34. The Prayer of Jesus

यीशु की प्रार्थना

34. यीशु की प्रार्थना

यहुन्ना 17:1-26

यहुन्ना के अनुसार सुसमाचार

प्रार्थना के द्वारा चेलों को तैयार करना

यहुन्ना की पुस्तक के हमारे अध्ययन के अंतिम चार अध्यायों में, प्रेरित यहुन्ना यीशु के उन शब्दों और कार्यों को याद करता है जो उसने अपने शिष्यों को उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने के बाद शोक के तीन दिन और फिर उसके पिता के पास उठाए जाने के बाद क्या होगा, इस सब के लिए तैयार करने को कहे थे। जब उन्होंने ऊपरी कक्ष में अंतिम भोज कर लिया और यहूदा उठकर चला गया, उस समय यहुन्ना ने हमें यीशु के वह शब्द दिए, जो उसने गतसमनी के बागीचे की ओर एक मील की यात्रा पर निकलने से पहले कहे थे (14:31)। मंदिर के निकट कहीं रुककर, अध्याय 15 और 16 यीशु की शिक्षा के अंतिम शब्दों के साथ-साथ सांत्वना के शब्दों को भी जारी रखते हैं। सत्रहवें अध्याय में, यीशु प्रार्थना में अपने हृदय का रुख पिता की ओर करता है।

यह यीशु के चरित्र के बारे में बहुत कुछ कहता है, कि जबकि वह अपनी गिरफ्तारी और क्रूस का सामना कर रहा था, वह अपने शिष्यों के लिए चिंतित था। वह उन्हें ऐसे शब्द देने की कोशिश कर रहा था जो कि उनके संकट में उन्हें सांत्वना दें। वह जानता था कि जब वह मार्ग को न अपनाने वाले यहूदी नेतृत्व के हाथों उसकी मृत्यु के बारे में सुनेंगे तो उनका विश्वास पस्त हो जाएगा। पवित्र शास्त्र हमें बताता है कि ग्यारह शिष्यों में से केवल एक, प्रेरित यहुन्ना, उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने के समय पर वहाँ था। सत्रहवाँ अध्याय, यीशु के उनके संग प्रार्थना शुरू करने के साथ ही हमें अंधकार के समय के शुरू होने के और करीब ले जाता है। पिता से उसकी प्रार्थना के तीन भाग हैं। पहले भाग, पद 1-5 में, यीशु स्वयं के लिए प्रार्थना करता है। दूसरा भाग, पद 6-19, शिष्यों के लिए प्रार्थना पर केंद्रित हैं; और अंतिम भाग, पद 20-24, आने वाली पीढ़ियों के सभी विश्वासियों के लिए प्रभु की प्रार्थना है। आइए, यीशु की इस सबसे विशेष प्रार्थना के प्रत्येक भाग पर ध्यान दें।

यीशु स्वयं के लिए प्रार्थना करता है (यहुन्ना 17:1-5)

1यीशु ने ये बातें कहीं और अपनी आँखें आकाश की ओर उठाकर कहा; “हे पिता, वह घड़ी आ पहुँची, अपने पुत्र की महिमा कर, कि पुत्र भी तेरी महिमा करे। 2क्योंकि तू ने उसको सब प्राणियों पर अधिकार दिया, कि जिन्हें तू ने उसको दिया है, उन सब को वह अनन्त जीवन दे। 3और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने। 4जो काम तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है। 5और अब, हे पिता, तू अपने साथ मेरी महिमा उस महिमा से कर जो जगत के होने से पहिले, मेरी तेरे साथ थी। (यहुन्ना 17:1-5)

तीन साल पहले, अपनी सेवकाई की शुरुआत में, यीशु ने एक ऐसे समय की बात की थी जब वह परमेश्वर की महिमा करेगा। गलील के काना में विवाह में, उसने अपनी माँ से कहा, "अभी मेरा समय नहीं आया" (यहुन्ना 2:5) Its actually verse 5 only in hindi । यहुन्ना अध्याय सात (पद 6, 8, 30) में भी तीन बार, उसने फिर से कहा कि उसका समय या क्षण अभी तक नहीं आया है, लेकिन अब, उसके क्रूस पर चढ़ने से कुछ घंटे पहले, उसने प्रार्थना में कहा, “हे पिता, वह घड़ी आ पहुँची, अपने पुत्र की महिमा कर, कि पुत्र भी तेरी महिमा करे” (यहुन्ना 17:1)।

जब यीशु ने क्रूस की महिमा के बारे में बात की तो उसका क्या अर्थ था? (पद 1)। क्रूस पिता के लिए महिमा कैसे लाता है?

परमेश्वर को महिमा मंडित करना

"महिमा" शब्द का अर्थ क्या है? पुराने नियम में, महिमा के लिए सबसे सामान्य इब्रानी शब्द काबोड है, जिसका अर्थ है, "वजन में भारी।" निर्गमन की पुस्तक में, मूसा ने यहोवा से कहा, "मुझे अपनी महिमा दिखा!" (निर्गमन 33:18)। वह क्या मांग रहा था? मूसा स्वर्ग के इस ओर यहोवा के तेज, सौंदर्य, वैभव और ऐश्वर्य को देखने की लालसा रखता था। नए नियम में, जिस यूनानी शब्द से महिमा शब्द का अनुवाद किया गया है, वह डॉकसाज़ो है। इस शब्द का प्रयोग "सुलैमान भी, अपने सारे विभव में" (मत्ती 6:29), और "संसार के सभी राज्यों और उनकी महिमा" (मत्ती 6:8) का वर्णन करने के लिए किया गया है। किसी को महिमामंडित करना किसी व्यक्ति के गुण के महत्व या वजन को पहचानना है। जब यीशु ने अपने पिता की महिमा करने और क्रूस के द्वारा उसे महिमा देने की अपनी इच्छा के बारे में बात की, तो यह पापियों के लिए क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के द्वारा परमेश्वर के प्रेम और दया की विशिष्टता को दिखाना या प्रकट करना है।

संसार के कई धर्म परमेश्वर को कठोर और क्रोधित परमेश्वर के रूप में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन यीशु की पिता के प्रति आज्ञाकारिता में हमें पता चलता है कि परमेश्वर वास्तव में कैसा है। हाँ, वह एक अद्भुत परमेश्वर है, वह जो इंसाफ और न्याय को क्रियान्वित करता है, लेकिन वह प्रेम का भी परमेश्वर है; वह करुणा और दया जो उसके हम दोषी पापियों को अपने निकट लाने के लिए उसकी विशाल कीमत चुकाने की इच्छा में हमें दिखता है। यदि यीशु क्रूस से पहले रुक जाता, तो यह साबित हो जाता कि परमेश्वर का प्रेम जिस हद तक जाएगा, उस प्रेम की भी सीमाएँ हैं। यीशु हमें यह दिखाने के लिए क्रूस पर चढ़ा कि परमेश्वर के प्रेम और दया की कोई सीमा नहीं है। अगर कोई और तरीका हो सकता था, तो क्या आपको नहीं लगता कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को सूली पर चढ़ाने के बजाय उसे चुना होता? क्रूस परमेश्वर की महिमा या उसके महत्व (वजन) को प्रकट करती है और पिता के चरित्र के बारे में बुलंदी से बोलती है।

फिर यीशु अनन्त जीवन के उस उपहार के बारे में प्रार्थना करता है जो वह उन सभी को देता है जिन्हें पिता ने उसे दिया है (पद 2)। यह अनंत जीवन उससे अधिक है कि यह एक ऐसा समय है जिसकी कोई सीमा नहीं। सबसे अधिक, यह जीवन की गुणवत्ता के बारे में है और साथ-साथ समय का माप भी है। सभी मनुष्य अनंतकाल में जीवित रहेंगे; यह सिर्फ इस बारे में है कि हम अनंत काल कहाँ बिताएँगे। मसीह में हमारे पश्चाताप और विश्वास के आधार पर, जीवन का उपहार हमारी अनंत नियति को बदल देता है और एक रूपांतरित करने वाली प्रक्रिया को शुरू करता है जो हमें अंदर से बाहर तक बदलती है; “परन्तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता है, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं” (2 कुरिन्थियों 3:18)। हम इस रूपांतरित करने वाली प्रक्रिया का परिणाम केवल तभी देखेंगे जब हम इस जीवन से अनंत जीवन में प्रवेश करेंगे। हम शरीर के तम्बू में रहने वाली अमर जीव हैं;

और हम इस डेरे में (हमारे नश्वर शरीर) रहते हुए बोझ से दबे कराहते रहते हैं; क्योंकि हम उतारना नहीं, वरन और पहनना चाहते हैं, ताकि वह जो मरनहार है जीवन में डूब जाए। (2 कुरिन्थियों 5:4)

यीशु ने फिर जीवन के इस उपहार का सार बताया जो वह अपने लोगों को देता है; यह पिता और पुत्र को जानना है।

और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने। (पद 3)

जब हम जीवन का उपहार प्राप्त करते हैं, तो पवित्र आत्मा हमारे जीवन में प्रवेश करता है और प्रभु यीशु मसीह के व्यक्ति और कार्य के लिए हमारे मन और हृदय को खोलने का अपना काम शुरू करता है, और साथ ही, हमें यह भी दिखाता है कि पिता कैसा है। जब हम विश्वास करते हैं, यह परमेश्वर के चरित्र की समझ पर आधारित एक बौद्धिक ज्ञान से अधिक है; तब यह एक प्रेम संबंध की शुरुआत है। जब हम अपने लिए परमेश्वर के प्रेम की गहराई को समझते हैं, तो हम बदले में उसे प्रेम कर प्रति-उत्तर देते हैं। जब आदम अदन की वाटिका में अपनी पत्नी के पास गया (उत्पत्ति 4:1), अंग्रेजी किंग जेम्स संस्करण ने इन शब्दों का उपयोग किया, "उसने अपनी पत्नी को जाना।" इब्रानी शब्द, याडा का अर्थ है "जानना" जो “अनुभव करने” के संदर्भ में है। इस संदर्भ में, यह एक पुरुष और स्त्री के बीच सबसे घनिष्ठ संबंध का प्रतीक है, एक दिल से दिल के मिलाप का ज्ञान जो स्वाभाविक रूप से शारीरिक मिलन के द्वारा उस प्रेम की अभिव्यक्ति की ओर जाता है। दुर्भाग्य से, इस तरह की घनिष्ठता को हमेशा वह सम्मान नहीं दिया जाता है जिसका वह हकदार है, जो कि विवाह की वाचा में होता है। पद तीन में, यीशु कह रहा है कि सच्चा विश्वासी परमेश्वर को एक घनिष्ठ, वाचा के संबंध में जान सकता है।

परमेश्वर और उसके लोगों के बीच इस प्रेम संबंध को कैसे विकसित किया जा सकता है? आत्मा हमें मसीह के प्रेम का अनुभव करने में कैसे मदद करता है?

यीशु की अपने शिष्यों के लिए प्रार्थना (यहुन्ना 17:6-19)

6मैंने तेरा नाम उन मनुष्यों पर प्रगट किया जिन्हें तू ने जगत में से मुझे दिया; वे तेरे थे और तू ने उन्हें मुझे दिया और उन्होंने तेरे वचन को मान लिया है। 7अब वे जान गए हैं, कि जो कुछ तू ने मुझे दिया है, सब तेरी ओर से है। 8क्योंकि जो बातें तू ने मुझे पहुँचा दीं, मैंने उन्हें उन को पहुँचा दिया और उन्होंने उन को ग्रहण किया: और सच सच जान लिया है, कि मैं तेरी ओर से निकला हूँ, और प्रतीति कर ली है कि तू ही ने मुझे भेजा। 9मैं उनके लिये विनती करता हूँ, संसार के लिये विनती नहीं करता हूँ परन्तु उन्हीं के लिये जिन्हें तू ने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे हैं। 10और जो कुछ मेरा है वह सब तेरा है; और जो तेरा है वह मेरा है; और इन से मेरी महिमा प्रगट हुई है। 11मैं आगे को जगत में न रहूँगा, परन्तु ये जगत में रहेंगे, और मैं तेरे पास आता हूँ; हे पवित्र पिता, अपने उस नाम से जो तू ने मुझे दिया है, उनकी रक्षा कर, कि वे हमारी नाईं एक हों। 12जब मैं उनके साथ था, तो मैं ने तेरे उस नाम से, जो तू ने मुझे दिया है, उनकी रक्षा की, मैंने उनकी चौकसी की और विनाश के पुत्र को छोड़ उन में से कोई नाश न हुआ, इसलिये कि पवित्र शास्त्र की बात पूरी हो। 13परन्तु अब मैं तेरे पास आता हूँ, और ये बातें जगत में कहता हूँ, कि वे मेरा आनन्द अपने में पूरा पाएं। 14मैंने तेरा वचन उन्हें पहुँचा दिया है, और संसार ने उनसे बैर किया, क्योंकि जैसा मैं संसार का नहीं, वैसे ही वे भी संसार के नहीं। 15मैं यह विनती नहीं करता, कि तू उन्हें जगत से उठा ले, परन्तु यह कि तू उन्हें उस दुष्ट से बचाए रख। 16जैसे मैं संसार का नहीं, वैसे ही वे भी संसार के नहीं। 17सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर; तेरा वचन सत्य है। 18जैसे तू ने जगत में मुझे भेजा, वैसे ही मैंने भी उन्हें जगत में भेजा। 19और उनके लिये मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएं। (यहुन्ना 17:6-19)

फिर यीशु ने परमेश्वर के उस वचन के महत्व के बारे में प्रार्थना की जिसे उसने शिष्यों के साथ बाँटा था (पद 6-8, 14)। परमेश्वर के वचन के महत्व को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। चौदहवीं शताब्दी अंत में, जब जॉन विक्लिफ ने पुराने और नए नियम का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया था, तब बाइबिल के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाने के लिए और इसे बस लैटिन भाषा में केवल मंच से ही प्रचार करने की अनुमति देने की कोशिश के भरसक प्रयास किए गए, ताकि आम लोग इसे समझ न सकें। शैतान की लोगों को परमेश्वर के वचन के प्रकाश से दूर धर्म के बंधन में बांधे रखने की मंशा थी। आज, अलौकिक दुष्ट शक्तियाँ परमेश्वर के वचन को कई भाषाओं में प्रकाशित होने से नहीं रोक सकतीं, इसलिए हमारा शत्रु सामान्य लोगों को इतना व्यस्त रखने के लिए रणनीति बनाता है कि उनके पास प्रभु यीशु के ज्ञान में बढ़ने के लिए पढ़ने और मनन करने का समय नहीं है।

एक समय में, पूरे परिवार को चलाने और उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए केवल एक वेतन की आवश्यकता थी। अब, हमें मेज़ पर खाना उपलब्ध कराने और अपने घरों के कर्ज़ उतारने के लिए हर किसी के काम करने की ज़रूरत है, और इसमें कुत्ते और बिल्ली भी शामिल हैं! जबकि अधिकांश देशों में आज लोगों के लिए परमेश्वर का वचन अधिक आसानी से उपलब्ध है, फिर भी मीडिया हम पर इस तरह से हावी हो जाता है कि हमारे पास इस पर ध्यान करने के लिए बहुत कम समय है। हमें इस बात से अवगत रहना चाहिए कि शैतान का प्राथमिक उद्देश्य किसी भी तरह से परमेश्वर के वचन को दबाए रखना है। परमेश्वर का वचन सुनना आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है? यीशु ने कहा कि यह एक विश्वासी को रूपांतरित करने के लिए परमेश्वर का माध्यम या ज़रिया है; “सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर; तेरा वचन सत्य है” (पद 17)। ग्यारह शिष्यों ने परमेश्वर के वचन को सुना, महत्व दिया और उसका पालन किया (यहुन्ना 17: 6)।

मसीही धर्म के शुरुआती दिनों में वचन का प्रचार और उसकी सेवकाई कितनी महत्वपूर्ण थी? जब इज़राइल की भूमि में रहने वाले यहूदियों और यूनानी भाषी इब्रानियों के बीच एक विवाद उत्पन्न हुआ, यह कि उनके बीच विधवाओं के साथ भोजन को प्रतिदिन बाँटने के संबंध में गलत व्यवहार किया जा रहा था, तो प्रेरितों ने इस विषय का प्रशासन और अच्छी तरह देखरेख करने के लिए अपना अधिक समय देने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, उन्होंने यह कहते हुए सात लोगों को चुन ऐसी परिस्थितियों का प्रबंधन करने के लिए एक समिति बनाई, "अपने में से सात सुनाम पुरूषों को जो पवित्र आत्मा और बुद्धि से परिपूर्ण हों, चुन लो, कि हम उन्हें इस काम पर ठहरा दें।

4 परन्तु हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे" (प्रेरितों के कार्य 6:3-4)। उन्होंने जाना कि कलीसिया के जीवन और विकास में सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसके अगवे प्रार्थना करने और पवित्र-शास्त्र सिखाना जारी रखने वाले जन हों। आज के इस आधुनिक युग में कई कलीसियाएँ अपने पासबानों से सी.ई.ओ बनने की उम्मीद करती हैं जबकि उन्हें आवश्यकता परमेश्वर के वचन को सिखाने की है। आत्मा का आशीष और अभिषेक उन कलीसियाओं पर होगा जिनका ज़ोर सेवकाई के इन दो क्षेत्रों पर है।

फिर यीशु ने चेलों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना की। उसने कहा, "अपने उस नाम से जो तू ने मुझे दिया है, उनकी रक्षा कर, कि वे हमारी नाईं एक हों" (यहुन्ना 17:11)। पुराने नियम के लिखे जाने के समय में, कभी-कभी नाम उस समय जारी घटनाओं को व्यक्त करने या किसी व्यक्ति के चरित्र के आधार पर दिए जाते थे। उदाहरण के लिए, पलिश्तियों के साथ एक लड़ाई के दौरान, जब महायाजक एली और उसके बेटों की मृत्यु हो गई, और वाचा का सन्दूक चोरी हो गया, उसी समय पैदा हुए एली के पोते का नाम ईकाबोद रखा गया। ईकाबोद एक निराशाजनक नाम है; इसका मतलब है कि महिमा उठ गई (1 शमूएल 4:21)। आपको इस नाम के साथ बड़े होना कैसा लगेगा? याक़ूब को जन्म के समय दिए गए नाम का अर्थ बेईमान, धोखेबाज या ठग था, और उसका चरित्र ठीक उसी तरह निकला जैसा उसका नाम बताता है। कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर ने अंतत: उसका सामना किया और उसका हृदय और चरित्र बदला; उसका नाम इज़राइल, परमेश्वर संग राजकुमार (उत्पत्ति 32:28), में बदल दिया गया।

यीशु के नाम का क्या अर्थ है? इससे परमेश्वर के स्वरूप के विषय में कुछ पता चलता है। यीशु ने अपनी प्रार्थना में पिता से कहा, "अपने उस नाम से जो तू ने मुझे दिया है, उनकी रक्षा कर" (पद 11)। इब्रानी भाषा में, अँग्रेजी अक्षर जे है ही नहीं। इब्रानी में यीशु का नाम येशुआ या येहोशुआ है, जिसका अर्थ है "यहोवा उद्धार है" या "यहोवा बचाता है।" यीशु ने आत्म-बलिदान के अपने आज्ञाकारी कार्य से परमेश्वर के चरित्र को प्रकट किया और पिता को महिमा दी, अर्थात, अपने जीवन को देना ताकि उसके लोगों को बचाया जा सके।

दुष्ट से शिष्यों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना

यीशु ने फिर पंद्रहवें वचन में प्रार्थना की कि पिता हमें संसार से बाहर निकालकर नहीं, बल्कि हमारे संसार में रहते हुए भी दुष्ट से बचाकर हमारी रक्षा करे। "मैं यह विनती नहीं करता, कि तू उन्हें जगत से उठा ले, परन्तु यह कि तू उन्हें उस दुष्ट से बचाए रख" (यहुन्ना 17:15)।

प्रभु जानता था कि उसके शिष्यों को इस वर्तमान दुष्ट संसार में काम करने वाली बुराई से सुरक्षा की आवश्यकता होगी। यह विचार कितना सुंदर है कि यीशु केवल उनकी सुरक्षा के लिए ही प्रार्थना नहीं कर रहा था, बल्कि उन सभी के लिए भी जो एक दिन उसे जानेंगे! याद रखें कि परमेश्वर समय के बंधन से बाहर है। गतसमनी के बगीचे के रास्ते में इस प्रार्थना में, यदि आप उसके चेलों में से एक हैं, तो वह आपके लिए प्रार्थना कर रहा था (पद 20)। उस रात के दौरान आप उसकी चिंता और प्रार्थना का केंद्र थे। कितना अद्भुत है! मैं परमेश्वर की सुरक्षा की एक व्यक्तिगत कहानी साझा करना चाहता हूँ, जिसे मैं कभी नहीं भूलूंगा;

मेरे पिता ने अपने लिए एक नई वाणिज्यिक मछली पकड़ने के जहाज़ का निर्माण कराया। इसे पूरा करने में तीन साल से अधिक का समय लगा। जैसे ही पैंतालीस फुट का जहाज पूरा होने वाला था, इंग्लैंड के हार्वे, एसेक्स के पूर्वी तट के उत्तर सागर में मछलियों के विशाल झुण्डों के साथ मच्छी पकड़ने का मौसम शुरू हो गया। हमने बहुत जल्दबाजी में नए जहाज़ को पानी में उतार दिया और तुरंत ही मछली के एक बड़े झुण्ड के बीच में घुस गया। हमने उस दिन लगभग चौंतीस टन मछलियाँ पकड़ीं और उन दोनों नावों को भरना शुरू कर दिया जो हमारे पास थीं। बड़े जाल को दो जहाजों, व्हाई वरी और मेरे पिता की नई जहाज़, जेन मैरी के बीच ढोया जा रहा था। जैसे जैसे हमने मछलियों को पकड़ में डालना शुरू किया, जेन मैरी पानी में और नीचे जाती रही और पूरे जहाज़ पर मच्छियों का ढेर लग गया था। जैसे-जैसे दिन ढलता गया, वैसे-वैसे मौसम एक भयानक तूफान में बादल गया। जब हम अपने बन्दरगाह की ओर बढ़ रहे थे, तो जहाज़ के पानी में काफी अंदर होने के कारण लहरें जहाज़ के भीतर आने लगीं। तब हमें एहसास हुआ कि हमने एक भयानक गलती की थी; हमने जहाज़ के भीतर से पानी को निकालने के लिए परनाले (डेक स्तर पर छेद) नहीं काटे थे।

जैसे-जैसे लहरें जहाज़ से टकरातीं, क्योंकि पानी के निकास का रास्ता नहीं था, इसलिए जहाज़ डूबने लगा। जेन मैरी (मेरी बहन के नाम पर) में आगे दो कमरे थे जिनमें पानी नहीं घुस सकता था। जहाज का पिछला आधा हिस्सा पूरी तरह से पानी के नीचे था, जिसमें रेल और रोलर्स पूरी तरह से पानी के नीचे थे। किसी जहाज़ पर होना और उस जहाज़ का पानी के नीचे होना एक अजीब सी बात है। जहाज़ पर से जाल और हैच पानी में तैर दूर जा रहे थे। मैंने अपने जूते उतार फैक दिए ताकि अगर जेन मैरी डूब जाए तो मेरे तंग जूते पानी से भर कर मुझे जहाज़ के नीचे खींच डुबा न दें। इंजन कक्ष और चालक कक्ष हमें बचाए हुए थे, लेकिन जहाज़ के कोण के कारण हम आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। हमारा दूसरा जहाज़, व्हाई वरी हमें खींच बन्दरगाह तक लेकर आया। मैंने तब फैसला किया कि मुझे तैरना सीखना होगा। मैंने हमेशा अपने जीवन में पीछे मुड़कर ऐसी घटनाओं को देखा है और महसूस किया है कि परमेश्वर ने मुझे बचाने के लिए मेरे ऊपर स्वर्गदूतों का पहरा रखा था।

क्या वे सब सेवा टहल करने वाली आत्माएं नहीं; जो उद्धार पाने वालों के लिये सेवा करने  को भेजी जाती हैं? (इब्रानियों 1:14)

ऊपर दिया गया खंड स्वर्गदूतों के बारे में बात करता है, जो उन लोगों की सेवा करने के लिए भेजी गई आत्माएँ हैं, जो उद्धार के उत्तराधिकारी होंगे, अर्थात् यहाँ भविष्य काल का प्रयोग किया गया है। हमारे मसीह में आने से पहले भी, पिता हमारी रक्षा के लिए हमारे जीवन में कार्य कर रहा था, भले ही हमने अभी तक यीशु के लिए अपना जीवन समर्पित नहीं किया था। पिता, जो समय के बंधन से बाहर है और सभी चीजों को जानता है, वह उन सभी को जानता है जो सुसमाचार के आह्वान का प्रतिउत्तर देंगे और उन्हें दुष्ट से बचाता है। यीशु ने हमारे लिए प्रार्थना की कि परमेश्वर हमारी रक्षा करे। हम सभी विश्वासी संभवतः अपने जीवन में पीछे मुड़ कर देख सकते हैं कि विश्वासी होने से पहले ही प्रभु हमारे जीवन में कैसे काम कर रहा था।

उन विभिन्न तरीकों को साझा करें जिनसे प्रभु ने आपको दुष्ट से बचाया है? क्या वह हमारी रक्षा के लिए केवल स्वर्गदूतों का उपयोग करता है? अपनी उन कहानियों को साझा करें जहाँ आपको लगता है कि प्रभु ने आपकी रक्षा करने के लिए हस्तक्षेप किया है।

यीशु ने कहा कि हमें संसार में रहना है, लेकिन फिर भी संसार का नहीं होना (यहुन्ना 17:15-17)। एक मसीही को मेरे पिता के मछली पकड़ने वाले जहाज़ की तरह बनना है। जब तक पानी बाहर की तरफ था, सब अच्छा था, लेकिन जब पानी जहाज़ में रिसना शुरू होता है, तो चीजें बहुत बुरी होने लगतीं हैं। संसार को हमारे जीवन के बाहर होना है। एक बार जब हम इस संसार की भ्रष्ट चीजों को अपने जीवन के आंतरिक हिस्से में बसने की अनुमति देना शुरू कर देते हैं, तो हम अपना आनंद और शांति खो देते हैं, और जो अंदर है वह बाहर की ओर बहेगा; "जो मुंह में जाता है, वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता, पर जो मुंह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है” (मत्ती 15:11)।

यीशु सभी विश्वासियों में एकता के लिए प्रार्थना करता है (यहुन्ना 17:20-26)

20मैं केवल इन्हीं के लिये विनती नहीं करता, परन्तु उन के लिये भी जो इन के वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, कि वे सब एक हों। 21जैसा तू हे पिता मुझ में हैं, और मैं तुझ में हूँ, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिये कि जगत प्रतीति करे, कि तू ही ने मुझे भेजा। 22और वह महिमा जो तू ने मुझे दी, मैंने उन्हें दी है कि वे वैसे ही एक हों जैसे की हम एक हैं। 23मैं उन में और तू मुझ में कि वे सिद्ध होकर एक हो जाएं, और जगत जाने कि तू ही ने मुझे भेजा, और जैसा तू ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही उन से प्रेम रखा। 24हे पिता, मैं चाहता हूँ कि जिन्हें तू ने मुझे दिया है, जहाँ मैं हूँ, वहाँ वे भी मेरे साथ हों कि वे मेरी उस महिमा को देखें जो तू ने मुझे दी है, क्योंकि तू ने जगत की उत्पत्ति से पहले मुझसे प्रेम रखा। 25हे धामिर्क पिता, संसार ने मुझे नहीं जाना, परन्तु मैंने तुझे जाना और इन्होंने भी जाना कि तू ही ने मुझे भेजा। 26और मैं ने तेरा नाम उन को बताया और बताता रहूँगा कि जो प्रेम तुझ को मुझ से था, वह उन में रहे और मैं उन में रहूँ। (यहुन्ना 17:15)

यीशु ने वचन 21 में प्रार्थना की कि जो लोग उस पर विश्वास करते हैं वे एक हों। क्या आपको लगता है कि यीशु के लौटने से पहले इस प्रार्थना का उत्तर दिया जाएगा? यदि हाँ, तो एकता बनाने के लिए विश्वासियों के बीच क्या होना चाहिए? विश्वासियों के बीच एकता इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

मेरा मानना ​​है कि विश्वासियों के बीच एकता ऐसी बात है जिसे प्रभु अंतिम दिनों में मसीह की देह में पूरा करेगा। संसार की आत्मा बहुत तेजी से मसीही विरोधी बन रही है। मेरा मानना ​​है कि हम एक ऐसा समय देखेंगे जब विश्वासियों के बीच कोई फर्क नहीं पड़ेगा यदि आप एक बैपटिस्ट, मेथोडिस्ट, प्रेस्बिटेरियन, विनयार्ड, आदि हैं। केवल यह मायने रखेगा कि आप अपने जीवन के केंद्र में यीशु मसीह के लिए खड़े रहेंगे और यह कि आप विश्वासियों के परिवार से प्रेम करते हैं। यह एक ऐसा समय होगा जब शुरुआती कलीसिया के विश्वासियों ने हृदय की एकता का अनुभव किया था; "ये सब कई स्त्रियों और यीशु की माता मरियम और उसके भाइयों के साथ एक चित्त होकर प्रार्थना में लगे रहे" (प्रेरितों के कार्य 1:14)। यह इस एकता के कारण था कि पवित्र आत्मा पिनतेकूस्त के दिन महान सामर्थ में आया था। अंग्रेजी एन.आई.वी ने यूनानी शब्द होमोथुमादोन का अनुवाद ऐसे किया है, "एक चित्त होकर प्रार्थना में लगे रहे”। होमोथुमादोन दो शब्दों का एक समास है जिनका का अर्थ है, "साथ में तेज़ चलना" और "एक ताल में।" यह छवि लगभग संगीतमय है; कई सुर छेड़े गए हैं, जो अलग-अलग होते हैं, लेकिन स्वरमान और ताल में सामंजस्य होता है। एक चित्त होना या आत्मा की एकता में एक साथ होना एक महान संगीत के कार्यक्रम के समान है जहाँ मुख्य संगीत संचालक, पवित्र-आत्मा के निर्देशन में मसीह की कलीसिया के सदस्य मसीह के लिए और एक दूसरे के लिए समर्पित हैं। जब कलीसिया में एकता होती है, तो उसके बीच में परमेश्वर की एक अनूठी उपस्थिति होती है;

1देखो, यह क्या ही भली और मनोहर बात है कि भाई लोग आपस में मिले रहें! 2यह तो उस उत्तम तेल के समान है, जो हारून के सिर पर डाला गया था, और उसकी दाढ़ी पर बह कर, उसके वस्त्र की छोर तक पहुंच गया। 3वह हेर्मोन की उस ओस के समान है, जो सिय्योन के पहाड़ों पर गिरती है! यहोवा ने तो वहीं सदा के जीवन की आशीष ठहराई है (भजन 133:1-3)

मेरा मानना ​​है कि हृदय की एकता ही वह स्थान है जहाँ पवित्र आत्मा प्रभु यीशु की कलीसिया का नेतृत्व करेगा। प्रभु परेशानी के समय आने देगा ताकि हम जरूरत के बीच एक दूसरे पर और प्रभु पर झुकना सीखें। परमेश्वर के राज्य के लिए हृदय और मन की एकता उस अभिषेक की तरह होगी जो उसकी नियुक्ति पर महायाजक हारून पर उतर आया था। अभिषेक के तेल की उपस्थिति उसके जीवन पर आत्मा की उपस्थिति का संकेत था, और यह वहीं था कि प्रभु ने उसे आशीष दी, यहाँ तक ​​कि अनंत जीवन की आशीष।

जब हम पिछले दो हज़ार वर्षों में यीशु मसीह की कलीसिया के इतिहास पर नज़र डालते हैं, तो हम हमारे बीच शैतान के विभाजन के कार्य का एक शर्मनाक अभिलेख देखते हैं। मैं एक बात जानता हूँ कि वह हर प्रार्थना जो यीशु ने की, उसका उत्तर दिया जाएगा, क्योंकि वह हर प्रार्थना पिता के हृदय से आती है। यीशु ने कहा, "क्योंकि मैंने अपनी ओर से बातें नहीं कीं, परन्तु पिता जिसने मुझे भेजा है उसी ने मुझे आज्ञा दी है, कि क्या क्या कहूँ और क्या क्या बोलूँ" (यहुन्ना 12:49)। हम उन दिनों में जी रहे हैं जब परमेश्वर मसीह की प्रार्थना को पूरा करेगा और अपनी कलीसिया में एकता को लाएगा। हो सकता है, आप आत्मा से उस एकता को लाने के लिए प्रार्थना करना चाहते हों, अर्थात, संसार के लिए पृथ्वी पर मसीह के उद्देश्य की अलौकिकता की एक प्रत्यक्ष बात; "मैं उन में और तू मुझ में कि वे सिद्ध होकर एक हो जाएं, और जगत जाने कि तू ही ने मुझे भेजा, और जैसा तू ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही उन से प्रेम रखा” (यहुन्ना 17:23)।

पिता, इन दिनों में जिनमें हम रहते हैं, क्या आप अपने लोगों को वह सब होने के लिए तैयार, प्रशिक्षित और सशक्त बना सकते हैं, जिसकी इच्छा आपने रखी है। हम में से प्रत्येक को आत्मा की एकता को प्रकट करने के लिए और संसार को यह साबित करने के लिए उपयोग करें कि आपने अपने पुत्र को संसार में पुरुषों और स्त्रीयों का आपस में मेल-मिलाप कराने के लिए भेजा है। आमिन!

कीथ थॉमस

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