते हैं कि लोग आपको मारने के लिए एक उपयुक्त समय की तलाश कर रहे हैं, तो क्या आप ऐसे स्थान पर जाएंगे जहाँ ऐसा काम करने की इच्छा रखने वाले आपके लिए इंतज़ार कर रहे हों? ऐसा करना या तो बिलकुल पागलपन या परमेश्वर में बेहद साहस या भरोसा होगा। हालांकि, हमारे प्रभु यीशु ने ऐसा ही किया। पद 11 हमें बताता है कि यहूदी लोग, मतलब वह यहूदी लोग जो यीशु के विरोध में थे, उसको यह पूछते खोज रहे थे, वह आदमी कहाँ है?” (पद 11)। उन्हें पता था कि वो वहाँ होगा क्योंकि हर यहूदी जो यरूशलेम और मंदिर के निकट कहीं भी होता, उन्हें झोपड़ियों के पर्व पर स्वयं को परमेश्वर के सम्मुख प्रस्तुत करना आवश्यक था (लैव्यव्यवस्था 23)। शायद, वे यरूशलेम शहर में प्रवेश के हर द्वार पर उसकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे (पद 25)। हालांकि, जैसा वह लोग अपेक्षा कर रहे थे, यीशु बड़ी भीड़ में लोगों के साथ यरूशलेम नहीं गया। वह उत्सव के मध्य में गुप्त होकर (पद 10) उसमें चला गया (पद 14)

 

हम यहाँ मसीह के साहस को देखते हैं। जब वो लोगों की भीड़ के मध्य से गुज़र रहा था, तो वह अपने बारे में व्यापक फुसफुसाट होते हुए सुन सकता था, वह भला मनुष्य है” जबकि दूसरों ने जवाब दिया, नहीं, वह लोगों को भरमाता है” (पद 12) आज भी यह ऐसा ही है। सामान्य सोच यही है कि हमारा उद्धारकर्ता अपने आलौकिक स्वरुप के विषय में एक धोखेबाज है जबकि अन्य लोग उसके संसार का उद्धारकर्ता होने में भरोसा रख चुके हैं।

 

बहादुरी से मंदिर परिसर में प्रवेश करते हुए, वह साहसपूर्वक खड़ा हुआ और जो भी उसे सुन सकते थे उन्हें सिखाते हुए सुलैमान के स्तम्बों के बीच में खड़ा हो शिक्षा देने लगा (पद 14)। जब यहूदी अग्वों ने उसे मंदिर के आँगन में अचानक प्रकट होकर अपने पिता के विषय में शिक्षा देते हुए जल्द ही भीड़ को इक्कठा करते देखा होगा, तो वह कितने ही आवेश में आ गए होंगे। उसकी हिम्मत से हम सभी को प्रेरित होना चाहिए।

 

परमेश्वर के लिए प्यास (यहुन्ना 7:37-43)

 

यहूदी लोग सदियों से उस व्यक्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे जिसके बारे में मूसा ने कहा था कि परमेश्वर उसे भेजेगा। वह मूसा के समान एक भविष्यद्वक्ता होगा। उन्हें उसे बहुत सावधानी से सुनना था:

 

15तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे मध्य से, अर्थात् तेरे भाइयों में से मेरे समान एक नबी को उत्पन्न करेगा; तू उसी की सुनना; 18 सो मैं उनके लिये उनके भाइयों के बीच में से तेरे समान एक नबी को उत्पन्न करूँगा; और अपना वचन उसके मुँह में डालूँगा; और जिस जिस बात की मैं उसे आज्ञा दूँगा वही वह उनको कह सुनाएगा। 19और जो मनुष्य मेरे वह वचन जो वह मेरे नाम से कहेगा ग्रहण न करेगा, तो मैं उसका हिसाब उस से लूँगा। (व्यवस्थाविवरण 18:15; 18-19)

 

इज़राइल के लोग यह समझते थे कि जब मसीह आएगा तो वह वैसे ही चमत्कार करेगा जैसे मूसा ने किए थे। उन्हें मूसा के समय के जैसे ही स्वर्ग से रोटी की उम्मीद थी, लेकिन मसीह ने कहा कि स्वर्ग से असल रोटी वह स्वयं ही है। उसने कहा, 32मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ कि मूसा ने तुम्हें वह रोटी स्वर्ग से न दी, परन्तु मेरा पिता तुम्हें सच्ची रोटी स्वर्ग से देता है। 33क्योकि परमेश्वर की रोटी वही है, जो स्वर्ग से उतरकर जगत को जीवन देती है।” (यहुन्ना 6:32-33) यहुन्ना अपने सुसमाचार के लेखन में हमें इस बात का एक और सबूत बताता है कि यीशु ही वह भविष्यद्वक्ता था जिसके विषय में मूसा ने कहा था। जैसे मूसा ने चट्टान पर अपनी लाठी मारकर उन्हें चट्टान से पानी पिलाया था (निर्गमन 17:5-6), पौलुस प्रेरित हमें बताता है कि पानी निकलने के लिए चट्टान का लाठी से मारा जाना मसीह का जीवन के जल का दाता होने का एक सादृश्य या सांकेतिक भाषा थी, उनके ऊपर उड़ेला गया परमेश्वर का आत्मा। पौलुस ने लिखा: 2और सब ने बादल में, और समुद्र में, मूसा का बपितिस्मा लिया। 3और सब ने एक ही आत्मिक भोजन किया। 4और सब ने एक ही आत्मिक जल पीया, क्योंकि वे उस आत्मिक चट्टान से पीते थे, जो उन के साथ- साथ चलती थी; और वह चटान मसीह था(1 कुरिन्थियों 10:2-4) मूसा ने जो किया वह यीशु जो क्रूस पर करेगा उसका मात्र एक प्रतीक था। पानी द्वारा दर्शाया, आत्मा पेंतेकूस्त के दिन उसी प्रकार उड़ेला जाएगा जैसा कि विभिन्न भविष्यवक्ताओं ने भविष्यवाणी की थी (जोएल 2:28, यशायाह 44:3, यहेजकेल 36:26-27)

 

यहुन्ना अब पुत्र के एक और प्रकाशन के बारे में लिखता है जिसे पिता ने अपने लोगों के लिए तैयार किया था। यह आठवें दिन हुआ, झोपड़ियों के पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन।

 

37फिर पर्व के अंतिम दिन, जो मुख्य दिन है, यीशु खड़ा हुआ और पुकार कर कहा, “यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए। 38जो मुझपर विश्वास करेगा, जैसा पवित्र शास्त्र में आया है उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी।” 39उसने यह वचन उस आत्मा के विषय में कहा, जिसे उसपर विश्वास करनेवाले पाने पर थे; क्योंकि आत्मा अब तक न उतरा था; क्योंकि यीशु अब तक अपनी महिमा को न पहुँचा था। 40तब भीड़ में से किसी किसी ने ये बातें सुन कर कहा, “सचमुच यही वह भविष्यद्वक्ता है।” 41औरों ने कहा, “यह मसीह है”, परन्तु किसी ने कहा, “क्यों? क्या मसीह गलील से आएगा? 42क्या पवित्र शास्त्र में यह नहीं आया कि मसीह दाऊद के वंश से और बैतलहम गाँव से आएगा जहाँ दाऊद रहता था? 43सो उसके कारण लोगों में फूट पड़ी। (यहुन्ना 7:37-43)

 

पर्व सात दिनों तक चलता और फिर आने वाला अगला दिन अति महत्वपूर्ण होता (यहुन्ना 7:37)। आठवें दिन के लिए यहोवा ने यह निर्देश दिए थे: सातों दिन यहोवा के लिये भेंट चढ़ाया करना, फिर आठवें दिन तुम्हारी पवित्र सभा हो, और यहोवा के लिये बलि चढ़ाना; वह महासभा का दिन है, और उस में परिश्रम का कोई काम न करना।” (लैव्यव्यवस्था 23:36)

 

आठवें दिन, जब हजारों लोगों के सामने, महायाजक सिलोम के कुण्ड में जाता और एक छोटा सोने का लोटा भर उसे मंदिर की वेदी के सम्मुख भीड़ के बीच में लाता। भीड़ यरीहो की दीवारों के गिराए जाने के स्मरण में सात बार वेदी के चरों ओर चक्कर लगाती, और फिर, पूरे आयोजन में विभिन्न भजनों के गाए जाने के साथ, मुख्य याजक इस बात के सांकेतिक चिन्ह के तौर पर कि यहूदी लोग जीवन के जल के लिए तैयार हैं, वेदी के सामने एक भविष्यवाणी के रूप में पानी उड़ेलता था।

 

भविष्यवक्ता यहेजकेल ने उस समय के बारे में बात की थी जब मंदिर की नीव के नीचे से, जीवन की एक नदी पूर्व की तरफ बहेगी जो शुरूआत में टखने तक होगी, फिर घुटने तक गहरी हो जाएगी, और अंत में इतनी गहरी हो जाएगी कि वह लोगों को उनके अपने पैरों तले उठा लेगी और उन्हें अपने रास्ते में ले जाएगी (यहेजकेल 47:1-9)। जहाँ भी यह नदी बहेगी, वह जीवन, फल ​​और चंगाई लाएगी। यह नदी मृत सागर में उतरेगी, और इसका प्रभाव मृत सागर में मछली उत्पन्न करना होगा (यहेजकेल 47:8-9)। पानी का उड़ेले जाना उनकी इस उम्मीद को दिखता है कि शायद उनके समय में, जब लोटा उड़ेला जाएगा, जीवन की नदी बहने लगेगी।

 

यहूदी लोगों के लिए, संसार का केंद्र इज़राइल था। इज़राइल का केंद्र यरूशलेम था, और यरूशलेम का केंद्र मंदिर था। ऐसा प्रतीत होता है कि लोटे उड़ेले जाने के उसी पल में, यीशु खड़ा हुआ और अपनी आवाज़ उठाई ताकि सभी उसके शब्दों को सुन सकें:

 

37यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए। 38जो मुझपर विश्वास करेगा, जैसा पवित्र शास्त्र में आया है उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी।” 39उसने यह वचन उस आत्मा के विषय में कहा, जिसे उसपर विश्वास करनेवाले पाने पर थे; क्योंकि आत्मा अब तक न उतरा था; क्योंकि यीशु अब तक अपनी महिमा को न पहुँचा था। 40तब भीड़ में से किसी किसी ने ये बातें सुन कर कहा, “सचमुच यही वह भविष्यद्वक्ता है।” 41औरों ने कहा, “यह मसीह है”, परन्तु किसी ने कहा, “क्यों? क्या मसीह गलील से आएगा? 42क्या पवित्र शास्त्र में यह नहीं आया कि मसीह दाऊद के वंश से और बैतलहम गाँव से आएगा जहाँ दाऊद रहता था? 43सो उसके कारण लोगों में फूट पड़ी। 44उनमें से कितने उसे पकड़ना चाहते थे, परन्तु किसी ने उस पर हाथ न डाला। (यहुन्ना 7:37-44)

 

यीशु जो कह रहा था वो यह है कि उसके जीवन के मंदिर से ताज़गी भरी, जीवन देने वाली, आत्मा की चंगाई की समर्थ प्रवाहित होगी, जिस पानी के विषय में भविष्यवाणी में कहा गया था। जब मसीह हमारे भीतर रहता है और उसे हमारे उपर शासन और प्रभुता करने के लिए पूर्ण स्वामित्व दिया जाता है, तो यह नदी या धारा, जैसा यीशु ने बताया था, हमारे अस्तित्व के केंद्र से बहेगी। जब मसीह हमारे हृदय के मंदिर के सिंहासन पर विराजमान होता है, तो उसका आत्मा हमारे चारों ओर उपस्थित लोगों के सामने बहता है, जिससे नया जीवन प्राप्त होता है। प्रेरित यहुन्ना यह स्पष्ट कर देता है कि आत्मा उस समय तक इस कारण नहीं दिया गया था क्योंकि अभी तक यीशु को महिमा नहीं मिली थी (पद 39) आत्मा केवल कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए कुछ विशेष व्यक्तियों पर आया था। परमेश्वर ने यह प्रतिज्ञा दी थी कि उसका आत्मा सभी लोगों के जीवनों में आएगा:

 

28उन बातों के बाद में सब प्राणियों पर अपना आत्मा उंडेलूँगा; तुम्हारे बेटे-बेटियाँ भविष्यद्वाणी करेंगी, और तुम्हारे पुरनिये स्वप्न देखेंगे, और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे। 29तुम्हारे दास और दासियों पर भी मैं उन दिनों में अपना आत्मा उंडेलूँगा(योएल 2:28-29)

 

प्रश्न 5) यूहन्ना 7:37-39 के अनुसार, यीशु ने क्या शर्तें बताईं थीं जिनका पूर्ण होना परमेश्वर के आत्मा के हमारे भीतर और हमारे द्वारा बहने के लिए आवश्यक है?

 

इस खंड में परमेश्वर के आत्मा से गहराई से प्राप्त करने के लिए चार शर्तें हैं:

 

1) आपको परमेश्वर से और ज्यादा के लिए प्यासा होना है। क्या आप जीवन जैसा है उससे संतुष्ट हैं? हमारे प्रभु को भूखे और प्यासे लोगों द्वारा खोजे जाना भाता है। जब तक आपकी प्यास बुझ नहीं जाती है तब तक मसीह को न जाने दें। परमेश्वर के पास आपके लिए जो कुछ है वह सब प्राप्त करें। आत्मा के आकर आपको भरने के लिए प्रार्थना में दृढ़ बने रहें।

 

2) आपको मसीह के व्यक्ति के पास आना है। उसने कहा, "उसे मेरे पास आने दो" यह कलीसिया या धार्मिक कार्यों के लिए भक्ति के बारे में नहीं है; यह स्वयं मसीह के पास आने के बारे में है। क्या आपको मसीह के व्यक्ति से प्रेम है? जब यीशु ने तीन बार स्वयं के पतरस द्वारा नकारे जाने बाद उसे पुन:स्थापित किया, तब यीशु ने तीन बार पतरस से पूछा कि क्या वह उससे प्रेम करता है (यहुन्ना 21:15-17), एक सवाल जिसका हम में से प्रत्येक को उत्तर देना है। आत्मा से माँगिए कि वह नई ताज़गी के साथ फिर से आपको वह सब प्रकट करे जो मसीह ने आपके लिए किया है ताकि आप मसीह के साथ बेइंतहा प्रेम में पड़ जाएँ।

 

3) आपको पीना होगा। यह एक खुले, पारदर्शी हृदय द्वारा आत्मा ग्रहण करने के कार्य की बात करता है। भेद्यता और ईमानदारी एक ऐसे हृदय के कुछ चिन्ह लक्षण हैं जो आत्मा द्वारा भरे जाने के लिए तैयार है। अपने मार्ग के बजाय परमेश्वर के मार्ग में जाना इच्छा का एक सचेत निर्णय है। यह जहाँ भी वह अगवाई करे, चरवाहे के पीछे जाने के लिए समर्पण की बात करता है।

 

4) जो भी मसीह में विश्वास करता है, वह प्राप्त करेगा (पद 38)। हम सुसमाचार के तथ्यों के लिए बौद्धिक सहमति के बारे में बात नहीं कर रहे हैं। यह एक गहरी, सहज आंतरिक धारणा है जो नैतिक मूल्यों के एक अलग संग्रह को अपने चरित्र को प्रभावित करने की अनुमति देती है। यीशु ने इसे नए सिरे जन्म पाना कहा है (यहुन्ना 3:3)। विश्वास करने का क्या अर्थ है? यदि यह उन शर्तों में से एक है जिसे परमेश्वर अनिवार्य कहता है, तो हमें इसकी जाँच करने की आवश्यकता है। मसीही धर्म के तथ्यों के बौद्धिक सहमति का अर्थ यह स्वीकार करना है कि यीशु पापियों को बचाने के लिए संसार में आया था, लेकिन जब परमेश्वर विश्वास शब्द के बारे में बात करता है तो वह केवल बौद्धिक सहमति की ही बात नहीं कर रहा। तो, विश्वास करने का क्या अर्थ है?

 

वर्षों पहले, महान कलाबाज़ कार्ल वालेंडा, जिन्हें अन्यथा ब्लोंडिन के नाम से जाना जाता था, ने नियाग्रा फॉल्स के ऊपर लगभग 1000 फीट लम्बा एक तार फैलाया और किसी को भी छोटे एक-पहिया ठेले पर पार कराने की पेशकश की। कई लोग बौद्धिक रूप से विश्वास करते थे कि वह ऐसा कर सकता था, लेकिन कोई भी उसमें बैठने के लिए तैयार न था। एक-पहिया ठेले में बैठना और खाई के उस पार जाना – यही परमेश्वर ने मसीह में जो किया है उससे बौद्धिक सहमति और व्यक्तिगत विश्वास के बीच का अंतर है। एक बौद्धिक विचार प्रक्रिया यह स्वीकार करती है कि एक-पहिया ठेला एक व्यक्ति को नियाग्रा फॉल्स पार करा देगा, लेकिन वह व्यक्ति उसमें बैठ किसी पर उसे फॉल्स पार कराने का भरोसा नहीं करता। व्यक्तिगत विश्वास, या मसीह में विश्वास, परमेश्वर की अगुवाई में चलने और उसकी आवाज़ की आज्ञा मानते हुए उसके लिए जीने के लिए अपनी इच्छा को त्याग देना है।

 

यह चारों बातें, आत्मा द्वारा निर्देशित हो और उसके सामर्थ द्वारा सशक्त विश्वास के जीवन को जीने के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्तें हैं। हम में से प्रत्येक जो मसीह में विश्वास करते हैं उनके पास पवित्र आत्मा है (रोमियों 8:9), लेकिन सवाल यह है, "क्या पवित्र आत्मा के पास हम हैं?" संसार के सबसे आकर्षक लोग वह हैं जो तृप्त हैं और परमेश्वर के आत्मा के नेतृत्व में हैं। परमेश्वर के आत्मा से भरे जाने के लिए, आपको अपने जीवन में स्वयं को अधिकार के सिंहासन से विस्थापित करने की आवश्यकता है। आत्मा के द्वारा भरे और नियंत्रित किए जाने का हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण प्रभु यीशु मसीह हैं। उसके जीवन के उदाहरण का अध्ययन करें, और आप कहीं गलत नहीं जा सकते।

 

साल्वेशन आर्मी के संस्थापक और अग्रणी विलियम बूथ एक बार बीमार थे और एक वर्ष नेतृत्व सम्मेलन में शामिल नहीं हो सके। उनसे पूछा गया कि क्या कोई ऐसी महत्वपूर्ण बात है जो वह अपने अग्वों से करना चाहते हैं। उनके पास उनके लिए कागज़ के टुकड़े पर सिर्फ एक शब्द लिखा था, और यह शब्द "दूसरे" था। उनके अग्वों को दूसरों के प्रति समर्पित होना था। यह मसीह के आत्मा से भरे मनुष्य का हृदय है।

 

जब यहूदी अग्वों ने यीशु को गिरफ्तार करने के लिए मंदिर के दरबान भेजे थे (पद 32), वे उसके बिना वापस आए। उन्होंने वापस आकर मुख्य याजकों और फरीसियों को बताया, किसी मनुष्य ने कभी ऐसी बातें न की” (यहुन्ना 7:46) मसीह की गतिशील उपस्थिति और साहस, साथ ही उसके होंठों से निकले दयालु शब्दों ने मंदिर के दरबानों को यहूदी लोगों के शासकों की अवज्ञा करने को मजबूर किया। पर्व के चरम बिंदु पर उसके संदेश के लिए लोगों की प्रतिक्रिया थी, सचमुच यही वह भविष्यद्वक्ता है।” औरों ने कहा, “यह मसीह है” (पद 40,41) आप क्या सोचते हैं? क्या आप कभी इस निष्कर्ष तक पहुँचे हैं कि यीशु ही मसीह है, संसार और आपके प्राण का उद्धारकर्ता? यदि हाँ, तो आप अपना जीवन उसके लिए क्यों नहीं खोलते और उसे आपके जीवन में अपने आत्मा द्वारा आकर आपको बहुतायत से तृप्त कर उमड़ कर बहने के लिए क्यों नहीं कहते?

 

पिता, क्या आप मेरे जीवन में आएँगे? मैं नए सिरे से जन्म लेना चाहता और आपके आत्मा से भरा होना चाहता हूँ। प्रभु, मुझे अपने लिए प्यासा बना। मैं जीवन के जल को गहराई से पीना चाहता हूँ। मैं अब इस नदी में टखने तक ही गहरा आना नहीं चाहता, न ही घुटने तक। मैं अपने अस्तित्व के हर पहलु में आपके द्वारा नियंत्रित होना और आपका नेतृत्व चाहता हूँ। आमीन!

 

कीथ थॉमस

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